श्री दत्त दर्शनम
श्री दत्त दर्शनम ब्रह्म लोक में विराजित ब्रह्मा, बैकुण्ठ लोक में विराजित श्री विष्णु एवं रुद्र लोक में ध्यानस्थ रुद्र अचानक विचलित हो उठे। वे अपने अपने दिव्यासनों के आस-पास बार बार उद्वेलित हो व्यथित हो इधर-उधर देखने लगे एवं उनकी शक्तियाँ अर्थात ब्राह्मी, लक्ष्मी एवं रुद्राणी उनकी वाचालता देख घबरा उठीं, अनेकों प्रकार के प्रयोजनों से त्रिदेवों की त्रिशक्तियों ने उन्हें पुनः स्थिर करना चाहा, शांत एवं प्रज्ञावान करना चाहा परन्तु त्रिदेवों का वाचाल कम्पन्न बढ़ता ही जा रहा था तीनों लोकों में हाहाकार मच गया, सबके सब वाचाल हो बैठे, सबके हृदय में एक बैचेनी सी महसूस होने लगी परन्तु कारण किसी की समझ में नहीं आ रहा था। आखिरकार त्रिदेव इतने वाचाल हो बैठे कि अपने-अपने सुखासनों से उठ अपने दिव्य वाहनों पर सवार हो "ह्रींकार" मार्ग की तरफ तीव्र गति से अग्रसर होने लगे। त्रिदेवों के कर्णों में "ह्रीं" का नाद गूंजने लगा। हां सब कुछ छोड़कर, सब तरफ से दृष्टि फेरकर, अपनी त्रिशक्तियों को भी छोड़कर सृष्टि के रचयिता, पालक एवं संहारक ब्रह्मा, विष्णु और र...