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महान व्यक्तियों की मौत को भी वोट के लिए भुना सकें।

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मैं नागपुर के 85 वर्षीय बुज़ुर्ग जिन्होंने अपने जीवन की आशा को त्याग कर अपना हॉस्पिटल बेड एक 40 वर्षीय व्यक्ति को दे दिया, ये कहकर कि मैंने अपनी ज़िंदगी जी ली है, उसके छोटे बच्चे हैं, उसकी ज़िंदगी बचाना ज़्यादा ज़रूरी है। उन्होंने जो काम किया है, उसे आत्महत्या कहना शायद गलत होगा, लेकिन इस आत्मबलिदान या शहादत से कम नहीं है। लेकिन यह बात यहीं खत्म नहीं हो जाती को उस व्यक्ति के नाम और समाज सेवा का लोग खुलकर फायदा उठा रहे हैं। कुछ संगठनों के मुखिया उनका नाम लिख लिख कर लोगों को इमोशनल मूर्ख बना रहे हैं...। हमें तो इस बात पर शर्मिंदा होना चाहिए कि ऐसी स्थिति आई ही क्यों कि एक व्यक्ति दूसरे को जीवन देने के लिए अपने जीवन को दांव पर लगाए। यह उपलब्धि नहीं यह तो सरासर हमारी नाकामी है। शर्म आनी चाहिए उन ज़िम्मेदारों को, जिनके राज में एक बुज़ुर्ग व्यक्ति को अपनी मौत चुननी पड़ी ताकि एक जवान आदमी का ईलाज हो सके...। आखिर कब तक ऐसा ही होता रहेगा। लेकिन बजाय शर्म करने के कुछ लोग गर्व से इस बात को लिख रहे हैं, ताकि अपने उस राष्ट्रवादी संगठन के ऐसे महान व्यक्तियों की मौत को भी वोट के लिए भुना सकें। ॐ जिते...