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Showing posts from June, 2021

02. || बेताल पच्चीसी - पहली कहानी || पति कौन ?

यमुना के किनारे धर्मस्थान नामक एक नगर था। उस नगर में गणाधिप नाम का राजा राज करता था। उसी में केशव नाम का एक ब्राह्मण भी रहता था। ब्राह्मण यमुना के तट पर जप-तप किया करता था। उसकी एक पुत्री थी, जिसका नाम मालती था। वह बड़ी रूपवती थी। जब वह ब्याह के योग्य हुई तो उसके माता, पिता और भाई को चिन्ता हुई। संयोग से एक दिन जब ब्राह्मण अपने किसी यजमान की बारात में गया था और भाई पढ़ने गया था, तभी उनके घर में एक ब्राह्मण का लड़का आया। लड़की की माँ ने उसके रूप और गुणों को देखकर उससे कहा कि मैं तुमसे अपनी लडकी का ब्याह करूँगी। होनहार की बात कि उधर ब्राह्मण पिता को भी एक दूसरा लड़का मिल गया और उसने उस लड़के को भी यही वचन दे दिया। उधर ब्राह्मण का लड़का जहाँ पढ़ने गया था, वहाँ वह एक लड़के से यही वादा कर आया। कुछ समय बाद बाप-बेटे घर में इकट्ठे हुए तो देखते क्या हैं कि वहाँ एक तीसरा लड़का और मौजूद है। दो उनके साथ आये थे। अब क्या हो? ब्राह्मण, उसका लड़का और ब्राह्मणी बड़े सोच में पड़े। दैवयोग से हुआ क्या कि लड़की को साँप ने काट लिया और वह मर गयी। उसके बाप, भाई और तीनों लड़कों ने बड़ी भाग-दौड़ की, ज़हर झाड़ने...

01. || बेताल पच्चीसी - पहली कहानी || पापी कौन ?

|| बेताल पच्चीसी - पहली कहानी || पापी कौन ?  काशी में प्रतापमुकुट नाम का राजा राज्य करता था। उसके वज्रमुकुट नाम का एक बेटा था। एक दिन राजकुमार दीवान के लड़के को साथ लेकर शिकार खेलने जंगल गया। घूमते-घूमते उन्हें तालाब मिला। उसके पानी में कमल खिले थे और हंस किलोल कर रहे थे। किनारों पर घने पेड़ थे, जिन पर पक्षी चहचहा रहे थे। दोनों मित्र वहाँ रुक गये और तालाब के पानी में हाथ-मुँह धोकर ऊपर महादेव के मन्दिर पर गये। घोड़ों को उन्होंने मन्दिर के बाहर बाँध दिया। वो मन्दिर में दर्शन करके बाहर आये तो देखते क्या हैं कि तालाब के किनारे राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ स्नान करने आई है। दीवान का लड़का तो वहीं एक पेड़ के नीचे बैठा रहा, पर राजकुमार से न रहा गया। वह आगे बढ़ गया। राजकुमारी ने उसकी ओर देखा तो वह उस पर मोहित हो गया। राजकुमारी भी उसकी तरफ़ देखती रही। फिर उसने किया क्या कि जूड़े में से कमल का फूल निकाला, कान से लगाया, दाँत से कुतरा, पैर के नीचे दबाया और फिर छाती से लगा, अपनी सखियों के साथ चली गयी। उसके जाने पर राजकुमार निराश हो अपने मित्र के पास आया और सब हाल सुनाकर बोला, “मैं इस राजकुमार...

00. || बेताल पच्चीसी - कहानी का प्रारंभ ||

00. || बेताल पच्चीसी - कहानी का प्रारंभ || विक्रम बेताल की प्रारंभिक कहानी  कुछ इस प्रकार है। बहुत समय पहले की बात है। उज्जयनी नाम के राज्य में राजा विक्रामादित्य राज किया करते थे। राजा विक्रामादित्य की न्यायप्रियता, कर्तव्यनिष्ठता और दानशीलता के चर्चे पूरे देश में मशहूर थे। यही कारण था कि दूर-दूर से लोग उनके दरबार में न्याय मांगने आया करते थे। राजा हर दिन अपने दरबार में लोगों की तकलीफों को सुनते और उनका निवारण किया करते थे। एक दिन की बात है। राजदरबार लगा हुआ था। तभी एक भिक्षु विक्रमादित्य के दरबार में आता है और एक फल राजा को देकर चला जाता है। राजा उस फल को कोषाध्यक्ष को दे देता है। उस दिन के बाद से हर रोज वह भिक्षु राजा के दरबार में आने लगा। उसका रोज का काम यही था कि वह राजा को फल देता और चुपचाप चला जाता। राजा भी प्रत्येक दिन भिक्षु द्वारा दिया गया फल कोषाध्यक्ष को थमा देता। ऐसे करते-करते करीब 10 साल बीत गए। एक दिन जब भिक्षु फिर राजा के दरबार में आकर फल देता है, तो इस बार राजा फल कोषाध्यक्ष को न देकर वहां मौजूद एक पालतू बंदर के बच्चे को दे देते हैं। यह बंदर किसी सुरक्षाकर्मी का था...

103. विक्रम बैताल || कहानी 03 || यह रिश्ता मंजूर नहीं ||

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*  यह रिश्ता  मंजूर नहीं। * 🙏🏻🚩🌹   👁❗👁   🌹🚩🙏🏻 103. विक्रम बैताल || कहानी 03 || यह रिश्ता मंजूर नहीं || उचित समय आने पर राजा अकेला योगी के मठ पर जा पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा विक्रम ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?” योगी ने कहा, “राजन्, यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर शमशान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।” यह सुनकर राजा विक्रम अपने वचन को पूरा करने के लिए शमशान की ओर चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन हर बाधा को दूर करते हुए निडर राजा विक्रम आगे बढ़ता गया।  जब वह शमशान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-ह...

32. तुलसी के राम (एक धार्मिक कथा)

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32. तुलसी के राम (एक धार्मिक कथा) एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज को किसी ने बताया कि जगन्नाथ जी में तो साक्षात भगवान ही दर्शन देते हैं। बस फिर क्या था सुनकर तुलसीदास जी महाराज तो बहुत ही प्रसन्न हुए और अपने इष्टदेव भगवान श्री राम का दर्शन करने श्रीजगन्नाथपुरी को चल दिए। महीनों की कठिन और थका देने वाली यात्रा के उपरांत जब वे जगन्नाथ पुरी पहुंचे तो मंदिर में भक्तों की भीड़ देख कर बड़े प्रसन्नमन से मंदिर के अंदर प्रविष्ट हुए। जगन्नाथ जी का प्रस्तर मूर्ति रुप में दर्शन करते ही उन्हें बड़ा धक्का सा लगा। वह निराश हो गये। और विचार करने लगे कि यह हस्तपादविहीन देव हमारे इस जगत में सबसे सुंदर नेत्रों को सुख देने वाले मेरे इष्ट श्री राम नहीं हो सकते। इस दुखी मन से मूवी मंदिर से बाहर निकल कर मंदिर से कुछ दूर एक वृक्ष के नीचे बैठ गये।  वे सोचने लगे कि उनका इतनी दूर आना ब्यर्थ हुआ। क्या गोलाकार नेत्रों वाला हस्तपादविहीन दारुदेव मेरा राम हो सकता है ? कदापि नहीं। रात्रि हो गयी, थके-माँदे, भूखे-प्यासे तुलसी का अंग-अंग टूट रहा था। अचानक एक आहट हुई। वे उस आहट को ध्यान से सुनने लगे। "अरे बाबा ! ब...

102. विक्रम बैताल || कहानी 02 || हिसाब बराबर ||

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हिसाब बराबर 🙏🏻🚩🌹   👁❗👁   🌹🚩🙏🏻 102. विक्रम बैताल || कहानी 02 || हिसाब बराबर || उचित समय आने पर राजा अकेला योगी के मठ पर जा पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा विक्रम ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?” योगी ने कहा, “राजन्, यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर श्मशान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।” यह सुनकर राजा विक्रम अपनी वचन को पूरा करने के लिए शमशान की ओर चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन हर बाधा को दूर करते हुए निडर राजा विक्रम आगे बढ़ता गया।  जब वह शमशान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव न...

31. नाचने गए हैं। (नाम का पंगा 🤣) [हास्य]

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31. नाचने गए हैं। (नाम का पंगा 🤣) [हास्य] जैसलमेर से बीकानेर बस रुट पर.... बीच में एक बड़ा सा गाँव है जिसका नाम है * नाचने *   वहाँ से बस आती है तो लोग कहते है कि  * नाचने वाली बस आ गयी ..*😎  कंडक्टर भी बस रुकते ही चिल्लाता..  * नाचने वाली सवारियाँ उतर जाएं बस आगे जाएगी. .*😎 इमरजेंसी में रॉ का एक नौजवान अधिकारी जैसलमेर आया  रात बहुत हो चुकी थी, वह सीधा थाने पहुँचा और ड्यूटी पर तैनात सिपाही से पूछा - * थानेदार साहब कहाँ हैं ? * सिपाही ने जवाब दिया थानेदार साहब * नाचने* गये हैं.. 😎 अफसर का माथा ठनका उसने पूछा डिप्टी साहब कहाँ हैं..? सिपाही ने विनम्रता से जवाब दिया- हुकुम 🙏🏻 * डिप्टी साहब भी नाचने* गये हैं ..😎 अफसर को लगा सिपाही अफीम की पिन्नक में है, उसने एसपी के निवास पर फोन📞 किया। एस.पी. साहब हैं ? जवाब मिला * नाचने* गये हैं. .!! लेकिन *नाचने* कहाँ गए हैं, ये तो बताइए ? बताया न *नाचने* गए हैं, सुबह तक आ जायेंगे। कलेक्टर के घर फोन लगाया वहाँ भी यही जवाब मिला, साहब तो *नाचने* गये हैं.. अफसर का दिमाग खराब हो गया, ये हो क्या रहा है इस सीमावर्ती जिले में और वो...

30. हे राम मुझे एक साली दो (हास्य कविता)

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30. हे राम मुझे एक साली दो (हास्य कविता) हे राम मुझे एक साली दो गोरी दो या काली दो सीधी दो या नखरे वाली दो हे राम मुझे एक साली दो। मोटी हो चाहें ककड़ी सी पतली हो चाहे हाथी सी गोरी हो चाहे  तवे के जैसी चाहे काली हो  वह दूध के जैसी सीधी दो या लड़ने वाली दो  हे राम मुझे एक साली दो गोरी दो या काली दो। मीठी हो चाहें करेले सी चाहें कडवी हो रसगुल्ले सी लम्बी हो चाहें बकरी जैसी नाटी हो वे ऊँट जैसी साधारण दो या निराली दो असली दो या जाली दो हे राम मुझे एक साली दो गोरी दो या काली दो। बोली हो चाहें कोए जैसी या ककर्ष हो कोयल जैसी चाहे मोरनी हो दुल्लती झाड़ या कछुए जैसी सरपट चाल चाहे बबूल सी डाली दो या चम्पा सी कांटो वाली दो हे राम मुझे एक साली दो गोरी दो या काली दो। लेखक ॐ   जितेन्द्र सिंह तोमर [औरत की व्यथा (कविता संग्रह) से साभार]

101. विक्रम बैताल || कहानी 01|| तीन पुतले ||

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101. विक्रम बैताल || कहानी 01|| तीन पुतले || राजा ने कहा “अच्छी बात है।” इसके उपरान्त योगी दिन और समय बताकर अपने मठ में चला गया। वह दिन आने पर राजा अकेला वहाँ पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?” योगी ने कहा, “राजन्, “यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर मसान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा लटका है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।” यह सुनकर राजा वहाँ से चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन राजा हिम्मत से आगे बढ़ता गया। जब वह मसान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे किर पड़ा और ...

100. विक्रम बैताल || कहानी 00 || कहानी का प्रारंभ व तीन पुतले ||

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कहा यह भी जाता हैं कि इन कहानियों को बेताल भट्ट ने लिखा था, जो कि राजा विक्रमादित्य के खास पाँच लोगों में से एक था. और लेखक ने इसमे राजा विक्रमादित्य के न्याय को कहानियों के रूप में संग्रहीत किया हैं. विक्रम बेताल की कहानियां, जिसे बेताल पच्चीसी के नाम से भी जाना जाता है। यह 25 कहानियों का संग्रह है, जिसमें कई प्ररेणादायक और नेतृत्व क्षमता को बढ़ाने वाली कहानियां शामिल हैं। इन सभी कहानियों को बेताल (एक पिशाच) तब सुनाता है, जब राजा विक्रम उसे जंगल से पकड़कर एक योगी के पास ले जा रहे होते हैं।हर बार बेताल रास्ता लंबा होने के कारण राजा विक्रम को कहानी सुनाता, जिन कहानियों का संग्रह विक्रम बेताल की कहानियों के नाम से प्रसिद्ध है। कहानी सुनाने से पहले बेताल, राजा के सामने एक शर्त भी रखता था कि अगर कहानी खत्म होने के बाद उसने मुंह से आवाज निकाली, तो वो वापस उड़कर पेड़ से लटक जाएगा। उधर, जब भी बेताल कहानी सुनाकर खत्म करता, तो राजा एक सवाल पूछता और कहता, राजन अगर तुमने जवाब पता होने पर भी नहीं दिया, तो मैं तुम्हारा सिर तोड़ दूंगा। इस वजह से राजा को मजबूर होकर जवाब देना पड़ता था और पहली शर्त के ...

29. तब कहानी कुछ और ही हो

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29. तब कहानी कुछ और ही होती।             (एक संत के विचार) पिछले कुछ दिनों से मौत मोहल्ले में ही घूम रही है। पिछले सोमवार पिछली गली से चढ़ेतीलाल जी मौत के हत्थे चढ़ गए, तो मंगलवार को तीन मकान आगे वाले उत्तरदेव जी जीवन की पटरी से उतर गए। बुधवार को दो, वीरवार को एक, शुक्रवार को फिर एक। शनिवार कुछ थक गई होगी शायद, पर रविवार को वह फिर एक को ले गई। वैसे भी उसे रविवार से क्या लेना? मौत के दफ्तर में कभी छुट्टी तो होती नहीं। वह तो सदा खुला ही रहता है। निष्ठुर ऐसी है कि उम्र का भी लिहाज नहीं करती। आगे पीछे नहीं देखती। मोहलत नहीं देती, ईमानदार इतनी कि रिश्वत भी नहीं लेती। वह तो अपने मालिक का ही हुक्म बजाती है। यूं देखूं तो जो पीछे रह गए, उन्हें दुखानुभूति तो है, इस पर किसे संदेह है? पर आखिर जिंदगी तो नहीं रुकती, आगे ही बढ़ती है। वे फिर खड़े होंगे, बचा हुआ संसार संभालेंगे, नया रास्ता बनाएँगे, नए सपने देखेंगे, और कहीं एक गहरी टीस लिए, फिर मुस्कुराएँगे, और जो चला गया वह भी सब कुछ भुला कर, नया शरीर पहन कर, नई गोद में खेलेगा। पर उस जाने वाले के लिए एक बात है। उसका एक शरीर...

28. मामा (एक संस्मरण)

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28. मामा (एक संस्मरण) दिल्ली एक ऐसा शहर है जिसमें किसी हर रोज एक या दो घटना किसी भी व्यक्ति के साथ घटित हो जाना आम बात है कुछ लोग उन घटनाओं पर ध्यान देते हैं कुछ उन्हें यूं ही हंसी में टाल देते हैं वैसे एक घटना हमारे पड़ोस में घटी आइए उसी घटना का आपसे जिक्र करते हैं।                 { *स्नेह के आँसू* }                    ======= गली से गुजरते हुए सब्जी वाले ने तीसरी मंजिल  की घंटी  का बटन दबाया।  ऊपर से बालकनी का दरवाजा खोलकर बाहर आई महिला ने नीचे देखा।  "दीदी जी !  सब्जी ले लो ।  बताओ क्या- क्या तोलना है।  कई दिनों से आपने सब्जी नहीं खरीदी मुझसे, कोई और देकर जा रहा है?" सब्जी वाले ने चिल्लाकर कहा।  *"रुको भैया!  मैं नीचे आती हूँ।"*  उसके बाद महिला घर से नीचे उतर कर आई  और सब्जी वाले के पास आकर बोली - "भैया ! तुम हमारी घंटी मत बजाया करो। हमें सब्जी की जरूरत नहीं है।" "कैसी बात कर रही हैं दीदी जी ! सब्जी खाना तो सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है। क...

27. इंटरव्यू

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27. इंटरव्यू एक  युवा संन्यासी का  न्यूयार्क में एक बड़े पत्रकार  मैं ले रहे थेः पत्रकार- सर, आपने अपने लास्ट लेक्चर में संपर्क* (Contact) और जुड़ाव* (Connection) पर स्पीच दिया लेकिन यह बहुत कन्फ्यूज करने वाला था। क्या आप इनका अंतर समझा सकते हैं ? संन्यासी मुस्कराये और उन्होंने कुछ अलग... पत्रकारों से ही पूछना शुरू कर दिया : "आप न्यूयॉर्क से हैं?"_ पत्रकार: "Yeah..."_ संन्यासी: "आपके घर मे कौन-कौन हैं?" पत्रकार को लगा कि.. संन्यासी उनका सवाल टालने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उनका सवाल बहुत व्यक्तिगत और उसके सवाल के जवाब से अलग था। फिर भी पत्रकार बोला : मेरी माँ अब नही हैं, पिता हैं तथा 3 भाई और एक बहन हैं ! सब शादीशुदा हैं। " संन्यासी ने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए पूछा : "आप अपने पिता से बात करते हैं? " पत्रकार चेहरे से गुस्सा झलकने लगा... संन्यासी ने पूछा, "आपने अपने फादर से last कब बात की थीं ? " पत्रकार ने अपना गुस्सा दबाते हुए जवाब दिया : "शायद एक महीने पहले। " संन्या सी ने पूछा : "क्या आप भाई-बहन अक़्सर...

26. पिता (पितृ दिवस)

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26. पिता (पितृ दिवस) पिता रोटी है, कपडा है और है मकान, पिता छोटे से परिंदे का है बडा-साआसमान, पिता नीम का पेड़ है, कड़वा पित्त समान, जरूरत पडने पर छाया ओर औषधि महान।। पिता जीवन की अभिव्यक्ति और परिवार का कठोर अनुशासन, दूसरी ओर अप्रदर्शित-अनंत प्रेम से चलने वाला प्रशासन। पिता परिवार के तन के लिए वस्त्र, बेटी का सिर का छत्र,  तो बेटे की बाजुओं का, वह है एक मजबूत अस्त्र भटकते हुए मन का आकार है, देव जो एक साकार हैं। पिता मेरे स्वाभिमान, अभिमान और परमपिता का उपकार है। पिता, मोम से हदय वाला सख्त शिलालेख हैं हमारे सुनहरे भविष्य का आलेख हैं बरगद की शाखाओं सी परिवार की सृष्टि है पिता, बरगद की जडे जैसे जीवन की अभिव्यक्ति है मील का पत्थर है, तन से अब जर्जर हैं मौन रहकर भी मेरा संबल है मेरा प्यारा और दुलारा है, मेरा पिता सबसे न्यारा है। पिता अप्रदर्शित-अनंत प्यार है, पिता है तो बच्चों को इंतज़ार है, पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं, पिता है तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं

25. किसान काल की कुछ यादें

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25. किसान काल की कुछ यादें कुछ दिन पूर्व गाजीपुर के किसान आंदोलन में शामिल होने का मौका मिला, तभी मुझे अपने किसान काल की कुछ बातें याद है। वे मैं आपके साथ शेयर कर रहा हूं कि वास्तव में किसान क्या होता है।  हमनें (ईश्वर वैदिक) यह सारी बातें बचपन में स्वयं अपनी आंखों से देखी हैं कि जीवों के प्रति गहरी संवेदना हमारे महान पुरखों में जन्मजात होती थी। जिन्हें आजकल हम अशिक्षित कहते हैं।  किसान एक वह व्यक्ति है जो आज भी सड़कों के किनारे बिना किसी लालच के वृक्ष लगाता है और कुछ समय बाद उन वृक्षों के दरख़्त होते ही वे सरकारी वृक्ष हो जाते हैं और इन्हीं वृक्षों की छांव में पथिक विश्राम करते हैं। जीवो के प्रति गहरी संवेदना के कुछ उदाहरण है जो मुझे अचानक से ज्यादा है और उन्हें में आपके सामने रखने का प्रयास कर रहा हूं। यह सब अभी 30-40 वर्ष पूर्व तक होता रहा। मेरे हम उम्र यदि गांव में रहे हैं तो उन्हें यह बातें अवश्य याद आ जाएंगीं। मुझे याद है कि हम छोटे होते थे तो हम गायों के पैरों के बीच चले जाते थे और वह हमें कुछ भी नहीं कहती थी जबकि हमारे घर के लोग डर जाया करते थे। मुझे याद है...

24. चायवाला और कुमार साहब। (हास्य)

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24. चायवाला और कुमार साहब (हास्य) एक बार एक चाय वाला अपनी पत्नी को लेने ससुराल जा रहा था। उसी रास्ते में कुमार साहब  मिल गए।  आगे क्या हुआ जानने के लिए पढ़ते हैं। 😀😀😀😀😀😀😀 एक बार एक चाय वाला अपनी पत्नी को लेने ससुराल जा रहा था। उसी रास्ते में कुमार साहब मिल गए।  कुमार साहब, "अरे मियां बड़े बन ठन के, कहाँ जा रहे हो ?" चाय वाला, "अपनी पत्नी को लेने ससुराल जा रहा हूँ।"  कुमार साहब, "अब कोई फायदा नहीं हैं वहां जाने का।" चाय वाला, "क्यों ? " कुमार साहब, "क्योंकि, वो तो विधवा हो गई है।" चाय वाला रास्ते से ही अपने गांव वापस आ गया। चाय वाले की माँ, "खाली हाथ कैसे आया है...  बहु को कहाँ है, उसे कहां छोड़ कर आ गया ?  चायवाले ने कहा, "माँ ! वह तो विधवा हो गई, इसलिये लाया ही नहीं।" चाय वाले की माँ,  "कलमुहें... तेरे जिंदा रहते वो विधवा कैसे हो सकती है ?" चाय वाला, "माँ.... मेरे जिंदा रहते, तू भी तो विधवा हो गई।" चाय वाले की माँ , "नालायक... मैं तो विधवा इसलिए हो गई थी क्योंकि तेरा बाप मर गया था।" च...