उज्जैन की भूखी माता
यहाँ प्रस्तुत है — 🌹 उज्जैन की भूखी माता (एक लोक-आध्यात्मिक कथा) बहुत पुरानी बात है। उज्जैन नगरी जिसे अवन्तिका कहा जाता था, वहाँ धर्म, विद्या और साधना की त्रिवेणी बहा करती थी। वही नगर, जहाँ काल स्वयं भी समय से पराजित होता था, जहाँ महाकाल अपने भक्तों की रक्षा करते थे, वहीं एक रहस्यमयी देवी की कथा आज भी लोगों के मन में आदर और भय दोनों साथ-साथ जगाती है। उस देवी का नाम था — भूखी माता। 🌾 कथा का आरंभ एक समय उज्जैन में भयंकर अकाल पड़ा। नदियाँ सूख गईं, खेत बंजर हो गए, पशु भूख से मरने लगे और मनुष्य अनाज के एक-एक दाने को तरसने लगे। नगर में हाहाकार मच गया। मंदिरों में पुजारी आरती करते, पर प्रसाद न होता। बच्चों के रोने की आवाजें रातभर नगर की गलियों में गूंजतीं। उसी समय, एक साधारण सी स्त्री नगर के बाहर एक पीपल वृक्ष के नीचे आकर बैठ गई। उसने कुछ नहीं माँगा, किसी से कुछ कहा नहीं। बस चुपचाप बैठी रहती — मौन, शांत और गंभीर। पर उसकी आँखों में एक गहराई थी — मानो समय के पार देख रही हो। नगर के लोग उसे देख कर चौंकते, पर कोई उसे पहचान न सका। 🥣 नगरवासियों की चिंता जब एक सप्ताह बीत गया...