मांसाहार सभ्य मनुष्यों का भोजन नहीं।
मांसाहार सभ्य मनुष्यों का भोजन नहीं। मासांहारी खाना खाने वाले मनुष्य कहलाने के लायक ही नहीँ है। पहली बात तो यह है कि हर पशु-पक्षी में आत्मा का वास होता है। ईश्वर यह कदापि आज्ञा नहीं देता कि हम उसकी बनाई सृष्टि को नष्ट करें। हमारे बच्चों को काँटा भी चुभता है तो हम परेशान हो जाते हैं परन्तु उस परमपिता की जिन्दा संतानों को हम मारकर खा जाते हैं। एक मनुष्य यानि जीव को मारने पर आजीवन कारावास की सजा मिलती है तो उन निरीह मूक जीवों को मारने की सजा का क्या प्रावधान है? शायद उनका न्याय उस बड़ी अदालत में होता है। जो व्यक्ति मांसाहार का सेवन करता हैँ, वो तामसी अपवित्र और पापी व्यक्ति अधोगती अर्थात नरक को प्राप्त होता है। भोजन के दो प्रकार हैँ, शाकाहार और मांसाहार, शाकाहार मनुष्यो का आहार हैँ और मांसाहार राक्षस, पशु, हिंसक जानवर का आहार हैँ। मनुष्य अगर मांसाहार का सेवन करेगा तो उसे भी राक्षस, कुत्ता ,कव्वा, गिधड़, सिंह, बाघ, लोमडी, सियार, बिल्ली भी कहना पडे़गा क्योंकी, मांसाहार उनका ही तो आहार हैँ मांसाहार मनुष्य का भोजन नही है क्योंकि माँसाहारी जीवों और मनुषय के शरीर की ...