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प्रेम किया है पण्डित , संग कैसे छोड़ दूँगी ?

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*प्रेम किया है पण्डित , संग कैसे छोड़ दूँगी ?* _______________________ काशी जिसे कभी वाराणसी कहा जाता था आज उसे बनारस के नाम से जानते हैं ना जाने कितनी बार वाराणसी अर्थात बनारस की यात्रा करने का मन बनाया लेकिन सफल नहीं हो पाए शायद वहां विराजमान देवाधिदेव भगवान भोले शंकर के काशी विश्वनाथ रूप को अभी हमें दर्शन करने की अनुमति नहीं थी हम भी झूठ ठहरे उनसे लगान लगाए रहे और 1 दिन जा पहुंचे बनारस और जब गंगा की लहरों में नाव पर यात्रा कर रहे थे तब नाव चला रहे व्यक्ति अर्थात मल्लाह ने हमें एक बहुत ही सुंदर कहानी सुनाई। कहानी पंडितराज जगन्नाथ शास्त्री और लवंगी के प्रेम की थी । बनारसी भाषी उस मल्लाह के शब्दों में तो मैं इसे नहीं उतार पाया लेकिन जितना भी प्रयास किया है। मुझे आशा है कि यह कहानी आपको पसंद आएगी। आप जितनी बार भी इसे पढ़ोगे । हर बार वही आनंद मिलेगा। *"पण्डितराज और लवंगी"* . सत्रहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध था,  दूर दक्षिण में गोदावरी तट के पर महाराज चन्द्रदेव का एक छोटा सा राज्य था। उस राज्य की राज्यसभा में एक विद्वान ब्राह्मण कमाल का सम्मान पाता था, *नाम था जगन्नाथ शास...