अखंड_रामायण_का_पाठ_करने_के_आवश्यक_नियम
🚩 #जय सियाराम 🚩
अखंड_रामायण_का_पाठ_करने_के_आवश्यक_नियम 🔥
श्री राम और रामायण दोनों पर सनातन धर्म को मानने वालों की बहुत ही श्रद्धा है अखण्ड रामायण करने कराने पर अकाट्य फल होता है इसमें दो राय नहीं है, बशर्ते पाठ ठीक से किया जाये पाठ खंडित न होने पाये ।
*कहते हैं कि वाल्मीकि रामायण के बाद अखण्ड रामायण का पाठ गोस्वामीजी के समय में ही होने लगा था । जो कि अब भी कहीं न कहीं होता ही रहता है । यह पाठ कुछ लोग पुण्य लाभ के लिए तो कुछ कुशल-मंगल अथवा अन्य किसी कामना की सिद्धि के लिए करते हैं ।*
अखण्ड रामायण पाठ के अलावा कई भक्त प्रतिदिन नियम से पाठ करते हैं । चाहे रोज कुछ ही दोहें पढ़ें । कुछ लोग मासपारायण तो कुछ लोग नवान्हपारायण पाठ भी करते हैं। यह भी बहुत फलदायी है ।
समय बदलने के साथ अखण्ड रामायण के करने-कराने के मूल स्वरूप में बहुत परिवर्तन आ गया है जो कि बहुत गलत है जिसके कारण इसका ठीक ठीक फल भी नहीं मिलता ।
अखण्ड रामायण पाठ कराने के लिए किसी योग्य कर्मकांडी ब्राह्मण को लाना चाहिए जो आवश्यक पूजा सम्पन्न करा सके और अपने उद्देश्य अथवा कामना के अनुरूप उचित सम्पुट का चयन करके अखण्ड रामायण का पाठ आरंभ कराना चाहिए यह सामान्यतः चौबीस घंटे में पूरा हो जाता है इसके बाद हवन, आरती, भजन और भोजन होना ही चाहिए ।
अखण्ड रामायण के दौरान सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि जब तक पाठ पूरा न हो जाय तब तक अनवरत पाठ चलना चाहिए बीच में कोई रुकावट नहीं होना चाहिए जहाँ पाठ चल रहा हो वहाँ अन्य कोई अनर्गल बात किसी को नहीं करना चाहिए और न ही पाठ करने वालों को पाठ के अलावा इधर-उधर कुछ बीच में बोलना चाहिए ।
पाठ कहने, करने और कराने के वही अधिकारी हैं जिन्हें श्रीरामचरितमानस, भगवान श्रीराम और गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज में पुर्ण श्रद्धा और विश्वास हो ।
अक्सर देखने में आता हैं कि लोग अखण्ड पाठ का आयोजन करा लेते हैं जबकि रामायण कहने वाले योग्य लोगों की व्यवस्था ही नहीं करते जो कि बहुत महत्वपूर्ण है ऐसे रंगरूट जो कभी श्रीरामचरितमानस नहीं पढ़ते, पाठ कहने के लिए आ जाते हैं कई तो मुँह में पान या गुटका भरे रहते हैं और बोलने पर थूक गिरता रहता है । ऐसे लोग बहुत ही अशुद्ध पढ़ते हैं जबकि पाठ शुद्ध होना चाहिए ये लोग मनोरंजन के लिए आते हैं, इन्हें शुद्धता से कोई मतलब नहीं होता ।
कई लोग तो ऐसे होते हैं जिन्हें रखे गए सम्पुट का ध्यान ही नहीं रहता ये एक बार कुछ तो दूसरी बार कुछ बोल देते हैं जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए ।
वैदिक बिहारी जी नीतीश
*विशेष :-🌺
*जैसा श्रीरामचरितमानस में लिखा गया है बिल्कुल वैसा ही पढ़ना चाहिए अपने मन से कुछ जोड़ना या घटाना नहीं चाहिए l
*यदि जरूरत होती तो गोस्वामीजी खुद जोड़ देते उनके जैसा भक्त-संत इस कलियुग में पैदा नहीं हुआ है और न होगा इसलिए ज्यादा दिखावा नहीं करना चाहिए।*
बिल्कुल स्पष्ट और शुद्ध पढ़ना चाहिए। होता तो यह कि *लोग मनमर्जी कुछ भी जोड़ देते हैं एक जगह तो मैंने सुना कि लोग जय अम्बे गौरी आदि भी जोड़ रहे थे ।*
रंगरूट *फ़िल्मी तर्ज पर कहने के लिए भी जोड़ते-घटाते हैं, तोड़-मरोड़ कर कहते हैं* यहाँ फ़िल्मी तर्ज की कोई जरूरत नहीं है ऐसे लोगों को पहले से ही दूर कर देना चाहिए।
एक बार एक लोग कह रहे थे कि हम लोग ऐसे तर्ज पर रामायण कह रहे थे कि लोग झूम गए शहर की लड़कियाँ आई हुई थीं वे तो डांस करने लगीं बड़ा आनंद आया ।
जब हम ही अपने ग्रन्थों का मजाक बनायेंगे तो दूसरे लोग कैसे सम्मान करेंगे,
कुल मिलाकर यही कहना है कि यह ध्यान रखना चाहिए कि अखण्ड पाठ खंडित न होने पाए रंगरूट न कहने पायें पाठ बहुत ही स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए इसके लिए पढ़ने वाले बीच-बीच में आराम करते रहें बिना आराम किए कहने से अशुद्धता की सम्भावना बढ़ जाती है प्रेम व भक्ति भाव से सीधा-सीधा पढ़ना चाहिए ऐसा करने से अवश्य ही अभीष्ट फल प्रात होता है ।
।। #पारायण विधि।।🌹
श्रीरामचरित मानस का विधिपूर्वक पाठ करने से पुर्व श्रीतुलसीदासजी, श्रीवाल्मीकिजी, श्रीशिवजी तथा श्रीहनुमानजी का आवाहन-पूजन करने के पश्चात् तीनों भाइयों सहित श्रीसीतारामजी का आवाहन, षोडशोपचार-पूजन और ध्यान करना चाहिये। तदन्तर पाठ का आरम्भ करना चाहियेः-
आवाहन_मन्त्रः-🌷
#तुलसीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुचिव्रत।
नैर्ऋत्य उपविश्येदं पूजनं प्रतिगृह्यताम्।।१।।
ॐ तुलसीदासाय नमः
श्रीवाल्मीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुभप्रद।
उत्तरपूर्वयोर्मध्ये तिष्ठ गृह्णीष्व मेऽर्चनम्।।२।।
ॐ वाल्मीकाय नमः
गौरीपते नमस्तुभ्यमिहागच्छ महेश्वर।
पूर्वदक्षिणयोर्मध्ये तिष्ठ पूजां गृहाण मे।।३।।
ॐ गौरीपतये नमः
श्रीलक्ष्मण नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
याम्यभागे समातिष्ठ पूजनं संगृहाण मे।।४।।
ॐ श्रीसपत्नीकाय लक्ष्मणाय नमः
श्रीशत्रुघ्न नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
पीठस्य पश्चिमे भागे पूजनं स्वीकुरुष्व मे।।५।।
ॐ श्रीसपत्नीकाय शत्रुघ्नाय नमः
श्रीभरत नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
पीठकस्योत्तरे भागे तिष्ठ पूजां गृहाण मे।।६।।
ॐ श्रीसपत्नीकाय भरताय नमः
श्रीहनुमन्नमस्तुभ्यमिहागच्छ कृपानिधे।
पूर्वभागे समातिष्ठ पूजनं स्वीकुरु प्रभो।।७।।
ॐ हनुमते नमः
अथ प्रधानपूजा च कर्तव्या विधिपूर्वकम्।
पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वा तु ध्यानं कुर्यात्परस्य च।।८।।
रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालंकृतं
श्यामांगं द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम्।
कारुण्यामृतसागरं प्रियगणैर्भ्रात्रादिभिर्भावितं
वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम्।।९।।
आगच्छ जानकीनाथ जानक्या सह राघव।
गृहाण मम पूजां च वायुपुत्रादिभिर्युतः।।१०।।
इत्यावाहनम्
सुवर्णरचितं राम दिव्यास्तरणशोभितम्।
आसनं हि मया दत्तं गृहाण मणिचित्रितम्।।११।।
इति षोडशोपचारैः पूजयेत्
ॐ अस्य श्रीमन्मानसरामायणश्रीरामचरितस्य श्रीशिवकाकभुशुण्डियाज्ञवल्क्यगोस्वामीतुलसीदासा ऋषयः श्रीसीतरामो देवता श्रीरामनाम बीजं भवरोगहरी भक्तिः शक्तिः मम नियन्त्रिताशेषविघ्नतया श्रीसीतारामप्रीतिपूर्वकसकलमनोरथसिद्धयर्थं पाठे विनियोगः।
अथाचमनम्
श्रीसीतारामाभ्यां नमः। श्रीरामचन्द्राय नमः।
श्रीरामभद्राय नमः।
इति मन्त्रत्रितयेन आचमनं कुर्यात्। श्रीयुगलबीजमन्त्रेण प्राणायामं कुर्यात्।।
।। अथ करन्यासः।।
जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।।
अगुंष्ठाभ्यां नमः
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पापपुंज समुहाहीं।।
तर्जनीभ्यां नमः
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।
मध्यमाभ्यां नमः
उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं।।
अनामिकाभ्यां नमः
सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
कनिष्ठिकाभ्यां नमः
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
इति करन्यासः
।। अथ ह्रदयादिन्यासः।।
जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।।
ह्रदयाय नमः।
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पापपुंज समुहाहीं।।
शिरसे स्वाहा।
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।
शिखायै वषट्।
उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं।।
कवचाय हुम्
सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
नेत्राभ्यां वौषट्
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।
अस्त्राय फट्
इति ह्रदयादिन्यासः
।। अथ ध्यानम्।।
मामवलोकय पंकजलोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।
नील तामरस स्याम काम अरि। ह्रदय कंज मकरंद मधुप हरि।।
जातुधान बरुथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन।।
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।।
भुजबल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।।
रावनारि सुखरुप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर।।
सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम।।
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब विधि कुसल कोसला मंडन।।
कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन।।
इति ध्यानम्।।
रामायण के कुछ विशेष सम्पुट जिसे रामायण में लगाकर पाठ करने से मनवांछित फल प्राप्त होता है। –
1️⃣
विपत्ति-नाश के लिये =
“राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।।”
2️⃣
संकट-नाश के लिये =
“जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।।
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।”
3️⃣
कठिन क्लेश नाश के लिये =
“हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥”
4️⃣
विघ्न शांति के लिये =
“सकल विघ्न व्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥”
5️⃣
खेद नाश के लिये =
“जब तें राम ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥”
6️⃣
चिन्ता की समाप्ति के लिये =
“जय रघुवंश बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृशानू॥”
7️⃣
विविध रोगों तथा उपद्रवों की शान्ति के लिये =
“दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥”
8️⃣
मस्तिष्क की पीड़ा दूर करने के लिये =
“हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।”
9️⃣
विष नाश के लिये =
“नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।”
1️⃣0️⃣
अकाल मृत्यु निवारण के लिये =
“नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।”
1️⃣1️⃣
सभी तरह की आपत्ति के विनाश के लिये / भूत भगाने के लिये =
“प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन।
जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥”
1️⃣2️⃣
नजर झाड़ने के लिये =
“स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।”
1️⃣3️⃣
खोयी हुई वस्तु पुनः प्राप्त करने के लिये =
“गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।”
1️⃣4️⃣
जीविका प्राप्ति के लिये =
“बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई।।”
1️⃣5️⃣
दरिद्रता मिटाने के लिये =
“अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद धन दारिद दवारि के।।”
1️⃣6️⃣
लक्ष्मी प्राप्ति के लिये =
“जिमि सरिता सागर महुँ जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।”
1️⃣7️⃣
पुत्र प्राप्ति के लिये =
“प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।’
1️⃣8️⃣
सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये =
“जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।सुख संपत्ति नाना विधि पावहि।।”
1️⃣9️⃣
ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिये =
“साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।”
2️⃣0️⃣
सर्व-सुख-प्राप्ति के लिये =
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।।
2️⃣1️⃣
मनोरथ-सिद्धि के लिये =
“भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।।”
2️⃣2️⃣
कुशल-क्षेम के लिये =
“भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।।”
2️⃣3️⃣
मुकदमा जीतने के लिये =
“पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।”
2️⃣4️⃣
शत्रु के सामने जाने के लिये =
“कर सारंग साजि कटि भाथा। अरिदल दलन चले रघुनाथा॥”
2️⃣5️⃣
शत्रु को मित्र बनाने के लिये =
“गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।”
2️⃣6️⃣
शत्रुतानाश के लिये =
“बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥”
2️⃣7️⃣
वार्तालाप में सफ़लता के लिये =
“तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा॥”
2️⃣8️⃣
विवाह के लिये =
“तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि सँवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला, कुँअरि लई हँकारि कै॥”
2️⃣9️⃣
यात्रा सफ़ल होने के लिये =
“प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयँ राखि कोसलपुर राजा॥”
3️⃣0️⃣
परीक्षा / शिक्षा की सफ़लता के लिये =
“जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥”
3️⃣1️⃣
आकर्षण के लिये =
“जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥”
3️⃣2️⃣
स्नान से पुण्य-लाभ के लिये =
“सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।”
3️⃣3️⃣
निन्दा की निवृत्ति के लिये =
“राम कृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।
3️⃣4️⃣
विद्या प्राप्ति के लिये =
गुरु गृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल विद्या सब आई॥
3️⃣5️⃣
उत्सव होने के लिये =
“सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।”
3️⃣6️⃣
यज्ञोपवीत धारण करके उसे सुरक्षित रखने के लिये =
“जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।”
3️⃣7️⃣
प्रेम बढाने के लिये =
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
3️⃣8️⃣
कातर की रक्षा के लिये =
“मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहिं अवसर सहाय सोइ होऊ।।”
3️⃣9️⃣
भगवत्स्मरण करते हुए आराम से मरने के लिये =
रामचरन दृढ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग ।
सुमन माल जिमि कंठ तें गिरत न जानइ नाग ॥
4️⃣0️⃣
विचार शुद्ध करने के लिये =
“ताके जुग पद कमल मनाउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।”
4️⃣1️⃣
संशय-निवृत्ति के लिये =
“राम कथा सुंदर करतारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी।।”
4️⃣2️⃣
ईश्वर से अपराध क्षमा कराने के लिये =
” अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता।।”
4️⃣3️⃣
विरक्ति के लिये =
“भरत चरित करि नेमु तुलसी जे सादर सुनहिं।
सीय राम पद प्रेमु अवसि होइ भव रस बिरति।।”
4️⃣4️⃣
ज्ञान-प्राप्ति के लिये =
“छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।”
4️⃣5️⃣
भक्ति की प्राप्ति के लिये =
“भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपासिंधु सुखधाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।।”
4️⃣6️⃣
श्रीहनुमान् जी को प्रसन्न करने के लिये =
“सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।।”
4️⃣7️⃣
मोक्ष-प्राप्ति के लिये =
“सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। काल सर्प जनु चले सपच्छा।।”
4️⃣8️⃣ श्री सीताराम के दर्शन के लिये =
“नील सरोरुह नील मनि नील नीलधर श्याम ।
लाजहि तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥”
4️⃣9️⃣
श्रीजानकीजी के दर्शन के लिये =
“जनकसुता जगजननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।।”
5️⃣0️⃣
श्रीरामचन्द्रजी को वश में करने के लिये =
“केहरि कटि पट पीतधर सुषमा सील निधान।
देखि भानुकुल भूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।”
5️⃣1️⃣
सहज स्वरुप दर्शन के लिये =
“भगत बछल प्रभु कृपा निधाना। बिस्व वास प्रगटे भगवाना।।”
सभी राम भक्तों को,
वैदिक बिहारी जी नीतीश✍🙏🙏
🌹राम राम 🙏
🌹जय बजरंगबली 🙏
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