रामायण काल में शासन व्यवस्था |

रामायण काल में शासन व्यवस्था |

रामायण भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रतिनिधि ग्रन्थ है। यह सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में ग्रथित करने , समग्र सृष्टि के प्रति सौहार्द की प्रेरणा देने तथा जनमानस में समाहित पारलौकिक एवं उदात्त लोक - व्यवहार को समुचित बनाने में सहायक है। यह उदात्त काव्यशिल्प में ग्रथित आदि महाकाव्य है। किन्तु रामायण में वर्णित राजतंत्र एवं शासन व्यवस्था का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रासङ्गिकता के स्वतंत्र अध्ययन का प्रायः अभाव रहा है प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में इस अभाव की दिशा में विनम्र प्रयास है। शोध प्रबन्ध का विषय रामायण में वर्णित राजतन्त्र एवं शासन - व्यवस्था का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रासङ्गिकता।

रामायण में राजतंत्र

रामायण नरका के दौरान निरंकुश राजशाही की एक प्रणाली के बारे में इंगित करता है जब यह कहता है कि डस्टमा नरको यानी नरका बहुत दुष्ट है और किसी भी आचार संहिता से बाध्य नहीं है। नरका के समय के राजाओं की ऐसी तुच्छ प्रकृति महाभारत के एक श्लोक द्वारा भी सुझाई गई है , जहाँ पर नरका का वर्णन पंथीविजय के रूप में किया गया है। वह पृथ्वी की सतह पर उन सभी के एक सम्राट के रूप में चले गए , जो सर्वेक्षण के दौरान उनके वंशानुगत हो सकते हैं। समय। कालिका पुराण , जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है , भागदत्त को नरका का पुत्र और उत्तराधिकारी कहते हैं। प्राचीन कामरूप के अधिकांश शिला लेखों में नरका के पुत्र भगदत्त और भगतदत्त के पुत्र वज्रदत्त का उल्लेख है।

प्राचीन भारत में , ग्रीस की तरह सरकार की प्रणाली , अर्थात लोकतंत्र , राजशाही और अभिजात वर्ग के संबंध में कई प्रयोग किए गए थे। लोकतंत्र लंबे समय तक फला - फूला , लेकिन बाद में राजशाही सरकार से सबसे ज्यादा स्वीकृत हो गया। राजा सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति और सरकार का मुख्य कार्यकारी बन जाता है। राजसत्ता की प्रणाली आर्यन संयुक्त परिवार प्रणाली का एक योगदान है। प्राचीन भारत में राजा वंशानुगत होने के साथ - साथ प्रभावी भी होते थे।

वैदिक काल के बाद के समय में शक्तिशाली राज्य का उदय हुआ। प्रशासन में राजा की सहायता करने वाले अधिकारियों की संख्या में स्वाभाविक वृद्धि हुई। राजा ने सरकार चलाने में मंत्रियों की परिषद की सलाह ली। राजा न्यायिक प्रशासन के प्रमुख थे। रामायण और महाभारत हमारे देश के बहुत पुराने महाकाव्य हैं। रामायण और महाभारत काल में सरकार का रूप राजतंत्र था। सरकार का मुखिया राजा होता था। राजा का मुख्य उद्देश्य अपने कर्तव्यों को पूरा करना था , लोगों की समृद्धि और खुशी बढ़ाने के लिए नैतिकता को प्रोत्साहित करना और उनके हित की रक्षा करना। राजा ने प्रजा का कल्याण देखा। राजा की दिव्यता की अवधारणा तब अपनी परिणति तक पहुंचती है जब महाभारत पूरी तरह से भगवान विष्णु के साथ शासक को प्रेरित करती है। पुराणों द्वारा राजा के लिए दिव्यता का दावा किया गया है। महाभारत काल के दौरान राज्य को ष्सप्तंगीष् कहा जाता था और सरकार का मुख्य रूप 3 राजतंत्र था। राजा ने उच्च विचारों का उदाहरण दिया और वह लोगों के कल्याण के लिए जिम्मेदार था।

मौर्य काल में कौटिल्य चंद्रगुप्त मौर्य के प्रसिद्ध प्रधानमंत्री थे। मौर्य काल के दौरान सबसे प्रसिद्ध पुस्तक कौथिल्य द्वारा लिखित अर्थशास्त्र थी , यह माना जाता है कि राजशाही या राजशाही सरकार का सबसे अच्छा रूप है। उनका कहना है कि अराजकता से पीड़ित लोगों ने सबसे पहले मनु को अपने राजा के लिए चुना और उन्हें 1 / 6 अनाज और 1/10 माल का व्यापार किया। राजा ने अपने विषयों की सुरक्षा और संरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।

रामायण और महाभारत काल में सरकार का रूप राजतंत्र था। सरकार का मुखिया राजा होता था। राजा का मुख्य उद्देश्य अपने कर्तव्यों को पूरा करना था , लोगों की समृद्धि और खुशी बढ़ाने के लिए नैतिकता को प्रोत्साहित करना और उनके हित की रक्षा करना। राजा ने लोगों के कल्याण की देखभाल की। 6 राजा की दिव्यता की अवधारणा अपनी परिणति तक पहुंचती है जब महाभारत पूरी तरह से भगवान विष्णु के साथ शासक को प्रेरित करती है। पुराणों द्वारा राजा के लिए दिव्यता का दावा किया गया है। महाभारत काल के दौरान राज्य को ष्सप्तंगीष् कहा जाता था और सरकार का प्रमुख रूप राजतंत्र था। राजा ने उच्च विचारों का उदाहरण दिया और वह लोगों के कल्याण के लिए जिम्मेदार था।

मौर्य काल में कौटिल्य चंद्रगुप्त मौर्य के प्रसिद्ध प्रधानमंत्री थे। मौर्य काल के दौरान सबसे प्रसिद्ध पुस्तक कौथिल्य द्वारा लिखित अर्थशास्त्रा थी , यह माना जाता है कि राजशाही या राजशाही सरकार का सबसे अच्छा रूप है। उनका कहना है कि अराजकता से पीड़ित लोगों ने सबसे पहले मनु को अपने राजा के लिए चुना और उन्हें 1/6 अनाज और 1/10 माल का व्यापार किया।

राजा शब्द की व्युत्पत्ति - राजकीय क्षेत्र या राज्य का शासन करने वाले व्यक्ति विशेष के लिए राजा शब्द का प्रयोग होता है। राजन शब्द का शब्दार्थ शासक है। राजा शब्द श्राजते इति राजाश् अर्थात् जो राज्य पर विराजमान होता है वह राजा है। इस अर्थ में राज् दीप्तौ धातु से श्कनिन युवृषितक्षिराजिधन्विषुप्रतिदेव सूत्र के माध्यम से कनिन प्रत्यय के संयोग से सिद्ध होता है। निरुक्त व वैदिक कोष में राजा शब्द की व्युत्पत्ति क्रमशः दीप्ति और प्रकाशक अर्थ में की गई है। वेदों में राजा का अर्थ - प्रजारजकता अर्थात् जो प्रजा को प्रसन्न करें वही राजा है। स्मृति ग्रन्थों में राजा के लिए क्षत्रिय शब्द का प्रयोग किया गया है।

राज्योत्पत्ति के प्रमुख सिद्धान्त 

राजा अथवा राज्य की उत्पत्ति को लेकर जो विचार मंथन प्राचीनकाल में किया गया , उसका अध्ययन करने से चार सिद्धान्त हमारे समक्ष उत्पस्थित होते हैं।

1. सामाजिक समझौते का सिद्धान्त 

इस सिद्धान्त के अनुसार प्रारम्भिक अवस्था में मानव - समाज सत्ययुग में था। किसी प्रकार का भी पाप नहीं था। सब लोक आनन्दपूर्वक रहते थे। इस कृतयुग में सर्वप्रथम राज्य राजा दण्ड एवं दाण्डिक आदि कुछ भी नहीं थे।

सब लोग धर्म से ही परस्पर रक्षा करते थे। परन्तु वे शनैः शनै मोहाभिभूत हुए तथा सन्मार्ग से बिछुड़ने लगे। इस प्रकार उन्हें कष्ट हुआ। वे परस्पर लड़ने लगे तथा समाज में अशांति फैलाने लगे। मनुष्यों का नैतक पतन हो जाने और धर्म का लोप हो जाने पर य आवश्यकता प्रतीत हुई कि राज्य द्वारा मनुष्यों में मर्यादा और नियंत्रण की स्थापना की जाए। इसी भावना से उन्होंने मनु वैवस्वत को अपना राज्य बनाया तथा उसे धान्य षड् भाग व पण्य दशभाग देने लगे। उसका कर्तव्य जनता की रक्षा करना था और जनता का कर्तव्य उसके अधिपत्य में रहना था।

महाभारत , अर्थशास्त्र आदि ग्रन्थों इस सिद्धान्त का स्पष्टतया उल्लेख प्राप्त होता है।

2. दैवी उत्पत्ति का सिद्धान्त 

वैदिक युग में राजा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक सिद्धान्त यह भी प्रचलित था। इसके अनुसार राजा परमात्मा का अंश माना जाता था। इस सिद्धान्त का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में प्राप्त होता है , जहाँ राजा का प्रजापति कहा गया है , क्योंकि उसके अधीन कितने ही व्यक्ति रहते है। ऐतरेय ब्राह्मण में राज्याभिशेक सम्बन्धी मंत्रों में अग्नि , गायत्री , स्वास्ति , बृहस्पति आदि देवताओं से राजा के शरीर में प्रवेश करने की प्रार्थना की गई है। यजुर्वेद में राजा को दिव सूनः अर्थात् द्युलोक का पुत्र कहा गया है।

मनुस्मृति के अनुसार “ संसार की रक्षा के लिए ईश्वर ने राजा का निर्माण इन्द्र , अग्नि , यम , सूर्य , वायु , वरूण , चन्द्र और कुबेर से अंश लेकर किया। इसीलिए वह उसकी आँखों और मनों को सूर्य के समान अपने तेज से व्याप्त करता है तथा पृथ्वी पर कोई भी व्यक्ति उसकी ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता। राजा अपने प्रभाव के कारण ही स्वयं अग्नि , वायु , सूर्य , सोम ( चन्द्रमा ) कुबेर , वरुण और महेन्द्र होता है। यदि कोई बालक भी राजा हो , तो यह समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिए। कि वह तो अभी बालक ही है। राजा देखने में यद्यपि एक साधारण मनुष्य प्रतीत होता है , पर वास्तव में उसे एक महान् देवता समझना चाहिए।

राजनयिक का स्वरूप एवं सिद्धान्त 

राजनयिक अभिकर्ता वे व्यक्ति होते हैं , जो विदेशों में भेजे जाने वाले राज्य के प्रतिनिधियों के रूप में निवास करते हैं। वे उन दोनों देशों के मध्य , जिसके द्वारा यह भेजे जाते हैं तथा जहाँ भेजे जाते है , महत्वपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करते हैं। इस प्रकार के कूटनीतिक (Diplomatic) कृत्य करते हैं एवं बनाएँ रखते हैं तथा राजनीतिक या विधिक सव्यवहार पूरा करते हैं वर्तमान समय में राजनीतिक प्रतिनिधियों की संस्था एक पद्धति हो गयी है , जिसके द्वारा राज्यों के बीच समागम प्रतिपादित किया जाता है। यह राजनयिक अभिकर्ताओं को भेजने तथा स्वीकार करने की प्रजा अनुसरण प्राचीन काल से ही किया जा रहा है। प्राचीन भारत में भी दूतों को एक राज्य से दूसरे राज्यों में भेजने की प्रथा थी। मनुस्मृति में जो भी वर्णन मिलता है , उससे पूर्ण रूपेण आश्वस्त होकर नहीं कहा जा सकता है , कि हकीकत में मनु का क्या मन्तव्य रहा होगा। इस सन्दर्भ में मानव धर्मशास्त्र में जो भी मूल्यांकित सामग्री उपलब्ध है , वह सूक्ष्म है , इस विषय - वस्तु के आधार पर सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि मनु वास्तविक रूप से सावयव स्वरूप से परिचित थे और इस सिद्धान्त का आश्रय उन्होंने मानव धर्मशास्त्र में राज्य के स्वरूप के वर्णन प्रसंग में समेट लिया था।

राजा और शासन विधान -

राजा के तीन प्रमुख कार्य हैं - राजनयिक ( प्रबन्ध अथवा कार्यकारिणी ) सम्बन्धी , न्याय सम्बन्धी एवम् विधान निर्माण सम्बन्धी कार्य। मनु का कथन है कि राजा में सभी देवताओं की दीप्ति विद्यमान रहती है , राजा शास्त्रेचित् जिन नियमों केा प्रणयन करता है , उनका उल्लंघन नहीं करना चाहिए। मेघातिथि ने राजनियमों के अन्तर्गत लिखा है कि राजधानी में उत्सव आदि मनाना चाहिए। मंत्री के घर वैवाहिक कार्यक्रम में सबको जाना चाहिए। कसाई , पशु को न मारे , पक्षियों को न पकड़े , महाजन ऋणी को न सताये , बुरी संगति न करे , ऐसे व्यक्ति को घर न आने दे , राजा को शास्त्रीय नियमों , वर्णाश्रम धर्म तथा अग्निहोत्र का विरोध नहीं करना चाहिए।

गौतम के अनुसार राजा को राजनियम धर्मग्रन्थों तथा वेद , धर्मधास्त्र , वेदांगों एवं उपनिषदों और पुराणों को लक्ष्य बनाकर बनाने चाहिए। मनु का मत है कि राजा दुर्भिक्ष के समय निर्यात पर रोक लगा दे। यदि कोई व्यापारी इसका उल्लंघन करे , तो उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ले। दुर्भिक्ष तथा विपत्ति के समय राजा प्रजा का रक्षण करे। प्रजा की चोरों , आक्रमणों तथा डाकुओं से रक्षा करे । मनु का कथन है कि राजा ही युग है। राजा के कार्यानुसार चार युग होते हैं। यदि राजा आलस्य तथा अज्ञान के कारण कोई कार्य नहीं करता है , तो उस समय कलियुग होता है , उस समय राजा सुप्त अवस्था में होता है। जागृत अवस्था में होने पर तथा कार्य न करने पर उसके राज्य में द्वापर युग होता है , जब राजा राजकार्य सन्धि - विग्रह आदि और शासन - प्रबन्ध करना है , उस समय त्रेता युग होता है। जब राजा शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट धर्मानुसार राज्य करता है , उस समय सतयुग होता है।

राजा को शासन

मन्त्रिमण्डल शासन रूपी गाड़ी की धुरी है , क्योंकि जिस प्रकार से शासन रूपी शरीर बिना मन और मस्तिष्क के चलायमान नहीं हो सकती है , उसी प्रकार अच्छे से अच्छा शासनाध्यक्ष राज्य गाड़ी को अकेले नहीं खींच सकता है , क्योंकि शासन और प्रशासन के आदेश एवं नियम की पुस्तकावलि मन्त्रिमण्डल ही तैयार करता है। मन्त्रिमण्डल में विशेष लोग विचार - विमर्श के लिए बैठते हैं और मण्डल की अधिकांश बातें गोपनीय रखकर , बल्कि उसे सीधे कार्य के रूप में परिणति कर दिए जाते हैं , इसमें शासनाधिपति के बहुत ही घनिष्ठ और विश्वसनीय पात्र इस समिति में सदस्य बनाये जाते हैं , चाहे आज का वर्तमान संसदीय शासन हो या अध्याय शासन हो , या फिर पहले का राजतंत्रीय शासन रहा हो , मन्त्रिमण्डल , प्रशासनिक इकाई का महत्वपूर्ण अंग रहा है। स्मृतियों में राज्य के सप्तांग वर्णन में द्वितीय स्थान पर अमात्य या सचिव का स्थान देकर उसकी आवश्यकता तथा महत्व का प्रतिपादन किया गया है। इतिहासों और पुराणों में भी सचिव की महत्ता का प्रतिपादन मिलता है। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने अपने सुन्दरकाण्ड में इसका सहज वर्णन किया है जैसे -

चिव , वैद्य , गुरु , तीन , जौ प्रिय बोलहि भय आस।

राज्य , धर्म , तन , तीन करि , होहि बेगहि नास।।

( रामचरित मानस , सुन्दरकाण्ड दोहा )

उपर्युक्त दोहे से हमें यह ज्ञात होता है कि सचिव , गुरु , वैद्य ये तीन किसी डर वश या शासन के भय से कोई नीति का निर्णय यदि गलत देते हैं , तो विनाश हो सकता है। इसलिए शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए सचिव ( मंत्री ) को किसी भी नीति का निर्णय निर्भय होकर लेना चाहिए। किसी के भी दबाव में आकर निर्णय या परामर्श गलत नहीं देना चाहिए। राजा को शासन में मंत्री ( सचिव ) को हर प्रकार से प्रशिक्षित कर तब नियुक्त करना चाहिए , जो राजा को ऐसा नहीं करता , वह राजा अपना शासन सुचारु रूप से नहीं चला सकता। अकेला व्यक्ति कोई कठिन कार्य को सम्पन्न नहीं कर सकता है , इसलिए जब किसी कार्यक्षेत्र का दायरा लम्बा होता ळें।

मनु ने अमात्य की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि जो कार्य सरल है , वह भी एक व्यक्ति के लिए कठिन ( दुष्कर ) हो जाता है , तो विस्तृत राज्य जो कठिन कार्य है , उसे अकेला राजा सुव्यवस्थित रूप से नहीं चला सकता। इसलिए राज्य के सुव्यवस्थित संचालन के लिए अन्य व्यक्तियों अर्थात् मंत्रियों की नियुक्ति करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त एक ही व्यक्ति सब कुछ जान लेने में समर्थ नहीं हो सकता। भिन्न - भिन्न पुरुषों में भिन्न - भिन्न प्रकार की बुद्धि , वैभव देखा गया है। इसलिए राज्य सम्बन्धी विषयों में एक ही व्यक्ति से राजा सदैव वास्तविकता पर पहुँच सकें , ऐसा सम्भव नहीं है , इसलिए राजा को राज्य के शासन सम्बन्धी समस्याओं पर मंत्रणा लेने के लिए विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों तथा कई व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी। ऋग्वेद में सभा का वर्णन है। यह एक प्रकार से मंत्रिपरिषद ही थी , अन्य प्राचीन ग्रन्थों में समिति , संगति , विदथ , परिषद् आदि का वर्णन किया गया है।

मंत्रियों के अधिकार एवं कर्तव्य - राजतंत्र

मन्त्रियों के कत्र्तव्य और अधिकार की जो कार्य शैलियाँ पुराणों , उपनिषदों और स्मृति साहित्यों में थी , वह परम्परा आज भी हमें देखने को मिलती है , जो उस समय राजतंत्र में राजा को सहायता और सलाह के लिए मंत्रि - परिषद थी और उसमें प्रत्येक विभाग के मंत्री अपनी विभागीय कार्य , नीतियों की और अपने विभाग सम्बन्धी समस्त गोपनीय हो या खुली रिपोर्ट राजा को देते थे , राजा अपने राज्य के प्रत्येक विभाग में मंत्री की नियुक्ति कर समस्त अपने अधिकार क्षेत्र की गतिविधियों का संचालन सुचारु ढंग से करता था। वही परम्परा आज भी भारतीय संविधान में वर्णित किया गया है , इसमें लिखा गया है कि आज के मुख्य कार्यपालक ( राष्ट्रपति ) को सहायता और सलाह के लिए मंत्रि - परिषद होगी , आज की शासनाध्यक्ष अपने अधिकार क्षेत्र की जानकारी अपने मंत्रियों के द्वारा ही रखता है , सभी राजनीतिक ग्रन्थों में राजा को मंत्रियों के राय लेने के लिए अनुमति दी गयी है। मनु ने राजा को मंत्रियों से सामूहिक और अलग - अलग दोनों विधि से मन्त्रणा देने को कहा है। अलग - अलग भाव न होने के कारण राजा को उनके अभिप्राय को जानकार मति से जो श्रेष्ठ ज्ञात हो , उसे कायान्वित करना चाहिए । याज्ञवल्क्य का कथन है कि राजा मंत्रियों के सलाह से अपनी बुद्धि से कत्र्तव्य का चिन्तन करे। मनु ने कहा है कि राजा स्वयं अन्तिम निर्णय करे , किन्तु अन्यत्र कहा है कि राजा सम्पूर्ण कार्य ब्राह्मण मंत्री को सौंप दे , उससे स्पष्ट होता है कि राजा मंत्रियों से मंत्रणा करके अपना निर्णय ले , फिर वह ब्राह्मण मंत्री से सलाह ले। राजा , प्रजा का हित चिन्तन होता था , तो वह मंत्रियों की सलाह का उल्लंघन नहीं करता था। राजा के लिए कल्याणकारी कार्य करना ही मंत्रिपरिषद का मुख्य ध्येय था। अमात्य अपने विभागांे का अच्छी तरह संचालन करते थे।

शासन एवं कर व्यवस्था -

प्रजा सुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।

नात्म प्रियं हितं राज्ञ प्रजानां तु प्रिये हितम्।।

अर्थात् प्रजा के सुख में राजा का सुख है , प्रजा के हित में ही उसका हित है। जो कुछ राजा को प्रिय हो , वह उसे हित न समझे , बल्कि जो प्रजा को प्रिय हो , वह उसे ही अपना हित समझे। 

प्राचीन भारतीय चिन्तों में अग्रणी चिन्तक आचार्य चाणक्य या कौटिल्य ( विष्णुगुप्त ) द्वारा रचित श्लोक कल्याणकारी राज्यों में शासन के प्रमुख ध्येय को स्पष्ट करता है। किसी भी देश में शासन व्यवस्था चाहें , राजशाही हो या तानाशाही पर आधारित हो , या लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार राजा का कत्र्तव्य जनकल्याण ही होता है। आधुनिक लोकतांत्रिक रूप से एवं जनकल्याणकारी राज्यों के प्रवर्तन से बहुत पहले ही मानव कल्याण तथा विकास के महत्व की पुष्टि करते हुए अनेक शासकों ने जन सुरक्षा - संरक्षा तथा कल्याण से निर्मित सार्थक कानूनों एवं नीतियों को व्यावहारिक स्तर पर कार्यान्वित कराने का गौरव प्राप्त किया है। विश्व स्तर पर प्रसिद्ध रही , भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की सहस्त्र वर्षों लम्बी इस यात्रा - धारा में लोक - प्रशासन अनेक प्रकार से क्रान्तिकारी परिवर्तनों का साक्षी रहा है। 

वेद , पुराणों , उपनिषदों तथा संहिता तथा स्मृतियों में उपलब्ध वर्णन के अनुसार वैदिक काल में भारतीय प्रशासन का स्वरूप राजतंत्रात्मक था , जिसमें लोककल्याण को महत्व देने वाला राजा ही शासन करता था , क्योंकि राजा का चयन ‘ समिति ’ नामक नागरिक संस्था द्वारा किया जाता था। ऋग्वैदिक काल में प्रायः बड़े - बड़े कबीले होते थे। एक राजा के अधीन एक या अधिक कबीले होते थे , राजा का पद नैतिकता से पूर्ण था , तथा राजगद्दी सम्भालते समय शपथ लेता था कि , “ यदि मैं जनता के हितों के विरूद्ध कार्य करूँ , तो मेरा और मेरे वंश का नाश हो जाये। “ बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार प्राचीन भारत में काशी ( बनारस ) , कौशल ( अवध ) , अंग ( पूर्वी बिहार ) , मगध ( दक्षिणी बिहार ) , मल्ल ( गोरखपुर ) अवन्ति ( मालवा ) , शूरसेन ( मथुरा ) , पांचाल ( बरेली ) , कम्बोज ( पेशावर - कश्मीर ) , वत्स ( इलाहाबाद ) , भेदि ( बुन्देलखण्ड ) , कुरु ( दिल्ली - मेरठ ) मत्स्य ( अलवर - जयपुर ) , विराट नगर , नागरा ( टोंक ) , जांगल प्रदेश ( जैसलमेर ) अर्जुनायन। अलवर - भरतपुर तथा माध्ययिका ( चित्तौड़गढ़ ) इत्यादि प्रमुख गणराज्य थे। गणराज्य की समिति राजा को पद से हटा भी सकती थी।

1.8 राजतंत्र

वैदिक साहित्य के आलोचनात्मक अध्ययन से स्पष्ट प्रतीत होता है कि वैदिक युग के राजनैतिक जीवन में राजतंत्र का महत्वपूर्ण स्थान था। उस समय राजतंत्र ही व्यवस्थित शासन का सर्वाधिक प्रचलित रूप था। तत्कालीन भारत में विभिन्न राज्य वर्तमान थे , जिनका प्रमुख अधिकारी राजा ही होता था।

1.9 राजा का व्यक्तित्व एवं महत्व 

प्राचीन भारत में राज्य के जो सात अंग माने गये थे , उनमें राजा का प्रथम एवं प्रमुख स्थान था। उस समय राजा का पद सर्वाधिक सम्मानित एवं महत्वपूर्ण था। तत्कालीन राजा के समक्ष इन्द्र , वरूण आदि देवातओं का आदर्श प्रतिष्ठित था। राजर्षि त्रसदस्यु की वैदिक प्रार्थना से ज्ञात होता है , कि ऋग्वेदकाल में राजा अपने व्यक्तित्व में इन्द्र और वरुण आदि देवताओं के अन्तर्हित मानते थे। उनका व्यक्तित्व इतना व्यापक होता था कि उनकी परिधि में भू : , भूवः और स्वःश् का अन्तर्भाव होता था। वे सम्पूर्ण जगत् के प्रेरक थे तथा उनकी धारणा थी , कि हम द्यावा पृथिवी को धारण करते हैं । उस समय राजा को देवता तुल्य माना जाता था। तथा उन्हें अत्यधिक कर्मण्य व देव - बल से युक्त माना जाता था।

1.10 राजा की नियुक्ति एवं राज्याभिषेक 

प्राचीन साहित्य के अध्ययन में ऐसे संकेत मिलते हैं , कि उस समय राजा की नियुक्ति दो प्रकार से होती थी - ( १ ) वंश परम्परानुसार अथवा ( २ ) निर्वाचन द्वारा। साधारणतया राजा वंशक्रमागत रहा करते थे। किन्तु वैदिक साहित्य में उनके निर्वाचन का उल्लेख भी आता है। इस सम्बन्ध में मैकडालन , स्मिथ , गेल्डनबर , बेबर प्रभृति पाश्चात्य विद्वानों ने स्पष्टतया कहा है , कि वैदिक युग का राजा साधारणतया वंशाक्रमागत था , किन्तु यह निरंकुश नहीं था। उस समय प्रभ , समिति आदि के माध्यम से प्रजा राजा पर नियंत्रण रखती थी।

वैदिक युग में वंशक्रमागत राजाओं के अतिरिक्त प्रजा के प्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचित राजा भी राज्य करते थे - ऐसा प्राचीन साहित्य से स्पष्ट विदित होता है। ऋग्वेद के दसवें मण्डल में प्राप्त राजा के निर्वाचन सम्बन्धी मंत्रों से ज्ञात होता है , कि उस समय राजा का पद पूर्णतः लौकिक था। अनुस , दुह्य , शिवि , कुरु एवं पुरु आदि ऐसे जनराज्य थे , जिनमें प्रजा स्वयं राजा को चुन लेती थी। राजा का निर्वाचन एवं समिति द्वारा होता था। अथर्ववेद में भी राजा के निर्वाचन का स्पष्ट संकेत प्राप्त होता है। वहाँ कहा गया है - त्वं विशो वृणतां राज्यायष् 1 ( 3/4/2 ) अर्थात् हे राजन ! प्रजाओं द्वारा तुम राज्य के लिए चुन लिए जाओ। ” “ विशंस्त्वां सर्वां वाञ्छन्तुष् २ अर्थात् हे राजन ! तुम्हारे लिए यह आवश्यक है कि समस्त प्रजाएँ तुम्हें चाहती हो। राजा के पदच्युत किये जाने के पश्चात् पुनः निर्वाचित होने का उल्लेख भी वैदिक साहित्य में प्राप्त होता है। उक्त प्रकरण में राजा को सम्बोधित करके कहा गया है - ष्तुम्हें जनता राजपद के लिए चुने , ये दिशायें तुम्हें चुने। तुम राष्ट्र के कंधे पर बैठों व उस स्थान से भौतिक समृद्धि का विकास करो।

1.11 राजा के कर्त्तव्य एवं प्रजा से सम्बन्ध 

ऋग्वैदिक युग में राजत्व की प्रतिष्ठा भली भाँति हो चुकी थी। उस युग में वरुण और इन्द्र सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित थे। इन दोनों के चरित्र में तत्कालीन राजा के कर्म अथवा राजा के कर्तव्यों का परिचय प्राप्त होता है। “ सम्राट वरुण के आदर्श पर प्रजा के कल्याण के लिए प्रयत्न करना , पापियों एवं अपराधियों को क्षमा करना , लोगों को विपत्तियों से बचाना , नेतृत्व करना , शासन विधान कीप्रतिष्ठा करना , मानवोंका अभ्युदय करना , अपने शासन में सबको सौभाग्यशाली बनाना , प्रजा के जीवन से तादात्म्य स्थापित करना , पापियों को दण्ड देना , प्रजा के शत्रुओं को दूर भगाना , चोरों से प्रजा की रक्षा करना , ऋत की प्रतिष्ठा करना आदि राजकर्म की परिधि में आते थे। इन्द्र के आदर्श पर प्रजा की रक्षा करने के लिए शत्रुओं से युद्ध करना , पापियों को मार डालना , दस्युओं पर विजय प्राप्त कर आर्यों की भूमि का स्वामी बनाना आदि कर्त्तव्य राजा के मानेगये थे। डॉ . शिवदत्त ज्ञानी के मतानुसार “ वरुण देवता की कल्पना के सम वैदिक ऋषियों के मन में तत्कालीन आदर्श राजा की घरेलू नीति का चित्र था। तथा इन्द्र की कल्पना के समय उसकी वैदेशिक नीति का चित्र।

1.12 रामायणानुसार शासन व्यवस्था

इस प्रकार रामायणानुसार सर्वगुण सम्पन्न , सच्चरित्र तथा सूक्ष्मवृद्धि वाला व्यक्ति ही मंत्री पद का अधिकारी था तत्कालीन मंत्री न्यायो एवं राजनीतिक , बुद्धिमान् एवं विद्वान् , शास्त्रविशारद अनुभवों , कर्मठ एवं दूरदर्शी , जनकल्याणकर्ता , राष्ट्र प्रेमी , राजा का हितेषी , योग्य सलाहकार एवं सुयोग्य योद्धा आदि सभी कुछ था।

रामायणानुसार शासन व्यवस्था में मंत्रीयों के पदों का विभाजन रहा होगा एवं शासन सम्बन्धी विभिन्न विभाग इस प्रकार होंगे 

1. धर्म विभाग

कौशल राज्य में इस विभाग के प्रधानमंत्री वशिष्ठ थे ।ये धार्मिक कार्यों का सम्पन्न कराने में प्रधान थे। राज्य के धर्म सम्बन्धी सभी कार्य उनके द्वारा सम्पन्न होते थे। संस्कार , यज्ञ , हवन आदि करना उनके अधिकार में था। इसी प्रकार किंष्किन्धा में भी यह विभाग होगा। सुग्रीव के अभिषेक पर धार्मिक कार्यों को ब्राह्मणों ने सम्पन्न कराया था ।लङ्का में भी धार्मिक कार्यकलाप यज्ञ आदि सम्पन्न होते थे। राजा रावण एवं मेघनाद भी यज्ञ आदि क्रियाकलापों से सम्बन्ध रखते थे। अतः लङ्का में भी धर्म विभाग रहा होगा। यद्यपि राक्षस राजा धर्मानुसार आचरण नहीं करते थे। 

2. रक्षा विभाग

इसका प्रधान सेनापतिश् था। अयोध्या में धृष्टि , जयन्त या विजय में से कोई इसका अधिकारी होगा। लङ्का में सेनापति प्रहस्त इस विभाग का अध्यक्ष एवं संचालक रहा होगा। इसी प्रकार किष्किन्धा में भी मुख्यवलाध्यक्ष इसका प्रधान होगा। 

3. वित्त विभाग

यह विभाग कोषाध्यक्ष्य के अधीन होगा। कौसल में राजा दशरथ के श्अर्थ साधक या सिद्धार्थ मंत्रीयों में से कोई इसका प्रधान होगा 

4. न्याय विभाग

इस विभाग का अधिकारी न्याय मंत्री होगा। कौसल राज्य में मंत्रपाल या धर्मपाल मंत्रीयों में से कोई इसका अधिकारी ( प्रभारी ) होगा।

5. गृह एवं विदेश विभाग

रामायण के अध्ययन से स्पष्ट है कि ये विभाग राजा के अधिकार में होते थे। ये विभाग गुप्तचरों के द्वारा संचालित होते थे। राजा राम ने अपने प्रजा का समाचार गुप्तचरों से ज्ञात किया था। राम ने भरत से प्रजा एवं कर्मचारियों के विषय में जानकारी लेते रहने के लिए गुप्तचरों की नियुक्ति विषयक प्रश्न किया था।

अपने राज्य के अतिरिक्त अन्य राज्यों के विषय में भी राजा गण गुप्तचरों के माध्यम से जानकारी प्राप्त करते थे। राजा दशरथ के मंत्री गुप्तचरों के माध्यम से ही अपने देश और अन्य देशों के विषय में ज्ञान प्राप्त करते थे।२ राजा बालि को गुप्तचरों के माध्यम से ही सुग्रीव और राम की मित्रता के विषय में परिज्ञान हुआ था। राजा रावण ने भी शत्रु के बलाबल को जानने के लिए शार्दूल , शुक तथा सारण को गुप्तचर बनाकर राम की सेना में भेजा था। राजा रावण ‘ चरोश् की नियुक्ति में असावधान कहा गया है। 

विदेशी राजाओं की गतिविधियों एवं युद्ध के समय उनके साथ संधि आदि करने के दूत भी इस विभाग द्वारा नियुक्त किये जाते थे। राजा रावण तथा राम अमात्य के समकक्ष गुप्तचर नियुक्त करते थे। सुग्रीव के सचिव हनुमान् ने लङ्का में दूत का कार्य किया था। अंगद ने भी राजदूत का कार्य किया था। इसी प्रकार राम के बलाबल को जानने के लिए एवं राम को पुनः वापिस लौट जाने का संदेश देकर शुक को रावण ने राम के पास दूत बनाकर भेजा था।३ स्पष्ट है कि गृह एवं विदेश विभाग का अध्यक्ष राजा होता था एवं इस विभाग का संचालन गुप्तचरों एवं दूतों के माध्यम से होता था। 

उपर्युक्त विभागों के अतिरिक्त लोक कल्याण आदि अन्य विभाग की तत्कालीन शासन में रहें होंगे। जैसा कि अयोध्या , लङ्का तथा किष्किन्धा की सभ्यता एवं सांस्कृतिक उन्नति से प्रतीत होता है।

1.13 समाज में मंत्रीपरिषद् का स्वरूप 

रामायणानुसार मंत्रीपरिषद् में अमात्य या सचिव तथा ब्राह्मण मंत्रीयों सहित राजपुरोहित सम्मिलित थे। इस प्रकार मंत्रीपरिषद् के दो विभाग थे - अमात्य या सचिव और राजपुरोहित एवं द्विजातीय मंत्रीगण।

अयोध्या में मंत्रीपरिषद् आठ अमात्य , दो ऋत्विज तथा छ : अन्य मंत्रीयों से मिलकर बनी थी। 

राजा देश के शासन का संचालन मंत्रीपरिषद् की सहायता से करता था। राजा के सभी महत्त्वपूर्ण मामलों में मंत्रीपरिषद् से सलाह ली जाती थी। राजा द्वारा मंत्रीपरिषद् तथा सभा के समक्ष प्रस्ताव रखा जाता था।२ मंत्री एवं सभासद् उस पर विचार करते थे।३ निर्णयान्तर कार्यवाही हेतु मंत्रीपरिषद् के राज्य स्तरीय मंत्रीयों या अमात्यगणों को कहा जाता था। वे कार्य सम्पन्न कराते थे। इस प्रकार कार्यों को सम्पादन मंत्रीपरिषद् के सदस्यों द्वारा होता था।

सभा के अतिरिक्त भी राजागण मंत्रीपरिषद् के सदस्यों को पृथक् बुलाकर उनसे मंत्रणा लेते थे। सभा को बैठक समाप्त हो जाने पर राजा दशरथ नेमंत्रपरिषद से राम के यौवराज्याभिषेक के विषय में पुनः परामर्श किया था।५ राम ने भी अश्वमेघ यज्ञ करने के लिए तद्विषयक परामर्श वसिष्ठ , वामदेव आदि मंत्रीपरिषद् के सदस्यों से किया था।

इस प्रकार राज्य के सभी महत्त्व के मामले मंत्रीयों की उपस्थिति में निर्णीत होते थे। राज्य की नीति सम्पूर्ण मंत्रीमण्डल से निश्चित होती थी। 

राजा को सलाह देना , १ राजा की अनुपस्थिति में शासन की सम्यक् व्यवस्था को संभालना , २ अभिषेक का आयोजन करना , राजा को राज्य सौंपना , ३ राजाओं को समय समय पर सचेत करना आदि मंत्रीपरिषद् के महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य थे। इस प्रकार राज्य की नीति का निर्धारण करना , कार्यों के विषय में विचार विमर्श करना एवं राजकार्यों का सम्पादन करना मंत्रीमण्डल के सदस्यों का कर्तव्य था। 

1.13.1 रामायण में मंत्रीमण्डल की बैठक

रामायण में मंत्रीपरिषद् की अनेक बैठकों का उल्लेख हैं , जो निम्नांकित

सर्वप्रथम बालकाण्ड में राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति के लिए अश्वमेघ यज्ञ करने के हेतु मंत्रीपरिषद् के सदस्यों - अमात्यों के साथ पुरोहित वशिष्ठ एवं अन्य वामदेव , जाबालि का मंत्रणा करने का उल्लेख हैं।५ 

अयोध्या में मंत्रीपरिषद् की दूसरी बैठक राम के विवाह के विषय में आमंत्रित की गई थी। राजा दशरथ ने मिथिला से प्राप्त राजा जनक के दूतों द्वारा संदेश लाने पर राम के विवाह के विषय में मंत्रीपरिषद् के सदस्यों से मंत्रणा ली थी एवं समर्थन प्राप्त किया था। 

अयोध्या में अन्य मंत्रीपरिषद् की बैठक राम के योवराज्याभिषक के लिए हुई थी। राजा दशरथ बनानेके विषय में सर्वप्रथम मंत्रीपरिषद् के सदस्यों - अमात्यगणों से तविषयक मंत्रणा ली थी। ” तदनन्तर सम्पूर्ण सभा बुलाई गई थी। उसमें राम को युवराज बनाने का पूर्ण समर्थन प्राप्त करके तदनन्तर अभिषेक आदि कार्यों को सम्पन्न कराने के लिए एवं राज्याभिषेक के समय को निश्चित करने के लिए पुनः राजा दरशरथ ने मंत्रीपरिषद् से मंत्रणा ली थी।

रामायणानुसार मंत्रीपरिषद् की एक बैठक समुद्र के किनारे राम , सुग्रीव एवं अन्य वानर मंत्रीयों की उपस्थिति में विभीषण के आगमन पर हुई थी। इसमें राम ने विभीषण के आगमन पर उसे शरण देने क लिए मंत्रीयों से अपनी अपनी सम्मति देने को कहा था।

लंका में मंत्रीपरिषद् की बैठक उस समय हुई , जबकि रावण ने राम और अपनी सेना द्वारासमुद्र पार कर लेने एवं सुवेल पर्वत पर पहाड़ डालने के विषय में सुना। इसमें रावण ने राक्षस मंत्रीयों के साथ करणीय बातों पर विचार विमर्श किया था । 

लंका में एक अन्य मंत्रीपरिषद् की बैठक राम की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई थी । राम ने भी इस मंत्रीपरिषद् में युद्ध सम्बन्धी करणीय बातों पर विचार विमर्श करके अंगद को लंका में दूत बता कर भेजने का निश्चय किया था।

1.14 मंत्रीपरिषद् की बैठक की विशेषताएँ - 

1. मंत्रीपरिषद् में राजा , मंत्रीगण तथा अमात्य या सविवगण ही उपस्थित होते थे। मंत्रीपरिषद् की बैठक राजा की अध्यक्षता में सम्पन्न होती थी। 

2. मंत्रीपरिषद् शासकीय संस्था थी। इसमें प्रजा के प्रति निधियों औरजानपद तथावैगम आदि को सम्मिलित होने का अधिकार नहीं था। 

3. मंत्रीपरिषद की बैठक में राजाओं के कार्यकलापों से सम्बन्धित , शासन के अन्य कार्यों से सम्बन्धित तथा युद्ध से सम्बन्धित विषयों पर विचार होता था। 

4. मंत्रीपरिषद् की मंत्रणा गुप्त रखी जाती थी। यह राजा तथा मंत्रीयों तक ही सीमित रहती थी। 

5. इस प्रकार मंत्रीपरिषद् राजा तथा राज्य के कार्यों से सम्बन्धित शासकीय संस्था में रामायण में वर्णित हैं।

1.15 रामायण कालीन शासन तंत्र के तीन प्रमुख अंग 

सभा , मंत्रीपरिषद् तथा शासनाधिकार थे। इन तीनों की सहायता से राजा शासन विधिवत् संचालन करता था। राम और महाराज दशरथ के काल में भी राज्य सभा या द्वारा सभा श्परिषद्श् समिति या कवेल ‘ सभाश् कहालती थी। सभा के सदस्य प्रकृति सभाषद कहलाते थे। सभा में सदस्य सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही होते थे। सरकारी सदस्यों की श्रेणी में अमात्य जन मंत्रीजन सेनापति तथा गैर सरकारी सदस्यों में राजागण सामन्त और नगर ग्राम में प्रतिनिधि होते थे। राजधानी में प्रतिनिधि पौर और शेष राष्ट्र के प्रतिनिधि जनपद कहलाते थे। सभा का यह श्पौरश् जनपद अंग ही सबसे अधिक शक्तिशाली था , क्योंकि देश में बहुमत का यही प्रतिनिधित्व करता था पौर जनपदों में राजधानी के नैगम और गणवल्लभ तथा देहात के बहुत के ग्रामघोषमहत्तर ( किसानों ) और ग्वालों में विशेष प्रतिनिधि सम्मिलित होते थे। ये वैश्य वन और व्यापारी वर्गी के प्रतिनिधि थे। इस प्रकार सभा में वर्णों , हितों और प्रदेशों को विशेष प्रतिनिधित्व प्राप्त था। ये समस्त प्रतिनिधि सम्भवतः सरकार द्वारा नियुक्ति अथवा जनपद द्वारा निर्वाचित होते थे। इसके बारे में स्पष्ट तो नहीं कहा जा सकता है कि फिर भी नैगमाः ग्राम घोष महत्तरा , श्रेणी मुख्य गणवल्लभा , जनमुख्या आदि नामों से किसी न किसी प्रकार का चुनाव अवश्य ध्वनित होता है। 

जब सभा का अधिवेशन प्रारम्भ होता था तब उसमें भाग लेने के लिए बाहर से विशिष्ट बुलाने का प्रथा भी स्पष्ट झलकती है। जब पुरोहित वशिष्ठ ने दशरथ का उत्तराधिकारी चुनने के लिए अयोध्या की सभा का विशेष आपत्तिकालीन अधिवेश बुलाया तब उसमें भारत के दधाजित को भी आमंत्रित किया था। 

( क ) सभा की गतिविधियाँ - हम रामायणकालीन भी सभा गतिवधियों का विधिवत् अध्ययन करें तो वही दूसरी ओर रावण जैसे महान् शासक की सभा के शान्तिकालीन अधिवेश का वर्णन है। तो वहीं दूसरी ओर रावण जैसे एक छत्र और निरंकुश नृपति की परिषद् में युद्धकालीन अधिवेश का भीबहुत सुन्दर एवं मनोरंजक विवरण प्राप्त होता है। यदि इन अधिवेशनों की तुलना आधुनिक विधान सभा की कार्यवाही से की जाये , तो दोनों में बहुत हद तक समानता दृष्टिगोचर होती है। सभा संदों की उपस्थिति होने की सूचना देतों या संदेशवाहकों द्वारा दी जाती थी। राजा की अनुपस्थिति अधिवेश बुलाने का अधिकार होता था ऐसा प्रावधान तत्कालीन समय में था।

( ख ) मंत्रीपरिषद् - तत्कालीन राजतंत्र में राजा की परामर्श देन तथा विधियों की क्रियान्वित करने के लिए मंत्रीपरिषद् होती थी। प्रत्येक प्रकार के अधिशशनिक तथा प्रशासनिक प्रस्तावों पर पहले विचार किया जाता था। विशेष तौर से अश्वमेघ करने के समय सभा के समक्ष किसी प्रस्ताव को रखने से पूर्व युद्ध घोषणा करने से पूर्व तथा वन्य कठिन समस्याओं के निराकरण हेतु राजा मंत्रीपरिषद् से परामर्श करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मंत्रीपरिषद् राज - काज में परामर्श देने , सहायता करने तथा क्रियान्वित करने वाली एक वृहद् संस्था थी। जिसमें ऐसे राजकर्मचारी भी सम्मिलित थे। जिन्हें मंत्रणा के समय उपस्थित होने का अधिकार प्राप्त नहीं था। 

( ग ) तीर्थ ( शासनाधिकारी )

शासनाधिकारी के अस्तित्व की झलक चित्रकूट पर राय द्वारा भरत से पूछे गये प्रश्नों में हुआ। किन्तु इन पदाधिकारियों के नाम का उल्लेख नहीं किया। टीकाकारों के मतानुसार ये तीर्थ संख्या में अठारह होते थे। 

(1) सभा -

सभा को शासनव्यवस्था की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था माना गया है। सभा के सदस्यों को प्रकृति सभासद् कहते हैं। सभा में राजा , मुनिजन , सेनापति , पुरोहित , पौरजनपद , प्रजाजन के प्रतिनिधि आदि प्रतिनिधि होते थे। सभा को रामायण में परिषद् या संसद कहा जाता है। सभा में समाज के लोग सामाजिक विषयों पर परिचर्चा करते थे तथा जहाँ व्यापारियों का न्याय होता है उस राज्य के न्यायालय को भी सभा कहा जाता है। सभा एक ऐसी संस्था है जिसमें राज्य सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण मामलों पर भी सदस्यों द्वारा सम्मिलित रूप से विचार किया गया है। उसके बाद राजा सभा का समर्थन प्राप्त करता है। निर्णय लेने पर ही कार्यवाही शुरु होती है सभा में पौरजनपद सबसे शक्तिशालीन अंग था। क्योंकि यह सम्पूर्ण राज्य के बहुमत का प्रतिनिधि करता था। पौर में पुर राजधानी के प्रतिनिधि थे। तथा जनपद में शेष राष्ट्र की जनता के प्रतिनिधि थे। सभा में इन्हीं के द्वारा कर्णों , हितों व प्रदेशों को विशेष प्रतिनिधित्व प्राप्त था। सभा भवन राजप्रसाद का अंग थे। राजमहल के निकट होते थे।

राजा का स्थान सभा भवन के एक और बीच में होता था।२ राजा के पास ही युवराज के बैठने का स्थान निश्चित होता था। राजा को मात्र प्रस्ताव रखने का अधिकार था। अन्तिम निर्णय सभासदों का राजा होता था। सभासदों की स्वतंत्रता को मान्यता दी गयी है तथा उनसे अपेक्षा की गयी है कि वे निर्णय होकर अपना मत प्रकट करें। रावण की सभा में स्वतंत्रता का भव था।

(2) मंत्री परिषद् -

प्रशासन का भार राजा अकेले नहीं उठा सकता। अतः मंत्रियों की नियुक्ति की व्यवस्था की गयी थी। जो राजतंत्र में राजा की परामर्श देने तथा विधियों को क्रियान्वित करने के लिए होती थी। कौटिल्य के अनुसार राजपद सहायकों की मदद से ही संभव है , अतः राजा को चाहिए कि वह मंत्रियों की नियुक्ति करे और उनकी समस्याए सुने। रामायण में मंत्रिपरिषद् की सर्व सम्मति को माना जाता था। रावण ने एक एक स्थान पर वशित किया था कि जिसमें शास्त्रोक्त दृष्टि से सब मन्त्री एकमत होकर प्रवृत्त होते है उसे उत्तम मंत्र कहते हैं।


उपसंहार


रामायण भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रतिनिधि ग्रन्थ है। यह सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में ग्रथित करने , समग्र सृष्टि के प्रति सौहार्द की प्रेरणा देने तथा जनमानस में समाहित पारलौकिक एवं उदात्त लोक - व्यवहार को समुचित बनाने में सहायक है। यह उदात्त काव्यशिल्प में ग्रथित आदि महाकाव्य है। 

कूजन्तं राम - रामेति मधुरं मधुराक्षरम्।

आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकि - कोकिलम्।।

कविता - रूपी शाखा पर विराजमान होकर श्राम - रामश् ऐसा मधुर अक्षरों का कूज करते हुए वाल्मीकि - रूपी कोकिल को नमस्कार करती हूँ।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।

यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः (न   काममोहितम्।।

हे निषाद ! तुम अनन्तकाल के लिए प्रतिष्ठा न प्राप्त करो क्योंकि तुमने काममोहित क्रौञ्च युगल में से एक का वध किया है। रामायण में सर्वप्रथम लौकिक या पौरुषेय छन्द का अभिराम अवतरण हुआ - आम्नायादन्यत्र नूतनश्च्छन्दसामवतारः२ अतः रामायण भारतीय साहित्य की प्रथम सृष्टि है , जिसके लिए प्रयुक्त आदि काव्य शब्द सर्वथा उपयुक्त है। यही आदि काव्य समग्र उत्तरकालीन भारतीय साहित्य का उपजीव्य है , जिसका तंतु - संतान अद्यावधि अविच्छिन्न है। 



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