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Showing posts from April, 2021

गांव का नालायक बेटा

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आज अब्दुल फिर से अपने काम को बंद किए हुए हैं । उसे याद आ रहे हैं पिछले साल के वे दिन जो उसने काले दिनों के रूप में बिताए थे। गांव के बुजुर्ग जिन्हें वो दादा कहता था, चाचा कहता थाा, काका कहता था, अम्मा कहता था, दादी क्या करता, वे सब उससे मुंह मोड़ रहे थे और आज उसे मसीहा कहते हुए थक नहीं रहे। कहानी पिछले वर्ष 2020 मैं शुरू हुई जिसमें उत्तर प्रदेश के एक गांव में रहने वाले अब्दुल को बुरी तरह से जलील किया गया था। 2020 में फैली महामारी में उसके धर्म विशेष के कुछ लोग अनेक देशों से अपनी आस्था को लिए भारत की राजधानी दिल्ली में आए हुए थे कि अचानक महामारी को देखते हुए लॉकडाउन लगा दिया गया। वे दिल्ली में एक विशेष स्थान पर रुक गए जिसे मरकज़ कहा जाता था।  हम भी अनेक बड़े मेलों पर अनेक स्थानों पर जाते हैं तो वहां किसी धर्मशाला, मंदिर या किसी सुरक्षित जगह को खोजते हैं । यहीं उन्होंने किया और वे सभी मरकज में रुक गए। अचानक मरकज में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई और उसमें ठहरे सभी लोगों के सिर महामारी फैलाने का दोष मढ़ दिया गया। और एक पूरा धर्म इसका दोषी हो गया और पूरे देश में उस धर्म के प्रति घृणा फैल ग...

महान व्यक्तियों की मौत को भी वोट के लिए भुना सकें।

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मैं नागपुर के 85 वर्षीय बुज़ुर्ग जिन्होंने अपने जीवन की आशा को त्याग कर अपना हॉस्पिटल बेड एक 40 वर्षीय व्यक्ति को दे दिया, ये कहकर कि मैंने अपनी ज़िंदगी जी ली है, उसके छोटे बच्चे हैं, उसकी ज़िंदगी बचाना ज़्यादा ज़रूरी है। उन्होंने जो काम किया है, उसे आत्महत्या कहना शायद गलत होगा, लेकिन इस आत्मबलिदान या शहादत से कम नहीं है। लेकिन यह बात यहीं खत्म नहीं हो जाती को उस व्यक्ति के नाम और समाज सेवा का लोग खुलकर फायदा उठा रहे हैं। कुछ संगठनों के मुखिया उनका नाम लिख लिख कर लोगों को इमोशनल मूर्ख बना रहे हैं...। हमें तो इस बात पर शर्मिंदा होना चाहिए कि ऐसी स्थिति आई ही क्यों कि एक व्यक्ति दूसरे को जीवन देने के लिए अपने जीवन को दांव पर लगाए। यह उपलब्धि नहीं यह तो सरासर हमारी नाकामी है। शर्म आनी चाहिए उन ज़िम्मेदारों को, जिनके राज में एक बुज़ुर्ग व्यक्ति को अपनी मौत चुननी पड़ी ताकि एक जवान आदमी का ईलाज हो सके...। आखिर कब तक ऐसा ही होता रहेगा। लेकिन बजाय शर्म करने के कुछ लोग गर्व से इस बात को लिख रहे हैं, ताकि अपने उस राष्ट्रवादी संगठन के ऐसे महान व्यक्तियों की मौत को भी वोट के लिए भुना सकें। ॐ जिते...

एक कहानी

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  एक कहानी..... जो न जाने कितनों की जान बचा सकती है।  जब तक कोविड नहीं हुआ, टीका नहीं लगवाया, दिन भर यहां वहां घूमा। मूर्ख बना रखा है, कोविड तो है ही नहीं, सरकार और पूंजिपतियों का षड़यंत्र है।  रिश्तेदारों में गए, शादी विवाह मैं यहां वहां घूमते रहे .... एक दिन बुखार महसूस हुआ तो लगा वायरल है यार, कोविड-वोविड कुछ नहीं, एक पैरासिटामोल ले लेता हूं। बुखार के दूसरे दिन बिना डॉक्टरी सलाह के मेडिकल स्टोर से एंटिबायोटिक्स ले लेता हूं, करोना टेस्ट की जरूरत नहीं है, वे लोग जबरदस्ती पॉजिटिव बता रहे हैं यदि मैंने भी टेस्ट कराया तो मुझे भी जबरदस्ती पाज़ीटिव बता देंगे। बुखार के तीसरे दिन बुखार नहीं उतर रहा तो सीटी स्कैन करा लेता हूं, आरटी- पीसीआर की रिपोर्ट तो चार दिन बाद आएगी । ( सीटी का स्कोर पहले दो तीन दिन में 3-4 ही रहता है तो निश्चिंत हो गया कि मैं स्वस्थ हूं।) बुखार के चौथे दिन में भी बुखार है, चलो ब्लड टेस्ट करा लेता हूं ( ब्लड टेस्ट में क्रास रिएक्शन की वजह से फाल्स टायफाइड पाज़िटिव दिख सकता है। यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए जो इन साहब को नहीं मालूम।) जब रिपोर्ट आई तो  ओ तेरी...