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एम.ए. (हिंदी) NC पेपर : 102 यूनिक पेपर कोड: 120501102

कोर्स : एम.ए. (हिंदी) NC पेपर : 102 यूनिक पेपर कोड: 120501102 शीर्षक: आदिकालीन हिंदी काव्य सेमेस्टर : 1 पूर्णांक : 70 आवश्यक निर्देश: 1. उत्तर के पूर्व प्रश्नों को अच्छी तरह से समझने का प्रयास करें।  2. छह प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दें। 3. प्रत्येक प्रश्न के अंक समान हैं। प्रश्न-1 दोहाशतक में व्यक्त सरहपा के विचारों की समीक्षा कीजिए। प्रश्न-2 नाथ-साहित्य की परम्परा में गोरखनाथ का महत्व बताइए। प्रश्न-3 विद्यापति की पदावली के काव्य-सौन्दर्य पर विचार कीजिए। प्रश्न-4 -विद्यापति का भक्तकवि हैं अथवा अश्रृंगारी प्रतिपादित जिए | प्रश्न-5 कयमासका के काव्य-तान्दर्य पर विचार कीजिए। प्रश्न-6 पृथ्वीराजयों में पृथ्वीराज के व्यक्तित्व पर विचार कीजिए। हल प्रश्न-2 नाथ-साहित्य की परम्परा में गोरखनाथ का महत्व बताइए। उत्तर  गोरखनाथ : व्यक्तित्व एवं कृतित्व नाथ संप्रदाय की मूलंभूत जानकारी प्राप्त करने के बाद हम नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक कवि गोरखनाथ तथा उनकी रचनाओं की जानकारी भी देना चाहेंगे। यह पहले बताया जा चुका है कि गोरखनाथ मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य थे। नाथों की शिष्य परंपरा मे...

नाथ साहित्य की विशेषताएँ | नाथ साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

नाथ साहित्य की विशेषताएँ | नाथ साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ अनुक्रम (Contents) नाथ साहित्य नौ नाथ के नाम नाथ साहित्य की विशेषताएँ | नाथ साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ :- (1) चित्त शुद्धि और सदाचार में विश्वास:- (2) परम्परागत रूढ़ियो एवं बाह्यडम्बरों का विरोध:- (3) गुरू महिमा :- (4) उलटवासियाँ :- (5) जनभाषा का परिष्कार :- नाथ साहित्य नाथ साहित्य की विशेषताएँ | नाथ साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ –  सिद्ध साहित्य  में आ गई विकृतियों के विरोध में नाथ साहित्य का जन्म हुआ। यद्यपि इनका मूल भी बौद्धों की वज्रयान शाखा ही है। सिद्धों ने ‘योग-साधना’ को नीरे मैथून का स्वरूप देकर समाज में अपने स्वैराचार को ‘वाममार्ग’ की शरण दी थी। नाथ-सम्प्रदाय ने योग-साधना को एक स्वस्थ साधना के रूप में अपनाया और आदिकालीन धार्मिक, सामाजिक जीवन में व्याप्त अनाचार को खत्म करने का प्रयास किया। यद्यपि नाथ लोग इस मत के जनक ‘आदिनाथ शिव’ को मानते है, लेकिन सही अर्थ में इस मत को एक सुव्यवस्थित रुप देने का श्रेय गोरखनाथ को दिया जाता है। गोरखनाथ ने अपने इस सम्प्रदाय को सिद्ध सम्प्रदाय से अलग कर दिया और इसका नाम...

जल की उत्पत्ति

जल की उत्पत्ति ‘जल’ की उत्पत्ति कैसे हुई? इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें ‘पुराणों’ का मंथन करना पड़ेगा। पुराणों का इसलिए क्योंकि ‘पुराण’ ही वे ग्रन्थ हैं जिनमें जगत् की सृष्टि-विषयक प्रश्न पर विशद रूप से विचार किया गया है। लगभग सभी पुराण इस मत पर स्थिर हैं कि जगत् की सृष्टि इस क्रम में हुई है- (1) प्रधान (प्रकृति) और पुरुष के संयोग के कारण सर्वप्रथम ‘महत्तत्त्व’ उत्पन्न हुआ। (2) महत्तत्त्व सात्विक, राजस और तामस – तीन प्रकार का है। यह ‘प्रधान’ से आवृत्त (ढँका हुआ) रहता है। (3) महत्तत्त्व से वैकारिक (सात्विक), तैजस (राजस) और भूतादि रूप (तामस) अहंकार उत्पन्न हुआ। (4) यह अहंकार त्रिगुणात्मक (सात्विक, राजस और तामस) होने के कारण ‘भूत’ (पंचतत्व) और इन्द्रिय आदि का जनक है। (5) यह अहंकार महत्तत्व से व्याप्त रहता है। (6) तामस अहंकार के विकृत होने पर ‘शब्द-तन्मात्रा’ और ‘शब्द’ गुण वाले आकाश की उत्पत्ति हुई। (7) यह शब्द तन्मात्रा वाला ‘आकाश’ तामस अहंकार से व्याप्त होने के कारण ‘स्पर्श तन्मात्रा’ की उत्पत्ति का कारण बना। अर्थात् स्पर्श गुण वाला ‘वायु’ उत्पन्न हुआ। (8) वायु आकाश से ‘आवृत्त’ रहता है।...