एम.ए. (हिंदी) NC पेपर : 102 यूनिक पेपर कोड: 120501102

कोर्स : एम.ए. (हिंदी) NC पेपर : 102
यूनिक पेपर कोड: 120501102
शीर्षक: आदिकालीन हिंदी काव्य
सेमेस्टर : 1
पूर्णांक : 70

आवश्यक निर्देश:

1. उत्तर के पूर्व प्रश्नों को अच्छी तरह से समझने का प्रयास करें। 
2. छह प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दें।

3. प्रत्येक प्रश्न के अंक समान हैं।

प्रश्न-1 दोहाशतक में व्यक्त सरहपा के विचारों की समीक्षा कीजिए।

प्रश्न-2 नाथ-साहित्य की परम्परा में गोरखनाथ का महत्व बताइए।

प्रश्न-3 विद्यापति की पदावली के काव्य-सौन्दर्य पर विचार कीजिए।

प्रश्न-4 -विद्यापति का भक्तकवि हैं अथवा अश्रृंगारी प्रतिपादित जिए |

प्रश्न-5 कयमासका के काव्य-तान्दर्य पर विचार कीजिए।

प्रश्न-6 पृथ्वीराजयों में पृथ्वीराज के व्यक्तित्व पर विचार कीजिए।

हल
प्रश्न-2 नाथ-साहित्य की परम्परा में गोरखनाथ का महत्व बताइए।

उत्तर
 गोरखनाथ : व्यक्तित्व एवं कृतित्व

नाथ संप्रदाय की मूलंभूत जानकारी प्राप्त करने के बाद हम नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक कवि गोरखनाथ तथा उनकी रचनाओं की जानकारी भी देना चाहेंगे। यह पहले बताया जा चुका है कि गोरखनाथ मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य थे। नाथों की शिष्य परंपरा में शिव को ही आदिनाथ कहा गया है। शिव के बाद मस्येंद्रनाथ का नाम लिया जाता है। इसके संबंध में एक जनश्रुति प्रचलित है। कहते हैं कि एक बार शिव जब इस ज्ञान का उपदेश पार्वती को दे रहे थे तो मत्स्य रूप धारण कर मत्स्येंद्रनाथ ने वह ज्ञान प्राप्त कर लिया था। बाद में उन्होंने यह ज्ञान गोरखनाथ को दे दिया। वास्तव में गोरखनाथ ने नाथ संप्रदाय को व्यवस्थित किया तथा उसे व्यापक रूप प्रदान किया। विद्वानों ने इन्हें शंकराचार्य के बाद दूसरा प्रभावशाली व्यक्ति माना है। वास्तव में भक्ति आंदोलन से पूर्व सबसे शक्तिशाली आंदोलन गोरखनाथ का योगमार्ग था।
गोरखनाथ के समय के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वानों ने इनका समय 9वीं शती का उत्तरार्ध माना है और कुछ ने 13वीं शती। वैसे अधिकांश विद्वान अनेक प्रमाणों के आधार पर इनका समय 9वीं शती का उत्तरार्ध ही मानते हैं। इनका व्यक्तित्व अपने समय में काफ़ी चर्चित था। भारत का कोई कोना ऐसा नहीं था जहाँ इनके बारे में कोई जनश्रुति प्रचलित न हो। कोई ऐसा मत या संप्रदाय नहीं था, जिससे इनका कोई न कोई संबंध न निकलता हो। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि गोरखनाथ पहले वज्रयानी साधक थे, बाद में वे शैव हो गए। कुछ इन्हें तांत्रिक शैव भी मानते हैं।

गोरखनाथ ने जो पंथ चलाया वह गोरखपंथ के नाम से जाना गया। इस पंथ के अधिकांश साधक ब्रह्मचारी थे। ये नारी को माया का रूप मान कर उससे दूर ही रहना चाहते थे।

गोरखनाथ एवं उनकी परंपरा के अन्य शिष्यों चर्पटनाथ, रभर्तृहरि, गोपीचंद्र, चौरंगीनाथ आदि द्वारा लिखी गई अनेक रचनाएँ मिलती है, जिनकी भाषा हिंदी है। इनमें से गोरखनाथ के नाम से लगभग 40 रचनाएँ मिलती है। किंतु इनकी प्रामाणिकता के विषय में संदेह है। डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने केवल 14 रचनाओं को इनके द्वारा रचित माना है, जिनमें सबदी, पद, नरवै बोध, आत्मबोध, मछीन्द्र-गोरख बोध, ज्ञान तिलक, पंचमात्रा आदि प्रमुख हैं। इन्होंने गोरखनाथ की पुस्तकों का एक संग्रह "गोरखबानी" के नाम से प्रकाशित कराया है। इस संकलन की रचनाओं में नाथ संप्रदाय की सभी प्रवृत्तियों का समावेश है।

गोरखनाथ के काव्य का प्रतिपाद्य

गोरखनाथ का काल सांप्रदायिक दृष्टि से बहुत अव्यवस्थित था। देश में मुसलमानों का आगमन हो चुका था। जो लोग वैदिक व्यवस्था का विरोध कर रहे थे, उनके सामने दो रास्ते थे। पहला, वे ब्राह्मण मत का विरोध सहते हुए भी हिंदू साधक बने रहें। दूसरा, वे मुसलमान हो जाएँ। लेकिन नाथपंथियों के आगमन से यह संप्रदाय हिंदुत्व की ओर खिंचता चला गया। भक्ति आंदोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का योगमार्ग था। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, गोरखनाथ ने हठयोग साधना पर बल दिया, जिसके अंतर्गत गुरु महिमा, योगपरक साधना, ब्रह्मानंद की स्थापना, नारी के प्रति दृष्टिकोण, शून्य की कल्पना, नाड़ी साधना, आदि इनके काव्य के प्रतिपाद्य विषय हैं।

अब हम इनकी एक-एक करके चर्चा करेंगे तथा इनसे संबंधित कुछ अंशों की "वाचन" खंड के अंतर्गत व्याख्या करेंगे।

गुरु महिमा

सिद्ध साहित्य के समान नाथ साहित्य में गुरु की महिमा का प्रतिपादन किया गया है। गोरखनाथ के अनुसार एकमात्र अवधूत ही गुरु हो सकता है। अवधूत वह होता है, जिसके प्रत्येक वाक्य में वेद का निवास होता है। उसका हर कदम तीर्थ होता है। उसकी दृष्टि में मोक्ष रहता है। जिसके एक हाथ में त्याग तथा दूसरे में भोग रहता है, फिर भी वह इन दोनों से दूर रहता है। गोरखनाथ के अनुसार गुरु ही समस्त श्रेयों का मूल है। एक स्थान पर गोरखनाथ कहते हैं

“आकाश मंडल में एक औंधे मुंह वाला कुँआ है, जिसमें अमृत भरा हुआ है। जिसने अच्छे

गुरु की शरण ली है, वही उसमें से अमृत पी सकता है। जिसने किसी अच्छे गुरु को प्राप्त

नहीं किया, वह प्यासा ही रह जाता है।"

योगपरक साधना

गोरखनाथ की रचनाओं में हठयोग की छाप अधिक दिखाई देती है। यौगिक प्रक्रिया को समझाते हुए ये कहते हैं कि "अन्न से बने मांस को वायु से बनी हड्डी पर ज्ञान और अमृत का बंध देकर वायु का भक्षण करना चाहिए। ऐसा करने से शरीर नष्ट नहीं होता क्योंकि मृत्यु (यम) का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

इन्होंने हठयोग साधना को समझाने के लिए लोक जीवन से उदाहरण लिए। इसका प्रमुख उद्देश्य यह था कि साधारण जनता भी इस साधना प्रक्रिया को आसानी से समझ सके। एक उदाहरण देखिए।
"आकाशमंडल में गाय का दूध निकालकर सिद्धों ने उसे दही के समान जमा दिया। अर्थात् उस ज्ञान को उपनिषद आदि ग्रंथों में स्थिर कर दिया। पंडितों ने इसी दही को छानकर केवल छाछ ग्रहण किया। अर्थात वे शब्दों में ही उलझ गए। किंतु सिद्धों ने छाछ को छोड़कर मक्खन ही ग्रहण किया, अर्थात ज्ञान प्राप्त किया।"

इनके अनुसार हठयोग साधना तभी हो सकती है जब कठोर आसन पर बैठकर ध्यान किया जाए। रात-दिन ब्रह्म का स्मरण किया जाए। भोजन थोड़ा किया जाए और काम, क्रोध तथा अहंकार को दूर भगा दिया जाए।

ब्रह्मानंद की स्थापना

नाथ ने ब्रह्मानंद की स्थिति को हर स्थान पर व्याप्त माना है। आगे चलकर संतों ने इसी भाव को ग्रहण किया तथा परमात्मा में आत्मा को लीन माना। ब्रहम की स्थिति का वर्णन करते हुए एक स्थान

पर गोरखनाथ ने जन जीवन से उदाहरण लेकर अत्यंत सरल शब्दों में अपना मत प्रकट किया है।

जिस प्रकार तिल में तेल व्याप्त है, वैसे ही अंजन में निरंजन जैसे तिल में से तेल निकाला. जाता है, वैसे ही मैंने (सिद्ध योगी) अंजन (माया) में से निरंजन (ब्रह्म) को प्राप्त किया है। इस तरह मैंने लगातार आध्यात्मिक आनंद प्राप्त किया है।

नारी के प्रति दृष्टिकोण

अधिकांश नाथ ब्रह्मचारी थे, अतः इनके लिए नारी का संग वर्जित था। इनके अनुसार नारी मात्र आकर्षण की वस्तु है, जिससे साधना में बाधा पैदा होती है। इसीलिए इन्होंने माया को छोड़कर दूर हो जाने की बात स्थान-स्थान पर कही है। गोरखनाथ एक स्थान पर कहते हैं कि जो स्वर्ण रूपी नारी का परित्याग कर देता है, वही संसार में निर्भय होकर योग सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है।

शून्य की कल्पना

आप पढ़ चुके हैं कि शून्य को सिद्धों ने काफी महत्व दिया था। नाथ संप्रदाय में भी इस शून्य तत्व को ग्रहण किया गया, परंतु इसे परम तत्व के रूप में ग्रहण किया गया। गोरखनाथ ने शून्य का संबंध शब्द या नादतत्व से जोड़ा। वास्तव में शिव और शक्ति की कल्पना नाद तथा बिंदु के रूप में, हठयोगी एवं तांत्रिक संप्रदायों में बहुत पहले से थी। इसमें नादतत्व या शब्द ब्रह्म को सारी सृष्टि का मूल कारण माना गया है। गोरखनाथ ने शून्य को नाद का प्रतीक मानकर उसे परम तत्व माना तथा उसे ही सब कुछ कहा। गोरखबानी में कुछ पंक्तियाँ ऐसी मिलती हैं, जिनमें शून्य से ऊपर सहजशून्य की कल्पना की गई है। उसमें यह बताया गया है कि शून्य में तो आना-जाना लगा रह सकता है, लेकिन जिस शून्य में जाकर चित्त स्थिर हो जाए, उसे ही सहज शून्य माना जाता है।

नाड़ी साधना

हठयोग में नाड़ी साधना को विशेष बल दिया गया। शरीर की 72 हज़ार नाड़ियों में से सिर्फ़ सुषुम्ना नाड़ी को ही शक्ति को धारण करने वाली माना गया। गोरखनाथ ने नाड़ी साधना, कुंडलिनी जागरण के विषय में स्थान-स्थान पर अपने विचार रखे हैं। इनके अनुसार इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना - इन तीनों नाड़ियों का संगम ब्रह्मरंध्र है जो मस्तिष्क के बीच में स्थित रहता है। ब्रह्मरंध्र द्वार है, जो बंद रहता है। साधना से ही इसे खोला जा सकता है। ब्रह्मरंध खुलते ही अमृतरस झरता है, जिससे योगी को अमरत्व की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि गोरखनाथ ने नाथ साहित्य परंपरा के अनुसार उन सभी विषयों का प्रतिपादन किया जो हठयोग साधना के लिए अनिवार्य थे। इनके साहित्य में मूल रूप से योगियों के लिए उपदेश दिए गए हैं, जिसमें नीतिपरक बातें, सामाजिक आचार-व्यवहार, साधना का मार्ग आदि विषयों का प्रमुख रूप से प्रतिपादन हुआ है। इन्होंने लौकिक विषयों से अपने मन को हटाकर अंतः साधना पर बल दिया, जिसमें प्राणसाधना का विस्तार से विवेचन किया। इन्होंने संसार से वैराग्य लेने का उपदेश दिया क्योंकि साधना मार्ग में संसार के आकर्षण बाधा उपस्थित करते हैं। इस प्रकार इन्होंने वैराग्य को साधना का प्रथम सोपान माना।

आइए, अब गोरखनाथ के कुछ प्रमुख काव्यांशों की चर्चा करें -

गोरखनाथ के काव्य का वाचन

गोरखनाथ के काव्य का प्रतिपाद्य विषय जान लेने के बाद यह आवश्यक हो जाता है कि उन प्रमुख विषयों को उनकी रचनाओं में देखा जाए। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, इस साहित्य का प्रतिपादन लौकिक भाषा में हुआ है, अतः लोक जीवन के लिए अनेक उदाहरण भी स्थान-स्थान पर दिखाई देते हैं।

यहाँ कुछ वाक्यांश दिए जा रहे हैं, जिनका पहले आपको वाचन करना है, फिर भावार्थ समझना है। उसके बाद शब्द प्रति शब्द अर्थ समझना है :

1) योगपरक बिंब का एक उदाहरण देखिए 1

"गगन मंडल मैं ऊँघा कूवा, तहाँ अमृत का बासा। सगुरा होइसो भरि भरि पीवै, निगुरा जाइ पियासा ॥"

भावार्थ

आकाश मंडल (शून्य) में एक औंधे मुंह वाला कुआँ है, जिसमें अमृत भरा हुआ है। जो अच्छे गुरु की शरण में है, वही उसमें से भर-भर कर अमृत पी सकता है। लेकिन अच्छे गुरु के अभाव में वह प्यासा ही रह जाता है।

शब्दार्थ :

गगन मंडल →आकाश मंडल (शून्य, ब्रहमरंध)
ऊँधा  →औघा लटका हुआ
कूवा  →कुआँ
बासा  →निवास 
सगुरा  →अच्छा गुरु
होई  →होना
सो  →वह
भरि भरि  →भर-भर कर
पीवै  →पीता है 
जाइ रह  →जाता है 
पियासा  →प्यासा

निगुरा बुरा गुरु

2) हठयोग साधना का एक उदाहरण देखिए, जिसमें लोक जीवन से उदाहरण लेकर उसे सरल तरीके से समझाया गया है

- "गिगिन मंडल में गाय बियाई, कागद दही जमाया।
छाछि छौंणि पिंडता पीवीं, सिंधा माषण षाया ॥"
(सबदी)

भावार्थ
गगन मंडल (शून्य) में अनुभूति के शिखर पर पहुंच कर सिद्धों ने गाय रूपी परमानुभूति प्राप्त की। उसी का दूध निकालकर उसे उपनिषद आदि ग्रंथों में दही के रूप में जमा दिया। पंडित दही को छानकर केवल छाछ ही ग्रहण कर पाए अर्थात वह शब्दों में ही फंसे रह गए, किंतु सिद्धों ने केवल मक्खन ही ग्रहण किया अर्थात शब्दों को छोड़कर ज्ञान को ग्रहण किया।

शब्दार्थ : 
गिगिन  →आकाश, गगन
पीवीं  →पीया
बियाई  →जन्म दिया
कागद  → कागज़
सिंधा  →सिद्ध योगी
माषण  →मक्खन
छाछि  → छाछ
छाणि  →छानकर
षाया  →खाया
पिंडता  →पंडित

3) यौगिक क्रिया का महत्व बताते हुए गोरखनाथ एक स्थान पर कहते हैं "

जैन का मास अनिल का हाड़, तत का बंद भषिवा बाई । बंदत गोरखनाथ पता होडबा चिरांई न पडै घटि न जमघट जाई ॥"





प्रश्न-3 विद्यापति की पदावली के काव्य-सौन्दर्य पर विचार कीजिए।
उत्तर
रूप-सौंदर्य चित्रण :

विद्यापति की पदावली का सौंदर्य वर्णन

विद्यापति की पदावली ने केवल श्रंगार रस से युक्त है बल्कि भाषा पोस्टर और अलंकार आदि से भी अभिव्यंजित है। आइए इसका 11 का वर्णन करते हैं।

श्रृंगार वर्णन
'पदावली' में यद्यपि शृंगार के अतिरिक्त शान्त, वीर, रौद्र, एवं अद्भुत रसों का भी समावेश हुआ है, तथापि उसका प्रधान रस है शृंगार। शृंगार-वर्णन में ही विद्यापति की काव्य-प्रतिभा को चरमोत्कर्ष प्राप्त हुआ है। उनके शृंगारपरक पदों में उनके भावलोक की समस्त विशेषताओं, जैसे भावों का सम्यक् विस्तार, मनोवैज्ञानिक निरीक्षण की सूक्ष्मता और अनुभूति की तीव्रता आदि के दर्शन होते हैं। विभाव, अनुभाव और संचारी के सम्यक् निरूपण के द्वारा कवि ने भावपक्ष को प्रभावोत्पादक सजीव और सशक्त बना दिया है। आइए पहले विद्यापति के संयोग शृंगार वर्णन पर विचार करें।
श्रृंगार के तीन तत्त्व माने जाते हैं  1) काम, 2) सौंदर्य, 3) प्रेम । 
काम एक ऐसा मनोवेग है जो मैथुन से संबंधित है। स्त्री-पुरुष का मैथुनजन्य आनंद काम कहलाता है। श्रृंगार का काम भाव जिसे काव्यशास्त्रीयोंने 'रति' स्थायी भाव कहा है। रति भाव पूर्णरूप से सुंदरता पर आधारित होता है। सौंदर्य आकृष्ट करने की शक्ति का नाम है। किसी विशेष व्यक्ति-वस्तु की आकर्षण शक्ति को उसका सौंदर्य कहा जा सकता है।

सुंदरता के दो आयाम होते हैं- 
1) द्रष्टा की ग्रहण शक्ति, 
2) वस्तु / शक्ति की आकर्षण शक्ति। दोनों का
सामंजस्य प्रेम का कारण है।

काम का परिष्कृत रूप प्रेम है। प्रेम के दो रूप है 1) व्यापक, 2) संकुचित ।

व्यापक अर्थ में प्रेम के रूप है- 1) छोटों के प्रति प्रेम (वत्सलता ) 2) बराबर वालों के प्रति प्रेम ( अनुराग ) 3) बड़ों के प्रति प्रेम (श्रद्धा)

संकुचित अर्थ में प्रेम भिन्न लिंगी व्यक्तियों में आपसी आकर्षण, प्रणयजन्य व्यापार है। इस विवेचन से स्पष्ट होता है कि सुंदरता चेतना का उज्वल वरदान है। सौंदर्य ही मानव जीवन का चरमोत्कर्ष है। सौंदर्यानुभूति की अभिव्यक्ति कला है। सौंदर्य प्रेम का मूल प्रेरक स्रोत है। विद्यापति कलाकार अर्थात् कवि है। सौंदर्यानुभूति को कविता के माध्यम से व्यक्त किया।

विद्यापति श्रृंगारी कवि होने के कारण प्रेम के मूल प्रेरक सौंदर्य का पूर्ण तथा अद्भुत निरूपण किया। सुंदरता के दो आधार है - 1) बाहरी सुंदरता 2) आंतरिक सुंदरता विद्यापति में दोनों रूप मिलते है। विद्यापति ने देह और मन दोनों की सुंदरता का निपुणता से वर्णन किया है।

1) बाहा सुंदरता :

बाह्य सुंदरता के अंतर्गत आकार, प्रकार, वेशभूषा, वर्ण, कद-काठी आते हैं। नख-शिख वर्णन. चेष्टाओं का वर्णन. वेश-भूषा, हाव-भाव वर्णन का बाह्य सौंदर्य चित्रण में समावेश होता है।

विद्यापति के काव्य का आधार प्रेम है। प्रेम का स्रोत सौंदर्य है और उसका आश्रय यौवन है। शारीरिक सौंदर्य का आधार प्रतिमान रूप है। मित्रों इसलिए सर्वप्रथम हम रूप की चर्चा करेंगे।

(क) रूप-सौंदर्य :

विद्यापति ने अपने पदों में रूप-सौंदर्य के विविध चित्र मनोहारी ढंग से प्रस्तुत किए है। रूप-सौंदर्य में केवल स्त्री (राधा) के रूप का ही वर्णन नहीं किया तो श्रीकृष्ण की रूप-माधुरी को भी प्रस्तुत किया है।

विद्यापति ने राधा को अपरूप, अपूर्व, अभिरामा कहा है। विद्यापति राधा के रूप के आगे मौन हो जाते है। यहीं मौन राधा की अपूर्व सुंदरता को प्रकट करता है। 'कि आरे!' 'की कहब' जैसे सार्वनामिक शब्दों की योजना कवि करता है। विद्यापति की राधा पृथ्वी की सर्वोत्तम सुंदरी है। विधाता ने कठिन परिश्रम कर राधा को गढ़ा है। कवि के शब्दों में

कतेक जतन बिहि आनि समारल खिति तात लावनि सार

रूप सौंदर्य का अंकन करते समय काव्यशास्त्र की परंपरा से प्राप्त उपमानों का प्रयोग विद्यापति ने बेहिचक किया है। जैसे चंद्रमा, कमल, हरित, कोकिला, चकोर, कीर (तोता), गजराज (हाथी), कनक-कदली (स्वर्गवेल), बिम्बाफल, दाडिम, खंजन प्रतिनिधित्व करते है। मुख, शरीर की गंध, नेत्र, आवाज, स्वर्णिम आभा, शरीर का रंग, उरोज, दाँत आदि। भृकुटि को देखकर भौंरा तथा नाक को देखकर तोता लजा गया है।

भौंह भ्रमरण नासापुट सुंदर से देखी कीर लजाई ।

शारीरिक सौंदर्य की पराकाष्ठा है कि शरीर के अंगों से उपमान लज्जित होकर धुप गए हैं

कबरी-मय चामरि गिरि-कंदर मुख भय चाँद अकासे। हरिन नयन-भय, सर भय कोकिल गतिभय गज वनवासे ।

राधा का मुख मनोहर और अधर लाल रंग के है। देखकर ऐसा लगता है मानों कमल के साथ लाल रंग का मधुर फूल खिला हो । नेत्र भ्रमर की आकृति के है। झुकी हुई आँखें इस तरह लगती है कि मधु के कारण मदमत्त हुआ भ्रमर उड़ने में असमर्थ है। भौएँ तो कामदेव के धनुष की तरह लगती है। शब्दों द्वारा उसका वर्णन करता संभव नहीं है। ब्रह्माजीने न जाने कितने यत्न से रूप की रचना की है। रूप वर्णन का अगला प्रकार नखशिख वर्णन है।

(ख) नखशिख वर्णन :

रीतिकालिन कवियों ने तथा पद्मावत में जायजी ने रूप-सौंदर्य वर्णन करने के लिए 'नख-शिख वर्णन' की परंपरा को आगे बढाया जो संस्कृत काव्यशास्त्र से हिन्दी में आई है। यह रूप वर्णन ऊपरी तथा मात्र शारीरिक है। विद्यापति की विशेषता है उन्होंने नायिका के अंग-उपांगों का क्रमिक वर्णन प्रस्तुत नहीं किया। वे मनोविज्ञान के ज्ञाता होने से नारी-सौंदर्य की पराकाष्ठा से यह वर्णन करते है।

पीन पयोधर दूबरि गता।
मेरू उपजल कनक लता।

नारी के रूप-स्वरूप के मनोहारी दर्शन पयोधर ही होते हैं। विद्यापति ने उरोजों की प्रधान रूप से चर्चा की है। पीन पयोधर सुमेरू पर्वत मात्र नहीं है। बिना नाल के खिले हुए कमल है, ये मुरझा न जाए इसलिए मणियों का हार सुरसरि गंगा की धारा बनकर उन्हें सींच रहा है। स्वर्ण कटोरा, श्रीफल के बाद विद्यापति इन्हें 'कनक-संभु' कह देते है।

काम-कम्बुभरि, कनक, संभु परि
ढाराती सुरसरि धारा ।

मथुरा जाते हुए कृष्ण भी “कुच जुग संभु को स्पर्श कर" पुनः आने का वचन राधा को देते है।

विद्यापति ने रूप सौंदर्य के दो तरह से चित्र प्रस्तुत किए हैं। वय:संधि वर्णन और सद्यस्नाता वर्णन। इन दोनों में उनकी मौलिकता दिखाई देती है। वयःसंधि वर्णन मनोवैज्ञानिक है। बचपना और यौवन का मिलन यहाँ है। आँखे • विशाल होकर कानों की ओर बढ़ने लगी है। बोलते समय मंद-मंद हँसती है। दर्पण लेकर अपने मुँह को निहारती है, श्रृंगार करती है। उरोजो को एकांत में निहारती है। कमर पतली हो गई है। आँचल से हृदय स्थल को ढाँकती है।

अब सब खत रह आँचर हात । लाने सखिगत न पुछात बात ।

सद्यस्नाता वर्णन

राधा के केशों से जल-धारा गिर रही है, देखकर ऐसा लगता है मुख रूपी चाँद के भय से केश रूपी अंधेरा आँसू बहा रहा है। दोनों स्तन सुंदर चक्रवाक है जो अपने कुल में समाने के लिए उड़ने को उद्युक्त हो रहे है। इसलिए नायिका ने उन्हें बाहु-पाश में बाँध लिया है। वस्त्र शरीर से चिपक गए हैं छूटने के भय से रो रहे है। ऐसी रूपवती नायिका कृष्ण को प्रिय है। कामदेव के पाँच बाण है- सम्मोहन, उन्माद, शोषण, तापन, स्तम्भक इनका सुंदर प्रयोग विद्यापति ने किया है।

कामिनी करए सनाने । हेरतहि हृदय हनए पंचबाने ।

(ग) हाव-भाव वर्णन :

विद्यापति ने राधा का सौंदर्य सचेष्ट, हाव-भाव युक्त किया है। गजगामिनी कामिनी पलट कर हँस देती है तो रसिक का हृदय बिंध जाता है।

गेलि कामिनि गजक गमिनि बिहँसि पलरि निहारि।
जोरि भुज जुग मोरि बेढल तताहि बदन सुछन्द ॥

राधा की सभी भाव-भंगिमा नायक कृष्ण को आकुल करनेवाली है। वह कभी बाल बाँधती है तो कभी खोलती है। कभी अपने शरीर को ढंकती हैं तो कभी अनावृत्त करती है। लज्जा, शर्म से कंपन स्वाभाविक है।

आँचल लेइ बदन पर झाँप |
थिर नहिं होअइ थर-थर काँप

विद्यापति की दृष्टि में 'रूप-स्वरूप मोयं कहइत असंभव है परंतु वह इतना आकर्षक है कि उसके पिछे आँखे लगी ही रहती है।

विद्यापति ने केवल नायिका के रूप-सौंदर्य को प्रस्तुत नहीं किया श्रीकृष्ण (नायक) का सौंदर्य चित्रण किया है। पुरुष सौंदर्य को देखकर नारी उस ओर आकृष्ट हो जाती है फिर लजा जाती है। रूप के जादू ने उसके मन में रति भाव को जगा दिया। शरीर से पसीना छूटता है, पुलक से कंचुकी फट जाती है, हाथ काँपने लगते है और मुँह से शब्द नहीं निकलते । श्रीकृष्ण का रूप ऐसा मनोहारी है ।

2) आंतरिक सौंदर्य :

शरीर सौंदर्य बाह्य सौंदर्य होता है जो कालसापेक्ष अर्थात् क्षणजीवि है। इतके विपरित आंतरिक सौंदर्य मानसिक होता है जो हमेशा बना रहता है, नष्ट नहीं होता। इस सौंदर्य का अंकन विद्यापति ने कुशलतापूर्वक किया है।

(क) अलौकिक सौंदर्य :

विद्यापति ने सहज-स्वाभाविक शारीरिक सौंदर्य का चित्रण करने के साथ-साथ सूक्ष्म और मानसिक सौंदर्य का अंकन किया है। यह सौंदर्य साधारण होकर भी असाधारण हैं, चिर परिचित होकर भी चिर नूतन है। इसके लिए उन्होंने 'अपरुप' नाम दिया। विद्यापति अपनी नायिका के मुख की उपमा चंद्रमा के सार तत्त्व से करते हैं तथा नायिका के शरीर को नूतन शाम मेघ के पीछे चमकती दामिनि-सी बताते है।

चाँद सार लए मुख चटना करू लोचन चकित चकोर । • नव जलधर तब संचर रे जनि बिजुरी रेह ।। इसीकारण विद्यापति को 'अप्सरा लोक के खनिज मधुर कवि' भी कहते है ।

ससन परस खसु अम्बर रे देखल धनि देह ।

(ख) लज्जा :

स्त्रियों का आभूषण लज्जा है। आ. रामचन्द्र शुक्ल ने चिंतामणि में लज्जा शीर्षक से निबन्ध लिखा है। लज्जा मतवाली सुंदरता का नूपुर है।

नील बसन तन धरलि सजनि गे
सिर लेल घोंघट सारि ।

लज्जा के कारण आँचल से अपने शरीर को ढाँकना, थर-थर काँपना, मुख नीचा करना, चेहरा आरक्त होना अनुभाव है, आदि का चित्रण मनावैज्ञानिक ढंग से करने के कारण विद्यापति की पदावली में सहज सौंदर्य का आगमन हुआ है।

प्राकृतिक सौंदर्य :

प्रकृति की सुंदरता हमारी मानसिक थकान को मिटाकर सुख प्रदान करती है। भारतीय कवियों का प्रिय वर्णन 'वसंतोत्सव' का रहा है। संस्कृत परिपाटी के अनुसार विद्यापतिने पदावली में 'वसंत' का वर्णन किया है। जो

रतिभाव, श्रृंगार रस को पुष्ट करनेवाला उद्दिपन विभाव है।

आएलु रितुपति राज वसंत
छाओल अतिकुल माधवि पंथ ॥
नब वृंदावन नब नब तरुगन, नब-नब विपसित फूल।

विद्यापतिने मानवीकरण द्वारा प्रकृति के उपमानों का सुंदर प्रयोग कर प्रकृति सौंदर्य में प्राण फूँक दिए है।

अभिव्यंजना सौंदर्य :

सौंदर्य का वर्णन करनेवाले शब्द भाषा भी सुंदर होना आवश्यक है। अन्यथा प्रभाव फीका हो जाएगा। भावानुकूल भाषा का प्रयोग विद्यापति की मुख्य विशेषता है। माधुर्य, प्रसाद और ओज गुण युक्त पदावली का प्रयोग देखते ही बनता है। हिन्दी कवियों में सुमित्रानंदन पंत इस बात के लिए प्रसिद्ध है। शब्द चयन, नाद-सौंदर्य, लय और संगीत के ज्ञान से यह चमत्कार उत्पन्न होता है।

खने खन नयन कोन अनुसरई।
बाजत द्रिगि द्रिगि धौद्रिम द्रिमिया ।
नरति कलावति माति श्याम संग ।

विद्यापति का सौंदर्य चित्रण स्वतंत्रता स्पष्टता ऐंद्रिकता को लिए हुए है। जो मानस में मनमथ को जगाता है। यही पहचान लोकप्रियता कवि-रचनाकार की आज भी है। विद्यापति सौंदर्य के अकूट अम्लान चितेरे हैं।

भाषा सौंदर्य:

विद्यापति दरभंगा जिले के निवासी थे। यहाँ की भाषा मैथिली है। जो मागधी अपभ्रंश से विकसित है। उडिया, बांगला, असमिया मागधी से ही जन्मी है।

महाकवि विद्यापति बहुभाषाविद् थे। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश में लेखन पूर्ण अधिकार के साथ किया । विद्यापति संधिकालीन कवि होने से सभी भाषाओं के तत्त्व लोक में व्याप्त थे जिनका प्रभाव दिखाई देना असंभव नही था। श्री रामवृक्ष बेनापुरी लिखते है - "विद्यापति की भाषा की दुर्दशा भी खूब हुई है। बंगाली लोगों ने उसे ठेठ बांगला का रूप दे दिया है। मोरंग वालों ने उनकी भाषा पर मोरंग का रंग चढाया है। बाबू बृजनंदन सहाय ते उसे भोजपुरी की कलई से चमकाया है और आजकल के मैथिल उस पर आधुनिक मैथिली का रोगन चढ़ा रहे है । "

पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र की दृष्टि से विद्यापति हिन्दी के आदि कवि है।

लोकभाषा का प्रयोग :

विद्यापति मिथिला के निवासी थे और मैथिली उनकी घरेलू भाषा थी। अपनापन, अनौपचारिकता, प्रगाढता को सूचित करने के लिए उन्होंगे पदावली में मैथिली का ही प्रयोग किया। घरेलू भाषा को बोली कहा जाता है।

• उष्म व्यंजन श का 'दंत्य 'स' हो जाता है।

संभु भगन भए भेल ।

अंत:स्थ य और 'व' मैथिली में 'ए' ओ हो जाते है। हेर इत प्रति मोर हबल गे आन।

क्ष, ष, य, ण मैथिली में ख. ख. ज. न हो जाती है।
हरख सवे सोहाब।

संयुक्ताक्षर का प्रयोग न होकर स्वरभक्ति मैथिली का गुण है। कामिनि करए सनाने

क्रियाओं मे भूतकालिन क्रियाएँ लकारांत होती है - -

भेल, गेल, वेल, लेल, उबेगल, मिलावल आदि।

भाषा सौष्ठव :

किहु किहु उतपति अंकुर भेल ।

विद्यापति की पदावली का भाषा-सौष्ठव अत्यंत भावपूर्ण सरस तथा लालित्य लिए हुए है। एक ओर पदावली में लोकभाषा का माधुर्य है तो दूसरी ओर अवधी, भोजपुरी, बंगला के शब्द भी प्रचुर मात्रा में पाये जाते है। इनकी यहाँ कामिनि शब्द का प्रयोग अर्थवत्ता लिए हुए है। जिसमें काम का निवास है वह कामिनि कहलाती है। कटाक्ष उसके बाण है। बाण से बिंध कर रसिक कामासक्त हो जाता है।

3) व्यंग्यार्थक शब्द योजना :

भाषा में प्रचलित शब्दों के तीन अर्थ होते है। वाच्यार्थ जिसे कोशिय या कोशगत अर्थ कहते हैं । यह अभिधेयार्थ है। दूसरा लक्षार्थ होता है जो लक्षणा पर आधृत है तो तिसरा अर्थ व्यंग्यार्थक है जो व्यंजना से प्रकट होता है। विद्यापति ने नोक-झोंक में वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ का मणिकांचन योग किया है।

कर धरू कस मोहे पारे,
देव में अपुख हारे, कन्हैया

वाच्यार्थ है - मेरा हाथ पकड़ कर मुझे पार लगाओ। व्यंजना में श्रृंगार है 'कर धर' का अर्थ है मुझे गले लगाओ। मेरे लिए अपूर्व उपहार है- वासना शमन जन्य आनंद ।

4) नादपरक शब्द योजना :

शब्दों के द्वारा भावानुकूल नादमयता निर्माण करना विद्यापति की भाषा की विशेषता है।

किंकिन किन-किन कंकन कन कन -
घन-घन नुपूर बाजे ।

जैसी पंक्तियों में यह नादमाधुर्य का गुण दिखाई देता है। यही अनुरणनात्मकता नाद कहलाता है। जो संगीतात्मकता का प्राणतत्त्व है। विद्यापति की पदावली का प्राणतत्त्व संगीत है। ये पद संगीत की अनुपम निर्झरणीयों के कल-कल नाद से प्रस्फुटित होते हैं। पदावली का प्रथम पद संगीतात्मकता लिए हुए है। अन्य पद का उदाहरण प्रस्तुत है,

नव वृंदावन नव-नव तरुगन नव-नव विकसित फूल,
नवल वसंत नवल मलयानिल मातल नव अलि कूल।

इसी संगीतात्मकता के कारण गेयता का अनायास आगमन हो जाता है। जैसे,

सुंदरि चललिहु पहु घरना।
चहुदिस सखि सब कर धना ।।
जैतहु लागु परम डर ना ।
जैसे ससि काँप राहु डर ना ।

इसमें 'ना' शब्द अनुनय, आग्रह और लज्जा को व्यक्त करता है।

5) बिंबात्मकता :

कवि गीत, संगीत के माध्यम से कविता को भावचित्र के रूप में प्रस्तुत करता है। यह एक शब्द चित्र है, जिससे प्रभावित होकर पाठक के मन में भात अमिट रूप से बस जाते हैं।

काक, भाख निज भाखह रे
पहु आवत मोरा,
खीर, खाँड भोजन देव रे
भरि कनक कटोरा । ***

कुच जुग चारू चकेवा, निय कुल मिलिअ आनि कोन देवा, ते संका भुजपासे - बाँधि धएल उडि जात अकासे ।

ग) लोकोक्ति-मुहावरों का प्रयोग :

डॉ. उमेश मिश्र ने विद्यापति की पदावली में 192 लोकोक्ति मुहावरों का चयन किया है। लोकोक्तियाँ और - मुहावरे अभिव्यंजना की प्रखरता को बढाते है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत है।

1) कुछ न आवै पथिक के पास (कुआ प्यासे के पास नहीं जाता।)
2) अवसर बहला रह पचताव (अवसर चूकने पर पछताना पड़ता है )
3) ढाकि रहय न अपजस नासि (अपयश ढँका नहीं रहता)
4) पर क वेदन बाँटि न लेइ (दूसरे की पीड़ा को नहीं लिया जा सकता)

 जनभाषा का प्रयोग :

विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के मत से विद्यापति की भाषा भाव के साथ-साथ चलती है। मेरे मत से जनभाषा प्रयोग होनेपर भी उसमें सुकुमारता, आलंकारिकता और भावात्मकता है। यह भाषा आम आदमी की अनुभूति को सशक्त ढंग से प्रस्तुत करती है। मेरे मत से विद्यापति लोकभाषा के सम्राट है।

इसीसे प्रभावित होकर गोस्वामी तुलसीदासजीने लोकभाषा अवधी में 'श्रीरामचरित मानस' की रचना कर अथाह यश संपादित किया।

प्रश्न 5 : विद्यापति भक्त कवि हैं या श्रृंगारिक? सतर्क विश्लेषण कीजिये।

उत्तर :

हल करने का दृष्टिकोण:

• भूमिका

• विद्यापति के भक्त कवि होने के पक्ष में तर्क

• विद्यापति के श्रृंगारिक कवि होने के पक्ष में तर्क

विद्यापति की प्रसिद्धि का मूल आधार उनकी रचना पदावली है। पदावली में भक्ति विषयक पद भी हैं और श्रृंगार विषयक पद भी। संभवत: पदावली के आधार पर ही विद्वानों ने यह प्रश्न उठाया कि विद्यापति भक्त कवि हैं या श्रृंगारिक?

जार्ज ग्रियर्सन, बाबू श्याम सुंदर दास, तथा बाबू ब्रजनंदन सहाय जैसे कुछ विद्वानों ने विद्यापति को भक्त कवि माना है। वहीं दूसरी ओर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, बाबू राम सक्सेना, डॉक्टर राम कुमार वर्मा और बच्चन सिंह जैसे विद्वानों ने विद्यापति को श्रृंगारिक कवि कहा है।

विद्यापति का प्रतिपाद्य - भक्ति या श्रृंगार :

विद्यापति को भक्त कवि मानने के पीछे तर्क:

विद्यापति के पद श्रृंगारिक या अश्लील होते तो मंदिरों में क्यों गाए जाते? इनको सुनकर चैतन्य महाप्रभु जैसे भक्त मूर्छित क्यों होते? परवर्ती काल में कृष्णदास, गोविंददास जैसे कवियों ने विद्यापति को भक्त कवि के रूप में ही महत्त्व दिया है। यदि राधा-कृष्ण के श्रृंगार का विस्तृत वर्णन कर सूर दास भक्त कवि हो सकते हैं तो विद्यापति क्यों नहीं? विद्यापति ने शिव स्तुति, गंगा स्तुति, काली वंदना, कृष्ण प्रार्थना जैसे भक्तीपरक पदों की भी रचना की है। विद्यापति को भक्त मानते हुए जार्ज ग्रियर्सन ने लिखा है "राधा जीवात्मा का प्रतीक है और कृष्ण परमात्मा के। जीवात्मा, परमात्मा से मिलने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है।"


विद्यापति बहुआयामी कवि है। इस कारण विद्यापति के संदर्भ में एकमत न होकर वाद-विवाद होता रहा है उनके जन्मस्थान, जन्मतिथी, उनकी भाषा तथा प्रतिपाद्य को लेकर विद्वानों में एकमत नहीं है। कभी इन्हें साहित्य क श्रृंगार माना गया तो कभी लोकमानस के प्रिय कवि माना गया।

विद्यापति को भक्तों ने शैव, शाक्त, पंचदेवोपासक या वैष्णवभक्त के रूप में स्वीकृति प्रदान की। तो आलोचक ने विद्यापति को रसराज श्रृंगार का अवतार माना।

भक्ति और श्रृंगार साहित्य की मुख्य प्रवृत्तियाँ है। श्रृंगार का अर्थ है सज-धजना, चुनना, मनोकुल विषय सुख प्राप्ति का बोध होता है, जिसका स्थायी भाव रति है। दूसरी ओर भक्ति भावावेश की चरम अवस्था है। भक्त - प्रेम की सहायता से अपने आराध्य तक पहुँचता है। इसीलिए आ. रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं, “श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है। जब पूज्यभाव की वृद्धी के साथ श्रद्धाभाव के सामिप्य लाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूप के साक्षात्कार की वासना हो, तब हृदय में भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए।"

भागवत के मत से भगवान में हेतुरहित निष्काम एकनिष्ठायुक्त अनवरत प्रेम का नाम भक्ति कहा गया है विद्यापति को भक्त कवि के रूप में मान्यता दी गई है। विद्वानों के मत इस प्रकार है

ग्रियर्सन से विद्यापति को भक्त कहने की परंपरा का सूत्रपात होता है। वे लिखते हैं, “विद्यापति के पद लगभग सब के सब वैष्णव पद या भजन है।... जिस प्रकार सोलोमन के गीतों को ईसाई पादरी पढा करते है, उसी प्रकार भक्त हिन्दू विद्यापति के चमत्कार पदों को पढते हैं और जरा भी कामवासना का अनुभव नहीं करते।"

डॉ. ग्रियर्सन की बात का समर्थन करते हुए श्री. नगेन्द्रनाथ गुप्त लिखते हैं, “विद्यापति की राधा-कृष्ण पदावली का सारांश यही है कि, जीवात्मा परमात्मा को खोज रहे हैं और एकान्त स्थान में परमात्मा से मिलने के लिए चिन्तित है।"

इसी कड़ी को आगे बढाते हुए डॉ. श्यामसुन्दरदास अपना मत व्यक्त करते हैं, “हिन्दी में वैष्णव-साहित्य के प्रथम कवि प्रसिद्ध मैथिल-कोकिल विद्यापति हुए। उनकी रचनाएँ राधा और कृष्ण के पवित्र प्रेम से ओत-प्रोत है।"

डॉ. जनार्दन मिश्र भी विद्यापति को भक्त कवि सिद्ध करते हैं। उनका तर्क है विद्यापति अपने को पत्नी (राधा) समझकर ईश्वर (कृष्ण) की उपासना पति के रूप में करते थे।

डॉ. जयनाथ नलिन विद्यापति को भक्त कवि के रूप में समर्थन देते हुए लिखते हैं, “भाषा और भाव की सूक्ष्मता, प्रांजलता, गहनता और सघनता के विकासक्रम की कसौटी माने तो क्रमश: शैव, शाक्त, वैष्णव धर्म की ओर उनका अग्रसर होना निश्चित होता है.... ग्रियर्सन साहब ने विद्यापति के पदों की भक्ति, रसमयता से समानता सोलोमन के पवित्र गीतों से की है। एक ईसाई जब अपने पवित्र धर्मतत्त्वों की समानता में अन्य धर्म के तत्त्वों को रखता है तो निश्चित ही उसके निर्णय का बहुत बड़ा मूल्य लगता है।"

विद्यापति की पदावली में भक्तिविषयक पद इसप्रकार है -

1) देवी वंदना स्तुतिपरक पद

2 ) शिव-गौरी स्तुति, जानकी वंदना

3) गंगा स्तुति

4 ) शिव विष्णु स्तुति

5) कृष्ण स्तुति

6 ) राधा स्तुति

1) देवी वंदना स्तुतिपरक पद: रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा संपादित पदावली में दुर्गा वंदना स्तुति के तीन प मिलते है। पार्वती की भैरवी, दुर्गा, काली रूप में स्तुति की है। भैरवी के भयावह रूप का जयगान विद्यापति करते हैं। विनित होकर उनकी करूणादृष्टि की याचना की है। देवी दुर्गा दैत्यों को मारकर दुष्टों के मन में डर उत्पन्न करती है। अपने भक्तों की रक्षा करते हुए उन्हें आश्वस्त करती है। अपने आपको पुत्र मानकर कहते हैं, “विद्यापति कवि तुअ पद सेवक, पुत्र विसरि जनि माता ।”

2) शिव-गौरी स्तुति : पदावती में शिव-गौरी विषयक सत्रह पद है। इसमें शिव-गौरी के जीवन की घटनाओ का भक्तिभरा अंकन हुआ है।

'जय जय संकर जय त्रिपुरारि । जय अध पुरुष जयति अध नारी ॥" अर्ध-नारी नटेश्वर की स्तुति इस पद में

है। शिव-पार्वती विवाह प्रसंग में हास्य-विनोद के माध्यम से भक्ति को प्रस्तुत किया गया है। अपने दोषों क आराध्य के प्रति विशदता से वर्णन कर भक्ति को प्रकट किया है।

"हर जनि बिसरब मोर ममता, हम नर अधम परम पतिता ।।'
पीडाजन्य दुख का वर्णन हुआ है। जानकी वन्दना पद में सीता के गुणों का बखान हुआ है।

3) गंगा स्तुति : विष्णु के पद-कमलों से निकली ब्रह्मा के कमंडल में लहरानेवाली तथा भगवान शंकर की जटाओं में वास करनेवाली गंगा, नरक का नाश करने के लिए अवतरित हुई है। प्रेम-पुलकता, क्षमायाचना, कातरता प्रार्थना आदि भाव वर्णित हुए है। गंगा-स्तुति के दो पद लिखे हैं।

4) शिव - विष्णु स्तुति : विद्यापति ने शिव और विष्णु के पद लिख कर समन्वय की स्थापना की है। यह पद शिव और विष्णु के तादात्म्य तथा विभिन्न लिलागान से संबंधित है। इस एक-रुप भक्ति का एक पद है।

5) कृष्ण स्तुति : कृष्ण की वन्दना तथा कृष्ण के चार पद पदावली में मिलते हैं। भक्त का विश्वास जब अपने

आराध्य पर स्थिर हो जाता है तब अपने अपराध की क्षमा वह निडर होकर माँगता है।

ए हरि, बन्दओं तुअ पद नाए।

तुअ पद परिहरि पाय-पायोनिधि, पारक कओन उपाए ।

अपनी आत्मग्लानि को एक भक्त की तरह प्रस्तुत करते हुए विद्यापति ने कहा । जिसका भावार्थ है - बचपन खाने-खेलने में बीत गया, जवानी प्रमादों में चली गई और अब वृद्धावस्था सामने आ गई, नरक का भय सताने लगा। रह-रह कर पछतावा हो रहा है। भक्त की दीनता और कृष्ण की उदारता प्रस्तुत हुई है। कवि तुलसिदल के साथ आत्मसमर्पण करते हुए दिखाई देते है। विद्यापति बार-बार भगवान कृष्ण के पद-पल्लव का अवलंब माँगते है। वे कहते है, कर्मगति के कारण मानुस, पशु, पक्षी या कीट, पतंग बनें तो भी तुम्हारे गायन-कीर्तन में बुद्धि लगी रहे ऐसा माँगते है।

6) राधा स्तुति : राधा कृष्ण की प्रिया है। कृष्ण की आल्हादिनी शक्ति है। राधा के रूप का सौन्दर्य वर्णन कृष्ण अपने सखा से करते हैं। राधा जहाँ अपने चरण रखती है, कमल खिल जाते है। जहाँ उसके अंग झलकते है, वहीं बिजली की लहर दिखाई देती है। उसका मंद हास अमृत की वर्षा करता है। कृष्ण राधा को छोड़ मथुरा चले जाते है, तो राधा कृश हो जाती है। उसे विस्मृति घेर लेती है। उसे कृष्ण ही कृष्ण दिखाई देते हैं।

अनुखन माधव माधव सुमरइते सुन्दरि भेलि मधाई ।

ओ निज भाव सुभावहि बरसल अपनेहि गुन लुबुधाई।

राधा कृष्णमय हो जाती है। यह तादात्म्यता ही तो भक्त की सिद्धि है। प्रिय और प्रेमिका, आत्मा-परमात्मा के एकाकार होने की दशा का सुंदर वर्णन विद्यापति ने किया है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि विद्यापति में भक्त जैसी गहरी अनुभूति, तीव्रता, उत्कटता दिखाई देती है। जब उन्हें सांसारिक ऐश्वर्य से विरक्ति होती है तब भक्ति के पद गाये हैं। इस विरक्ति निर्माण के पिछे भगवान का अनुग्रह भी कार्य करता है। उगना तथा गंगा संबंधी जनश्रुतियाँ रही है। भक्त - सी भावात्मकता विद्यापति के भक्ति पदों में दृष्टिगोचर होती है। मधुराभक्ति से ओतप्रोत कीर्तनिया पद के वे रचियता है।

श्रृंगारिक कवि मानने के पीछे तर्क:

पदावली में संयोग श्रृंगार पदों की अधिकता है। विद्यापति शैव थे अत: यदि भक्ति करनी होती तो शिव-पार्वती की करते न कि राधा कृष्ण की। विद्यापति ने अपने आश्रयदाता राजा शिव सिंह की प्रशंसा एवं मनोरंजन हेतु कृष्ण का प्रतीकात्मक प्रयोग किया है जो वास्तव में शिव सिंह ही है। विद्यापति के काव्य में विद्यमान भक्ति तत्त्व की सबसे तीखी आलोचना आचार्य शुक्ल करते हैं और लिखते हैं कि "आध्यात्मिक रंग के चश्में आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं। उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने 'गीत-गोविंद' को आध्यात्मिक संकेत बताया है वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी।" श्रृंगार विषयक इन्हीं तर्को के आधार पर विद्यापति के काव्य को निराला 'नागिन की लहर' कहते हैं तो बच्चन सिंह 'खजुराहों की मंदिरों वाली आध्यात्मिकता' बताते हैं।

श्रृंगार शब्द श्रृंग और आर के संयोग से बना है। श्रृंगार का अर्थ कामोद्रेक और 'आर' का अर्थ है प्राप्ति । कामोद्रेक की प्राप्ति ।

श्रृंगार की परिभाषा -

आ. भरतमुनि के मत से श्रृंगार रस 'रति' स्थायीभाव से उद्भुत होता है। उसका वेश उज्जवल है। संसार में जो कुछ उज्वल दर्शनीय है वह श्रृंगार कहलाता है।

आ. विश्वनाथ के मत से काम के अंकुरित होने को श्रृंग कहते है। मन के अनुकूल वस्तु में सुख व प्राप्ति का नाम रति है।

श्रृंगार के तीन तत्त्व डॉ. पद्मा पाटील ने प्रस्तुत किए है - i) काम तत्त्व, ii) सौन्दर्य तत्त्व, iii) प्रेम तत्त्व । काव्यशास्त्र के अनुसार आश्रय नायक, विभाव नायिका, उद्दीपन विभाव- एकांत स्थान, चांदनी रात, - उपवन, नदी तट, रूप सौंदर्य, वेशभूषा आदि है। अनुभाव - कंप, रोमांच, स्वर- भंग, वैवर्ण्य, स्वेद है। संचारी भाव - उत्सुकता, हर्ष, लज्जा, ग्लानि, चिंता है।

श्रृंगार के दो पक्ष है - 

संयोग नायक-नायिका पास हो तो संयोग श्रृंगार होता है | 

वियोग-नायक अथवा - नायिका का साथ न होना वियोग शृंगार होता है।


विद्यापति श्रृंगारी कवि के रूप में -

विद्यापति रसराज, रससिद्ध, मैथिल कोकिल के रूप में ख्यात है। इसलिए विद्यापति को श्रृंगारी कवि के रूप में निम्न विद्वानों ने मान्यता दी है।

श्री. विनयकुमार सरकार, डॉ. सुभद्र झा, पं. शिवनंदन ठाकुर, डॉ. रामकुमार वर्मा, नगेन्द्रनाथ, डॉ. उमेश मिश्र, डॉ. बाबुराम सक्सेना, आ. रामचंद्र शुक्ल, डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित, डॉ. पद्मा पाटील आदि। कुछ विद्वानों के मत इस प्रकार है।

डॉ. विनयकुमार सरकार "बहुत से ऐसे लोग है, जिसके लिए सांसारिक तत्त्व, शारीरिक सौंदर्य, मिट्टी और - धूलि, अपूर्णता - संपूर्णता, हृदय और प्रकृति और स्त्री, मानवीय प्रेम, इंद्रिय सुख उपेक्षणीय है। सचमुच ही विद्यापति ने राधा-कृष्ण का जो चित्र खींचा है, उसमें वासना का रंग बहुत ही प्रखर है। आराध्य के प्रति भक्ति-भाव की जो पवित्रता होनी चाहिए उसका लेशमात्र भी कहीं पता नहीं।

डॉ. सुभद्र झा ने भी विद्यापति को शृंगारी कवि माना है।

पं. शिवनंदन ठाकुर ने विद्यापति को श्रृंगारी कवि कहा है। इसके तर्क इसप्रकार है

1) विद्यापति के ग्रंथ रचनाक्रम से कथन पुष्ट होता है - सबसे पहले उन्होंने कीर्तिलता, कीर्तिपताका की रचना की। कीर्तिसिंह के वर्णन में वीर तथा श्रृंगार का संयोग दिखाई देता है।

2 ) गुणग्राही राजा-रानी (शिवसिंह और लखिमा देवी) पाकर विद्यापति ने श्रृंगार रस की सरिता बहा दी। 3) पदावली शृंगार रस प्रधान है और आर्यासप्तशती आदि ग्रंथों के आधार पर रचित है।

4) विवाह हे अवसर पर गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट नवीन युवक-युवती के मनमें, मुग्धा के मुग्ध हृदय से अपरिचित के हृदय पर गीतों में श्रृंगार रस की शिक्षा द्वारा रति नामक स्थायीभाव उत्पन्न करने के लिए विद्यापति की पदावली की रचना हुई है। इसलिए ये गीत शादी-ब्याह के अवसर पर मिथिलांचल में गाये जाते है।

डॉ. बाबुराम सक्सेना का मत है - "विद्यापति के पदों के अध्ययन से पता चलता है कि वे श्रृंगारी कवि थे। इन पदों पर राधा-कृष्ण की भक्ति का आरोप करना पद पदार्थ के प्रति अन्याय है। कवि विद्यापति के रसिक होने का परिचय उनके प्रथम ग्रंथ 'कीर्तिलता' पढ़ने से ही हो जाता है। "

डॉ. रामकुमार वर्मा - "राधा का प्रेम भौतिक और वासनामय प्रेम है। आनंद ही उसका उद्देश्य है और सौंदर्य ही उसका कार्य-कलाप । विद्यापति के इस बाह्य संसार में भगवतभजन कहाँ? इस वय: संधि में ईश्वर से संधि कहाँ... सद्यस्नाता में ईश्वर से नाता कहाँ और अभिसार में भक्ति का सार कहाँ। उनकी कविता विलास की सामग्री है, उपासना की साधना नहीं। उससे हृदय मतवाला हो सकता है, शांत नहीं।"

आ. रामचंद्र शुक्ल 'आजकल आध्यात्मिक चश्मा बहुत सस्ता हो गया है।" स्वयं विद्यापति ने 'कीर्तिपताका' में लिखा है- 'राम को सीता की विरह वेदना सहनी पडी इसलिए उन्हें काम कला निपुण अनेक स्त्रियों के साथ रहने की उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हुई। इसी कारण उन्होंने कृष्णावतार लेकर गोपियों के साथ विहार किया।" राधा-कृष्ण उनकी दृष्टि में सामान्य नायक-नायिका मात्र है।

विद्यापति को श्रृंगारी कवि मानने का तर्क यह है की वे राजकवि और राजसभासद थे। दरबारों का वातावरण विलासी था। श्रृंगार के अलावा और कोई रस सुनना पसंद नहीं था। विद्यापति यदि भक्त कवि होते तो राजाश्रय का स्वीकार ही नहीं करते। वे दरबार में जाते ही नहीं। उन्होंने अलग-अलग राजाओं की आज्ञा से उनकी फमाईश पर सद्यस्नाता सुंदरी तथा कुएँ पर खडी दीपशिखा दिखानेवाली रमणियों के चित्र प्रस्तुत किये। अपने राजा-रानी को खुश करने के लिए विद्यापति ने राधा-कृष्ण के नितांत एकांत क्षणों में भी दखलंदाजी की है।

सूरदास के दृष्टिकूट, मीराँबाई के गिरिधर गोपाल, कबीर के स्वामी राम क्रमशः सखा, पति और स्वामी होने पर भी उनके निजी कक्षमें नहीं जाते। परंतु विद्यापति अपने आराध्य के ऐसे श्रृंगारी चित्र प्रस्तुत करते हैं जिससे उन्हें ग्राम दान, धन-दान, तुला दान और उपाधि दान स्वरूप प्राप्त हुए।

विद्यापति, पदावली में सुंदरी राधा के अंग-प्रत्यंगों की चर्चा करते नहीं हिचकिचाते। अनहि विद्यापति सुन बरजोबति, एहन जगत नहिं आने । राजा शिवसिंह रूपनरायन लखिमादेई पतिभाने ॥

राजा शिवसिंह और रानी लखिमादेवी विद्यापति के आराध्य राधा-कृष्ण की सभी लिलाओं के साक्षी है। इसी कारण विद्यापति लिखते हैं - "राजा शिवसिंघ रूपनरायन, इ रस सकल से पावे।" आगे वे लिखते हैं - "भनइ विद्यापति रति अवसान राजा शिवसिंघ इ रस जान ।। "

प्रिय वस्तु में प्रेम प्रेरित होकर उन्मुख होने की भावना रति कहलाती है। यही रतिभाव शृंगार का स्थायीभाव है। विद्यापति रससिद्ध, रसिक शिरोमणि कवि है। जिस भाव में उनका मन रमा, उसी भावको उन्होंने चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। इसलिए विद्यापति की कविता में न वैराग्य, न भक्ति बल्कि वैराग्याभास और भक्त्याभास है। वे मूलत: शृंगारी कवि है। उनके द्वारा प्रस्तुत चित्रण मांसल और शारीरिक है। रूप-सौन्दर्यवर्णन, वय:संधि वर्णन, सद्यस्नाता वर्णन तथा श्रृंगार के सभी हाव-भावों का अंकन विद्यापति ने सफलतापूर्वक किया है। इसलिए निष्कर्ष यह है कि पदावली के कारण वे भक्त कवि सिद्ध नहीं होते।


निष्कर्ष

उपर्युक्त विश्लेषण के आलोक में यह माना जा सकता है कि विद्यापति में श्रृंगार समन्वित भक्ति है। इनके यहाँ लौकिक प्रेम ही इश्वरोन्मुख होकर कहीं-कहीं भक्ति में परिणत हो जाता है। इनकी भक्ति भावना पर अपनी पूर्ववर्ती परंपरा का प्रभाव है साथ ही, प्रेम तत्त्व का सम्मिश्रण भी है।


प्रश्न-6 पृथ्वीराजयों में पृथ्वीराज के व्यक्तित्व पर विचार कीजिए।

उत्तर

पृथ्वीराज रासो के आधार पर पृथ्वीराज चौहान का चरित्र चित्रण : -

पृथ्वीराज रासो एक विशालतम महाकाव्य है। इस महाकाव्य का नायक 'पृथ्वीराज चौहान' है। सारा कथानक इनके इर्द-गिर्द घूमता है। उसके पिता का नाम सांभर नरेश सोमेश्वर है। कवि ने उसकी आयु केवल १६ वर्ष बताई है। जो दिल्ली तथा अजमेर का शासक है। फल का भोक्ता भी पृथ्वीराज ही है। शुक उसे पद्मावती के समक्ष इन्द्र का अवतार कहता है। उसका व्यक्तित्त्व आकर्षक और सुंदरता से परिपूर्ण है अर्थात वह कामदेव के समान सुन्दर और रूपवान है। शुक ने पृथ्वीराज को कामदेव का अवतार बताया है। शुक उसका परिचय देता हुआ कहता भी है कि उसके समान्य प्रभावी व्यक्तित्व का कोई है ही नहीं

'कामदेव अवतार हुअ सुअ सोमेसर नन्द । सास-किरन झलहल कमल, रति समीप वर बिन्द।।"

दिल्ली का एक वीर और प्रतापी राजा पृथ्वीराज के शौर्य तथा प्रेम भाव को व्यक्त करना महाकवि चंद बरदाई का उद्देश्य है पृथ्वीराज के चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार बताई जा सकती है।

1) कथा का नायक : 

पृथ्वीराज रासो का चरित नायक पृथ्वीराज चौहान है। रासो के आधार पर कहा जा सकता है कि सोलह वर्ष की अवस्था में ही पृथ्वीराज दिल्ली का शासक हो गया। पृथ्वीराज धीर प्रशांत कथानायक है। वीरता, साहस, निर्णय लेने की अक्षता दानी, शीलवान है।

2) आदर्श नायक 

कवि ने पृथ्वीराज को महाकाव्योचित नायक सिद्ध करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि चन्दबरददाई ने उसके रूप-सौन्दर्य का अधिक वर्णन नहीं किया, बल्कि वह उसके शौर्य और साहस का अधिक वर्णन करता है। उसकी भुजाएं घुटनों तक लम्बी हैं तथा वह अचूक शब्द-भेदी बाण चलाने में निपुण है। वह बड़ा दानी, शीलवान् साहसी, दृढ़ प्रतिज्ञ तथा धैर्यवान् योद्धा है। उसने गजनी के बादशाह शहाबुद्दीन गौरी को युद्ध में तीन बार हराकर कैद किया और फिर अभयदान देकर छोड़ दिया। कितना प्रभावी स्वरूप है।

"वैसह बरीस षोड्स नरिन्दं, आजनु बाहु भुअलोक यंददं ।

+ + + 

जिहि पकरि साह साहाब लीन, तिहुं बेर करिल पानीप हीन। सिंगिनि सुसद्द गुने चढ़ि जंजीर, युक्के न सबद बेघन्त तीर ।। 

+ + + 

बल बैन करन जिमि दान मानं, सत सहस सील हरिश्चन्द समान। साहस सुकम विकम जु वीर, दांनव सुमत अवतार धीर ।।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पृथ्वीराज एक सर्वगुण सम्पन्न नायक है। यदि वह कामदेव के समान सुन्दर है तो वह वीर और प्रतापी भी है। नायक के इन्हीं गुणों को सुनकर पद्मावती उस पर आसक्त हो जाती है।


3) गुणवान व्यक्तित्व का धनी : 

पृथ्वीराज चौहान का शारीरिक व्यक्तित्त्व आकर्षक एवं सुंदर है। इसीके साथ-साथ साहस तथा ओज से परिपूर्ण है। गजनी के बादशाह शहाबुद्दीन गोरी को युद्ध में कई बार हराकर कैद कर लिया उसके शरण आनेपर शरणागत वत्सलता का गुण दिखाकर उसे छोड़ दिया। पृथ्वीराज की भुजाएँ घुटनों तक लंबी होने के कारण वह आजानुबाहु था। इतना युद्ध कौशल उसके पास था की शब्द सुनकर अचूक लक्ष्य भेद बाण से करता था।

सिंगिनि सुसद्द गुने चढि जंजीर चुक्के न सबद बेधन्ता तीर ।


3) वीर योद्धा राष्ट्र नायक : 

पृथ्वीराज रासो वीर रसप्रधान रचना होने के कारण 19 खण्डों में से लगभग 15 - खण्डों में युद्ध का विशद वर्णन हुआ है। इसमें जायसी के पद्मावत की तरह काल्पनिक अथवा परंपरागत युद्ध वर्णन नहीं किया गया है। प्रत्येक युद्ध में कुछ न कुछ नवीनता दिखाई देती है। युद्ध वर्णन में आलंकारिकता तथा अतिशयोक्ति का नामोनिशान नहीं है। यह वर्णन स्वाभाविक आँखों देखासा वर्णन है। उदाहरण प्रस्तुत है।

जयचंद की फौज को देखकर समस्त पृथ्वी तथा इंद्रादि देवता काँप रहे हैं, उसकी सेना का मुकाबला पृथ्वीराज के बिना कौन करे! क्यों न हो चंद कवि को पृथ्वीराज के अलावा संसार में तथा स्वर्ग में अधिक बलवान क्यों भला नजर आए। पृथ्वीराज की सेना के भार से पृथ्वी, समुद्र पर्वतापि सब डगमगा रहे है। पृथ्वराज के क्रोध को चंद ने इस प्रकार प्रकट किया है।

तब नरिंद जंगली कोह, कट्टयो सुबंक असि ।

××××××

हंकति सिर विकंध, नचित धर कबंध 11-64

इनमें दोहा 16, 17, 18 में पृथ्वीराज तथा शहाबुद्दीन की लडाई का सजीव वर्णन है। कई तरह के व्यूहों का निर्माण - यवन सेना का वर्णन - हाथी, घोड़ों की ठेल-पेल तथा राजपूतों की सेना तथा उनके शौर्य का वर्णन किया गया है। पृथ्वीराज की वीरता ऐसी है कि उसके रणकौशल को देखकर आकाश में चमकनेवाला सूर्य भी चकित होकर रूक जाता है। धरती भी घूमना बंद कर देती है। पृथ्वीराज न केवल शत्रू पर विजयी होता है अपितु उनका मान-भंग करता हुआ अपनी विजय पताका लहराता है। भारत का नाम विश्व में कर देता है।

इस प्रकार पृथ्वीराज एक दुर्द्धर्ष योद्धा भी है। युद्ध क्षेत्र में ही उसके दुर्द्धर्ष योद्धा होने के प्रमाण मिल जाते हैं। वह शत्रुओं पर आक्रमण करके उनके मान अभिमान को कुचल डालता है। जब युद्ध क्षेत्र में घमासान युद्ध होता है और धूल उड़ने से रात सा अंधेरा छा जाता है तब वह गौरी की गर्दन में अपना धनुष डालकर उसे कैद कर लेता है। वह इतना शौर्यवान् योद्धा है कि एक साथ सुद्रशिखर के राजा विजय और कुमायूं के राजा कुमोदमणि पर विजय प्राप्त कर गौरी पर भी विजय प्राप्त कर लेता है। कवि उसके असीम साहस का वर्णन करते हुए लिखता है कि

"गिरदं उड़ी भानं अंधार रैनं। 

गई सूधि, सुझझै नहीं मझझ नैनं ।। 

सिर नाय कम्मान प थराज राजं । 

पकरिये साहि जिम कुलिंग बाजं ।।"


4) निर्णय लेने में शीघ्रता : 

पृथ्वीराज के व्यक्तित्त्व का यह भी एक आयाम है। किसी भी निर्णय लेने में वह देर नहीं लगाता, समय व्यर्थ नहीं गँवाता। बिना आगा-पिछा सोचे पद्मावती का हाथ पकडकर उसे अपने घोडे की पीठ पर चढा लेता है और दिल्ली की ओर रवाना होता है। संयोगिता के साथ भी ऐसाही करता है। जयचंद के विरोध की पर्वाह नहीं करता।

पृथ्वीराज वीरता का तो साक्षात अवतार दिखाई देता है। युद्ध क्षेत्र में ही पाठक उसकी वीरता को जान पाता है। वह पद्मावती का हरण कर उसे अपने घोड़े पर बिठाकर दिल्ली की ओर जा रहा था। थोड़ी दूर जाने पर ही शत्रुओं के घुड़सवारों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। यह देखकर पृथ्वीराज अपने घोड़े की लगाम मोड़कर पीछे चल पड़ा और उसने अपनी तलवार के वे जौहर दिखाए, उसे देखकर मानो सूर्य भी रुक सा गया। धरती कांपने लगी और शेषनाग बेचैन हो उठा। उसे शत्रुओं को पृथ्वीराज काल के समान दिखाई देने लगा। कवि लिखता भी है।

"उल्टी जु राज पथिराज बाग थकि सूर गगन धर धसत नाग।। सामन्त सूर सब काल रूप । गहि लोह बाह्रै सुभूप ।।"

इसी प्रकार से गौरी के साथ युद्ध करते समय भी प थ्वीराज का वीर रूप हमारे समक्ष उभर कर आता है। जब वह म्यान से अपनी तलवार को बाहर निकालता है तब ऐसा लगता है कि मानो काले बादलों में बिजली चमक गई हो। वह दुश्मन के हाथियों पर ऐसे टूट पड़ता है जैसे सिंह ने हाथियों पर हमला किया हो। उसकी वीरता का वर्णन करते हुए कवि लिखता है

"गही तेग चहुंवान हिन्दवांन रानं । गजं जूथ परि कोप केहरि समानं ।। करे रूंड मुंड करी कुम्भ फारे। वरं सूर सामन्त हुकि गर्ज भारे।।"


5) श्रृंगारी नायक पृथ्वीराज : 

कवि ने पृथ्वीराज को काम का अवतार माना है। पृथ्वीराज का व्यक्तित्त्व आकर्षक और सुंदर था। इंछिनी, पद्मीनी, संयोगिता पृथ्वीराज के रूपसौंदर्य पर आसक्त नायिकाएँ थी। संयोगिता का रूप-चित्रण कर कविने यह घोतित किया है कि उसके लिए योग्य पुरुष पृथ्वीराज ही है। कवि लिखता है, संयोगिता के घुंघराले केश मानों कामदेव के अंकुर है, उसके अधर कोमल, सुगंधित तथा अरुण किसलय की तरह है। ललाट पर मंजरी तिलक सुशोभित है। पृथ्वीराज संयोगिता के साथ विलास में इतना डूबे है कि उन्हें अपने राज्य की कोई सुध-बुध नहीं। राजपुरोहित, चंद कवि, सांबर नरेश इससे चिंतित हो गए।

रसघुटिय लुटिय मयन टुट्टी नतम जरिजाह।

भरभग्गत कच्छह सुमि अलि भरि मंजरियाह । 

चंद अपने स्वामी को सचेत करने के लिए अंतपुर में संदेश भेजता है।

गोरिय रत्तो तुव धरनि तुं गोरि अनुरत्त 

अर्थात् शहाबुद्दिन गोरी तुम्हारे राज्य पर अनुरक्त है और तुम गौरी (संयोगिता) के प्रेम में आसक्त हो। इतना सुनते ही पृथ्वीराज ने संयोगिता का खयाल छोडकर युद्ध की तैयारी शुरू कर दी।

इस तरह पृथ्वीराज चौहान केवल शृंगार में डूबे हुए नायक नहीं है तो राष्ट्र की रक्षा करनेवाले वीर योद्धा भी है। कुल मिलाकर कवि चंद ने 'पृथ्वीराज रासो' में पृथ्वीराज चौहान को वीर, गुणी, ज्ञानी, दानी, वचन के पक्के, शीलवान, सुपुरुष के रूप में चित्रित किया है। पंक्तियाँ प्रस्तुत है,

बल बैन करन जिम दान पान, सत सहस सील हरिचंद समान।

साहस सुक्रंम विक्रम जु, वीर, दानव सुमत्त, अवतार धीर ।

दिस च्यार जानि सब कला भूप, कंद्रप्प जानि अवतार रूप ॥


उदात्त सागर

इस खण्ड काव्य के अन्तिम भाग में प थ्वीराज का धीरोदात्त नायक रूप हमारे सामने उभर कर आता है। दिल्ली पहुंच कर वह विधिवत पद्मावती के साथ विवाह करता है और फिर याचकों को दान देकर उन्हें सम्मानित करता है। यही नहीं वह अपने शत्रु शहाबुद्दीन को केवल 8000 घोड़ों का दण्ड देकर मुक्त कर देता है। यह उसकी उदारता का ही परिचायक है। भले ही इतिहासकारों ने पथ्वीराज की निन्दा की है लेकिन प थ्वीराज ने प्राचीन भारतीय परम्परा का पालन करते हुए शहाबुद्दीन गौरी को प्राणदान देकर छोड़ दिया। इस सम्बन्ध में कवि लिखता भी है

"बोलि विप्र सीधे लगन्न, सुभ घरी परट्ठिय

हरि बांसह मंहर बनाय, करि थांवरि गंठिय ।।

ब्रह्म वेद उच्चरहिं होम चौरी जु प्रति वर पद्मावती दुलहिन अनूप, दुल्लह पथिराज नर।।"

इस प्रकार प थ्वीराज एक महान नायक है। जिसमें अपूर्व साहस, सौन्दर्य, दया, उदारता और देर दृष्टि है।

6) हार कर भी जीतनेवाला नायक : 

पृथ्वीराज रासो में नायक पृथ्वीराज गोरी की जेल में बंदी है। नेत्रविहीन करने जैसी क्रूर यंत्रणाएँ भोगी। अंत में शहाबुद्दीन गोरी का 'शब्द वेध' बाण से वध कर सुझ-बुझ का परिचय दिया। राष्ट्र को म्लेच्छ मुक्त किया ।


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