एम.ए. (हिंदी) NC पेपर : 102 यूनिक पेपर कोड: 120501102
प्रश्न 5 : विद्यापति भक्त कवि हैं या श्रृंगारिक? सतर्क विश्लेषण कीजिये।
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण: • भूमिका • विद्यापति के भक्त कवि होने के पक्ष में तर्क • विद्यापति के श्रृंगारिक कवि होने के पक्ष में तर्क |
विद्यापति की प्रसिद्धि का मूल आधार उनकी रचना पदावली है। पदावली में भक्ति विषयक पद भी हैं और श्रृंगार विषयक पद भी। संभवत: पदावली के आधार पर ही विद्वानों ने यह प्रश्न उठाया कि विद्यापति भक्त कवि हैं या श्रृंगारिक?
जार्ज ग्रियर्सन, बाबू श्याम सुंदर दास, तथा बाबू ब्रजनंदन सहाय जैसे कुछ विद्वानों ने विद्यापति को भक्त कवि माना है। वहीं दूसरी ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, बाबू राम सक्सेना, डॉक्टर राम कुमार वर्मा और बच्चन सिंह जैसे विद्वानों ने विद्यापति को श्रृंगारिक कवि कहा है।
विद्यापति का प्रतिपाद्य - भक्ति या श्रृंगार :
विद्यापति को भक्त कवि मानने के पीछे तर्क:
विद्यापति के पद श्रृंगारिक या अश्लील होते तो मंदिरों में क्यों गाए जाते? इनको सुनकर चैतन्य महाप्रभु जैसे भक्त मूर्छित क्यों होते? परवर्ती काल में कृष्णदास, गोविंददास जैसे कवियों ने विद्यापति को भक्त कवि के रूप में ही महत्त्व दिया है। यदि राधा-कृष्ण के श्रृंगार का विस्तृत वर्णन कर सूर दास भक्त कवि हो सकते हैं तो विद्यापति क्यों नहीं? विद्यापति ने शिव स्तुति, गंगा स्तुति, काली वंदना, कृष्ण प्रार्थना जैसे भक्तीपरक पदों की भी रचना की है। विद्यापति को भक्त मानते हुए जार्ज ग्रियर्सन ने लिखा है "राधा जीवात्मा का प्रतीक है और कृष्ण परमात्मा के। जीवात्मा, परमात्मा से मिलने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है।"
श्रृंगारिक कवि मानने के पीछे तर्क:
पदावली में संयोग श्रृंगार पदों की अधिकता है। विद्यापति शैव थे अत: यदि भक्ति करनी होती तो शिव-पार्वती की करते न कि राधा कृष्ण की। विद्यापति ने अपने आश्रयदाता राजा शिव सिंह की प्रशंसा एवं मनोरंजन हेतु कृष्ण का प्रतीकात्मक प्रयोग किया है जो वास्तव में शिव सिंह ही है। विद्यापति के काव्य में विद्यमान भक्ति तत्त्व की सबसे तीखी आलोचना आचार्य शुक्ल करते हैं और लिखते हैं कि "आध्यात्मिक रंग के चश्में आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं। उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने 'गीत-गोविंद' को आध्यात्मिक संकेत बताया है वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी।" श्रृंगार विषयक इन्हीं तर्को के आधार पर विद्यापति के काव्य को निराला 'नागिन की लहर' कहते हैं तो बच्चन सिंह 'खजुराहों की मंदिरों वाली आध्यात्मिकता' बताते हैं।
श्रृंगार शब्द श्रृंग और आर के संयोग से बना है। श्रृंगार का अर्थ कामोद्रेक और 'आर' का अर्थ है प्राप्ति । कामोद्रेक की प्राप्ति ।
श्रृंगार की परिभाषा -
आ. भरतमुनि के मत से श्रृंगार रस 'रति' स्थायीभाव से उद्भुत होता है। उसका वेश उज्जवल है। संसार में जो कुछ उज्वल दर्शनीय है वह श्रृंगार कहलाता है।
आ. विश्वनाथ के मत से काम के अंकुरित होने को श्रृंग कहते है। मन के अनुकूल वस्तु में सुख व प्राप्ति का नाम रति है।
श्रृंगार के तीन तत्त्व डॉ. पद्मा पाटील ने प्रस्तुत किए है - i) काम तत्त्व, ii) सौन्दर्य तत्त्व, iii) प्रेम तत्त्व । काव्यशास्त्र के अनुसार आश्रय नायक, विभाव नायिका, उद्दीपन विभाव- एकांत स्थान, चांदनी रात, - उपवन, नदी तट, रूप सौंदर्य, वेशभूषा आदि है। अनुभाव - कंप, रोमांच, स्वर- भंग, वैवर्ण्य, स्वेद है। संचारी भाव - उत्सुकता, हर्ष, लज्जा, ग्लानि, चिंता है।
श्रृंगार के दो पक्ष है -
संयोग नायक-नायिका पास हो तो संयोग श्रृंगार होता है |
वियोग-नायक अथवा - नायिका का साथ न होना वियोग शृंगार होता है।
विद्यापति श्रृंगारी कवि के रूप में -
विद्यापति रसराज, रससिद्ध, मैथिल कोकिल के रूप में ख्यात है। इसलिए विद्यापति को श्रृंगारी कवि के रूप में निम्न विद्वानों ने मान्यता दी है।
श्री. विनयकुमार सरकार, डॉ. सुभद्र झा, पं. शिवनंदन ठाकुर, डॉ. रामकुमार वर्मा, नगेन्द्रनाथ, डॉ. उमेश मिश्र, डॉ. बाबुराम सक्सेना, आ. रामचंद्र शुक्ल, डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित, डॉ. पद्मा पाटील आदि। कुछ विद्वानों के मत इस प्रकार है।
डॉ. विनयकुमार सरकार "बहुत से ऐसे लोग है, जिसके लिए सांसारिक तत्त्व, शारीरिक सौंदर्य, मिट्टी और - धूलि, अपूर्णता - संपूर्णता, हृदय और प्रकृति और स्त्री, मानवीय प्रेम, इंद्रिय सुख उपेक्षणीय है। सचमुच ही विद्यापति ने राधा-कृष्ण का जो चित्र खींचा है, उसमें वासना का रंग बहुत ही प्रखर है। आराध्य के प्रति भक्ति-भाव की जो पवित्रता होनी चाहिए उसका लेशमात्र भी कहीं पता नहीं।
डॉ. सुभद्र झा ने भी विद्यापति को शृंगारी कवि माना है।
पं. शिवनंदन ठाकुर ने विद्यापति को श्रृंगारी कवि कहा है। इसके तर्क इसप्रकार है
1) विद्यापति के ग्रंथ रचनाक्रम से कथन पुष्ट होता है - सबसे पहले उन्होंने कीर्तिलता, कीर्तिपताका की रचना की। कीर्तिसिंह के वर्णन में वीर तथा श्रृंगार का संयोग दिखाई देता है।
2 ) गुणग्राही राजा-रानी (शिवसिंह और लखिमा देवी) पाकर विद्यापति ने श्रृंगार रस की सरिता बहा दी। 3) पदावली शृंगार रस प्रधान है और आर्यासप्तशती आदि ग्रंथों के आधार पर रचित है।
4) विवाह हे अवसर पर गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट नवीन युवक-युवती के मनमें, मुग्धा के मुग्ध हृदय से अपरिचित के हृदय पर गीतों में श्रृंगार रस की शिक्षा द्वारा रति नामक स्थायीभाव उत्पन्न करने के लिए विद्यापति की पदावली की रचना हुई है। इसलिए ये गीत शादी-ब्याह के अवसर पर मिथिलांचल में गाये जाते है।
डॉ. बाबुराम सक्सेना का मत है - "विद्यापति के पदों के अध्ययन से पता चलता है कि वे श्रृंगारी कवि थे। इन पदों पर राधा-कृष्ण की भक्ति का आरोप करना पद पदार्थ के प्रति अन्याय है। कवि विद्यापति के रसिक होने का परिचय उनके प्रथम ग्रंथ 'कीर्तिलता' पढ़ने से ही हो जाता है। "
डॉ. रामकुमार वर्मा - "राधा का प्रेम भौतिक और वासनामय प्रेम है। आनंद ही उसका उद्देश्य है और सौंदर्य ही उसका कार्य-कलाप । विद्यापति के इस बाह्य संसार में भगवतभजन कहाँ? इस वय: संधि में ईश्वर से संधि कहाँ... सद्यस्नाता में ईश्वर से नाता कहाँ और अभिसार में भक्ति का सार कहाँ। उनकी कविता विलास की सामग्री है, उपासना की साधना नहीं। उससे हृदय मतवाला हो सकता है, शांत नहीं।"
आ. रामचंद्र शुक्ल 'आजकल आध्यात्मिक चश्मा बहुत सस्ता हो गया है।" स्वयं विद्यापति ने 'कीर्तिपताका' में लिखा है- 'राम को सीता की विरह वेदना सहनी पडी इसलिए उन्हें काम कला निपुण अनेक स्त्रियों के साथ रहने की उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हुई। इसी कारण उन्होंने कृष्णावतार लेकर गोपियों के साथ विहार किया।" राधा-कृष्ण उनकी दृष्टि में सामान्य नायक-नायिका मात्र है।
विद्यापति को श्रृंगारी कवि मानने का तर्क यह है की वे राजकवि और राजसभासद थे। दरबारों का वातावरण विलासी था। श्रृंगार के अलावा और कोई रस सुनना पसंद नहीं था। विद्यापति यदि भक्त कवि होते तो राजाश्रय का स्वीकार ही नहीं करते। वे दरबार में जाते ही नहीं। उन्होंने अलग-अलग राजाओं की आज्ञा से उनकी फमाईश पर सद्यस्नाता सुंदरी तथा कुएँ पर खडी दीपशिखा दिखानेवाली रमणियों के चित्र प्रस्तुत किये। अपने राजा-रानी को खुश करने के लिए विद्यापति ने राधा-कृष्ण के नितांत एकांत क्षणों में भी दखलंदाजी की है।
सूरदास के दृष्टिकूट, मीराँबाई के गिरिधर गोपाल, कबीर के स्वामी राम क्रमशः सखा, पति और स्वामी होने पर भी उनके निजी कक्षमें नहीं जाते। परंतु विद्यापति अपने आराध्य के ऐसे श्रृंगारी चित्र प्रस्तुत करते हैं जिससे उन्हें ग्राम दान, धन-दान, तुला दान और उपाधि दान स्वरूप प्राप्त हुए।
विद्यापति, पदावली में सुंदरी राधा के अंग-प्रत्यंगों की चर्चा करते नहीं हिचकिचाते। अनहि विद्यापति सुन बरजोबति, एहन जगत नहिं आने । राजा शिवसिंह रूपनरायन लखिमादेई पतिभाने ॥
राजा शिवसिंह और रानी लखिमादेवी विद्यापति के आराध्य राधा-कृष्ण की सभी लिलाओं के साक्षी है। इसी कारण विद्यापति लिखते हैं - "राजा शिवसिंघ रूपनरायन, इ रस सकल से पावे।" आगे वे लिखते हैं - "भनइ विद्यापति रति अवसान राजा शिवसिंघ इ रस जान ।। "
प्रिय वस्तु में प्रेम प्रेरित होकर उन्मुख होने की भावना रति कहलाती है। यही रतिभाव शृंगार का स्थायीभाव है। विद्यापति रससिद्ध, रसिक शिरोमणि कवि है। जिस भाव में उनका मन रमा, उसी भावको उन्होंने चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। इसलिए विद्यापति की कविता में न वैराग्य, न भक्ति बल्कि वैराग्याभास और भक्त्याभास है। वे मूलत: शृंगारी कवि है। उनके द्वारा प्रस्तुत चित्रण मांसल और शारीरिक है। रूप-सौन्दर्यवर्णन, वय:संधि वर्णन, सद्यस्नाता वर्णन तथा श्रृंगार के सभी हाव-भावों का अंकन विद्यापति ने सफलतापूर्वक किया है। इसलिए निष्कर्ष यह है कि पदावली के कारण वे भक्त कवि सिद्ध नहीं होते।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विश्लेषण के आलोक में यह माना जा सकता है कि विद्यापति में श्रृंगार समन्वित भक्ति है। इनके यहाँ लौकिक प्रेम ही इश्वरोन्मुख होकर कहीं-कहीं भक्ति में परिणत हो जाता है। इनकी भक्ति भावना पर अपनी पूर्ववर्ती परंपरा का प्रभाव है साथ ही, प्रेम तत्त्व का सम्मिश्रण भी है।
प्रश्न-6 पृथ्वीराजयों में पृथ्वीराज के व्यक्तित्व पर विचार कीजिए।
उत्तर
पृथ्वीराज रासो के आधार पर पृथ्वीराज चौहान का चरित्र चित्रण : -
पृथ्वीराज रासो एक विशालतम महाकाव्य है। इस महाकाव्य का नायक 'पृथ्वीराज चौहान' है। सारा कथानक इनके इर्द-गिर्द घूमता है। उसके पिता का नाम सांभर नरेश सोमेश्वर है। कवि ने उसकी आयु केवल १६ वर्ष बताई है। जो दिल्ली तथा अजमेर का शासक है। फल का भोक्ता भी पृथ्वीराज ही है। शुक उसे पद्मावती के समक्ष इन्द्र का अवतार कहता है। उसका व्यक्तित्त्व आकर्षक और सुंदरता से परिपूर्ण है अर्थात वह कामदेव के समान सुन्दर और रूपवान है। शुक ने पृथ्वीराज को कामदेव का अवतार बताया है। शुक उसका परिचय देता हुआ कहता भी है कि उसके समान्य प्रभावी व्यक्तित्व का कोई है ही नहीं
'कामदेव अवतार हुअ सुअ सोमेसर नन्द । सास-किरन झलहल कमल, रति समीप वर बिन्द।।"
दिल्ली का एक वीर और प्रतापी राजा पृथ्वीराज के शौर्य तथा प्रेम भाव को व्यक्त करना महाकवि चंद बरदाई का उद्देश्य है पृथ्वीराज के चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार बताई जा सकती है।
1) कथा का नायक :
पृथ्वीराज रासो का चरित नायक पृथ्वीराज चौहान है। रासो के आधार पर कहा जा सकता है कि सोलह वर्ष की अवस्था में ही पृथ्वीराज दिल्ली का शासक हो गया। पृथ्वीराज धीर प्रशांत कथानायक है। वीरता, साहस, निर्णय लेने की अक्षता दानी, शीलवान है।
2) आदर्श नायक
कवि ने पृथ्वीराज को महाकाव्योचित नायक सिद्ध करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि चन्दबरददाई ने उसके रूप-सौन्दर्य का अधिक वर्णन नहीं किया, बल्कि वह उसके शौर्य और साहस का अधिक वर्णन करता है। उसकी भुजाएं घुटनों तक लम्बी हैं तथा वह अचूक शब्द-भेदी बाण चलाने में निपुण है। वह बड़ा दानी, शीलवान् साहसी, दृढ़ प्रतिज्ञ तथा धैर्यवान् योद्धा है। उसने गजनी के बादशाह शहाबुद्दीन गौरी को युद्ध में तीन बार हराकर कैद किया और फिर अभयदान देकर छोड़ दिया। कितना प्रभावी स्वरूप है।
"वैसह बरीस षोड्स नरिन्दं, आजनु बाहु भुअलोक यंददं ।
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जिहि पकरि साह साहाब लीन, तिहुं बेर करिल पानीप हीन। सिंगिनि सुसद्द गुने चढ़ि जंजीर, युक्के न सबद बेघन्त तीर ।।
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बल बैन करन जिमि दान मानं, सत सहस सील हरिश्चन्द समान। साहस सुकम विकम जु वीर, दांनव सुमत अवतार धीर ।।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पृथ्वीराज एक सर्वगुण सम्पन्न नायक है। यदि वह कामदेव के समान सुन्दर है तो वह वीर और प्रतापी भी है। नायक के इन्हीं गुणों को सुनकर पद्मावती उस पर आसक्त हो जाती है।
3) गुणवान व्यक्तित्व का धनी :
पृथ्वीराज चौहान का शारीरिक व्यक्तित्त्व आकर्षक एवं सुंदर है। इसीके साथ-साथ साहस तथा ओज से परिपूर्ण है। गजनी के बादशाह शहाबुद्दीन गोरी को युद्ध में कई बार हराकर कैद कर लिया उसके शरण आनेपर शरणागत वत्सलता का गुण दिखाकर उसे छोड़ दिया। पृथ्वीराज की भुजाएँ घुटनों तक लंबी होने के कारण वह आजानुबाहु था। इतना युद्ध कौशल उसके पास था की शब्द सुनकर अचूक लक्ष्य भेद बाण से करता था।
सिंगिनि सुसद्द गुने चढि जंजीर चुक्के न सबद बेधन्ता तीर ।
3) वीर योद्धा राष्ट्र नायक :
पृथ्वीराज रासो वीर रसप्रधान रचना होने के कारण 19 खण्डों में से लगभग 15 - खण्डों में युद्ध का विशद वर्णन हुआ है। इसमें जायसी के पद्मावत की तरह काल्पनिक अथवा परंपरागत युद्ध वर्णन नहीं किया गया है। प्रत्येक युद्ध में कुछ न कुछ नवीनता दिखाई देती है। युद्ध वर्णन में आलंकारिकता तथा अतिशयोक्ति का नामोनिशान नहीं है। यह वर्णन स्वाभाविक आँखों देखासा वर्णन है। उदाहरण प्रस्तुत है।
जयचंद की फौज को देखकर समस्त पृथ्वी तथा इंद्रादि देवता काँप रहे हैं, उसकी सेना का मुकाबला पृथ्वीराज के बिना कौन करे! क्यों न हो चंद कवि को पृथ्वीराज के अलावा संसार में तथा स्वर्ग में अधिक बलवान क्यों भला नजर आए। पृथ्वीराज की सेना के भार से पृथ्वी, समुद्र पर्वतापि सब डगमगा रहे है। पृथ्वराज के क्रोध को चंद ने इस प्रकार प्रकट किया है।
तब नरिंद जंगली कोह, कट्टयो सुबंक असि ।
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हंकति सिर विकंध, नचित धर कबंध 11-64
इनमें दोहा 16, 17, 18 में पृथ्वीराज तथा शहाबुद्दीन की लडाई का सजीव वर्णन है। कई तरह के व्यूहों का निर्माण - यवन सेना का वर्णन - हाथी, घोड़ों की ठेल-पेल तथा राजपूतों की सेना तथा उनके शौर्य का वर्णन किया गया है। पृथ्वीराज की वीरता ऐसी है कि उसके रणकौशल को देखकर आकाश में चमकनेवाला सूर्य भी चकित होकर रूक जाता है। धरती भी घूमना बंद कर देती है। पृथ्वीराज न केवल शत्रू पर विजयी होता है अपितु उनका मान-भंग करता हुआ अपनी विजय पताका लहराता है। भारत का नाम विश्व में कर देता है।
इस प्रकार पृथ्वीराज एक दुर्द्धर्ष योद्धा भी है। युद्ध क्षेत्र में ही उसके दुर्द्धर्ष योद्धा होने के प्रमाण मिल जाते हैं। वह शत्रुओं पर आक्रमण करके उनके मान अभिमान को कुचल डालता है। जब युद्ध क्षेत्र में घमासान युद्ध होता है और धूल उड़ने से रात सा अंधेरा छा जाता है तब वह गौरी की गर्दन में अपना धनुष डालकर उसे कैद कर लेता है। वह इतना शौर्यवान् योद्धा है कि एक साथ सुद्रशिखर के राजा विजय और कुमायूं के राजा कुमोदमणि पर विजय प्राप्त कर गौरी पर भी विजय प्राप्त कर लेता है। कवि उसके असीम साहस का वर्णन करते हुए लिखता है कि
"गिरदं उड़ी भानं अंधार रैनं।
गई सूधि, सुझझै नहीं मझझ नैनं ।।
सिर नाय कम्मान प थराज राजं ।
पकरिये साहि जिम कुलिंग बाजं ।।"
4) निर्णय लेने में शीघ्रता :
पृथ्वीराज के व्यक्तित्त्व का यह भी एक आयाम है। किसी भी निर्णय लेने में वह देर नहीं लगाता, समय व्यर्थ नहीं गँवाता। बिना आगा-पिछा सोचे पद्मावती का हाथ पकडकर उसे अपने घोडे की पीठ पर चढा लेता है और दिल्ली की ओर रवाना होता है। संयोगिता के साथ भी ऐसाही करता है। जयचंद के विरोध की पर्वाह नहीं करता।
पृथ्वीराज वीरता का तो साक्षात अवतार दिखाई देता है। युद्ध क्षेत्र में ही पाठक उसकी वीरता को जान पाता है। वह पद्मावती का हरण कर उसे अपने घोड़े पर बिठाकर दिल्ली की ओर जा रहा था। थोड़ी दूर जाने पर ही शत्रुओं के घुड़सवारों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। यह देखकर पृथ्वीराज अपने घोड़े की लगाम मोड़कर पीछे चल पड़ा और उसने अपनी तलवार के वे जौहर दिखाए, उसे देखकर मानो सूर्य भी रुक सा गया। धरती कांपने लगी और शेषनाग बेचैन हो उठा। उसे शत्रुओं को पृथ्वीराज काल के समान दिखाई देने लगा। कवि लिखता भी है।
"उल्टी जु राज पथिराज बाग थकि सूर गगन धर धसत नाग।। सामन्त सूर सब काल रूप । गहि लोह बाह्रै सुभूप ।।"
इसी प्रकार से गौरी के साथ युद्ध करते समय भी प थ्वीराज का वीर रूप हमारे समक्ष उभर कर आता है। जब वह म्यान से अपनी तलवार को बाहर निकालता है तब ऐसा लगता है कि मानो काले बादलों में बिजली चमक गई हो। वह दुश्मन के हाथियों पर ऐसे टूट पड़ता है जैसे सिंह ने हाथियों पर हमला किया हो। उसकी वीरता का वर्णन करते हुए कवि लिखता है
"गही तेग चहुंवान हिन्दवांन रानं । गजं जूथ परि कोप केहरि समानं ।। करे रूंड मुंड करी कुम्भ फारे। वरं सूर सामन्त हुकि गर्ज भारे।।"
5) श्रृंगारी नायक पृथ्वीराज :
कवि ने पृथ्वीराज को काम का अवतार माना है। पृथ्वीराज का व्यक्तित्त्व आकर्षक और सुंदर था। इंछिनी, पद्मीनी, संयोगिता पृथ्वीराज के रूपसौंदर्य पर आसक्त नायिकाएँ थी। संयोगिता का रूप-चित्रण कर कविने यह घोतित किया है कि उसके लिए योग्य पुरुष पृथ्वीराज ही है। कवि लिखता है, संयोगिता के घुंघराले केश मानों कामदेव के अंकुर है, उसके अधर कोमल, सुगंधित तथा अरुण किसलय की तरह है। ललाट पर मंजरी तिलक सुशोभित है। पृथ्वीराज संयोगिता के साथ विलास में इतना डूबे है कि उन्हें अपने राज्य की कोई सुध-बुध नहीं। राजपुरोहित, चंद कवि, सांबर नरेश इससे चिंतित हो गए।
रसघुटिय लुटिय मयन टुट्टी नतम जरिजाह।
भरभग्गत कच्छह सुमि अलि भरि मंजरियाह ।
चंद अपने स्वामी को सचेत करने के लिए अंतपुर में संदेश भेजता है।
गोरिय रत्तो तुव धरनि तुं गोरि अनुरत्त
अर्थात् शहाबुद्दिन गोरी तुम्हारे राज्य पर अनुरक्त है और तुम गौरी (संयोगिता) के प्रेम में आसक्त हो। इतना सुनते ही पृथ्वीराज ने संयोगिता का खयाल छोडकर युद्ध की तैयारी शुरू कर दी।
इस तरह पृथ्वीराज चौहान केवल शृंगार में डूबे हुए नायक नहीं है तो राष्ट्र की रक्षा करनेवाले वीर योद्धा भी है। कुल मिलाकर कवि चंद ने 'पृथ्वीराज रासो' में पृथ्वीराज चौहान को वीर, गुणी, ज्ञानी, दानी, वचन के पक्के, शीलवान, सुपुरुष के रूप में चित्रित किया है। पंक्तियाँ प्रस्तुत है,
बल बैन करन जिम दान पान, सत सहस सील हरिचंद समान।
साहस सुक्रंम विक्रम जु, वीर, दानव सुमत्त, अवतार धीर ।
दिस च्यार जानि सब कला भूप, कंद्रप्प जानि अवतार रूप ॥
उदात्त सागर
इस खण्ड काव्य के अन्तिम भाग में प थ्वीराज का धीरोदात्त नायक रूप हमारे सामने उभर कर आता है। दिल्ली पहुंच कर वह विधिवत पद्मावती के साथ विवाह करता है और फिर याचकों को दान देकर उन्हें सम्मानित करता है। यही नहीं वह अपने शत्रु शहाबुद्दीन को केवल 8000 घोड़ों का दण्ड देकर मुक्त कर देता है। यह उसकी उदारता का ही परिचायक है। भले ही इतिहासकारों ने पथ्वीराज की निन्दा की है लेकिन प थ्वीराज ने प्राचीन भारतीय परम्परा का पालन करते हुए शहाबुद्दीन गौरी को प्राणदान देकर छोड़ दिया। इस सम्बन्ध में कवि लिखता भी है
"बोलि विप्र सीधे लगन्न, सुभ घरी परट्ठिय
हरि बांसह मंहर बनाय, करि थांवरि गंठिय ।।
ब्रह्म वेद उच्चरहिं होम चौरी जु प्रति वर पद्मावती दुलहिन अनूप, दुल्लह पथिराज नर।।"
इस प्रकार प थ्वीराज एक महान नायक है। जिसमें अपूर्व साहस, सौन्दर्य, दया, उदारता और देर दृष्टि है।
6) हार कर भी जीतनेवाला नायक :
पृथ्वीराज रासो में नायक पृथ्वीराज गोरी की जेल में बंदी है। नेत्रविहीन करने जैसी क्रूर यंत्रणाएँ भोगी। अंत में शहाबुद्दीन गोरी का 'शब्द वेध' बाण से वध कर सुझ-बुझ का परिचय दिया। राष्ट्र को म्लेच्छ मुक्त किया ।
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