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Showing posts from February, 2022

घर के रसगुल्ला और मालपुआ बनाने का आसान तरीका

घर के रसगुल्ला और मालपुआ  बनाने का आसान तरीका इस बार त्योहार का जायका बढ़ाएं ट्रडिशनल और टेस्टी पकवान मालपुआ और रसगुल्ला के साथ तो हो जाएं तैयार इनको बनाने के लिए मालपुआ आटे वाले सामग्री : एक कप गेहूं का आटा, एक चम्मच सौंफ पिसी हुई, 3 से 4 इलायची पिसी हुई, एक बड़ा चम्मच कद्दूकस किया नारियल या नारियल का बुरादा, आधा कप चीनी, 3 बड़े चम्मच दूध। विधिः   * मालपुआ बनाने के लिए सबसे पहले दूध में चीनी डालकर एक घंटे के लिए रख दें। * तब तक एक बर्तन में आटा छानकर, इसमें सौंफ, इलायची और नारियल का बुरादा डालकर अच्छी तरह मिक्स कर लें। * जब दूध में घुल जाए, तो चीनी-दूध के घोल को आटे के में डालकर इसे एक चम्मच से फेंटते हुए मिलाएं। * इस तरह आटे का न ज्यादा गाढ़ा, न ज्यादा पतला पेस्ट तैयार कर लें। यदि पेस्ट अच्छी तरह नहीं बना, तो इसमें थोड़ा पानी डालकर फेंट लें। * अब एक कड़ाही में घी डालकर, उसे गैस पर गर्म करने रखें।  * घी गर्म होने के बाद गैस की आंच मध्यम करके, एक बड़े चम्मच में आटे का पेस्ट लेकर, उसे गोल पूरी के आकार में घुमाते हुए घी में डालें और फ्राई करें।  * मालपुआ दोनों तरफ से प...

जबलपुर के भेड़ाघाट और धुआंधार

जबलपुर के भेड़ाघाट और धुआंधार विध्यांचल एवं सतपुडा के बीच 'अमरकंटक' नामक ऊंचे पर्वत हैं। यहीं सोहागपुर जिले के अमरकंटक नामक गाव के कुंड में एक गोमुख से जलधारा प्रकट होती है। इस कुंड को कोटिकुंड तथा जलधारा को नर्मदा कहते हैं। यह अमरकंटक से निकलने के 332 कि.मी. पश्चात (नर्मदा) मंडला से गुजरती है। मंडला से आगे नर्मदा का प्रवाह मंद हो जाता है तथा इसके आगे 'भेड़ाघाट' नामक सुंदर पहाड़ी स्थान आता है। मध्य प्रदेश राज्य के जबलपुर में नर्मदा नदी की गोद में बसा है भेड़ाघाट। संगमरमर के पत्थरों के बीच बहती नदी 'भेड़ाघाट' पर जलप्रपात का निर्माण करती है। यहीं पर वामनगंगा नदी विंध्याचल पर्वत से जन्म लेकर 419 कि.मी. यात्रा पूर्ण कर नर्मदा में मिलती है। भेड़ाघाट में संगमरमर के पर्वतों के मध्य बना 'धुआंधार' नामक जलप्रपात सबसे प्रसिद्ध है। इस स्थल पर नर्मदा नदी 13 कि.मी. की ऊंचाई से गिरती है मानो 'धुआं सा छा गया हो तथा संभवतः इसी मुखी कारण इसका नाम भी 'धुआंधार' जलप्रपात बना है। पूजा अथाह जलराशि के इस अद्भुत खजाने की तुलना नियाग्रा फॉल के समकक्ष मानी जा सकती है। स...

नदी जिसे 'शापित' माना जाता है?

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नदी जिसे 'शापित' माना जाता है। भारत में नदियों को बेहद पवित्र माना गया है। इन्हें मां का दर्जा दिया गया है। उनकी पूजा होती है, इनके लिए दीपदान किए जाते हैं। खास मौकों पर नदियों में स्नान करने की परंपरा भी सदियों पुरानी है। पूजा-पाठ, शुभ कार्यों में पवित्र नदियों के जल का खासतौर पर उपयोग होता है। कुल मिलाकर हमारे यहां नदियां केवल जीवनदायिनी (लाइफलाइन) ही नहीं मानी जातीं, बल्कि उनका बड़ा धार्मिक महत्व है। लेकिन हमारे ही देश में एक ऐसी नदी भी है, जिसके पानी को लोग हाथ तक लगाने से भी बचते हैं। कर्मनाशा है इस अनूठी नदी का नाम हिंदू धर्म में गंगा को सबसे पवित्र नदी माना गया है लेकिन सरस्वती, नर्मदा, यमुना, क्षिप्रा आदि नदियों का भी बहुत महत्व है। इन नदियों में स्नान के महापर्व कुंभ को आयोजित किए जाते हैं। भारत में जहां नदियां का इतना महत्व है वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार से होकर बहने वाली एक नदी है जिसके पानी को लोग छूते तक नहीं हैं। इस नदी का नाम है कर्मनाशा। शब्द कर्मनाशा दो शब्दों से बना है। पहला कर्म और दूसरा नाशा है। जिसका अर्थ है काम बिगड़ने वाली या वाला। माना जाता है कि नदी का प...

गणेश जी की रहस्यमयी 'सूंड'

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गणेश जी की रहस्यमयी 'सूंड'   भगवान गणेश देवों के देव भगवान शिव और माता पार्वती के छोटे पुत्र हैं। गणेश जी की पत्नियों के नाम रिद्धि और सिद्धि है। शुभ और लाभ इनके पुत्र। रिद्धि और सिद्धि भगवान विश्वकर्मा की पुत्रियां हैं। गणेश जी के सिर कट जाने के उपरांत उन्हें हाथी का सिर लगाया गया था, अतः उनके सूंड होना भी अनिवार्य है। परंतु क्या आप जानते हैं कि किस तरफ सूंड वाले श्री गणेश पूजनीय हैं? यदि नहीं तो आइए इसी बारे में जानते हैं। दाईं सूंड: जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ दाई ओर हो उसे दक्षिण मूर्ति या दक्षिणामुखी मूर्ति कहते हैं। यहां दक्षिण का अर्थ है दक्षिण दिशा या दाई बाजू दक्षिण दिशा यमलोक की ओर ले जाने वाली व दाई भूजा सूर्य नाड़ी की है।  जो यमलोक की दिशा का सामना कर सकता है वह शक्तिशाली होता है व जिसकी सूर्य नाड़ी कार्यरत है वह तेजस्वी भी होता है। इन दोनों अर्थों से दाई सूंड वाले गणपति को 'जागृत' माना जाता है। ऐसी मूर्ति की पूजा विधि के सर्व नियमों का यथार्थ पालन करना आवश्यक है। उसमें सात्विकता बढ़ती है व दक्षिण दिशा में प्रसारित होने वाली रज लहरियो...

बांसुरी कितने कमाल की है

बांसुरी कितने कमाल की है ~~~~~~~~~~~~~~~~ वैसे तो कई तरह की बांसुरियां होती है जो अलग अलग असर दिखाती है लेकिन बांस से बनी बांसुरी और चांदी की बांसुरी विशेषअसर दिखाने वाली और कमाल की होती है। -     चांदी की बांसुरी अगर आपके घर में होगी तो उस घर में पैसों से जूड़ी कोई परेशानी नहीं होगी।  -     सोने की बांसुरी घर में रखने से उस घर में लक्ष्मी रहने लग जाती है और ऐसे घर में पैसा ही पैसा होता है। -    बाँस के पौधे से बनी होने के कारण लकड़ी की बांसुरी शीघ्र उन्नतिदायक प्रभाव देती है अत: जिन व्यक्तियों को जीवन में पर्याप्त सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही हो, अथवा शिक्षा, व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो, तो उसे अपने बैडरूम के दरवाजे पर दो बाँसुरियों को लगाना चाहिए। -     यदि घर में बहुत ही अधिक वास्तु दोष है, या दो से अधिक दरवाजे एक सीध में है, तो घर के मुख्यद्वार के ऊपर दो बांसुरी लगाने से लाभ मिलता है तथा वास्तु दोष धीरे धीरे समाप्त होने लगता है। -     घर का कोई सदस्य अगर बहुत दिनों से बीमार हों या अकाल मृत्यु का डर या ...

कैसा दिखाई देता था शताब्दियों पहले दिल्ली शहर; अनदेखी तस्वीरों में देख लीजिये

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कैसा दिखाई देता था शताब्दियों पहले दिल्ली शहर, अनदेखी तस्वीरों में देख लीजिये, 100 Years Old Photo’s of Delhi: दिल्ली (Delhi), भारत (India) की राजधानी ही नहीं, बल्कि देश के सबसे प्राचीन शहरों में से एक भी है. दिल्ली को इंद्रप्रस्थ के नाम से भी जाना जाता है. किसी ज़माने में दिल्ली इन्द्रप्रस्थ की राजधानी भी हुआ करती थी. उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ तक दिल्ली में इंद्रप्रस्थ नामक गांव भी हुआ करता था. दिल्ली पर 300 ईसा पूर्व से ही अलग-अलग शासकों ने राज किया. 13वीं शताब्दी में फिरोजशाह तुगलक दिल्ली का राजा बना. इसके बाद दिल्ली सन 1206 के बाद ‘दिल्ली सल्तनत’ की राजधानी बनी. इस दौरान दिल्ली पर ‘खिलजी वंश’, ‘तुगलक वंश’, ‘सैयद वंश’ और ‘लोदी वंश’ समेत कुछ अन्य वंशों के शासकों ने राज किया. दिल्ली में आज मुग़ल काल में बने कई ऐतिहासिक स्मारक हैं जो इस शहर को प्राचीन बनाने का काम करती हैं. आज ये प्राचीन स्मारक दिल्ली की ‘आन, बान और शान’ बन चुके हैं. यही दिल्ली की पहचान भी हैं. चलिए आज आप भी दिल्ली की 100 साल पुरानी तस्वीरें देख लीजिये-  1- सन 1910, देश की राजधानी दिल्ली का...