कथाकार मुंशी प्रेमचंद रचित बूढ़ी काकी
*बुढ़ापा बहुधा (अक्सर) बचपन का पुनरागमन (फिर से आगमन) होता है।* *कहते हैं बुढ़ापा बचपन का ही एक रूप है। वृद्धावस्था में मनुष्य की हरकतें बच्चों जैसी हो जाती हैं।* *वृद्धावस्था में मनुष्य के अंग-प्रत्यंग कमजोर हो जाते हैं और उन्हें बच्चों की तरह दूसरों का सहारा लेना पड़ता है। दिमाग कमजोर हो जाता है और याददाश्त बच्चों की तरह हो जाती है। दाँत गिर जाते हैं और मनुष्य का मुँह बच्चों की तरह पोपला हो जाता है। बच्चों की तरह वृद्धों को मान-अपमान की परवाह नहीं होती। जैसे बच्चों की बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता, उसी प्रकार वृद्धों की बातों पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। उनकी इच्छा-अनिच्छा का भी कोई महत्त्व नहीं होता। वृद्धावस्था और बचपन की अधिकांश बातों में समानता होती है। इसलिए कहा जा सकता है कि, बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है।* *इसी बात पर आधारित हिन्दी उर्दू साहित्य के शीर्षतम कथाकार मुंशी प्रेमचंद रचित नाटक-* *बूढ़ी काकी-* 1 *बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। बूढ़ी काकी में जिह्वा-स्वाद के सिवा और कोई चेष्टा शेष न थी और न अपने कष्टों की ओर आकर्षित करने का, रोने के अतिरिक्त कोई दू...