अग्नि पुराण | अध्याय – 007 | अरण्यकाण्ड की संक्षिप्त कथा 4YT
अहो भाग्य आपको अपने प्यारे मित्र मुझ जितेन्द्र सिंह तोमर को सबसे अधिक लाभप्रदान करने वाली और सबसे बड़ी पुराण अग्नि पुराण का छठवां अध्याय सुनाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आशा है, आपको हमारा यह प्रयास आवश्य पसंद आएगा। आपको इस पुराण के सुनने या पढ़ने का पूरा-पूरा लाभ प्राप्त होगा। कहते हैं कि इस अध्याय को सुनने या पढ़ने से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। अध्याय – 007 अरण्यकाण्ड की संक्षिप्त कथा नारदजी कहते हैं – मुने ! श्रीरामचंद्रजी ने महर्षि वशिष्ठ तथा माताओं को प्रणाम करके उन सबको भरत के साथ विदा कर दिया | तत्पस्च्यात महर्षि अत्रि तथा उनकी पत्नी अनसूया को, शरभंगमुनि को, सुतीक्ष्ण को तथा अगस्त्यजी के भ्राता अग्निजिहं मुनि को प्रणाम करते हुए श्रीरामचंद्रजी ने अगस्त्यमुनि के आश्रम पर जा उनके चरणों में मस्तक झुकाया और मुनि की कृपा से दिव्य धनुष एवं दिव्य खड्ग प्राप्त करके वे दण्डकारण्य में आये | वहाँ जनस्थान के भीतर पंचवटी नामक स्थान में गोदावरी के तटपर रहने लगे | एक दिन शूर्पन्खा नामवाली भयंकर राक्षसी राम, लक्ष्मण और सीता को खा जाने के लिये पंचवटी में आयी; किंतु श्रीरामचं...