19. (कविता) कोई तो किश्त है जो शायद अदा नहीं है,
कोई तो किश्त है जो शायद अदा नहीं है, साँस बाक़ी है परन्तु बाकी हवा नहीं है.. भरा पूरा है परिवार, परंतु संग नहीं है आँख भी ढक लीजिये, संग मुँह के अपने, कहीं आंखों को रास न आए यह देखना कि अंत समय, कंधा देने वाला कोई नहीं है कोई तो किश्त है जो शायद अदा नहीं है, साँस बाक़ी है परन्तु बाकी हवा नहीं है.. धारती बिकी जल बिका और बिका आकाश रक्त बिका, अंग बिके और बिका विश्वास। हर कोई शामिल है इन गुनाहों में क़ुसूर मेरा, आपका या किसी एक का नहीं है.. कोई तो किश्त है जो शायद अदा नहीं है, साँस बाक़ी है परन्तु बाकी हवा नहीं है.. आँसू जानते हैं कौन अपना है तभी तो अपनों के सामने ढलक जाते है। कमबख्त मुस्कुराहट का क्या है, वह तो ग़ैरों से भी वफ़ा कर लेती है..! यह दुनिया है 'जनाब' यहाँ 'मिट्टी' में मिलाने के लिए अपने ही "कन्धों" पर भी उठा लेते हैं । 🙏 *सुप्रभात* 🙏 लेखक ॐ जितेंद्र सिंह तोमर 12/6/21/5/2021