'68 तीर्थों का वास' माता-पिता के चरणों में
'68 तीर्थों का वास' माता-पिता के चरणों में पद्म पुराण में कहा गया है जो पुत्र अंगहीन, दीन, वृद्ध, दुखी तथा रोग से पीड़ित माता-पिता को त्याग देता है वह कीड़ों से भरे हुए दारुण नरक में पड़ता है। जो पुत्र अपने कटुवचनों द्वारा माता- पिता को दुखी करता है, वह पापी बाघ की योनि में जन्म लेकर घोर दुख उठाता है। आज संस्कारहीनता और पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होने के कारण वर्तमान पीढ़ी द्वारा माता- पिता एवं गुरुजनों की उपेक्षा ही नहीं अपितु उत्पीड़न तक हो रहा है। वृद्ध माता-पिता को बोझ समझ कर भगवान भरोसे छोड़ा जा रहा है। वृद्धाश्रमों की बढ़ती हुई संख्या और मांग इस बात का प्रमाण है कि माता-पिता अनावश्यक वस्तु की श्रेणी में रखे जाने लगे हैं। वे आज जीवन के अंतिम पड़ाव में सेवा, सहानुभूति, चिकित्सा और प्रेम के मीठे वचनों को सुनने के लिए तरस रहे हैं। जो पुत्र बचपन में माता-पिता को अपने मूत्र से गीले हुए बिस्तर पर सुलाया करता था वही पुत्र अब अपने कटुवचनों से उनके नेत्रों को भी गीला करने में संकोच नहीं कर रहा है। आज की पीढ़ी यह भूल रही है कि एक दिन उनको भी वृद्धावस्था का दंश झेलना पड़ेगा तब य...