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Showing posts from June, 2022

जगन्नाथ यात्रा : 5 दीपों से करें भगवान की आरती, पीले पुष्प जरूर करें अर्पित

जगन्नाथ यात्रा : 5 दीपों से करें भगवान की आरती, पीले पुष्प जरूर करें अर्पित हर साल ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकाली जाती है। इस साल इस रथ यात्रा उत्सव की शुरुआत 1 जुलाई, शुक्रवार से होगी। इस यात्रा में शामिल होने के लिए दुनियाभर से लोग आते हैं और भगवान का रथ खींचने का सौभाग्य पाते हैं। लेकिन यदि आप भगवान जगन्नाथ की यात्रा में शामिल होने में असमर्थ हैं, तो घर पर रहकर भी इस यात्रा पूजा का फल और भगवान का आशीर्वाद पा सकते हैं। यात्रा का महत्व हिंदू धर्म में जगन्नाथ पुरी को मुक्ति का द्वार भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस रथ यात्रा में शामिल होने से व्यक्ति के समस्त कष्टों का निवारण होता है। साथ ही इस यात्रा में शामिल होने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है। पुराणों के अनुसार, आषाढ़ मास में पुरी तीर्थ में स्नान करने से सभी तीर्थों के दर्शन करने के तुल्य ही पुण्य मिलता है। भगवान जाते हैं मौसी के घर हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीय तिथि को भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर जाते हैं। इस दौरान उनके बड़े भाई बलराम और छोटी बहन सुभद्रा भी उनके साथ अलग-अलग रथों पर सवार होकर जाते हैं। गुंडीचा म...

अग्निदेव कौन हैं,और क्या है इनकी पौराणिक कथा?????

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अग्निदेव कौन हैं,और क्या है इनकी पौराणिक कथा?????? अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं। वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है। अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व-साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है। ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार-बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है। आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे-आगे चलते हैं। युद्ध में सेनापति का काम करते हैं इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था। पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। ये सब देवताओं के मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हीं के द्वारा देवताओं तक पहुँचती है। केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं।  इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियाँ प्राप...

व्रह्मांड और समय की धारणा l

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व्रह्मांड और समय की धारणा l आपको गर्व अनुभव होगा की हमने अति प्राचीन ज्ञान के एकमात्र धारक सनातन धर्मीय परिवार में जन्म लिया है। #वैदिक बिहारी जी नीतीश  भारतवर्ष में जन्म लिया है। आज के वैज्ञानिक समय कैसे नापते है? पिकोसेकेण्ड  नैनो सेकेण्ड  माईक्रो सेकेण्ड,  सेकेण्ड  60 सेकेण्ड मे 1 मिनट,  60 मिनट मे 1 घन्टा, 24 घन्टे मे 1 दिन,(पृथ्वी के आपनी धुरी पर घुमना) 30 दिन मे 1 माह  12 माह मे 1 साल या वर्ष ।(पृथ्वी का सुर्य की एक वार परिक्रमण करना) बस ? अब वेद पर आते है। ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। *1 परमाणु = काल की सबसे सूक्ष्मतम अवस्था  *2 परमाणु = 1 अणु  *3 अणु = 1 त्रसरेणु  *3 त्रसरेणु = 1 त्रुटि  *10 ‍त्रुटि = 1 प्राण  *10 प्राण = 1 वेध  *3 वेध = 1 लव या 60 रेणु  *3 लव = 1 निमेष  *1 निमेष = 1 पलक झपकने का समय  *2 निमेष = 1 विपल (60 विपल एक पल होता है)  *3 निमेष = 1 क्षण  *5 निमेष = 2 सही 1 बटा 2 त्रुटि  *2 सही 1 बटा 2 त्रुटि = 1 सेकंड या 1 लीक्षक से कुछ कम।  *20 निमेष = 10 विपल, एक प्राण या 4 सेकं...

9 मसाले कौन कौन से है और ये किस प्रकार ग्रहों का प्रतिनिधित्व

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9 मसाले कौन कौन  से है और ये किस प्रकार ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते है व इनके पीछे छिपी वैज्ञानिकता क्या है ? 1. नमक       *(पिसा हुआ) सूर्य* 2. लाल मिर्च....       *(पिसी हुई) मंगल...* 3. हल्दी          *(पिसी हुई ) गुरु....* 4. जीरा  *(साबुत या पिसा हुआ) राहु-केतु...* 5. धनिया        *(पिसा हुआ) बुध...* 6. काली मिर्च    *(साबुत या पाउडर) शनि...* 7. अमचूर         *(पिसा हुआ) केतु....* 8. गर्म मसाला         *(पिसा हुआ)* *राहु....* 9. मेथी          *मंगल....*    👉मसाले के सेवन से अपने     स्वास्थ्य और ग्रहो को ठीक करे..                    👇 *भारतीय रसोई में मिलने वाले मसाले सेहत के लिए तो अच्छे होते ही है ,पर साथ में उन के सेवन से हमारे ग्रह भी अच्छे होते है* *सौंफ* *सौंफ का जिक्र हम पहले भी कर चुके है की सौंफ खाने से हमारा शुक्र और चंद्र अच्छा ...

जाने कुछ परम्पराओं के वैज्ञानिक तर्क l

🚩जय श्री कृष्ण 🚩 अवश्य पढें, हिन्दू धर्म की परम्परायें पूर्ण रुप से विज्ञान (स्वास्थ्य) पर आधारित हैं l जाने कुछ परम्पराओं के वैज्ञानिक तर्क l *1-# कान छिदवानें की परम्परा :-* ************************* भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है। *#वैज्ञानिक तर्क -* दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है,जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है। *2- माथे पर कुमकुम/तिलक :-* ************************ महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं। *वैज्ञानिक तर्क -* आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है।कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है।इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता है। *3 - जमीन पर बैठकर भोजन करना :-* ***************************** भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है। *वै...

कुशा का आध्यात्मिक एवं पौराणिक महत्त्व

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#कुशा का आध्यात्मिक एवं पौराणिक महत्त्व?? अध्यात्म और कर्मकांड शास्त्र में प्रमुख रूप से काम आने वाली वनस्पतियों में कुशा का प्रमुख स्थान है।  इसको कुश ,दर्भअथवा ढाब भी कहते हैं। जिस प्रकार अमृतपान के कारण केतु को अमरत्व का वर मिला है, उसी प्रकार कुशा भी अमृत तत्त्व से युक्त है। यह पौधा पृथ्वी लोक का पौधा न होकर अंतरिक्ष से उत्पन्न माना गया है।  मान्यता है कि जब सीता जी पृथ्वी में समाई थीं तो राम जी ने जल्दी से दौड़ कर उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु उनके हाथ में केवल सीता जी के केश ही आ पाए। ये केश राशि ही कुशा के रूप में परिणत हो गई।  इसके सिरे नुकीले होते हैं उखाडते समय सावधानी रखनी पडती है कि जड सहित उखडे और हाथ भी न कटे। कुशल शब्द इसीलिए बना ।" ऊँ हुम् फट " मन्त्र का उच्चारण करते हुए उत्तराभिमुख होकर कुशा उखाडी जाती है । #भारत में हिन्दू लोग इसे पूजा /श्राद्ध में काम में लाते हैं। श्राद्ध तर्पण विना कुशा के सम्भव नहीं हैं ।  कुशा से बनी अंगूठी पहनकर पूजा /तर्पण के  समय पहनी जाती है जिस भाग्यवान् की सोने की अंगूठी पहनी हो उसको जरूरत नहीं है। ...

साधक का गुप्त धन है जप माला!!

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#नाम  संकीर्तनं यस्य  सर्व पाप प्रणाशनम् ।  प्रणामो दुःख शमनः तं नमामि हरिं परम् ॥  (#मैं उन 'हरि' को प्रणाम करता हूँ जिनका नाम संकीर्तन सभी पापों को समाप्त करता है और जिन्हें प्रणाम करने मात्र से सारे दुःखों का नाश हो जाता है। ) #साधक का गुप्त धन है जप माला!! *माला शब्द दो अक्षरों से बना है—मा + ला । ‘मा’ माने लक्ष्मी, प्रभा, शोभा और ज्ञान; ‘ला’ माने जिसमें लीन रहे; इसलिए ‘लक्ष्मी, प्रभा, शोभा और ज्ञान जिसमें लीन रहते हैं वह है माला।* *साधना में जप माला बहुत ही महत्वपूर्ण वस्तु है । जब जप अधिक संख्या में करना हो तो जप माला रखना अनिवार्य है । भगवान का स्मरण और नाम-जप की गिनती करने के कारण साधक को इसे अपने प्राणों के समान प्रिय मानना चाहिए ।* *एक बार वृन्दावन में दो संतों में लड़ाई हो गयी । एक #संत ने दूसरे के लिए कहा—‘इसने मेरा हीरा चुरा लिया है ।’ दूसरे ने कहा—‘इन्होंने मेरा पारस चुरा लिया है ।’ मामला अदालत में गया । दोनों ने अपनी-अपनी बात कही । जज ने पूछा—‘तुमको हीरा कहां से मिला ?’ पहले संत ने उत्तर दिया—‘हमको हमारे गुरु ने दिया था ।’ जज ने पूछा—‘कहां ...

क्यूं कहते हैं कि "#काशी जमीन पर नहीं है, वह शिव के त्रिशूल के ऊपर है!"

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क्यूं कहते हैं कि "#काशी जमीन पर नहीं है, वह शिव के त्रिशूल के ऊपर है!" क्योंकि काशी एक_यंत्र है एक #असाधारण #यंत्र!! #मानव शरीर में जैसे नाभी का स्थान है, वैसे ही पृथ्वी पर वाराणसी का स्थान है.. शिव ने साक्षात धारण कर रखा है इसे! शरीर के प्रत्येक अंग का संबंध नाभी से जुड़ा है और पृथ्वी के समस्त स्थान का संबंध भी वाराणसी से जुड़ा है। धरती पर यह एकमात्र ऐसा यंत्र है!! काशी की रचना सौरमंडल की तरह की गई है, इस यंत्र का निर्माण एक ऐसे विशाल और भव्य मानव शरीर को बनाने के लिए किया गया,  जिसमें भौतिकता को अपने साथ लेकर चलने की मजबूरी न हो, और जो सारी आध्यात्मिक प्रक्रिया को अपने आप में समा ले। आपके अपने भीतर ११४ चक्रों में से ११२ आपके भौतिक शरीर में हैं, लेकिन जब कुछ करने की बात आती है, तो केवल १०८ चक्रों का ही इस्तेमाल आप कर सकते हैं। इसमें एक खास तरीके से मंथन हो रहा है। यह घड़ा यानी मानव शरीर इसी मंथन से निकल कर आया है, इसलिए मानव शरीर सौरमंडल से जुड़ा हुआ है और ऐसा ही मंथन इस मानव शरीर में भी चल रहा है।  #सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास से 108 गुनी है। आप...

शिखा_सूत्र_का_वैदिक_विज्ञान

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#शिखा_सूत्र_का_वैदिक_विज्ञान सिर के ऊपरी भाग को ब्रह्मांड कहा गया है और सामने के भाग को कपाल प्रदेश। कपाल प्रदेश का विस्तार ब्रह्मांड के आधे भाग तक है। दोनों की सीमा पर मुख्य मस्तिष्क की स्थिति समझनी चाहिए। #ब्रह्मांड का जो केन्द्रबिन्दु है, उसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं। ब्रह्मरंध्र में सुई की नोंक के बराबर एक छिद्र है जो अति महत्वपूर्ण है। सारी अनुभूतियां, दैवी जगत् के विचार, ब्रह्मांड में क्रियाशक्ति और अनन्त शक्तियां इसी ब्रह्मरंध्र से प्रविष्ट होती हैं। हिन्दू धर्म में इसी स्थान पर चोटी(शिखा) रखने का नियम है। ब्रह्मरंध्र से निष्कासित होने वाली ऊर्जा शिखा के माध्यम से प्रवाहित होती है । वास्तव में हमारी शिखा जहां एक ओर ऊर्जा को प्रवाहित करती है, वहीं दूसरी ओर उसे ग्रहण भी करती है। वायुमंडल में बिखरी हुई असंख्य विचार तरंगें और भाव तरंगें शिखा के माध्यम से ही मनुष्य के मस्तिष्क में प्रविष्ट होती हैं। कहने की आवश्यकता नहीं, हमारा मस्तिष्क एक प्रकार से रिसीविंग और ब्रॉडकास्टिंग सेंटर का कार्य शिखारूपी एंटीना या एरियल के माध्यम से करता है। मुख्य मस्तिष्क( सेरिब्रम) के बाद लघु मस्तिष्क(सेरिबे...

सत्य घटना साझा

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ऐसी सत्य घटना साझा कर सकते हैं, जिसे पढ़ते ही हृदय भगवान के लिए व्याकुल हो जाये? दिनांक: 1 नवंबर 1979। #समय: रात्रि 1 बजे। #स्थान: तिरुपति मंदिर। पूरा तिरुपति शहर और स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण भी शयन कर रहे थे और घनघोर शांत रात्रि थी की इतने में ही… ठंन्न ठंन्न ठंन्न ठंन्न! तिरुपति मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर के श्रीविग्रह के ठीक आगे जो बड़ा सा घंट है वो अपने आप हिलने लगा और उस घंट नाद से पूरा तिरुपति शहर एकदम आश्चर्य में भरकर उठ खड़ा हुआ। मंदिर रात्रि 12 बजे पूर्ण रूप से बंद हो गया था, फिर ये कैसी घंटा नाद की ध्वनि आ रही है? कोई भी जीवित व्यक्ति मंदिर में रात्रि 12 के बाद रहना संभव नही, तो फिर किसने ये घंटा नाद किया? कोई जीव-जंतु मंदिर में प्रवेश नही कर सकते क्योंकि सारे द्वार बंद है, तो फिर ये कौन है? मंदिर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री पी वी आर के प्रसाद के नेत्रो में अश्रु थे क्योंकि केवल वे जान पा रहे थे कि ये केवल घंटा नाद नही है, ये भगवान ने अपना संकेत दे दिया है मेरे "वरुण जाप" की सफलता के लिए। भगवान् के सभी भक्त यह घटना बड़ी श्रद्धा से पढ़ें :- यह अलौकिक दिव्य...

अखंड_रामायण_का_पाठ_करने_के_आवश्यक_नियम

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🚩 #जय सियाराम 🚩 अखंड_रामायण_का_पाठ_करने_के_आवश्यक_नियम 🔥 श्री राम और रामायण दोनों पर सनातन धर्म को मानने वालों की बहुत ही श्रद्धा है अखण्ड रामायण करने कराने पर अकाट्य फल होता है इसमें दो राय नहीं है, बशर्ते पाठ ठीक से किया जाये पाठ खंडित न होने पाये । *कहते हैं कि वाल्मीकि रामायण के बाद अखण्ड रामायण का पाठ गोस्वामीजी के समय में ही होने लगा था । जो कि अब भी कहीं न कहीं होता ही रहता है । यह पाठ कुछ लोग पुण्य लाभ के लिए तो कुछ कुशल-मंगल अथवा अन्य किसी कामना की सिद्धि के लिए करते हैं ।* अखण्ड रामायण पाठ के अलावा कई भक्त प्रतिदिन नियम से पाठ करते हैं । चाहे रोज कुछ ही दोहें पढ़ें । कुछ लोग मासपारायण तो कुछ लोग नवान्हपारायण पाठ भी करते हैं। यह भी बहुत फलदायी है । समय बदलने के साथ अखण्ड रामायण के करने-कराने के मूल स्वरूप में बहुत परिवर्तन आ गया है जो कि बहुत गलत है जिसके कारण इसका ठीक ठीक फल भी नहीं मिलता । अखण्ड रामायण पाठ कराने के लिए किसी योग्य कर्मकांडी ब्राह्मण को लाना चाहिए जो आवश्यक पूजा सम्पन्न करा सके और अपने उद्देश्य अथवा कामना के अनुरूप उचित सम्पुट का चयन करके अखण्ड ...

मुंडन संस्कार का वैज्ञानिक महत्व -

मुंडन संस्कार का वैज्ञानिक महत्व - हिंदू धर्म के 16 मुख्य संस्कारों में से एक संस्कार मुंडन भी है । शिशु जब जन्म लेता है, तब उसके सिर पर गर्भ के समय से ही कुछ केश पाए जाते हैं, जो अशुद्ध माने जाते हैं । इसके पीछे कारण यह है कि, जब बच्चा मां के गर्भ में होता है तब उसके सिर के बालों में बहुत से कीटाणु, बैक्टिरिया और जीवाणु लगे होते हैं, जो साधारण तरह से धोने से नहीं निकल सकते । वैदिक बिहारी जी नीतीश  इसके लिए एक बार बच्चे का मुंडन जरूरी होता है । बाल कटवाने से शरीर की अनावश्यक गर्मी निकल जाती है, दिमाग व सिर ठंडा रहता है । बच्चों में दांत निकलते समय होने वाला सिर दर्द व तालु का कांपना बंद हो जाता है । शरीर पर और विशेषकर सिर पर विटामिन-डी (धूप के रूप) में पड़ने से, कोशिकाएं जाग्रत होकर खून का प्रसारण अच्छी तरह कर पाती हैं जिनसे भविष्य में आने वाले केश बेहतर होते हैं । जब बच्चोँ के दाँत निकलने लगते हैँ तो उन्हेँ कई प्रकार के रोग होने की संभावना रहती है । अक्सर इस समय बच्चोँ में निर्बलता, चिड़चिड़ापन, आदि उत्पन्न होने लगता है और उसे दस्त तथा बाल झड़ने की शिकायत होने लगती है । मुंडन करान...

किस माह में क्या न खाएँ

*#पुराने समय की कहावत है - - -* चैते गुड़, वैसाखे तेल । जेठ के पंथ¹, अषाढ़े बेल ।। सावन साग, भादौ दही²। कुवांर करेला, कार्तिक मही³ ।। अगहन जीरा, पूसै धना। माघे मिश्री, फागुन चना।। जो कोई इतने परिहरै, ता घर बैद पैर नहीं धरै।।।। *किस माह में क्या न खाएँ* _*#आवश्यक निर्देश* चैत्र माह में नया गुड़ न खाएं  (15 march-15april) बैसाख माह में नया तेल न लगाएं (16April-15may) जेठ माह में दोपहर में नहीं चलना चाहिए (16May-15june) अषाढ़ माह में पका बेल न खाएं  (16june-15july) सावन माह में साग न खाएं  (16july-15August) भादों माह में दही न खाएं  (16august-15september) क्वार माह में करेला न खाएं  (16september-15october) कार्तिक माह में जमीन पर न सोएं (16October-15november) अगहन माह में जीरा न खाएं  (16 November -15 December) पूस माह में धनिया न खाएं  (16 Dec- 15 jan) माघ माह में मिश्री न खाएं  (16jan-15feb) फागुन माह में चना न खाएं (16 feb- 14march ) *आयुर्वेदामृतम्*

कैसे पहचानें कि दैवीय शक्ति आपकी मदद कर रही हैइन 11 संकेतों

कैसे पहचानें कि दैवीय शक्ति आपकी मदद कर रही है इन 11 संकेतों से कर सकते हैं आभास::- ===================== ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ  दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें उनके जीवन में दैवीय सहायता मिलती है। किसी को ज्यादा तो किसी को कम। कुछ तो ऐसे हैं जिनके माध्यम से दैवीय शक्तियां अच्छा काम करवाती हैं। सवाल यह उठता है कि आम व्यक्ति कैसे पहचानें कि उसकी दैवीय शक्तियां मदद कर रही है या उसकी पूजा-पाठ-प्रार्थना का असर हो रहा है? इन 11 संकेतों से हम इसको महसूस कर सकते हैं- 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 1. अच्छा चरित्र ============ शास्त्र कहते हैं कि दैवीय शक्तियां सिर्फ उसकी ही मदद करती है, जो दूसरों के दुख को समझता है, जो बुराइयों से दूर रहता है, जो नकारात्मक विचारों से दूर रहता है, जो नियमित अपने इष्ट की आराधना करता है या जो पुण्य के काम में लगा हुआ है। यदि आप समझते हैं कि मैं ऐसा ही हूं तो निश्चित ही दैवीय शक्तियां आपकी मदद कर रही हैं। आपको बस थोड़ा सा इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि आप अच्छे मार्ग पर हैं और आपको ऊपरी शक्तियां देख रही हैं। 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 2. ब्रह्...

ईश्वर कौन है ? (एक सुंदर कविता)

#ईश्वर कौन है ? कौन चलाता है यह दुनियां को ???  कहाँ है ईश्वर?? तुम माँ के पेट में थे नौ महीने तक,  कोई दुकान तो चलाते नहीं थे, फिर भी जिए। हाथ—पैर भी न थे कि भोजन कर लो, फिर भी जिए। श्वास लेने का भी उपाय न था, फिर भी जिए। नौ महीने माँ के पेट में तुम थे, कैसे जिए? तुम्हारी मर्जी क्या थी? किसकी मर्जी से जिए? फिर माँ के गर्भ से जन्म हुआ, जन्मते ही,  जन्म के पहले ही माँ के स्तनों में दूध भर आया, किसकी मर्जी से? अभी दूध को पीनेवाला आने ही वाला है कि दूध तैयार है, किसकी मर्जी से? गर्भ से बाहर होते ही तुमने कभी इसके पहले साँस नहीं ली थी माँ के पेट में तो माँ की साँस से ही काम चलता था— लेकिन जैसे ही तुम्हें माँ से बाहर होने का अवसर आया, तत्क्षण तुमने साँस ली, किसने सिखाया? पहले कभी साँस ली नहीं थी, किसी पाठशाला में गए नहीं थे, किसने सिखाया कैसे साँस लो? किसकी मर्जी से? फिर कौन पचाता है तुम्हारे दूध को जो तुम पीते हो, और तुम्हारे भोजन को? कौन उसे हड्डी—मांस—मज्जा में बदलता है? किसने तुम्हें जीवन की सारी प्रक्रियाएँ दी हैं? कौन जब तुम थक जाते हो तुम्हें सुला देता है? और कौन जब तुम...

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ?

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ?  जानिए इसके पीछे का रहस्य . . . जब भी हम किसी शिव मंदिर जाते हैं तो अक्सर देखते हैं कि कुछ लोग शिवलिंग के सामने बैठे नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहते हैं। ये एक परंपरा बन गई है। इस परंपरा के पीछे की वजह एक मान्यता है। आज हम आपको उसी के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार है.. इसलिए नंदी के कान में कहते हैं मनोकामना मान्यता है जहां भी शिव मंदिर होता है, वहां नंदी की स्थापना भी जरूर की जाती है क्योंकि नंदी भगवान शिव के परम भक्त हैं। जब भी कोई व्यक्ति शिव मंदिर में आता है तो वह नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहता है। इसके पीछे मान्यता है कि भगवान शिव तपस्वी हैं और वे हमेशा समाधि में रहते हैं। ऐसे में उनकी समाधि और तपस्या में कोई विघ्न ना आए। इसलिए नंदी ही हमारी मनोकामना शिवजी तक पहुंचाते हैं। इसी मान्यता के चलते लोग नंदी को लोग अपनी मनोकामना कहते हैं। शिव के ही अवतार हैं नंदी शिलाद नाम के एक मुनि थे, जो ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने उनसे संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद मुनि ने संतान भगवान शिव की प्रसन्न कर अयोनिज और मृ...