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रामायण कालीन सभ्यता, संस्कृति एवं रामायण का साहित्यिक महत्त्व

रामायण कालीन सभ्यता, संस्कृति एवं रामायण का  साहित्यिक महत्त्व प्रस्तावना संस्कृत साहित्य में महर्षि वाल्मीकिकृत "रामायण" "आदिकाव्य" माना जाता है। महर्षि वाल्मीकि आदिकवि के नाम से प्रसिद्ध हैं। जब व्याघ के बाण के द्वारा विधे हुए क्रौञ्च के लिए क्राञ्ची का करुण विलाप ऋषि के कान में प्रवेश किया तो महर्षि के मुख से अकस्मात् श्लोक निकल पड़ा। मा निषाद प्रतिष्ठास्त्वमगमः शाश्वती समाः । यत् क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ।।  अर्थात है। निषाद तुझे नित्य निरन्तर कभी भी शान्ति न मिले क्योंकि तुमने इस क्रौंच के जोड़े में से एक क्रौंच जो काम मोहित था, उसको बिना किसी अपराध के अकारण ही मार डाला इसलिए तुम सदा के लिए अप्रतिष्ठा को प्राप्त करो। महर्षि वाल्मीकि की इस कल्याणमयी वाणी को सुनकर स्वयं ब्रह्माजी प्रकट हुए और उन्होंने वाल्मीकि से रामचरित लिखने के लिए कहा तब महर्षि वाल्मीकि ने (रामायण) की रचना अनुष्टुप छन्द में की अतः वाल्मीकि को अनुष्टुप् छन्द का प्रवर्तक माना जाता है। रामायण में सात काण्ड और चौबीस हजार श्लोक है इसलिए इसे "चतुर्विंशति साहस्त्री संहिता के नाम से जाना ज...