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32. तुलसी के राम (एक धार्मिक कथा)

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32. तुलसी के राम (एक धार्मिक कथा) एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज को किसी ने बताया कि जगन्नाथ जी में तो साक्षात भगवान ही दर्शन देते हैं। बस फिर क्या था सुनकर तुलसीदास जी महाराज तो बहुत ही प्रसन्न हुए और अपने इष्टदेव भगवान श्री राम का दर्शन करने श्रीजगन्नाथपुरी को चल दिए। महीनों की कठिन और थका देने वाली यात्रा के उपरांत जब वे जगन्नाथ पुरी पहुंचे तो मंदिर में भक्तों की भीड़ देख कर बड़े प्रसन्नमन से मंदिर के अंदर प्रविष्ट हुए। जगन्नाथ जी का प्रस्तर मूर्ति रुप में दर्शन करते ही उन्हें बड़ा धक्का सा लगा। वह निराश हो गये। और विचार करने लगे कि यह हस्तपादविहीन देव हमारे इस जगत में सबसे सुंदर नेत्रों को सुख देने वाले मेरे इष्ट श्री राम नहीं हो सकते। इस दुखी मन से मूवी मंदिर से बाहर निकल कर मंदिर से कुछ दूर एक वृक्ष के नीचे बैठ गये।  वे सोचने लगे कि उनका इतनी दूर आना ब्यर्थ हुआ। क्या गोलाकार नेत्रों वाला हस्तपादविहीन दारुदेव मेरा राम हो सकता है ? कदापि नहीं। रात्रि हो गयी, थके-माँदे, भूखे-प्यासे तुलसी का अंग-अंग टूट रहा था। अचानक एक आहट हुई। वे उस आहट को ध्यान से सुनने लगे। "अरे बाबा ! ब...