कलश की उत्पत्ति
कलश यात्रा सैकड़ों महिलाओं को सिर पर कलश लेकर चलते देख लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं। उन्हें यह सब बे फालतू का काम लगता है। कलश का अपना एक आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्त्व है । जिसे समझना जरूरी हैं। सत्य सनातन परंपरा अर्थात हिन्दू धर्म की विशेषता है कि वह वैज्ञानिक ज्ञान को प्रतीकों में बाँधकर उसे धार्मिक आस्था में ओतप्रोत कर देता है। विद्वानों का कहना है कि सिर पर कलश रखने वाले श्रद्धालु की आत्मा पवित्र व निर्मल हो जाती है। उसके तमाम रोग दोष विकारों का भगवान हरण कर देते है। वहीं कलश को धारण करने वाले जिस मार्ग से भी ग्राम का भ्रमण करता है वहां की धरा स्वयं सिद्व हो जाती है। जो अपने सिर पर कलश धारण करने वाली आत्मा को ईश्वर पवित्र और निर्मल करते हुए अपनी शरण में ले लेते हैं। कलश की उत्पत्ति समुद्र मंथन की कथा बहुत प्रसिद्ध है। समुद्र जीवन और तमाम दिव्य रत्नों और उपलब्धियों का स्रोत है। देवी अर्थात् रचनात्मक और दानवी अर्थात् ध्वंसात्मक शक्तियाँ इस समुद्र का मंथन मंदराचल शिखर पर्वत की मथानी और वासुकी नाग की रस्सी बनाकर करती हैं। पहली दृष्टि में यह एक कपोल कल्पना अथवा गल्पक...