जल की उत्पत्ति
जल की उत्पत्ति
‘जल’ की उत्पत्ति कैसे हुई? इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें ‘पुराणों’ का मंथन करना पड़ेगा। पुराणों का इसलिए क्योंकि ‘पुराण’ ही वे ग्रन्थ हैं जिनमें जगत् की सृष्टि-विषयक प्रश्न पर विशद रूप से विचार किया गया है। लगभग सभी पुराण इस मत पर स्थिर हैं कि जगत् की सृष्टि इस क्रम में हुई है-
(1) प्रधान (प्रकृति) और पुरुष के संयोग के कारण सर्वप्रथम ‘महत्तत्त्व’ उत्पन्न हुआ।
(2) महत्तत्त्व सात्विक, राजस और तामस – तीन प्रकार का है। यह ‘प्रधान’ से आवृत्त (ढँका हुआ) रहता है।
(3) महत्तत्त्व से वैकारिक (सात्विक), तैजस (राजस) और भूतादि रूप (तामस) अहंकार उत्पन्न हुआ।
(4) यह अहंकार त्रिगुणात्मक (सात्विक, राजस और तामस) होने के कारण ‘भूत’ (पंचतत्व) और इन्द्रिय आदि का जनक है।
(5) यह अहंकार महत्तत्व से व्याप्त रहता है।
(6) तामस अहंकार के विकृत होने पर ‘शब्द-तन्मात्रा’ और ‘शब्द’ गुण वाले आकाश की उत्पत्ति हुई।
(7) यह शब्द तन्मात्रा वाला ‘आकाश’ तामस अहंकार से व्याप्त होने के कारण ‘स्पर्श तन्मात्रा’ की उत्पत्ति का कारण बना। अर्थात् स्पर्श गुण वाला ‘वायु’ उत्पन्न हुआ।
(8) वायु आकाश से ‘आवृत्त’ रहता है। अतः इन दोनों (शब्द और स्पर्श तन्मात्राओं) के संयोग से ‘रूप तन्मात्रा’ तथा रूप गुण वाले ‘तेज’ की उत्पत्ति हुई।
(9) ‘तेज’ स्पर्श तन्मात्रा से आवृत्त रहता है। अतः आकाश, वायु और तेज के संयोग से ‘रस तन्मात्रा’ तथा रस गुण वाले ‘जल’ की सृष्टि हुई।
(10) रस तन्मात्रा तेज से आवृत्त रहती है। अतः उसमें जब विकार हुआ तो आकाश, वायु, तेज और जल के संयोग से ‘गन्ध तन्मात्रा’ तथा गन्ध गुण वाली पृथ्वी की उत्पत्ति हुई।
आधुनिक भौतिक-विज्ञान के अनुसार ‘जल’ की उत्पत्ति ‘हाईड्रोजन+ऑक्सीजन’ इन दो गैसों पर विद्युत की प्रक्रिया के कारण हुई है। पौराणिक सिद्धान्त के अनुसार ‘वायु’ और ‘तेज’ की प्रतिक्रिया के कारण ‘जल’ उत्पन्न हुआ है। यदि वायु को गैसों का समुच्चय एवं तेज को विद्युत माना जाये तो इन दोनों ही सिद्धांतों में कोई अन्तर नहीं है। अतः जल की उत्पत्ति का पौराणिक सिद्धांत पूर्णतया विज्ञान-सम्मत सिद्ध होता है।
(1) प्रधान (प्रकृति) और पुरुष के संयोग के कारण सर्वप्रथम ‘महत्तत्त्व’ उत्पन्न हुआ।
(2) महत्तत्त्व सात्विक, राजस और तामस – तीन प्रकार का है। यह ‘प्रधान’ से आवृत्त (ढँका हुआ) रहता है।
(3) महत्तत्त्व से वैकारिक (सात्विक), तैजस (राजस) और भूतादि रूप (तामस) अहंकार उत्पन्न हुआ।
(4) यह अहंकार त्रिगुणात्मक (सात्विक, राजस और तामस) होने के कारण ‘भूत’ (पंचतत्व) और इन्द्रिय आदि का जनक है।
(5) यह अहंकार महत्तत्व से व्याप्त रहता है।
(6) तामस अहंकार के विकृत होने पर ‘शब्द-तन्मात्रा’ और ‘शब्द’ गुण वाले आकाश की उत्पत्ति हुई।
(7) यह शब्द तन्मात्रा वाला ‘आकाश’ तामस अहंकार से व्याप्त होने के कारण ‘स्पर्श तन्मात्रा’ की उत्पत्ति का कारण बना। अर्थात् स्पर्श गुण वाला ‘वायु’ उत्पन्न हुआ।
(8) वायु आकाश से ‘आवृत्त’ रहता है। अतः इन दोनों (शब्द और स्पर्श तन्मात्राओं) के संयोग से ‘रूप तन्मात्रा’ तथा रूप गुण वाले ‘तेज’ की उत्पत्ति हुई।
(9) ‘तेज’ स्पर्श तन्मात्रा से आवृत्त रहता है। अतः आकाश, वायु और तेज के संयोग से ‘रस तन्मात्रा’ तथा रस गुण वाले ‘जल’ की सृष्टि हुई।
(10) रस तन्मात्रा तेज से आवृत्त रहती है। अतः उसमें जब विकार हुआ तो आकाश, वायु, तेज और जल के संयोग से ‘गन्ध तन्मात्रा’ तथा गन्ध गुण वाली पृथ्वी की उत्पत्ति हुई।
विशेषः
इस सृष्टि क्रम में ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक तन्मात्राएँ, आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी की क्रमशः ‘गुण’ मात्र हैं, इनमें कोई विशेष भाव नहीं है और इनका सुख-दुख तथा मोह रूप से अनुभव नहीं हो सकता और ये शान्त, घोर तथा गूढ़ नहीं हैं। अतः ये अविशेष हैं। उक्त पौराणिक सृष्टि क्रम, तुलना करने पर आधुनिक-विज्ञान की कसौटी पर पूर्ण रूप से ‘खरा’ उतरता है।आधुनिक भौतिक-विज्ञान के अनुसार ‘जल’ की उत्पत्ति ‘हाईड्रोजन+ऑक्सीजन’ इन दो गैसों पर विद्युत की प्रक्रिया के कारण हुई है। पौराणिक सिद्धान्त के अनुसार ‘वायु’ और ‘तेज’ की प्रतिक्रिया के कारण ‘जल’ उत्पन्न हुआ है। यदि वायु को गैसों का समुच्चय एवं तेज को विद्युत माना जाये तो इन दोनों ही सिद्धांतों में कोई अन्तर नहीं है। अतः जल की उत्पत्ति का पौराणिक सिद्धांत पूर्णतया विज्ञान-सम्मत सिद्ध होता है।
आधुनिक खोज के अनुसार
वैज्ञानिकों ने बताया कि उल्कापिंडों पर पानी की जो रासायनिक संरचना थी, वो धरती के पानी के मिलती नहीं थी. उल्कापिंडों से आए पानी में ड्यूटीरियम (Deuterium) ज्यादा था. यह हाइड्रोजन (Hydrogen) का भारी रूप होता है. इसका मतलब ये है कि सौर मंडल में आज भी इस तत्व से भरे हुए उल्कापिंडों पर पानी की मौजूदगी जरूर होगी लेकिन रूप थोड़ा अलग होगा.
सौर हवा (Solar Wind) आमतौर से हाइड्रोजन के आयन निकलते हैं. जो एस्टेरॉयड के पत्थरों में मौजूद ऑक्सीजन के एटम से मिलकर पानी बनाते हैं. पुराने रिसर्च में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि इटोकावा (Itokawa) नाम के एस्टेरॉयड पर काफी ज्यादा पानी है. लेकिन यह पता नहीं चलता कि इस एस्टेरॉयड पर इतना पानी आया कहां से. ऐसा माना जाता है कि हमारे सौर मंडल के शुरुआत में काफी ज्यादा धूल फैली हुई थी. जो सौर हवा की वजह पानी में तब्दील हुई. बात वहीं आकर अटकती है कि धूल पानी कैसे बन सकता है. तो ये समझ ले कि धूल के कणों में ऑक्सीजन होता है, सौर हवा के हाइड्रोजन से मिलने के बाद वह पानी बनता है.
ल्यूक डेली ने जापानी स्पेसक्राफ्ट हायाबूसा द्वारा लाए गए एस्टेरॉयड्स के टुकड़े की जांच की थी. ये टुकड़ा साल 2010 में वापस धरती पर आया था. ल्यूक ने देखा कि एस्टेरॉयड के टुकड़े पर कुछ ऐसे कण हैं जो सौर हवा (Solar Wind) की वजह से पानी में तब्दील हो चुके थे. ल्यूक की गणना के मुताबिक ड्यूटीरियम से भरे एस्टेरॉयड के एक मीटर क्यूब के टुकड़े से करीब 20 लीटर पानी निकल सकता है.
आधुनिक वैज्ञानिक आकाश, वायु तेज, जल और पृथ्वी को तत्व नहीं मानते। न मानने का कारण ‘तत्व’ संबंधी अवधारणा है। तत्व के सम्बन्ध में पौराणिक अवधारणा यह है कि जिसमें ‘तत्’ (अर्थात् पुरुष/विष्णु/ब्रह्म) व्याप्त हो, वह ‘तत्व’ कहलाता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार ‘तत्व’ केवल मूल पदार्थ (Element) होता है। वस्तुतः ‘तत्त्व’ और ‘तत्व’ में बहुत अन्तर है। ‘तत्त्व’ वास्तविक रूप में एक ‘भूत’ है। किन्तु तत्व या Element एक पदार्थ मात्र है। अतः यह भेद मात्र अवधारणा के कारण उत्पन्न हुआ है।
इस सम्बन्ध में ‘विष्णु पुराण’ का निम्नलिखित श्लोक दृष्टव्य है-
‘पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च।
सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषाख्यं हि यज् जगत्।।’
अर्थात्- पृथिवी, आपः (जल), तेज, वायु, आकाश, समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरण इत्यादि जितना भी यह जगत् (गतिशील संसार है, सब ‘पुरुष रूप’ है।
-श्री विष्णु पुराण/प्रथम अंश/अ.-2/श्लोक -68
महर्षि पाराशर का कथन है कि सृष्टि की रचना में भगवान् तो केवल निमित्त-मात्र हैं (क्योंकि) उसका प्रधान कारण तो ‘सृज्य पदार्थों’ की शक्तियाँ ही हैं। वस्तुओं की रचना में निमित्त मात्र को छोड़कर और किसी बात की आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि वस्तु तो अपनी ही (परिणाम) शक्ति से ‘वस्तुता’ (स्थूलरूपता) को प्राप्त हो जाती है-
‘निमित्तमात्रमेवासौ सृ्ज्यानां सर्गकर्मणि।
प्रधान कारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तयः।।
निमित्त मात्रं मुक्त्वैवं नान्यक्तिञ्चिदपेक्षते।
नीयते तपतां श्रेष्ठ स्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम्।।’
< -श्री विष्णु पुराण/प्रथम अंश/अ.-4/श्लोक 51-52
‘जल’ की उत्पत्ति के संबंध में एक अन्य पुरातन- अवधारणा भी विचारणीय है। लगभग सभी पुराणों और स्मृतियों में यह श्लोक (थोड़े-बहुत पाठभेद से) दिया रहता है जो इस अर्थ का वाचक है कि जल की उत्पत्ति ‘नर’ (पुरुष = परब्रह्म) से हुई है अतः उसका (अपत्य रूप में) प्राचीन नाम ‘नार’ है, चूंकि वह (नर) ‘नार’ में ही निवास करता है, अत: उस नर को ‘नारायण’ कहते हैं-
आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।।
-ब्रह्मपुराण/अ-1/श्लोक-38
विष्णुपुराण के अनुसार इस समग्र संसार के सृष्टि कर्ता ‘ब्रह्मा’ का सबसे पहला नाम नारायण है। दूसरे शब्दों में में भगवान का ‘जलमय रूप’ ही इस संसार की उत्पत्ति का कारण है-
जल रूपेण हि हरिः सोमो वरूण उत्तमः।
अग्नीषोममयं विश्वं विष्णुरापस्तु कारणम्।।
-अग्निपुराण /अ.-64/श्लोक 1-2
‘हरिवंश पुराण’ भी इसकी पुष्टि करता है कि ‘आपः’ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। ‘हरिवंश’ में कहा गया है कि स्वयंभू भगवान् नारायण ने नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से सर्वप्रथम ‘जल’ की ही सृष्टि की। फिर उस जल में अपनी शक्ति का आधीन किया जिससे एक बहुत बड़ा ‘हिरण्यमय-अण्ड’ प्रकट हुआ। वह अण्ड दीर्घकाल तक जल में स्थित रहा। उसी में ब्रह्माजी प्रकट हुए-
ततः स्वयंभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत्।।35।।
हिरण्य वर्णभभवत् तदण्डमुदकेशयम्।
तत्रजज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयंभूरिति नः श्रुतम्।। 37।।
इस ‘हिरण्यमय अण्ड’ के दो खण्ड हो गये। ऊपर का खण्ड ‘द्युलोक’ कहलाया और नीचे का ‘भूलोक’। दोनों के बीच का खाली भाग ‘आकाश’ कहलाया। स्वयं ब्रह्माजी ‘आपव’ कहलाये-
‘उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य ज्ञज्ञिरे।
आपवस्य प्रजासर्गें सृजतो ही प्रजापतेः।।49।।’
अर्थात्- इस प्रकार प्रजा की सृष्टि रचते हुए उन ‘आपव’ (अर्थात् जल में प्रकट हुए) प्रजापति ब्रह्मा के अंगों में से उच्च तथा साधारण श्रेणी के बहुत से प्राणी प्रकट हुए।
-हरिवंश/हरिवंश पर्व/प्रथम अध्याय
‘जल’ केवल ‘नारायण’ ही नहीं, ब्रह्मा विष्णु और महेश (रूद्र) तीनों है।
‘वायु पुराण’ के अनुसार जल शिव की अष्टमूर्तियों में से एक है। दूसरे शब्दों में ‘रूद्र’ की उपासना के लिए जो आठ प्रतीक निर्धारित हैं उनमें से एक जल है-
ततोSभिसृष्टास्तनव एषां नाम्ना स्वयंभुवा।
सूर्यो मही जलं वह्निर्वायुराकाशमेव च।।
दीक्षितो ब्राह्मणश्चन्द्र इत्येते ब्रह्मघातवः।
तेषु पूज्यश्च वन्द्यः स्याद् रुद्रस्तान्न हिनस्तिवै।।
ये आठ प्रतीक क्रमशः सूर्य, मही, जल, वह्नि(पशुपति), वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र हैं। रूद्र की जो आठ मूर्तियाँ निश्चित हैं, उनकी पूजा (क्रमशः) सूर्य (रूद्र), मही (शर्व), जल (भव), वह्नि (पशुपति), वायु (ईशान), आकाश (भीम), दीक्षित ब्राह्मण (उग्र) तथा चन्द्र (महादेव) में करने से रूद्र कभी भी उपासक को हानि नहीं पहुँचाते।
इनमें शिव का जो ‘रसात्मक’ रूप है वह ‘भव’ कहलाता है और जल में निवास करता है। इसलिए ‘भव्’ और ‘जल’ से सम्पूर्ण भूत समूह (प्राणी) उत्पन्न होता है और वह सबको उत्पन्न करता है। अतः ‘भवन-भावन-सम्बंध’ होने के कारण ‘जल जीवों का संभव’ कहलाता है-
यस्माद्भवन्ति भूतानि ताम्यस्ता भावयन्ति च।
भवनाद्भवनाच्चैव भूतानां संभवः स्मृतः।।22।।
इसी कारण कहा गया है कि जल में मल-मूत्र नहीं त्यागना चाहिए। न थूकना चाहिए। नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिए। जल में मैथुन नहीं करना चाहिए। शिरः स्नान नहीं करना चाहिए। स्थिर या बहते हुए जल के प्रति कोई अप्रीतिजनक बात नहीं कहनी चाहिए। पवित्र या अपवित्र शरीर के स्पर्श से जल कभी-भी दूषित नहीं होता। किन्तु मटमैले, विरस, दुर्गन्धित और थोड़े जल का उपयोग नहीं करना चाहिए।
समुद्र जल का उत्पत्ति स्थान है। इसलिए जलराशि समुद्र की कामना करती है। जल समुद्र को पाकर पवित्र और अमृतमय हो जाता है। बहते हुए जल को रोकना नहीं चाहिए। क्योंकि वह समुद्र में जाना चाहता है। इस प्रकार ‘जल तत्त्व’ को जानकर जो जल में रहता है, उसकी ‘हिंसा’ भव-देवता नहीं करते हैं।
भगवान् महादेव ही अमृतात्मा जलमय चन्द्रमा कहे जाते हैं। (महादेवोSमृतात्माSसौ द्यृम्मयश्चन्द्रमाः स्मृतः)।
जलरूप भव की पत्नि ‘उषा’ और पुत्र ‘उशना’ माने गये हैं- भवस्य या द्वितीया तु तनुरापः स्मृता तु वै। तस्योषाSन्न स्मृता पत्नी पुत्रश्चाप्युशना स्मृतः।।
-वायुपुराण/अ.-27/श्लोक-50
पुराणों और स्मृतियों के अनुसार ‘जल’ आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक तीनों रूपों में विद्यमान है।
वेदों में जल को ‘आपो देवता’ कहा गया है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद – इन तीनों संहिताओं में, यद्यपि जल के लिए पूरे एक सौ पर्यायवाची शब्द प्रयुक्त हुए हैं, तथापि सर्वाधिक प्रयोग ‘आपः’ शब्द का हुआ है, इसका करण हैवस्तुत: आपः शब्द ‘आप्’ धातु का विकसित रूप है। आप् धातु का प्रयोग व्यापक होने, फैलने एवं सर्वत्र विद्यमान रहने के अर्थ में किया जाता है। दूसरे शब्दों में, जो सर्वव्यापी है, जो फैल सकता है और जो सर्वत्र विद्यमान है, वह ‘आपः’ कहलाता है। ये तीनों लक्षण क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश के वाचक हैं। अतः वेदों में यदि जल को ‘आपो देवता’ कहा गया है तो ठीक ही है। वह पूर्ण उपयुक्त है। साथ ही उपवृंहण करने पर पुराणों की विचारधारा से भी मेल खाता है।
थोड़ा-सा हम ‘देवता’ शब्द पर भी विचार कर लें। क्योंकि पाश्चात्य भाष्यकारों ने वैदिक-देवताओं के प्रति अपने जो विचार व्यक्त किए हैं, उनके कारण वैदिक देवता बहुत ही हल्के होकर रह गये हैं। देवता ही क्यों, ‘वेद’ तक ‘सामान्य धर्मग्रन्थ’ बनकर रह गये हैं। आज के लोग जब ‘वेदों’ को पढ़ते हैं तो उन्हें वेदों में कोई खास बात नजर नहीं आती। पाश्चात्यों के अनुकरण पर (उन्हें भी) वेदों में केवल यज्ञ-उपासना, बलि और हिंसा ही अधिक दिखायी देती है. वेदों के मंत्र-ऋक्, यजुष्, साम और अथर्व की बजाय उन्हें घुमन्तू कबीले के प्राचीन-गीत अधिक मालूम पड़ते हैं। वेदों की ‘देवता’ पर उनका ध्यान ही नहीं जाता। और यह सब केवल ‘देवता’ शब्द के कारण हुआ है जिसे प्राचीन भारतवासियों के अलावा, अन्य कोई भी नहीं समझ पाया।
वस्तुतः ‘देवता’ शब्द उस ईश्वरीय शक्ति या रूप के लिए प्रयुक्त होता है, जिसका सृष्टि के विकास, उसकी स्थिरता तथा संहार पर प्रभाव पड़ता है और जिसका इन तीनों क्रियाओं में ‘सीधा दखल’ रहता है।
महर्षि वाल्मीकि ने अपनी ‘महारामायण’ (योग वासिष्ठ) में कहा है कि स्थावर (पर्वत आदि), जंगम (प्राणिवर्ग), आकाश, जल, अग्नि, वायु इत्यादि में ‘शुद्ध चेतन’ नित्य रूप से विद्यमान रहता है। वह न कभी उदित होता है और न अस्त।
शुद्धं हि चेतनं नित्यं नोदेति न च शाम्यति।
स्थावरे जंगमे व्योम्नि शैलेSर्ग्नो पवने स्थितम्।।
-योग वसिष्ठ/उत्पत्ति प्रकरण/सर्ग-55/3
पाणिनी के अष्टाध्यायी (3/3/121) के अनुसार ‘दिवु’ (दिवादिगण) धातु से ‘दीव्यति द्योतते इति देवः’ (इस अर्थ में) ‘हलश्च’ सूत्र से ‘घ’ प्रत्यय करके ‘देव’ शब्द बनता है। पुनः उसी अर्थ में ‘तल्’ प्रत्यय करके ‘देवता’ शब्द की सिद्धि होती है।
‘वेद’ के ‘निरुक्त’ नामक अंग के भाष्यकार महर्षि यास्क के अनुसार “यो देवः सा देवता” (7/4/2) अर्थात् जो दीप्तिमान (या प्रभावशाली) है वह देवता है। यास्क ने कहा है कि देवता शब्द ‘दा’‘दीप’ और ‘द्युत्’ धातुओं से बना है।
(देवो दानाद् वा दीपनाद वा द्योतनाद् वा निरुक्त, दैवत काण्ड 7/4/2)
अर्थात्- जो ऐश्वर्य प्रदान करता है (ददाति ह्यसौ ऐश्वर्याणि) जो स्वयं तेजोमय होने के कारण दूसरों के प्रकाशित करता है ( दीपयति ह्यसौ तेजोमयत्वात्) अथवा स्वयं प्रकाशमान होने के कारण दूसरों को प्रकाशित करता है (द्योतनाद वा)।
यहाँ ‘देवता’ शब्द की विस्तृत व्याख्या करना हमारा ‘अभीष्ट’ नहीं है। संक्षेप में यही समझ लेना चाहिए कि वैदिक ऋषियों ने जिस शक्ति या पदार्थ की ‘देवता’रूप में अनुभूति की है, उसे ही उन्होंने उस मंत्र (ऋचा, यजुष् या साम) का ‘देवता’ बताया है।
आधुनिक वैज्ञानिक आकाश, वायु तेज, जल और पृथ्वी को तत्व नहीं मानते। न मानने का कारण ‘तत्व’ संबंधी अवधारणा है। तत्व के सम्बन्ध में पौराणिक अवधारणा यह है कि जिसमें ‘तत्’ (अर्थात् पुरुष/विष्णु/ब्रह्म) व्याप्त हो, वह ‘तत्व’ कहलाता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार ‘तत्व’ केवल मूल पदार्थ (Element) होता है। वस्तुतः ‘तत्त्व’ और ‘तत्व’ में बहुत अन्तर है। ‘तत्त्व’ वास्तविक रूप में एक ‘भूत’ है। किन्तु तत्व या Element एक पदार्थ मात्र है। अतः यह भेद मात्र अवधारणा के कारण उत्पन्न हुआ है।
इस सम्बन्ध में ‘विष्णु पुराण’ का निम्नलिखित श्लोक दृष्टव्य है-
‘पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च।
सर्वेन्द्रियान्तःकरणं पुरुषाख्यं हि यज् जगत्।।’
अर्थात्- पृथिवी, आपः (जल), तेज, वायु, आकाश, समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरण इत्यादि जितना भी यह जगत् (गतिशील संसार है, सब ‘पुरुष रूप’ है।
-श्री विष्णु पुराण/प्रथम अंश/अ.-2/श्लोक -68
महर्षि पाराशर का कथन है कि सृष्टि की रचना में भगवान् तो केवल निमित्त-मात्र हैं (क्योंकि) उसका प्रधान कारण तो ‘सृज्य पदार्थों’ की शक्तियाँ ही हैं। वस्तुओं की रचना में निमित्त मात्र को छोड़कर और किसी बात की आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि वस्तु तो अपनी ही (परिणाम) शक्ति से ‘वस्तुता’ (स्थूलरूपता) को प्राप्त हो जाती है-
‘निमित्तमात्रमेवासौ सृ्ज्यानां सर्गकर्मणि।
प्रधान कारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तयः।।
निमित्त मात्रं मुक्त्वैवं नान्यक्तिञ्चिदपेक्षते।
नीयते तपतां श्रेष्ठ स्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम्।।’
< -श्री विष्णु पुराण/प्रथम अंश/अ.-4/श्लोक 51-52
‘जल’ की उत्पत्ति के संबंध में एक अन्य पुरातन- अवधारणा भी विचारणीय है। लगभग सभी पुराणों और स्मृतियों में यह श्लोक (थोड़े-बहुत पाठभेद से) दिया रहता है जो इस अर्थ का वाचक है कि जल की उत्पत्ति ‘नर’ (पुरुष = परब्रह्म) से हुई है अतः उसका (अपत्य रूप में) प्राचीन नाम ‘नार’ है, चूंकि वह (नर) ‘नार’ में ही निवास करता है, अत: उस नर को ‘नारायण’ कहते हैं-
आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।।
-ब्रह्मपुराण/अ-1/श्लोक-38
विष्णुपुराण के अनुसार इस समग्र संसार के सृष्टि कर्ता ‘ब्रह्मा’ का सबसे पहला नाम नारायण है। दूसरे शब्दों में में भगवान का ‘जलमय रूप’ ही इस संसार की उत्पत्ति का कारण है-
जल रूपेण हि हरिः सोमो वरूण उत्तमः।
अग्नीषोममयं विश्वं विष्णुरापस्तु कारणम्।।
-अग्निपुराण /अ.-64/श्लोक 1-2
‘हरिवंश पुराण’ भी इसकी पुष्टि करता है कि ‘आपः’ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। ‘हरिवंश’ में कहा गया है कि स्वयंभू भगवान् नारायण ने नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से सर्वप्रथम ‘जल’ की ही सृष्टि की। फिर उस जल में अपनी शक्ति का आधीन किया जिससे एक बहुत बड़ा ‘हिरण्यमय-अण्ड’ प्रकट हुआ। वह अण्ड दीर्घकाल तक जल में स्थित रहा। उसी में ब्रह्माजी प्रकट हुए-
ततः स्वयंभूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत्।।35।।
हिरण्य वर्णभभवत् तदण्डमुदकेशयम्।
तत्रजज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयंभूरिति नः श्रुतम्।। 37।।
इस ‘हिरण्यमय अण्ड’ के दो खण्ड हो गये। ऊपर का खण्ड ‘द्युलोक’ कहलाया और नीचे का ‘भूलोक’। दोनों के बीच का खाली भाग ‘आकाश’ कहलाया। स्वयं ब्रह्माजी ‘आपव’ कहलाये-
‘उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य ज्ञज्ञिरे।
आपवस्य प्रजासर्गें सृजतो ही प्रजापतेः।।49।।’
अर्थात्- इस प्रकार प्रजा की सृष्टि रचते हुए उन ‘आपव’ (अर्थात् जल में प्रकट हुए) प्रजापति ब्रह्मा के अंगों में से उच्च तथा साधारण श्रेणी के बहुत से प्राणी प्रकट हुए।
-हरिवंश/हरिवंश पर्व/प्रथम अध्याय
‘जल’ केवल ‘नारायण’ ही नहीं, ब्रह्मा विष्णु और महेश (रूद्र) तीनों है।
‘वायु पुराण’ के अनुसार जल शिव की अष्टमूर्तियों में से एक है। दूसरे शब्दों में ‘रूद्र’ की उपासना के लिए जो आठ प्रतीक निर्धारित हैं उनमें से एक जल है-
ततोSभिसृष्टास्तनव एषां नाम्ना स्वयंभुवा।
सूर्यो मही जलं वह्निर्वायुराकाशमेव च।।
दीक्षितो ब्राह्मणश्चन्द्र इत्येते ब्रह्मघातवः।
तेषु पूज्यश्च वन्द्यः स्याद् रुद्रस्तान्न हिनस्तिवै।।
ये आठ प्रतीक क्रमशः सूर्य, मही, जल, वह्नि(पशुपति), वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र हैं। रूद्र की जो आठ मूर्तियाँ निश्चित हैं, उनकी पूजा (क्रमशः) सूर्य (रूद्र), मही (शर्व), जल (भव), वह्नि (पशुपति), वायु (ईशान), आकाश (भीम), दीक्षित ब्राह्मण (उग्र) तथा चन्द्र (महादेव) में करने से रूद्र कभी भी उपासक को हानि नहीं पहुँचाते।
इनमें शिव का जो ‘रसात्मक’ रूप है वह ‘भव’ कहलाता है और जल में निवास करता है। इसलिए ‘भव्’ और ‘जल’ से सम्पूर्ण भूत समूह (प्राणी) उत्पन्न होता है और वह सबको उत्पन्न करता है। अतः ‘भवन-भावन-सम्बंध’ होने के कारण ‘जल जीवों का संभव’ कहलाता है-
यस्माद्भवन्ति भूतानि ताम्यस्ता भावयन्ति च।
भवनाद्भवनाच्चैव भूतानां संभवः स्मृतः।।22।।
इसी कारण कहा गया है कि जल में मल-मूत्र नहीं त्यागना चाहिए। न थूकना चाहिए। नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिए। जल में मैथुन नहीं करना चाहिए। शिरः स्नान नहीं करना चाहिए। स्थिर या बहते हुए जल के प्रति कोई अप्रीतिजनक बात नहीं कहनी चाहिए। पवित्र या अपवित्र शरीर के स्पर्श से जल कभी-भी दूषित नहीं होता। किन्तु मटमैले, विरस, दुर्गन्धित और थोड़े जल का उपयोग नहीं करना चाहिए।
समुद्र जल का उत्पत्ति स्थान है। इसलिए जलराशि समुद्र की कामना करती है। जल समुद्र को पाकर पवित्र और अमृतमय हो जाता है। बहते हुए जल को रोकना नहीं चाहिए। क्योंकि वह समुद्र में जाना चाहता है। इस प्रकार ‘जल तत्त्व’ को जानकर जो जल में रहता है, उसकी ‘हिंसा’ भव-देवता नहीं करते हैं।
भगवान् महादेव ही अमृतात्मा जलमय चन्द्रमा कहे जाते हैं। (महादेवोSमृतात्माSसौ द्यृम्मयश्चन्द्रमाः स्मृतः)।
जलरूप भव की पत्नि ‘उषा’ और पुत्र ‘उशना’ माने गये हैं- भवस्य या द्वितीया तु तनुरापः स्मृता तु वै। तस्योषाSन्न स्मृता पत्नी पुत्रश्चाप्युशना स्मृतः।।
-वायुपुराण/अ.-27/श्लोक-50
पुराणों और स्मृतियों के अनुसार ‘जल’ आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक तीनों रूपों में विद्यमान है।
वेदों में जल को ‘आपो देवता’ कहा गया है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद – इन तीनों संहिताओं में, यद्यपि जल के लिए पूरे एक सौ पर्यायवाची शब्द प्रयुक्त हुए हैं, तथापि सर्वाधिक प्रयोग ‘आपः’ शब्द का हुआ है, इसका करण हैवस्तुत: आपः शब्द ‘आप्’ धातु का विकसित रूप है। आप् धातु का प्रयोग व्यापक होने, फैलने एवं सर्वत्र विद्यमान रहने के अर्थ में किया जाता है। दूसरे शब्दों में, जो सर्वव्यापी है, जो फैल सकता है और जो सर्वत्र विद्यमान है, वह ‘आपः’ कहलाता है। ये तीनों लक्षण क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश के वाचक हैं। अतः वेदों में यदि जल को ‘आपो देवता’ कहा गया है तो ठीक ही है। वह पूर्ण उपयुक्त है। साथ ही उपवृंहण करने पर पुराणों की विचारधारा से भी मेल खाता है।
थोड़ा-सा हम ‘देवता’ शब्द पर भी विचार कर लें। क्योंकि पाश्चात्य भाष्यकारों ने वैदिक-देवताओं के प्रति अपने जो विचार व्यक्त किए हैं, उनके कारण वैदिक देवता बहुत ही हल्के होकर रह गये हैं। देवता ही क्यों, ‘वेद’ तक ‘सामान्य धर्मग्रन्थ’ बनकर रह गये हैं। आज के लोग जब ‘वेदों’ को पढ़ते हैं तो उन्हें वेदों में कोई खास बात नजर नहीं आती। पाश्चात्यों के अनुकरण पर (उन्हें भी) वेदों में केवल यज्ञ-उपासना, बलि और हिंसा ही अधिक दिखायी देती है. वेदों के मंत्र-ऋक्, यजुष्, साम और अथर्व की बजाय उन्हें घुमन्तू कबीले के प्राचीन-गीत अधिक मालूम पड़ते हैं। वेदों की ‘देवता’ पर उनका ध्यान ही नहीं जाता। और यह सब केवल ‘देवता’ शब्द के कारण हुआ है जिसे प्राचीन भारतवासियों के अलावा, अन्य कोई भी नहीं समझ पाया।
वस्तुतः ‘देवता’ शब्द उस ईश्वरीय शक्ति या रूप के लिए प्रयुक्त होता है, जिसका सृष्टि के विकास, उसकी स्थिरता तथा संहार पर प्रभाव पड़ता है और जिसका इन तीनों क्रियाओं में ‘सीधा दखल’ रहता है।
महर्षि वाल्मीकि ने अपनी ‘महारामायण’ (योग वासिष्ठ) में कहा है कि स्थावर (पर्वत आदि), जंगम (प्राणिवर्ग), आकाश, जल, अग्नि, वायु इत्यादि में ‘शुद्ध चेतन’ नित्य रूप से विद्यमान रहता है। वह न कभी उदित होता है और न अस्त।
शुद्धं हि चेतनं नित्यं नोदेति न च शाम्यति।
स्थावरे जंगमे व्योम्नि शैलेSर्ग्नो पवने स्थितम्।।
-योग वसिष्ठ/उत्पत्ति प्रकरण/सर्ग-55/3
पाणिनी के अष्टाध्यायी (3/3/121) के अनुसार ‘दिवु’ (दिवादिगण) धातु से ‘दीव्यति द्योतते इति देवः’ (इस अर्थ में) ‘हलश्च’ सूत्र से ‘घ’ प्रत्यय करके ‘देव’ शब्द बनता है। पुनः उसी अर्थ में ‘तल्’ प्रत्यय करके ‘देवता’ शब्द की सिद्धि होती है।
‘वेद’ के ‘निरुक्त’ नामक अंग के भाष्यकार महर्षि यास्क के अनुसार “यो देवः सा देवता” (7/4/2) अर्थात् जो दीप्तिमान (या प्रभावशाली) है वह देवता है। यास्क ने कहा है कि देवता शब्द ‘दा’‘दीप’ और ‘द्युत्’ धातुओं से बना है।
(देवो दानाद् वा दीपनाद वा द्योतनाद् वा निरुक्त, दैवत काण्ड 7/4/2)
अर्थात्- जो ऐश्वर्य प्रदान करता है (ददाति ह्यसौ ऐश्वर्याणि) जो स्वयं तेजोमय होने के कारण दूसरों के प्रकाशित करता है ( दीपयति ह्यसौ तेजोमयत्वात्) अथवा स्वयं प्रकाशमान होने के कारण दूसरों को प्रकाशित करता है (द्योतनाद वा)।
यहाँ ‘देवता’ शब्द की विस्तृत व्याख्या करना हमारा ‘अभीष्ट’ नहीं है। संक्षेप में यही समझ लेना चाहिए कि वैदिक ऋषियों ने जिस शक्ति या पदार्थ की ‘देवता’रूप में अनुभूति की है, उसे ही उन्होंने उस मंत्र (ऋचा, यजुष् या साम) का ‘देवता’ बताया है।
घाट-घाट का पानी
विश्व पानी दिवस
(22 मार्च) पर विशेष
धरती पर पानी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। शायद ही कोई ऐसा जीवित प्राणी और उसकी कोशिकाएं हों, जिसमें पानी की मौजूदगी न हो। सीधे कहें तो हम 50 फीसदी से ज्यादा पानी ही हैं। इसलिए पानी का शरीर में सही अनुपात में होना जरूरी है। न कम हो और न ज्यादा। कब, कितना और किस प्रकार पानी पिया जाए कि वह शरीर में लिए लाभदायक रहे। इस बारे एक्सपर्ट्स से बात करके जानकारी दे रहे हैं राजेश भारती
श रीर को स्वस्थ रखने के लिए पौष्टिक खाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है साफ पानी पीना है। अगर पानी तय मात्रा से कम या ज्यादा और गलत समय पर पिया जाए तो यह फायदे की जगह नुकसान ही देता है। वहीं मौसम के हिसाब से भी पानी पीना जरूरी है। पानी की मात्रा कम या ज्यादा की जा सकती है। पानी पीने से हमारे शरीर का मेटाबॉलिजम सही रहता है। अगर मेटाबॉलिजम सही रहेगा तो इससे पाचन सही रहेगा। पाचन सही रहने से बहुत सारी बीमारियां दूर रहती हैं। साथ ही पानी पीते रहने से आप ज्यादा खाने की आदत से खुद को दूर रख सकते हैं।
वहीं पानी हमारे शरीर में न्यूट्रीएंट्स को ले जाने काम करता है और हानिकारक टॉक्सिंस को भी बाहर निकालता है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि लोगों को सुबह की शुरुआत चाय की जगह एक गिलास पानी पीकर करनी चाहिए।
रोजाना कितना पानी है जरूरी
रोजाना 2 से 3 लीटर सादा पानी जरूर पीना चाहिए। हालांकि यह मौसम और शरीर के आकार पर भी निर्भर करता है। गर्मी में ज्यादा पसीना निकलता है। इसलिए गर्मियों में पानी पीने की मात्रा बढ़ जाती है। वहीं सर्दियों में कम पानी पिया जाता है। वहीं पानी पीने की मात्रा शारीरिक श्रम पर भी निर्भर करती है। अगर कोई शख्स ऐसा काम करता है जिससे शरीर से ज्यादा मात्रा में पसीना निकलता है तो उन्हें कुछ ज्यादा पानी पीना चाहिए। ऐसे लोगों को गर्मियों में 3 से 4 लीटर पानी पीना चाहिए।
कब पिएं
पानी पीने का कोई तय वक्त नहीं है। जब भी प्यास लगे, पानी पी लेना चाहिए। प्यास को कभी रोककर न रखें। अगर कुछ समय के लिए प्यास रोकेंगे तो प्यास बढ़ती जाएगी। ज्यादा प्यास में पानी ज्यादा पिया जाता है। इससे प्यास बुझने के साथ-साथ शरीर में लिमिट से ज्यादा पानी चला जाता है। ऐसे में किडनी को भी जरूरत से ज्यादा काम करना पड़ जाता है। इससे किडनी कमजोर हो सकती है। इसलिए जब भी प्यास लगे, पानी पी लेना चाहिए। हां, अगर कहीं ऐसी जगह फंस गए हैं जहां पानी नहीं मिल रहा है तब अलग बात है। लेकिन ऐसा बार-बार नहीं होना चाहिए।
कैसे पिएं
पानी कभी भी जल्दबाजी में नहीं पीना चाहिए। पानी हमेशा घूंट-घूंट करके आराम से पानी चाहिए। दरअसल, जब हम घूंट-घूंट करके आराम से पानी पीते हैं तो मुंह में मौजूद कुछ एंजाइम जैसे- एमाइलेज ज्यादा मात्रा में मिलकर पेट में जाते हैं। इससे पाचन शक्ति में सुधार होता है। वहीं कहा जाता है कि पानी हमेशा बैठकर पीना चाहिए। ऐसा कोई स्थाई नियम नहीं है। अपनी सुविधा के अनुसार बैठकर या खड़े होकर पानी पी सकते हैं। होना यह चाहिए कि जब भी पानी पिएं, तसल्ली से पिएं। हालांकि कुछ एक्सपर्ट्स के अनुसार खड़े होकर पानी नहीं पीना चाहिए क्योंकि इससे पेट के निचले हिस्से की दीवारों पर दबाव बनता है, जिससे पेट के आसपास के अंगों को बहुत नुकसान पहुंचता है।
कैसा पिएं
हमेशा सादा पानी पिएं। नगर निगम की पाइप के जरिए घरों में आना वाला पानी या वॉटर प्यूरीफायर का पानी पी सकते हैं। अगर निगम की लाइन का पानी गंदा या बदबूदार है तो बेहतर होगा कि वॉटर प्यूरीफायर का पानी पिएं। वहीं अगर घर में बोरिंग का पानी आ रहा है तो बेहतर होगा कि प्यूरीफायर लगवाएं, क्योंकि बोरिंग का पानी हार्ड और खारा होता है। सर्दियों में दिन में एक-दो बार गुनगुना पानी पी सकते हैं लेकिन गर्मियों में जब तक बहुत जरूरी जैसे- कोई दवाई लेनी हो, जुकाम आदि न हो तो गुनगुना पानी न पिएं। अब चूंकि गर्मियां आ चुकी हैं तो ऐसे में सादा पानी या मटके का पानी ही बेहतर है।
गर्मियों में फ्रिज का पानी पीने से बचें। अगर मजबूरी में पीना भी पड़े तो बहुत ज्यादा ठंडा पानी न पिएं। कई बार देखने में आता है कि बाहर से आने के बाद घर में घुसते ही लोग फ्रिज का ठंडा पानी पी लेते हैं। ऐसा हरगिज न करें। दरअसल, गर्मियों में बाहर हमारे शरीर का तापमान ज्यादा हो जाता है, ऐसे में अगर फ्रिज का ठंडा पानी पीते हैं तो शरीर का तापमान बिगड़ जाता है जिससे बुखार और जुकाम होने के साथ दूसरी बीमारी भी हो सकती हैं।
मटका है बेस्ट: एक्सपर्ट बताते हैं कि गर्मियों में मटके या सुराही का पानी पीना सबसे अच्छा होता है। दरअसल, मटके में रखा पानी प्राकृतिक तरीके से ठंडा होता है। साथ ही मिट्टी में रखे होने के कारण इसमें कुछ मिनरल्स भी मिल जाते हैं। यही नहीं, मटके का पानी नियमित रूप से पीने से शरीर का इम्यून सिस्टम बेहतर होता है। मटके के पानी में ऐल्कलाइन (क्षारीय) गुण होते हैं जो पेट की कई बीमारियों को खत्म करने में मदद करता है।
बच्चा 6 महीने का हो जाए तो दे सकते हैं पानी
अगर बच्चे की उम्र 6 महीने से कम है तो उसे पानी नहीं पिलाना चाहिए। सिर्फ मां का दूध ही उसके लिए पौष्टिक आहार होता है। मां के दूध में 80% पानी और 20% पोषक तत्व होते हैं जो बच्चे के विकास के लिए जरूरी होते हैं। 6 महीने के बाद बच्चे को दिन में 2 से 3 बार 1-1 चम्मच सादा और शुद्ध पानी पिलाना शुरू करें। जब बच्चा 3 साल से ज्यादा का हो जाता है तो उसकी ऐक्टिविटी बढ़ जाती हैं और उसके शरीर से पानी की मात्रा ज्यादा निकलने लगती है। ऐसे में उन्हें पीने के लिए ज्यादा पानी की जरूरत होती है। कई बार बच्चे पानी पीने पर ध्यान नहीं दे पाते। इसलिए पैरंट्स की जिम्मेदारी है कि बच्चे को पानी पिलाएं। बच्चे को कितना पानी पिलाना चाहिए, इसके लिए बेहतर होगा कि किसी डॉक्टर की सलाह लें।
किसमें करें पानी को स्टोर
इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी है कि आप जिस पानी को पी रहे हैं, वह कहां और किस चीज में स्टोर किया गया है। पानी को हमेशा इन 3 तरह के बर्तनों में स्टोर करके रखें:
मटका: पानी स्टोर करने के लिए मटका या मिट्टी का कोई दूसरा बर्तन अच्छा माना जाता है। इसमें पानी सामान्य तापमान पर भी ठंडा रहता है और शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता। मिट्टी के जिस बर्तन में पानी स्टोर कर रहे हैं, उस पर सीधी धूप न आए, वरना पानी ठंडा नहीं होगा।
तांबे का बर्तन: तांबे के बर्तन में रखे पानी को श्रेष्ठ माना गया है। पानी में अगर कोई हानिकारक बैक्टीरिया है तो वह तांबे के बर्तन में रखे होने पर मर जाता है। साथ ही पानी में ऐसे मिनरल्स भी मिल जाते हैं जो सेहत के लिए अच्छे होते हैं।
स्टील का बर्तन: स्टील के बर्तन में पानी सुरक्षित माना जाता है। अगर घर में स्टील की बाल्टी या कोई बड़ा बर्तन है तो उसमें पानी स्टोर करके रख सकते हैं।
प्लास्टिक: मजबूरी में पानी को प्लास्टिक के सामान में स्टोर कर सकते हैं लेकिन 2 या 3 घंटे से ज्यादा नहीं। इस दौरान ध्यान रखें कि पानी पर धूप सीधी न पड़ रही हो, नहीं तो धूप की गर्मी से प्लास्टिक से हानिकारक पदार्थ निकलते हैं जो पानी में मिल जाते हैं। इस पानी को लंबे समय तक पीने से कैंसर तक हो सकता है। अगर घर में वॉटर प्यूरीफायर है और उसका टैंक प्लास्टिक का है तो बेहतर होगा कि उसमें पानी स्टोर करके न रखें। जब टैंक भर जाए तो उसमें से पानी निकालकर मटके में या कांच की बोतलों में भरकर रख लें।
नोट: बर्तन कैसा भी हो, उसे 24 घंटे में एक बार अच्छे से साफ करना जरूरी है। पानी को 24 घंटे से ज्यादा स्टोर करके न रखें।
इन हालात में कितना पिएं पानी
सुबह उठने के बाद
सुबह उठने के के बाद खाली पेट पानी पीना बहुत जरूरी है। आयुर्वेद में इसे उषापान कहा गया है। दरअसल, हम रात को 6 से 8 घंटे की नींद लेते हैं। ऐसे में सुबह शरीर में पानी की कमी हो जाती है और शरीर डिहाइड्रेट हो जाता है। इसलिए सुबह उठकर पानी जरूर पिएं। वहीं सुबह खाली पेट पानी पीने से कब्ज की समस्या कम हो जाती है। साथ ही शरीर से ज्यादातर हानिकारक टॉक्सिन्स बाहर निकल जाते हैं जिससे कई बीमारियों से बचने में मदद मिलती है।
कितना पिएं: सुबह उठकर अपनी क्षमता अनुसान 1 या 2 गिलास पिएं।
कैसा पिएं: अक्सर कहा जाता है कि सुबह गुनगुना या रात को नीबू के टुकड़े डालकर रखा गया पानी पिएं, लेकिन यह जरूरी नहीं है। सबसे अच्छा सादा और ताजा पानी होता है। इसलिए बेहतर होगा कि सुबह सिर्फ सादा पानी ही पिएं। हां, पानी का टेस्ट बदलने के लिए रात को नीबू के टुकड़े डालकर रखा गया पानी पी सकते हैं।
खाना खाने के दौरान
कुछ एक्सपर्ट्स जहां खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीने से मना करते हैं तो कुछ की राय इससे अलग है। वैसे ज्यादातर एक्सपर्ट की राय है कि खाना खाने से 45 मिनट पहले एक गिलास सादा पानी पीना चाहिए और खाना खाने के 45 मिनट बाद पानी पी सकते हैं। जरूरी हो तो खाना खाने के दौरान 1 या 2 घूंट पानी ही पिएं।
कारण- हमारे मुंह में मौजूद एंजाइम खाने के साथ मिलकर पेट में जाते हैं, जहां खाने का पाचन सही तरीके से होता है। अगर खाने के दौरान ज्यादा पानी पिएंगे तो ये एंजाइम पानी के साथ पेट में चले जाते हैं और खाना पचाना मुश्किल होता है।
वहीं दूसरी ओर एक्सपर्ट कहते हैं कि खाना खाने के तुरंत बाद 1 या 2 गिलास पानी उन्हीं लोगों को पीना चाहिए जो अपना वजन बढ़ाना चाहते हैं। अगर वजन नहीं बढ़ाना तो खाने के तुरंत बाद ज्यादा पानी न पिएं। आधे घंटे बाद पानी पी सकते हैं।
एक्सरसाइज के बाद
एक्सरसाइज के दौरान शरीर से काफी मात्रा में पसीना और सोडियम निकलता है, जिससे शरीर डिहाइड्रेट भी होता है। वहीं एक्सरसाइज के दौरान कोशिकाएं टूटती हैं। इनके बनने में भी पानी की अहम भूमिका होती है।
शरीर में पानी की मात्रा बनाए रखने के लिए एक्सरसाइज के दौरान 10-10 मिनट बाद 1 या 2 घूंट ही पानी पिएं। एक्सरसाइज खत्म करने के तुरंत बाद कभी भी 1 या 2 गिलास पानी न पिएं। जब हम एक्सरसाइज करते हैं तो दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं और शरीर में खून का प्रवाह तेज हो जाता है। इसलिए एक्सरसाइज करने के करीब 15 मिनट बाद ही ज्यादा पानी पिएं क्योंकि तब तक खून का प्रवाह और धड़कनें सामान्य हो जाती हैं।
कैसा पिएं: एक्सरसाइज के बीच में या एक्सरसाइज के बाद, हमेशा सादा पानी ही पिएं। अगर चाहे तो पानी में नीबू का रस मिला सकते हैं। 1 लीटर पानी में 1 नीबू का रस काफी रहता है। वहीं अगर डायबीटिज नहीं है तो पानी में शहद डालकर भी पी सकते हैं।
इन बीमारियों में
पथरी होने पर: अगर किसी शख्स को 5mm तक की पथरी है तो उसे तय मात्रा से कुछ ज्यादा पानी पीने की सलाह दी जाती है ताकि पथरी यूरिन के रास्ते बाहर निकल जाए।
किडनी की समस्या होने पर: अगर किसी शख्स को किडनी की समस्या है तो उसे पानी पीने पर काबू रखना चाहिए। ज्यादा पानी पिएंगे तो किडनी को ज्यादा काम करना पड़ता है।
लिवर फेल होने पर: अगर लिवर को फिट रखना है तो किडनी को फिट रखना होगा। वहीं अगर लिवर फेल होने का केस है तो पानी कम मात्रा में पीना चाहिए।
पेट खराब होने पर: लूज मोशन या कब्ज के मामले में ज्यादा पानी पीने को कहा जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि पानी बहुत ज्यादा मात्रा में ही पी लिया जाए। लूज मोशन में एक गिलास सादा पानी में एक चुटकी सफेद नमक और एक चम्मच चीनी मिलाकर पिएं। वहीं कब्ज में सादा पानी पीना फायदेमंद है
नोट: किसी भी बीमारी में अपने हिसाब से पानी की मात्रा कम या ज्यादा न करें। इस बारे में डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
कैसे जानें कि आपका पानी पीने लायक है
पानी का सिर्फ साफ दिखना ही इस बात की गारंटी नहीं है कि वह पीने लायक है। पानी को कई स्तरों पर जांचा जाता है। यह जांच आप घर पर भी कर सकते हैं:
1. TDS लेवल
TDS का उपयोग पानी की शुद्धता को जांचने के लिए किया जाता है। इसके पता लगाया जाता है कि पानी पीने लायक है या नहीं। WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के अनुसार अगर पानी का TDS 100 से 250 ppm (पार्ट्स प्रति मिलियन) है तो यह पानी पीने के लिए शुद्ध है। इससे कम या ज्यादा TDS वाले पानी को नहीं पीना चाहिए।
जानें, कितने TDS पर पानी की शुद्धता कैसी होती है
TDS लेवल क्वॉलिटी पीने में कैसा
0-150 ppm अच्छा पानी मीठा लेकिन
मिनरल्स में कुछ
कमी। पी सकते हैं
151-250 ppm बहुत अच्छा पीने के लिए अच्छा
251-300 ppm ठीक पी सकते हैं
301-500 ppm कुछ ठीक मजबूरी में थोड़ा पानी पी सकते हैं
501-900 ppm खराब बिल्कुल न पिएं
901 ppm से ज्यादा बहुत खराब पीने के बारे में
सोचें भी नहीं
घर पर ऐसे जांचें TDS
घर पर आ रहे पानी का TDS खुद भी जांच सकते हैं। TDS जांचने के लिए डिजिटल थर्मामीटर जैसी डिवाइस आती है। एक गिलास पानी लेकर इस डिवाइस के आगे से सिरे को उसमें 1 मिनट के लिए डाल दें। डिवाइस में लगी स्क्रीन पर पानी का TDS आ जाता है।
कीमत: 150 रुपये से शुरू
कहां से खरीदें: ऑनलाइन या ऑफलाइन
2. pH लेवल
pH लेवल बताता है कि पानी कितना हार्ड है और कितना सॉफ्ट। किसी भी चीज की pH वैल्यू 0 से 14 के बीच होती है। इसे एक स्कैल पर नापते हैं। इसका आदर्श पॉइंट या न्यूट्रल 7 माना जाता है। pH 7 लेवल शुद्ध पानी का होता है। अगर पानी का pH लेवल 7 से कम है तो इसे हार्ड वॉटर माना जाता है। इसे एसिडिक यानी अम्लीय पानी भी कहते हैं। अगर पानी का pH लेवल 7 से ज्यादा है तो इसे ऐल्कलाइन यानी क्षारीय पानी कहा जाता है। पीने योग्य पानी का pH लेवल 7 से 8 के बीच में होना चाहिए। हल्का ऐल्कलाइन पानी सेहत के लिए अच्छा होता है। इसमें एंटी एजिंग गुण पाए जाते हैं। साथ ही यह इम्यूनिटी भी बढाता है। यह लंबे समय तक शरीर को हाइड्रेट (शरीर में पानी का स्तर बनाकर) रखता है। इस पानी में कैंसर से लड़ने वाले गुण भी पाए जाते हैं।
घर पर ऐसे जांचें pH
पानी का pH लेवल चेक करने के लिए TDS चेक करने जैसी ही डिवाइस आती है। डिवाइस में डिस्प्ले लगी होती है जिस पर pH वैल्यू आ जाती है।
कीमत: 400 रुपये से शुरू
कहां से खरीदें: ऑनलाइन या ऑफलाइन
3. ORP लेवल
ORP का मतलब Oxidation Reduction Potential है। ORP को मिलिवोल्ट (mV) से नापते हैं। किसी भी पानी में ORP की मात्रा नेगेटिव 1500 (-1500) mV से प्लस 1500 (+1500) mV हो सकती है। ORP की वैल्यू जितनी ज्यादा निगेटिव होगी, पानी उतना साफ माना जाता है। एक स्टैंडर्ड के अनुसार किसी जगह के पानी का ORP -400 mV है तो ORP के अनुसार वह पानी साफ है। अगर ORP +400 है तो वह पानी पीने लायक नहीं है। पीने योग्य पानी का ORP -400 mV से -200 mV के बीच
होना चाहिए।
घर पर ऐसे जांचें ORP
पानी की ORP वैल्यू चेक करने के लिए TDS चेक करने जैसी ही डिवाइस आती है। डिवाइस में डिस्प्ले लगी होती है जिस पर ORP वैल्यू आ जाती है।
कीमत: 3000 रुपये से शुरू
कहां से खरीदें: ऑनलाइन या ऑफलाइन
कम या ज्यादा मात्रा में पानी पीने से असर
कम पानी पीने से
- डिहाइड्रेशन हो जाता है जिससे चक्कर आने लगते हैं।
- ढलती उम्र के निशान जल्दी नजर आने लगते हैं।
- शरीर पर झुर्रियां जल्दी पड़ जाती हैं और त्वचा अपनी चमक खोकर ढीली पड़ने लगती है।
- मेटाबॉलिजम की प्रक्रिया सही नहीं होती जिससे शरीर में फैट जमा होने लगता है।
- हड्डियों और जोड़ों में दर्द हो सकता है।
ज्यादा पानी पीने से
- शरीर से सोडियम का लेवल कम होने लगता है जिससे मस्तिष्क में सूजन आ सकती है।
- पानी को फिल्टर करने के लिए किडनी पर बोझ बढ़ जाता है। इससे किडनियां फेल हो सकती हैं।
- महिलाओं के हार्मोन गड़बड़ हो सकते हैं। बीपी हाई हो सकता है।
- मांसपेशियों में कमजोरी या ऐंठन की समस्या हो सकती है।
इन चीजों के खाने के तुरंत बाद पीना पीना सख्त मना है
भुने चने खाने के बाद: भुने चने खाने के तुरंत बाद पानी बिलकुल न पिएं। अगर पानी पीते हैं तो इससे पेट में दर्द हो सकता है, क्योंकि पानी पीने से चना फूल जाता है।
अमरूद खाने के बाद: अमरूद खाने के बाद पानी पीने से पेट में गैस की समस्या हो सकती है या कुछ ही देर बाद तेज दर्द हो सकता है।
तरबूज खाने के बाद: तरबूज और खरबूज में काफी मात्रा में पानी होता है। इन्हें खाने के बाद पानी पीने से पेट संबंधी बीमारियां हो सकती हैं।
चाय पीने के बाद: चाय या कॉफी पीने के बाद पानी पीने से पेट खराब हो सकता है। पाचन तंत्र धीमा होने से पेट में भारीपन की समस्या हो सकती है।
मूंगफली खाने के बाद: मूंगफली खाने के तुरंत बाद पानी पीने से खांसी हो सकती है।
इस समय पानी पीना है फायदेमंद
- नहाने से आधा घंटा पहले पानी पीने से ब्लड प्रेशर की समस्या नहीं होती।
- सोने से पहले पानी पीने से हार्ट अटैक का खतरा कम होता है।
- घर से बाहर निकलते वक्त पानी पीकर निकलें। इससे एनर्जी मिलती है और कुछ समय तक डिहाइड्रेशन की दिक्कत भी नहीं होती।
प्यूरीफायर का पानी कितना सही
स्ट्रक्चर्ड वाॅटर होना चाहिए
वॉटर प्यूरीफायर हमेशा ऐसा खरीदें जिससे स्ट्रक्चर्ड वॉटर निकले। वह पानी जो पूरी तरह से न केवल शुद्ध बल्कि सेहत के लिए भी अच्छा होता है, स्ट्रक्चर्ड वाटर कहलाता है। इसे जिंदा पानी भी कह सकते हैं। स्ट्रक्चर्ड वाटर के लिए शर्त है कि उसका TDS लेवल 100 से 250 ppm, pH लेवल 7 से 8 और ORP -400 mV से -200 mV के बीच होना चाहिए। अगर आपके घर में सप्लाई का आने वाला पानी हार्ड है तो बेहतर होगा कि सप्लाई की लाइन के शुरू में ही वॉटर सॉफ्टनर लगवाएं। इससे पूरे घर में सॉफ्ट पानी आएगा। इस पानी से न केवल वॉटर प्यूरीफायर की उम्र बढेगी बल्कि धुलने वाले कपड़े और नहाने के बाद बालों की भी उम्र बढ़ाएगा। हार्ड पानी से कपड़े धोएं जाएं तो वे जल्दी खराब हो जाते हैं। वहीं हार्ड वॉटर से सिर धोते समय बालों को नुकसान पहुंचता है। वॉटर सॉफ्टनर को ऑनलाइन या ऑफलाइन खरीद सकते हैं। इसकी शुरुआती कीमत करीब 4 हजार रुपये है।
ऐसा प्यूरीफायर खरीदें
ऐसा प्यूरीफायर लें जिसमें आरओ, यूवी और यूएफ तीनों तकनीक हो। इसके साथ ही चूंकि जरूरी मिनरल्स की शरीर को जरूरत होती है, ऐसे में TDS कंट्रोलर तकनीक से लैस प्यूरीफायर ही लें, जिससे शरीर में बैलेंस बना रहे। जहां तक छोटे शहरों या कम प्रदूषित इलाकों की बात है तो अगर वहां का ग्राउंड वाटर पहले से साफ और मीठा है और उसे बस फिल्टर करने की जरूरत है तो यूवी प्यूरीफायर इस्तेमाल करना चाहिए।
प्यूरीफायर से निकले पानी का यह करें
फिल्ट्रेशन के दौरान वॉटर प्यूरीफायर से निकले पानी को बेकार न बहने दें। उसे इकट्ठा कर लें। इस पानी को प्लांट में लगा सकते हैं या घर-आंगन धो सकते हैं। बाथरूम में फ्लश के दौरान भी इस्तेमाल कर सकते हैं। पार्क में छिड़काव कर सकते हैं।
एक अन्य कहानी
जब सृष्टि नहीं थी प्रलयकाल था , उस समय कोई नहीं था : जल ,आकाश , पृथ्वी , सूर्य , चंद्रमा ,अग्नि, हवा , मनुष्य , जीव-जंतु , सारे तीर्थ , वृक्ष , पेड़ , पशु , देवलोक , ग्रहलोक , बैकुंठ लोक , ब्रह्मलोक , शिवलोक , मृत्युलोक , पाताल लोक , देवी -देवता आदि । कुछ भी नहीं था । पूरे त्रिलोक में केवल अंधेरा ही अंधेरा था ।
उस प्रलय के समय में रहते हैं तो कण-कण में रहने / बसने वाले केवल पर ब्रह्म परमात्मा जो निराकार स्वरूप में विद्यमान रहते हैं । इनके ना हाथ-पैर होते हैं , ना ही आंख- नाक – कान मुंह , पेट होते हैं । लेकिन वो निराकार परम परमात्मा फिर भी काम करते हैं , देखते हैं , सूंघते हैं और चलते-फिरते भी है । अर्थात बिना शरीर के भी परम परमात्मा सभी कुछ कर सकते हैं ।
और इसी निराकार परम परमात्मा ने प्रलय के बाद सृष्टि की रचना की ।
सबसे पहले परम परमात्मा ने अपने आप को समेट कर अपना एक स्वरुप बनाया । और इस सृष्टि में सबसे पहले पूर्ण परम ब्रह्म परमात्मा प्रगट हुए ।
सृष्टि के अन्धकार में जो परमात्मा प्रगट हुए वो मनुष्य के रुप में हुए । जिनका वर्णन किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता । लेकिन इनके शरीर पर कोई वस्त्र या आभूषण नहीं था । केवल सिर पर बाल ही बाल थे और बाल भी इतने थे कि पूरे त्रिलोक में फैल गए । और परमात्मा ने अपने इस स्वरुप का नाम रखा : ” सदाशिव ” ।
इसके बाद अपने साथ में स्त्री के रुप में एक अष्ट भुजा धारी शक्ति को प्रगट किया क्योंकि शक्ति बिना भगवान भी अधूरे हैं , शक्तिमान नही हो सकते । और उस शक्ति को नाम दिया : ” शिवा “
फिर अपने रहने के लिए बिना पृथ्वी के , बिना आकाश के , बिना धरातल के परमात्मा ने एक बहुत सुंदर नगर को प्रगट किया । जो कभी प्रलय के समय भी विनाश नहीं होता । और ना ही परमात्मा और शक्ति का कभी भी विनाश होगा ।
इस प्रकार जो नगर प्रगट हुआ वह बहुत ही सुंदर और आनन्द देने वाला था । इसलिए उस नगर का नाम रखा : ” आनन्दवन “
बाद में जब परमात्मा सृष्टि की रचना करने लगे तो आनन्दवन का नाम बदल कर दूसरा नाम रखा :” काशी “।
सबसे पहले अपने आपको प्रगट किया अपने साथ में शक्ति के रूप में मां भगवती को फिर काशी नगरी को प्रगट किया !
इस प्रकार सृष्टि की रचना प्रारंभ कर दी ।
सबसे पहले एक दिव्य महादेव , महा पुरुष को प्रगट किया , जो बहुत ही शांत , सर्वगुण सम्पन्न , गम्भीरता में सागर के समान , क्षमा में पृथ्वी के समान , जिनका वाणी से वर्णन करना बहुत मुश्किल है ऐसे महान देवता स्वरुप एक दिव्य महा पुरुष को प्रगट किया । जिनके चार हाथ थे , पीले वस्त्र पहने हुए थे , सुंदर मुकुट पहने हुए थे , गले में वैजन्ती माला थी, चारों हाथों में शंख , चक्र , गदा , पद्म और कमल का फूल लिए , पीताम्बर धारण किए हुए प्रगट हुए । जैसे ही प्रगट हुए , पीताम्बरधारी ने पूछा : हे सदाशिव मैं आपको प्रणाम करता हूं , आपने मुझे प्रगट किया तो मेरा क्या नाम होगा । तब सदाशिव ने पीताम्बर धारी का नाम करण करते हुए कहा : ” हे देव आप सर्वत्र त्रिलोक में व्याप्त रहोगे : देवलोक में , पृथ्वी लोक में , पाताल लोक में , आप सब प्रकार से व्याप्त रहोगे । इसलिए मैं आप का नाम ” विष्णु ” रखता हूं ।
तभी विष्णु जी ने कहा हे प्रभु : आपने मेरा नाम करण तो कर दिया । अब आप मुझे काम भी बताईए काम क्या करना होगा । तब भगवान सदाशिव ने भगवान विष्णु जी को कार्य सौंपा : हे विष्णु आप यहीं काशी नगरी में बैठ कर मुझ शिव और शिवा का ध्यान रखकर , मैं आपको श्वांस के द्वारा मंत्र देता हूं इसका जाप करते हुए कठोर तपस्या करो क्योंकि आपको सृष्टि के कार्यो में सहयोग देना है । और सृष्टि के कार्य आप तभी कर पाओगे जब आपके पास शक्ति होगी । उस शक्ति को प्राप्त करने के लिए आपको मेरी भक्ति और शक्ति चाहिए । प्रभु सदाशिव के वचनों का पालन करके भगवान विष्णु ने ध्यान लगाकर सदाशिव ने सांस के माध्यम से जो मंत्र दिया उसका जाप करते हुए , शिव-शिवा का ध्यान करते हुए घोर तपस्या प्रारंभ कर दी । हजारों वर्षों तक भगवान विष्णु ने काशी में बैठ कर घोर तपस्या की ।
फिर भगवान विष्णु ऐसी घोर तपस्या करने लगे कि घोर तपस्या करते-करते ही उनके शरीर मे से जल रुप में पसीने निकलने लगे । शरीर में पसीने की धारा बहने लगी । और कोई छोटी-मोटी धारा नहीं । विष्णु जी शक्ति से , विष्णु जी की भक्ति से , तपस्या के प्रताप से भगवान विष्णु के शरीर से जल रुप में ऐसी धारा बहने लगी जैसे बारिश के दिनों में पहाड़ों से झरने बहते हैं । और यही झरना रुपी पसीना जल के रुप में इतना निकला कि पूरे त्रिलोक में जल ही जल प्रगट हो गया ।
और जब पूरा त्रिलोक जलमय हो गया तो जो काशी में भगवान विष्णु तपस्या मे समाधी लगाए बैठे थे वो उस जल में लेट गए लेकिन तपस्या अभी नहीं छोड़ी । लेटे हुए भी भगवान विष्णु तपस्या कर रहे थे । तभी सदाशिव ने विष्णु जी की तपस्या से प्रसन्न होकर इस सृष्टि का कार्य आगे कदम बढ़ाया और जल में लेटे लेटे ही विष्णु जी की नाभि से कमल की नाल प्रगट की और नाल से बढ़ते-बढ़ते कमल का फूल प्रगट हुआ और उस कमल के फूल में से एक और दिव्य महा पुरुष प्रगट हुए जो ब्रह्म जी कहलाए ।
इस प्रकार जल की उत्पत्ति हुई ।
ओमगर्म-गर्म पानी से नहाना चाहिए...
इन दिनों कड़ाके की सर्दी के बीच गर्म पानी लगभग हर घर में जरूरत बन गया है। बाथरूम में नहाने से लेकर किचन में बर्तन साफ करने तक गर्म पानी का इस्तेमाल होता है। हर समय गर्म पानी मिलता रहे, इसके लिए ज्यादातर लोग गीजर लगवा लेते हैं। मार्केट में कई तरह के गीजर मौजूद हैं। वहीं कई बार गीजर की वजह से हादसे भी हो जाते हैं । ऐसे में जानें, गीजर खरीदते और इस्तेमाल करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए:
मार्केट में 3 तरह के
गीजर हैं मौजूद
मार्केट में 3 तरह के गीजर मौजूद हैं। अपनी सुविधा के अनुसार इन्हें खरीद सकते हैं। ये गीजर इस प्रकार हैं:
1. इलेक्ट्रिक गीजर
ये गीजर बिजली से चलते हैं। साइज में काफी बड़े होते हैं। इसलिए इन्हें फिट करने के लिए ज्यादा स्पेस की जरूरत पड़ती है। इनमें पानी धीरे-धीरे गर्म होता है। इस्तेमाल के दौरान ये बिजली की ज्यादा खपत करते हैं। इलेक्ट्रिक गीजर दो तरह के होते हैं-
A. स्टोरेज गीजर
- इनमें एक टैंक होता है, जिसमें पानी भरा जाता है। इनमें अलग-अलग क्षमता (5, 10, 15, 20 लीटर) का टैंक होता है।
- बिजली का स्विच ऑन करने के बाद 5 से 10 मिनट में पानी गर्म होता है
- परिवार में 4 या ज्यादा सदस्य हैं तो स्टोरेज गीजर सही रहता है। इन्हें दीवार पर फिट करते हैँ।
कीमत: 2500 रुपये से शुरू
टॉप ब्रैंड: Hindware, Havells, Bajaj, Candes आदि।
B. इंस्टेंट वॉटर गीजर
- इनमें कोई टैंक नहीं होता। इनका इस्तेमाल किचन या ऐसी जगह किया जाता है जहां कम गर्म पानी की जरूरत होती है।
- ये 2 से 3 मिनट में ही गर्म पानी देना शुरू कर देते हैं।
- परिवार में 2 या 3 सदस्य हैं तो इंस्टेंट वॉटर गीजर बढ़िया हैं। इन्हें भी दीवार पर फिट किया जाता है। ये स्टोरेज गीजर की अपेक्षा कम जगह घेरते हैं।
कीमत: 2000 रुपये से शुरू
टॉप ब्रैंड: Bajaj, Crompton, Orient, V-Guard आदि।
2. गैस गीजर
इन गीजर को इस्तेमाल करने के लिए घरेलू गैस का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें पानी को जमा करने के लिए कोई टैंक नहीं होता। जब भी गर्म पानी की जरूरत होती है, इन्हें ऑन करते ही गर्म पानी आना शुरू हो जाता है। गैस गीजर इलेक्ट्रिक गीजर की अपेक्षा कम खर्चीले होते हैं। गैस गीजर इस्तेमाल करने के दौरान इन बातों का ध्यान रखें-
- गैस गीजर को कभी भी बाथरूम के अंदर न लगवाएं। इसके इस्तेमाल के दौरान बाथरूम में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। नतीजा, बाथरूम में मौजूद शख्स को चक्कर आने लगते हैं और वह बेहोश हो सकता है। यहां तक कि उसकी जान भी जा सकती है।
- अगर बाथरूम में गैस गीजर लगवाना भी पड़े तो वहां वेंटिलेशन सही होना चाहिए। साथ ही एग्जॉस्ट फैन भी लगा होना चाहिए ताकि अंदर बनने वाली गैस बाहर निकलती रहे।
- अगर जरा-सा भी चक्कर आए तो जितनी जल्दी हो सके, बाथरूम से निकल जाएं।
कीमत: 3500 रुपये से शुरू, टॉप ब्रैंड: Bajaj, V-Guard, Hindware आदि।
3. सोलर वॉटर गीजर
ये गीजर पानी को सूरज की रोशनी से गर्म करते हैं। इन्हें छत या ऐसी खुली जगह पर लगाया जाता है जहां इन्हें सूरज की रोशनी बिना किसी रुकावट मिल सके। दिनभर में सूरज की रोशनी से जो पानी गर्म होता है, वह एक इंसुलेटेड टैंक में स्टोर हो जाता है। जब गर्म पानी की जरूरत होती है, उस पानी को इस्तेमाल कर सकते हैं। ये गीजर उन क्षेत्रों के लिए अनुकूल नहीं है जहां सूरज की रोशनी बहुत कम आती है या सूरज बहुत कम निकलता है। हालांकि इनमें इलेक्ट्रिक हीटर भी होता है जो बारिश या सूरज के न निकलने पर पानी गर्म कर देता है। सोलर वॉटर गीजर खरीदते समय इन बातों का ध्यान रखें-
- अगर आप ऐसे फ्लैट या घर में रहते हैं जहां सीधी धूप नहीं आती है तो आपके लिए ये गीजर किसी काम के नहीं हैं।
- सोलर वॉटर गीजर से हम एक निश्चित क्षमता के अंदर ही पानी गर्म कर सकते हैं और इस्तेमाल कर सकते हैं।
कीमत: 20,000 रुपये से शुरू, टॉप ब्रैंड: Havells, Racold, Sunlit आदि।
गीजर खरीदने से पहले इन बातों का ध्यान रखें
जरूरत देखें: कोई भी गीजर खरीदने से पहले जरूरत देखें कि कितने लीटर का गीजर आपके या आपके परिवार के सभी सदस्यों के लिए काफी रहेगा? अगर घर में 3 या 4 सदस्य हैं तो नहाने से लेकर बर्तन धोने तक के लिए 10 से 15 लीटर की क्षमता वाला गीजर काफी है।
कौन-सा गीजर रहेगा ठीक: अगर आप ऐसे इलाके में रहते हैं जहां बिजली की परेशानी रहती है तो आपके लिए इलेक्ट्रिक हीटर सही नहीं रहेगा। वहीं अगर आप ऐसी जगह रहते हैं जहां बहुत अच्छी धूप आती है तो आपके लिए सोलर गीजर सही रहेगा। इनकी कीमत भी ज्यादा होती है।
स्टार रेटिंग देखें: अगर आप इलेक्ट्रिक गीजर खरीदने जा रहे हैं तो गीजर की इलेक्ट्रिसिटी बचाने वाली रेटिंग देखें। 4 या 5 स्टार रेटिंग वाले गीजर ज्यादा इलेक्ट्रिसिटी बचाते हैं। हालांकि ये कम स्टार रेटिंग वालों की अपेक्षा कुछ महंगे जरूर होते हैं।
ऑटो ऑफ फीचर: इस फीचर की मदद से आपको गीजर को बंद करने की चिंता से मुक्ति मिल जाती है। दरअसल, जब गीजर में पानी गर्म हो जाता है तो यह फीचर गीजर को अपने आप बंद कर देता है। इससे न केवल बिजली की बचत होती है, बल्कि अगर इस्तेमाल के बाद स्विच ऑफ करना भूल भी जाएं तो चिंता की कोई बात नहीं रहती।
मजबूती भी जरूरी: अगर टैंक वाला गीजर खरीद रहे हैं तो ध्यान रखें कि उसका टैंक स्टेनलेस स्टील का होना चाहिए। ये न केवल मजबूत होते हैं बल्कि लंबे समय तक चलते हैं। साथ ही इस पर एंटी-करोशन कोटिंग होनी चाहिए। इससे टैंक पर जंग नहीं लगता और इसको मेंटेन करने में भी ज्यादा रकम खर्च नहीं करनी पड़ती। साथ ही ध्यान रखें कि गीजर को बाहर से मजबूती देने के लिए इस पर ABS (Acrylonitrile Butadiene Styrene) प्लास्टिक का इस्तेमाल किया गया हो। गीजर में इंसुलेशन के लिए PUF (Polyurethane Foam) का इस्तेमाल किया गया हो ताकि पानी देर तक गर्म रहे।
गीजर लगवाते समय ये बातें जानना हैं जरूरी
- गीजर को बहुत ज्यादा ऊंचाई पर न लगवाएं। अगर गीजर में कोई खराबी आ जाए तो ज्यादा ऊंचाई पर लगे होने के कारण उसे ठीक करना मुश्किल हो जाता है। गीजर जमीन से अधिकतम 6 फुट की ऊंचाई पर ही लगवाना चाहिए।
- इलेक्ट्रिक गीजर लगवाते समय ध्यान रखें कि उसका स्विच थोड़ी ऊंचाई पर हो ताकि छोटे बच्चों का हाथ उस तक न पहुंचे। साथ ही गीजर का कनेक्शन एमसीबी से हो ताकि वोल्टेज घटने-बढ़ने या शॉर्ट सर्किट होने पर वह ऑटोमेटिक बंद हो जाए।
मार्केट में मौजूद कुछ अच्छे इलेक्ट्रिक गीजर
1. Bajaj New Shakti Neo
क्षमता: 15 लीटर
कीमत: 5899 रुपये
खासियतें
- यह कॉपर एलिमेंट वाला गीजर है। इसमें 5 से 6 घंटे तक पानी गर्म रहता है।
- इस गीजर की बॉडी रस्ट-प्रूफ है। इसमें ऑटो ऑफ फीचर दिया गया है।
खामियां
- इसमें टैंक वॉटर लेवल दिखाई नहीं देता है।
- घर में 4 या इससे ज्यादा सदस्य हैं तो ठीक नहीं।
2. Havells Monza EC
क्षमता: 25 लीटर
कीमत: 9500 रुपये
खासियतें
n यह 5 स्टार रेटिंग के साथ आता है। साथ ही पानी को तुरंत गर्म कर देता है।
n स्टेनलेस स्टील के फ्लेक्सी पाइप हैं जो इसे मजबूत बनाते हैं।
खामियां
- पानी गर्म होने में करीब 20 मिनट का समय लगता है।
- पानी गर्म होने के दौरान गीजर से कई बार घर्र-घर्र की आवाज आती है।
3. Candes 3 L Instant Water Geyser
क्षमता: 3 लीटर
कीमत: 2179 रुपये
खासियतें
- यह गीजर उन लोगों के लिए अच्छा है जो अकेले रहते हैं।
- यह पानी को तुरंत गर्म कर देता है। इसमें ऑटो ऑफ फीचर भी है।
खामियां
- इसमें टाइमर नहीं दिया गया है, जिससे पता चल सके कि पानी कितनी देर में गर्म हो जाएगा।
- इसमें तापमान को एडजस्ट करने के लिए नॉब नहीं दी गई है।
नोट: मार्केट में इनके अलावा और भी कंपनियों के वॉटर गीजर मौजूद हैं। कीमतों में बदलाव मुमकिन।
टोंटी में फिट हो जाने वाले मिनी वॉटर हीटर
मार्केट में ऐसे भी हीटर आ गए हैं जो टोंटी में फिट हो जाते हैं और 2 से 5 सेकंड में ही गर्म पानी देने लगते हैं। ये बिजली से चलते हैं। इन वॉटर हीटर को सीधे बाथरूम या किचन के नल में फिट करा सकते हैं। इनकी खासियतें इस प्रकार हैं
- ये मिनी वॉटर हीटर हाई क्वॉलिटी मटेरियल से बने होते हैं जिससे ये मजबूत रहते हैं।
- इनमें डिजिटल डिस्प्ले लगी होती है, जिसमें आप पानी का टेंपरेचर आसानी से देख
सकते हैं।
- ये लाइटवेट, रस्ट प्रूफ, शॉक प्रूफ और हीट प्रूफ होते हैं।
कीमत: 1200 रुपये से शुरू
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