मुंडन संस्कार का वैज्ञानिक महत्व -

मुंडन संस्कार का वैज्ञानिक महत्व -

हिंदू धर्म के 16 मुख्य संस्कारों में से एक संस्कार मुंडन भी है । शिशु जब जन्म लेता है, तब उसके सिर पर गर्भ के समय से ही कुछ केश पाए जाते हैं, जो अशुद्ध माने जाते हैं ।
इसके पीछे कारण यह है कि, जब बच्चा मां के गर्भ में होता है तब उसके सिर के बालों में बहुत से कीटाणु, बैक्टिरिया और जीवाणु लगे होते हैं, जो साधारण तरह से धोने से नहीं निकल सकते ।
वैदिक बिहारी जी नीतीश 
इसके लिए एक बार बच्चे का मुंडन जरूरी होता है ।

बाल कटवाने से शरीर की अनावश्यक गर्मी निकल जाती है, दिमाग व सिर ठंडा रहता है ।
बच्चों में दांत निकलते समय होने वाला सिर दर्द व तालु का कांपना बंद हो जाता है ।
शरीर पर और विशेषकर सिर पर विटामिन-डी (धूप के रूप) में पड़ने से, कोशिकाएं जाग्रत होकर खून का प्रसारण अच्छी तरह कर पाती हैं जिनसे भविष्य में आने वाले केश बेहतर होते हैं ।

जब बच्चोँ के दाँत निकलने लगते हैँ तो उन्हेँ कई प्रकार के रोग होने की संभावना रहती है ।
अक्सर इस समय बच्चोँ में निर्बलता, चिड़चिड़ापन, आदि उत्पन्न होने लगता है और उसे दस्त तथा बाल झड़ने की शिकायत होने लगती है ।
मुंडन कराने से बच्चोँ के शरीर का तापमान सामान्य हो जाता है और अनेक शारीरिक तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं जैसे फोड़े, फुंसी, दस्त आदि से बच्चोँ की रक्षा होती है ।

#यजुर्वेद के अनुसार यह संस्कार बल, आयु, आरोग्य तथा तेज की वृद्धि के लिए
किए जाने वाला अति महत्वपूर्ण संस्कार है ।
महर्षि चरक ने लिखा है -
पौष्टिकं वृष्यमायुष्यं शुचि रूपविराजनम् ।
केशश्यक्तुवखदीनां कल्पनं संप्रसाधनम् ॥''
मुंडन संस्कार, नाखून काटने और बाल संवारने तथा बालों को साफ रखने से पुष्टि, वृष्यता, आयु, पवित्रता और सुंदरता की वृद्धि होती है ।

#जन्म के पश्चात् प्रथम वर्ष के अंत या फिर तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष की समाप्ति के पूर्व शिशु का मुंडन संस्कार करना आमतौर पर प्रचलित है ।
हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार एक वर्ष से कम उम्र में मुंडन करने से शिशु के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है, साथ ही अमंगल होने का भय बना रहता है ।
कुल परंपरा के अनुसार प्रथम, तृतीय, पंचम या सप्तम वर्ष में भी मुंडन संस्कार करने का विधान है ।
वैदिक बिहारी जी नीतीश
शास्त्रीय एवं पौराणिक मान्यताएं यह हैं कि शिशु के मस्तिष्क को पुष्ट करने, बुद्धि में वृद्धि करने तथा गर्भावस्था की अशुचियों को दूर कर मानवतावादी आदर्शों को प्रतिस्थापित करने हेतु मुंडन संस्कार किया जाता है ।
इसका उद्देश्य बुद्धि, विद्या, बल, आयु और तेज की वृद्धि करना है ।
सामान्यत: मुंडन संस्कार किसी देवस्थल या तीर्थ स्थल पर इसलिए कराया जाता है ताकि उस स्थल के दिव्य वातावरण का लाभ शिशु को मिले तथा उसके मन में सुविचारों की उत्पत्ति हो ।

इसके अलावा जब घर मेँ किसी की मृत्यु हो जाती है, तब भी मुंडन संस्कार करने की परंपरा है ।
इसके पीछे कारण यह है कि जब पार्थिव शरीर को जलाया जाता है, तो उसमें से कुछ हानिकारक जीवाणु हमारे शरीर पर चिपक जाते हैं ।
सिर में चिपके इन
जीवाणुओं को पूरी तरह निकालने के लिए
ही मुंडन कराया जाता है ।
कुछ संप्रदायोँ मेँ मुंडन का कार्य दाह संस्कार के पहले ही कर दिया जाता है ।
दाह संस्कार के बाद नदी में स्नान करने और धूप में बैठने का भी यही कारण है । 

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