रामायण कालीन सभ्यता, संस्कृति एवं रामायण का साहित्यिक महत्त्व

रामायण कालीन सभ्यता, संस्कृति एवं रामायण का साहित्यिक महत्त्व

प्रस्तावना

संस्कृत साहित्य में महर्षि वाल्मीकिकृत "रामायण" "आदिकाव्य" माना जाता है। महर्षि वाल्मीकि आदिकवि के नाम से प्रसिद्ध हैं। जब व्याघ के बाण के द्वारा विधे हुए क्रौञ्च के लिए क्राञ्ची का करुण विलाप ऋषि के कान में प्रवेश किया तो महर्षि के मुख से अकस्मात् श्लोक निकल पड़ा।

मा निषाद प्रतिष्ठास्त्वमगमः शाश्वती समाः ।
यत् क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ।। 

अर्थात है। निषाद तुझे नित्य निरन्तर कभी भी शान्ति न मिले क्योंकि तुमने इस क्रौंच के जोड़े में से एक क्रौंच जो काम मोहित था, उसको बिना किसी अपराध के अकारण ही मार डाला इसलिए तुम सदा के लिए अप्रतिष्ठा को प्राप्त करो।

महर्षि वाल्मीकि की इस कल्याणमयी वाणी को सुनकर स्वयं ब्रह्माजी प्रकट हुए और उन्होंने वाल्मीकि से रामचरित लिखने के लिए कहा तब महर्षि वाल्मीकि ने (रामायण) की रचना अनुष्टुप छन्द में की अतः वाल्मीकि को अनुष्टुप् छन्द का प्रवर्तक माना जाता है। रामायण में सात काण्ड और चौबीस हजार श्लोक है इसलिए इसे "चतुर्विंशति साहस्त्री संहिता के नाम से जाना जाता है।

इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक हजार श्लोक का पहला अक्षर गायत्री मन्त्र के ही अक्षर से आरम्भ होता है। रामायण का एक-एक अक्षर महापातक का नाश करने वाला है एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् रामायण को काव्य का बीज कहा गया है।

पठ रामायण व्यास काव्यबीजं सनातनम्।
यत्र रामचरितं स्यात् तदहं तत्र शक्तिमान्। 
(बृहद्धर्मपुराण - 1/30/47)

रामायण के माहात्म्य के विषय में तो भगवान् व्यास ने भी अनेक पुराणों में कहा है,

जैसे -

रामायणं पठितं प्रसन्नोऽस्मि कृतस्त्वया करिष्यामि पुराणानि महाभारतमेव च।। (बृहद्धर्मपुराण - 1/30/55)

रामायण के श्रवण मात्र से ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति होती है कहा गया है

धर्मार्थकाममोक्षाणं साधनं च द्विजोत्तमाः । श्रोतव्य च सदा भक्त्या रामायणपरामृतम् (श्रीवाल्मीकिरामायणमाहात्म्य- 1। (श्रीवाल्मीकिर 1/24)

फ्रांस के आदरणीय आलोचक फ्लाउबेर ने माना है कि वाल्मीकि की रामायण महनीय काल" के लिए जिस आदर्श को काव्य गोष्ठी में प्रस्तुत किया है वह वाल्मीकि के इस काव्य में सुचारु रूप में अपनी अभिव्यक्ति पा रहा है।

सभ्यता किसे कहते हैं? इस विषय में शब्दसागर कोश में बताया गया है कि जो सभ्य होने का भाव है वही सभ्यता है व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की वह अवस्था जिसमें लोगों का आचार व्यवहार बहुत सुधरकर अच्छा हो चुका हो सुशिक्षित एवं सज्जन होने की अवस्था को ही सभ्यता कहते हैं। किसी भी युग (समय) के सामाजिक जीवन या व्यवहार को ही संस्कृति कहते हैं। रहन-सहन आदि भी संस्कृति के अन्तरगत आते हैं। इस प्रकार से रामायणकालीन सभ्यता एवं संस्कृति में राम का चरित्र, रामराज्य की व्यवस्था, रामराज्य की नारी, रामराज्य की मन्त्री प्रथा, रामराज्य के न्याय इत्यादि विषयों का समावेश होता है।

रामायण एक अत्यन्त लोकप्रिय महाकाव्य है। भारतीय राष्ट्र की विचारधारा तथा साहित्य को सहस्त्रों वर्षों तक, अन्य किसी भी ग्रन्थ की अपेक्षा, इसने अधिक प्रभावित किया है। यह काव्य और आचारशास्त्र का संयुक्त रूप है क्योंकि मानव जीवन का आदर्श इसमें प्रस्तुत किया गया है। रामायण के पात्रों तथा मनोरम शिक्षाप्रद कथाओं से प्रत्येक भारतीय का परिचय है। साधारण वार्तालाप में इसके पात्रों का दृष्टान्त दिया जाता है जैसे- राम का आदर्शभूत मानव रूप, लक्ष्मण तथा भरत की भ्रातृभक्ति, सीता का पातिव्रत्य, विभीषण की न्यायप्रियता, रावण की हठधर्मिता, कुम्भकर्ण की निद्रा इत्यादि । काव्यशास्त्रियों ने काव्योपदेश के रूप में निरन्तर यही कहा है 'रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत । ' रामायण काव्य होने के कारण कान्तासम्मित उपदेश से युक्त है।

रामायण में पितृभक्ति, पुत्रप्रेम, स्वामिभक्ति, प्रजावत्सलता, भ्रातृस्नेह, इत्यादि मानवीय गुणों का एवं सत्य, धर्म, सदाचार, कर्तव्यनिष्ठा आदि सामान्य गुणों का विस्तार से प्रतिपादन किया गया है । अन्याय पर न्याय की अन्ततः विजय का निरूपण करना रामायण का प्रमुख तथा आशावादी पक्ष है। आदर्श मानव के रूप में सभी गुणों से विभूषित नायक राम का चित्रण करके वाल्मीकि ने काव्य में नायक की व्यवस्था का प्रवर्तन किया है (रामायण १/१/२-४ तथा ८-१९) राम के शारीरिक, मानसिक, नैतिक और चारित्रिक गुणों का वाल्मीकि ने सूत्ररूप में चित्रण करके पुनः उनका विस्तृत प्रदर्शन किया है। इन गुणों के कारण ही भारत में तथा विदेशों में भी रामकथा का व्यापक प्रचार हुआ। इस दृष्टि से वाल्मीकीय रामायण भारत के समस्त साहित्य में श्रेष्ठ उपजीव्य ग्रन्थ है।

वाल्मीकि ने रामायण में मानव हृदय के सभी पक्षों का वर्णन किया है। पात्रों को उन्होंने जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में प्रस्तुत किया है जिससे आज भी भारतीय संस्कार से युक्त व्यक्ति को जीवन के सभी स्तरों में दिशा-निर्देश रामायण से प्राप्त होता है। राजा के कर्तव्यों का वाल्मीकि ने व्यापक वर्णन किया है। राजा न रहने पर प्रजा में सर्वत्र असुरक्षा तथा भय व्याप्त हो जाता है-
नाराजके जनपदे धनवन्तः सुरक्षिताः । 
शेरते विवृतद्वारा: कृषिगोरक्षजीविनः ॥ (२/६७/१८)

अर्थात् राजा से रहित देश में धनी लोग सुरक्षित नहीं रहते, कृषि और गोपालन से जीविका चलाने वाले गृहस्थ भी द्वार खोल कर नहीं सो सकते। इसलिए प्रजा में शान्ति और व्यवस्था राजा का परम कर्तव्य है। रामायण की सूक्तियाँ सार्वकालिक महत्त्व रखती हैं, जैसे- 
उत्साहवन्तः पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु; भयं भीताद् हि जायते; ऋद्धियुक्ता हि पुरुषा न सहन्ते परस्तवम् इत्यादि

धार्मिक दृष्टि से रामायण को महाभारत की अपेक्षा अधिक प्रशस्त माना गया है। गायत्री मन्त्र के २४ अक्षरों का संघटन इसके चौबीस सहस्र श्लोकों में किया गया है। स्कन्दपुराण के उत्तरखण्ड में पाँच अध्यायों में रामायण का धार्मिक महत्त्व निरूपित किया गया है। कहा गया है-

रामायणमादिकाव्यं सर्ववेदार्थसम्मतम् ।
सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखनिबर्हणम् । 
समस्तपुण्यफलदं सर्वयज्ञफलप्रदम् । 
(रामायणमाहात्म्य ५/६३)

रामायण-ग्रन्थ का सम्मान किया जाता है, इसके लिए धार्मिक विधान हैं। रामायण की पुस्तक ऊँचे स्थान पर रखी जाती है, इसे भूमि पर रखना अशुभ मानते हैं। रामायण में उत्कृष्ट समाज और संस्कृति के चित्र भी प्राप्त होते हैं।

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रामायणकालीन आर्य एवं अनार्य सभ्यता

रामायणकालीन सभ्यता में आर्य और अनार्य ये दो विभाग थे। इन दोनों (आर्य-अनार्य) की सामाजिक व्यवस्था में अन्तर था। जहाँ आर्यों का समाज वर्णाश्रम की सोच में ढला हुआ था वहीं अनार्यों का समाज जाति रहित था। आर्यों का प्रभुत्व गंगा, सिन्धु के प्रायः सम्पूर्ण मैदान में फैला हुआ था जबकि उसके दक्षिण में वन ही वन थे जिनमें अनार्य जाति निवास करती थी। आर्यों ने अपनी सभ्यता तथा संस्कृति के बल पर लगभग-लगभग सम्पूर्ण देश पर अपना अधिकार कर लिया था। कुछ अनार्यों ने इनका डटकर विरोध किया तो कुछ अनार्यों ने इनका सहयोग किया जिन्होंने इनका विरोध किया था उन्होंने आगे चलकर पूर्णरूपेण परास्त होकर आर्यों की प्र परन्तु भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिणी छोर पर तथा लंका द्वीप में 3/11 वास करती थी। जिसकी रीति-नीति आर्यों के आचार-विचार से भिन्न थी। 
इस जाति को आर्यों ने राक्षसों की संज्ञा दी। वेदों में यह नाम असभ्य, बर्बर और घृणित जातियों का लिए आया है। इसी राक्षस जाति के विरुद्ध भगवान् राम ने युद्ध किया था जिसका विस्तृत यशोगान वाल्मीकि ने रामायण में किया है।

इनके बाद में रामायण में वानरों का उल्लेखनीय स्थान है। यह भी दक्षिण भारत की एक अनार्य जाति थी किन्तु इसने आर्यों का सहयोग एवं उनके धार्मिक क्रियाओं को तथा आर्यसभ्यता को मुक्त हृदय के द्वारा स्वीकार किया। इन वानरों के नेता बाली एवं सुग्रीव थे। राक्षसों और वानरों के अतिरिक्त तत्कालीन भारत में निषाद, गृध, शबर, यक्ष और नाग जैसी अन्य अनार्य जातियाँ निवास करती थीं। इनमें निषाद जाति कोसल राज्य और गंगा के बीच के प्रदेश में रहती थी। इसके मुखिया "गुह" और इनकी राजधानी "श्रृंगवेरपुर" थी। जब भरत भगवान् राम को वापस लाने जा रहे थे तब निषादों से भरत का सामना हुआ था। इसका वर्णन अयोध्याकाण्ड के 84वें सर्ग मे वर्णित हैं- 

सम्पन्नां श्रियमन्विच्छंस्तस्य राज्ञः सुदुर्लभाम् ।
भरतः कैकेयीपुत्रो हन्तुं समाधिगच्छति ।। 
(अयोध्याकाण्ड - 84/5)

अर्थात् निषादराज गुह करता है कि धन की लोभ से भरत राम को मारने जा रहा है।

भर्ता चैव सखा चैव रामो दाशरथिर्मम | 
तस्यार्थकामाः संनद्धा गङ्गानूपेऽत्र तिष्ठत ।। 
(अयोध्याकाण्ड - 84 / 6)

और राम तो हमारे मित्र और सखा हैं। इसलिए हे सेनाओं! तुम अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर गंगा तट पर मौजूद हो। लेकिन फिर निषादराज गुह" यह भी कहता है कि यदि भरत का भाव भगवान् राम के प्रति संतोषजनक होगा तो वो कुशलतापूर्वक गंगा पार जा सकेंगे।

यदि तुष्टस्तु भरतो रामस्येह भविष्यति । 
इयं स्वस्तिमती सेना गङ्गामद्य तरिष्यति ।। 
( अयोध्याकाण्ड - 84 / 9)

निषादों के विषय में कथा प्राप्त होती है कि जब रावण माता सीता का हरण कर ले जाता है तब जटायु माता सीता को छुड़ाने के लिए रावण से युद्ध करता है तथा  रावण के द्वारा उसकी हत्या हो जाती है। सीता की खोज करते हुए जटायु के पास भगवान् राम वहाँ आते हैं और पूरा वृत्तान्त सुनकर दुःखी होते हैं तथा जटायु का शास्त्रोक्त विधि से श्राद्धकर्म करते हैं-

एवमुक्त्वा चितां दीप्तामारोग्य पतगेश्वरम् ।
ददाह रामो धर्मात्मा स्वबन्धुमिव दुःखितः ।।
(अरण्यकाण्ड-08/31)

इस तरह से सभी अनार्यों ने आर्यों का पूरा-पूरा सहयोग किया। रामायणकालीन आर्य सभ्यता बहुत ही सुन्दर एवं समृद्ध थी। वाल्मीकि रामायण का अध्ययन केवल समाजिक, सैद्धान्तिक या शैक्षणिक ही नहीं अपितु व्यवहारिक भी है। रामायण को आर्य संस्कृति सभ्यता के आधारस्तम्भ के रूप में जाना जाता है। समाजिक रीति-रिवाज को लौकिक काल में लोकवृत्त अथवा लोकाचार कहा जाता था । राम लौकिक प्रथाओं और परम्पराओं के अच्छे ज्ञाता थे- लौकिके सममाचारे विशारदः इस प्रकार से आर्य एवं अनार्यों के विषय में बहुत सारी चर्चा वाल्मीकि रामायण में प्राप्त होती है।

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रामायणकालीन राक्षसी सभ्यता
राजनीतिक दृष्टि से वाल्मीकि रामायण में राक्षसों और आर्यों के पारस्परिक संघर्ष का सर्वप्रथम विस्तृत रूप से विवरण प्राप्त होता है इसलिए उसमें राक्षसीसभ्यता का भी अपेक्षाकृत विस्तार से वर्णन है। महाभारत एवं पुराणों में भी राक्षसों का उल्लेख आया है किन्तु समाजिक दृष्टि से इसका विशेष महत्त्व नहीं है क्योंकि उनके समय में राक्षसों की शक्ति अस्तोन्मुख अथवा लुप्तप्राय हो चुकी थी लेकिन रामायण काल में तो राक्षसों की चरम उन्नति एवं चरम अवनति दोनों ही लक्षित होती है। रामायणकालीन राक्षसों की तीन शाखाओं का स्पष्ट रूप से पता चलता है-

1. विराध शाखा
2. दनुशाखा (दानवशाखा)
3. राक्षस या "रक्ष" शाखा

1. विराध शाखा 
इस शाखा के लोग दण्डकारण्य के उत्तरी भाग में रहते थे। इसमें मुलिया विराध नामक राक्षस था, जिसके कथनानुसार ये जव और शतह्रदा के पूर्वज थे विराध की आकृति बहुत ही भयानक थी। राम-लक्ष्मण के हाथों से उसका वध हुआ था-

ते शरीरं विराधस्य भित्त्वा वर्हिणवाससः । 
निपेतुः शोगितादिग्धा धरण्यां पावकोपमाः।। 
(अरण्यकाण्ड-3 / 12 )

2. दनु शाखा 
ये राक्षसों की दूसरी शाखा है। यह दनु के संतति होने के कारण दानव के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस शाखा का प्रतिनिधि कबंध राक्षस था । उसकी आकृति बड़ी विचित्र थी, उसके भुजापाश में आने वाला प्रत्येक प्राणी उसका आहार बन जाता था। उसकी मृत्यु होने पर लक्ष्मण जी ने उसका शव एक गड्डे मे डालकर जला दिया था।

एवमुक्तौ तु तौ वीरौ कबन्धेन नरेवरौ ।
गिरिप्रदरमासाञ्च पावकं विससर्जतुः ।।
(अरण्यकाण्ड-72/1) 

3. राक्षस शाखा 
यह शाखा राक्षस या रक्ष नाम से विख्यात हुई। यह शाखा सबसे ज्यादा क्रूर तथा शक्तिशाली थी। इसके अन्तर्गत लंका के राक्षसों की गिनती होती है जो पुलस्त्य एवं दिति के वंशज रावण के अधीन था। लंका के राक्षसों का वर्णन वाल्मीकि ने विशेषतः सुन्दरकाण्ड में किया है जिसके अध्ययन द्वारा हमें उनके सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन के विविध पक्षों का स्पष्ट रूप से पता चल जाता है। उस समय जो भी राक्षस थे वे देव याचना भी किया करते थे जैसे रावण शिव भक्त था । इस तरह से राक्षसों के विषय में बहुत सारी जानकारी प्राप्त होती है।

रामायणकालीन वानरी सभ्यता
वानरों की सभ्यता का जो चित्रण रामायण में प्रस्तुत है उससे यह प्रमाणित होता है कि वानरों की जाति एक वास्तविक मनुष्य जाति थी जिसकी अपनी विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था और सभ्यता थी। भले ही यह जाति मध्यदेश के आर्यों और लंका के राक्षसों के समुन्नत नहीं रही हो पर निश्छल, सरल और साम्राज्यवादी आकाक्षाओं से अलिप्त होने के कारण इसका भी अपना एक अनोखा गौरव है। रामायण ही भारतीय साहित्य का सबसे प्राचीन और एकमात्र ऐसा स्थान है जिसमें हम वानर सभ्यता को निकट से देख सकते हैं। कवि ने वानरों को बलवान के रूप में चित्रित किया है जो माया जानने वाले, पराक्रमी, शूरवीर, वायु के समान वेगवान्, नीतिज्ञ, बुद्धिमान्, किसी से परास्त न होने वाले, दिव्य शरीरधारी और देवताओं की तरह सभी शास्त्रों के पयोग में कुशल थे-

सत्यसंधस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिणः ।
विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वं कामरूपिणः।। 
मायाविदश्च शूरणं वायुवेगसमान् जवे।
नयज्ञान बुद्धिसम्पन्न विष्णुतुल्यपराक्रमान् ।। 
असंहार्यानुपायज्ञान दिव्यसंधन्ननान्वितान् ।
सर्वास्त्रं गुणसम्पन्नानमृतप्राशनानिव ।। 
(बालकाण्ड-17 / 2-4) 

"कामरूपिणः" उनका एक बहुत प्रयुक्त विशेषण है, वे इच्छानुसार रूप धारण कर सकते थे। राम-लक्ष्मण से पहली भेंट के समय हनुमान ने अपना कपिरूप त्यागकर ब्राह्मण पण्डित रूप धारण कर लिया था। फिर लंका में माता सीता के खोज के समय भी हनुमान ने अनेक रूप धारण किये थे। वानर अपने दांतों और नखों को शस्त्ररूप में प्रयोग करते थे-

ततः सचिवसंदिष्टा हरयो रोमहर्षणः । 
गिरिकुञ्जरमेधाभा नगरान्निर्ययुस्तदा । ।
नखदंद्रष्टायुधा सर्वे वीरा विकृतदर्शनाः ।
सर्वे शार्दूलदंष्ट्राश्च सर्वे विवृतदर्शनाः ।। 
(कियकिन्धाकाण्ड-31 /23-24)

वानरों में कतिपय मानसिक लक्षण भी थे, जिसके कारण वह अन्य जातिओं से भिन्न थे। उनमें शारीरिक और मानसिक चापल्य था रावण की दृष्टि में वानरगण चपल, उद्धत और अस्थिर चित्त के थे- 'चपला ध्यविनीताश्च चलचित्ताश्च वानरा । वानरों की इस दुर्बलता को और उनके अस्थिर मति को हनुमान ने भी स्वीकार किया था- 
"नित्यमास्थिरचित्ताहि कुपयो हरिपुंगव।"

इस प्रकार से वानरों के विषय में बहुत सारे तथ्य प्राप्त होते हैं, जिससे इनकी सभ्यता के विषय में पता चलता है।

रामायणकालीन संस्कृति का महत्त्व

रामायण की संस्कृति का प्रचार हिन्दू धर्म के व्याख्याताओं और उन्नायकों का सदा प्रिय विषय रहा है। हमारे साहित्य में ऐसे लेख ग्रन्थ एवं काव्य विरले ही मिलेंगे जिनमें राम की स्तुति, उनके अलौकिक चरित्र का कीर्तन अथवा एक मर्यादा पुरुषोत्तम लोकोत्तर विभूति के रूप में उनका चित्रण न किया गया हो। रामायण के नैतिक आदर्शों का गुणगान करने वाले गम्भीर भाषण लेख आदि भी आये दिन सुनने देखने में आते रहते हैं किन्तु आज के व्यावहारिक जगत् में हम अधिक रस किसी युग एवं व्यक्ति के लौकिक मूल्यांकन में लेने लगे हैं किसी का श्रद्धाजन्य यशोगान हमारी आंतरिक अभिरुचि को नहीं जगा पाता। रामराज्य अथवा रामायण काल प्राचीन भारतीय समाज का एक स्वर्णायुग था परन्तु उसका मात्र विशेषणों में वर्णन कर देने से, उसके मात्र प्रशस्ति गान से हमारी जिज्ञासा तृप्त नहीं होती। हम तो जानना चाहते हैं उस युग में आर्य तथा अनार्य जाति के लोगों का खान-पान कैसा था? मांस-मदिरा उनके लिए त्याज्य थे अथवा ग्राह्य? उनकी वेश-भूषा कैसी होती थी? लोग अपना मनोरंजन कैसे करते थे? उनके रीति-रिवाज क्या थे? 

नगरों प्रासादों और आश्रमों का वे कैसे और किन उपकरणों द्वारा निर्माण करते थे? राजा तथा प्रजा द्वारा किन कला कौशलों का अनुशीलन किया जाता था? साहित्य और विज्ञान की स्थिति क्या थी? उन दिनों संस्कृत लोक भाषा थी अथवा मात्र साहित्यिक भाषा? शिक्षा का स्वरूप क्या था और उसका विस्तार कितना था ? कौन कौन से धार्मिक कर्मकाण्ड प्रचलित थे? जीवन के प्रति लोगों का दृष्टिकोण क्या था तथा धर्म और नैतिकता के आदर्श क्या थे? यदि इन प्रश्नों के समाधान के लिए आदिकाव्य का सांस्कृतिक विश्लेषण किया जाये तो इस चिर पुराण कथा का एक सर्वथा नवीन और रोचक रूप उपस्थित होगा। ऐसे वस्तुगत या तथ्याश्रित अध्ययन से भारत के परम्परागत सांस्कृतिक गौरव पर भी जैसा प्रकाश पड़ेगा, वह अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशस्तियों की तुलना में कहीं अधिक ज्ञानवर्धक और प्रभावोत्पादक सिद्ध होगा। आज के तर्कप्रिय मानव को भी ऐसे सांस्कृतिक चित्रणों में वैरस्य अथवा अविश्वास का अनुभव नहीं होगा। 

संस्कृत भाषा का पठन-पाठन कम हो जाने पर देश में राम कथा के आदिस्रोत वाल्मीकि रामायण का भी प्रचलन कम हो गया और उसका स्थान प्रादेशिक भाषाओं की रामायणों ने ले लिया। इन रामायणों का लोक मानस पर चाहे कितना ही प्रभाव क्यों न हो, रामराज्य की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक गवेषणा के लिए इनका महत्व नगण्य है। उस युग के मौलिक सांस्कृतिक तथ्यों के सर्वाधिक प्रामाणिक परिज्ञान के लिए हमें वाल्मीकि का ही सहारा लेना पड़ेगा। भले ही वाल्मीकि आधुनिकता की सम्मति में राम के समकालीन न रहे हों, फिर भी अन्य रामायणकारों की तुलना में वह रामराज्य की परम्पराओं और लोकश्रुतियों के अधिक निकट थे, अतः उनके महाकाव्य का सांस्कृतिक महत्त्व असाधारण एवं निर्विवाद है।

भारत की सांस्कृतिक परम्पराओं को समझने के लिए रामायण और महाभारत में वर्णित परिस्थितियों से सुपरिचित होना अति आवश्यक है क्योंकि एक तो उनकी संस्कृति आज भी हमारे समाज में न्यूनाधिक रूप में परिलक्षित होती है और दूसरी हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का राजनीतिक और सामाजिक जीवन का जैसा सजीव वर्णन उनमें मिलता है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है वाल्मीकि ने आर्य संस्कृति के एक अतिशय प्राचीन एवं उत्कृष्ट युग को मानो साकार रूप में रंगमंच पर उपस्थित कर दिया है और उसके सांस्कृतिक तथ्य मिस्र या देवीलोन की तरह किसी मृत संस्कृति के निर्जीव उपलक्षण नहीं है, अपितु एक आत्मनिष्ठ और सुसंस्कृति जाति के जागरित अस्तित्व और सजीव चेतना के पुरातन प्रतीक है प्राचीन आर्यों का मस्तिष्क उर्वर और प्रतिक्षण जागरुक था। 

उन्होंने उदात्त और विचारोत्तेजक सिद्धान्तों की नव सृष्टि की तथा उन्हें भाषा, संगीत और कला के माध्यम से हृदयग्राही रूप में अभिव्यक्त किया। सच पूछा जाये तो भारत के इतिहास पुराणों में रामायण और महाभारत में जीवन के जो सत स्पंदनशील कण बिखरे पड़े हैं, उन्हें एक सूत्र में पिरोकर उनका पुनरुद्धार करने के लिए बड़े विद्वानों की और उससे भी बड़े कलाकारों की आवश्यकता है।

रामायणकालीन संस्कृति में नारी का महत्त्व

नारी की स्थिति ही किसी समाज की सभ्यता का सच्चा मापदण्ड है। रामायणकाल की नारी संस्कृति का यथार्थ स्वरूप जानने के लिए वाल्मीकि ने प्रचुर सामग्री प्रस्तुत की है । संस्कृत के साहित्यशास्त्र की भाषा में नारियाँ ही इस आदिकाव्य का प्रमुख आलम्बन हैं, वे ही इसके कथानक को गति प्रदान करती हैं, उसका चरम विकास करती हैं। रामायण में कई प्रधान एवं आनुषंगिक नारी पात्रों के विशद चित्र अंकित हैं, ऐसे नारी पात्र जिनके गुण और दुर्गुण, जिनकी महत्ता और दुर्बलता हमारे सम्मुख नारी संस्कृति का एक मिला-जुला रूप उपस्थित कर देती है रामायण में नारी चित्रण इतना सजीव, इतना प्रमुख है कि वह उसे एक पुरुष प्रधान काव्य के स्थान पर एक नारी प्रधान रचना बना देता है।

रामायण में नारी की स्थिति का कई दृष्टियों से अध्ययन किया जा सकता है क्योंकि कन्यात्व पत्नीत्व और मातृत्व उसके जीवन के प्रमुख अंग हैं, अतः समाज में उसकी स्थिति का विश्लेषण इन तीन दृष्टियों से करना अच्छा होगा। उत्तरकाण्ड में ऐसे कई स्थल हैं, जहाँ विवाह योग्य कन्याओं की बढती हुई आयु को देखकर माता-पिता की चिन्ता के उद्गार अभिव्यक्त हुए हैं।

दूसरी ओर यदि हम परिवार में कन्या की स्थिति और उसके प्रति किये जाने वाले व्यवहार की समीक्षा करें तो यह स्वीकार करना होगा कि कन्याओं से किसी प्रकार का द्वेष, द्रोह या घृणा नहीं की जाती थी। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि कन्या का जन्म हो जाने के बाद उसका लालन-पालन मनोयोग से किया जाता था और उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए उदारता बरती जाती थी।

रामायण के प्रमुख स्त्री पात्रों की समीक्षा से यह स्पष्ट है कि विवाह से पूर्व उन्हें अपने घरों में समुचित शिक्षा मिलती थी क्योंकि उन्हें सभी धार्मिक कृत्यों में अकेले या पति के साथ सम्मिलित होना पड़ता था, अतः उन्हें विवाह से पहले ही श्रौत और स्मार्त क्रिया की तथा उनमें प्रयुक्त होने वाले मन्त्रों की शिक्षा दे दी जाती थी। राम के यौवराज्याभिषेक के दिन कौसल्या अग्नि में मन्त्रों के द्वारा आहुति दे रही थीं-

सा क्षौ मवसना हृष्टा नित्यं व्रतपरायणा । 
अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत्कृतमंगलम् ।। 
( वा. रा. - 2 /20/15)

सीता को सन्ध्योपासन में तत्पर बताया गया है जबकि तारा मन्त्रों की जानकार ( मन्त्रवित्) थी कर्मकाण्ड की शिक्षा पाने के अतिरिक्त कन्यायें शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों का भी पर्याप्त ज्ञान प्राप्त करती थीं। यह ज्ञान उन्हें अपने माता-पिता, ब्राह्मण
अभ्यागतों तथा ऋषि मुनियों से मिलता था। इस प्रकार मिलने वाली उनकी शिक्षा से कन्याओं का सर्वांगीण विकास होता था।

कन्याओं को व्यावहारिक और नैतिक शिक्षा भी दी जाती थी। पत्नीविषयक कर्तव्यों का उन्हें सुचारु रूप से बोध कराया जाता था । सीता ने राम के साथ वन चलने का आग्रह किया था इससे यह ज्ञात होता है कि सीता को अपने माता-पिता से पत्नी के कर्तव्यों की समुचित शिक्षा मिल चुकी थी ।

अनुशिष्टास्मि मात्रा च पित्रा च विविधाश्रयम् । 
नास्मि संप्रति वक्तव्या वर्ततव्यं यथा मया । 
( वा. रा. - 2 /27/10)

राजकुमारियों को राजधर्म की भी शिक्षा दी जाती थी, जिससे वे अपने राजकीय पतियों की सच्ची सहयोगिनी बन सकें। युवराज की पत्नी होने के परिणामस्वरूप सीता राजधर्म की जानकार थी (अभिज्ञा राजधर्माणाम्) । कई कन्याओं को संगीत, नृत्य आदि ललित कलाओं की भी शिक्षा दी जाती थी। रावण के अंतःपुर की रमणीया स्त्रीयाँ वाद्य यन्त्रों के प्रयोग में प्रवीण थीं ।

देवासुर संग्राम में कैकेयी का अपने पति के साथ जाना यह सिद्ध करता है कि स्त्रीयाँ सैन्य शिक्षा से भी वंचित नहीं रखी जाती थीं। अपने कौमार्य काल में कन्यायें पर्दे जैसे नियन्त्रणों अथवा अतिशय औपचारिकता के बन्धनों से मुक्त रहती थीं। नगर के उद्यानों में वे आभूषणों से सज्जित होकर सांयकाल के समय समूहों में क्रीडा करने जाया करती थीं।

विवाह होने के बाद पितृगृह से पतिगृह आने वाली कन्या 'वधू' का पद प्राप्त करती थी। (उद्यते पितृगृहात् पतिगृहम् कति वधू) रामायण में सास-ससुर और पुत्रवधू के बीच नितान्त स्नेहसिक्त सम्बन्ध चित्रित हुए हैं। दशरथ और कौसल्या का अपनी पुत्रवधू सीता के प्रति हार्दिक और निश्छल स्नेह था ।

जहाँ तक पति के प्रति व्यवहार का प्रश्न है, वाल्मीकि ने पत्नी की ऐकान्तिक निष्ठा और सेवा भावना का ही बार बार आग्रह किया है और यह इसलिए कि पति ही पत्नी की एकमात्र शरण है। उसके बिना वह जीवित रहने मे भी समर्थ नहीं है।

तत्कालीन समाज पत्नी से कठोर अनुशासन एवं आत्म त्याग की अपेक्षा रखता था । उसे पति के अवगुणों को आँखों से सर्वथा ओझल करके उसकी निःस्वार्थ सेवा करनी होती थी। पति बुरे स्वभाव का मनमाना बर्ताव करने वाला अथवा धनहीन ही क्यों न हो, उत्तम स्वभाववाली नारियों के लिए वह श्रेष्ठ देवता के समान है। सीता ने भी इस दृष्टिकोण को सर्वदा स्वीकार किया था।

रामायणकालीन संस्कृति में आचार-विचार

लोक में प्रचलित आचार-विचार ही किसी भी समाज की संस्कृति का ज्ञापक होता है। रामायणकालीन समाज भारतीय संस्कृति में एक विशिष्ट स्थान रखता है। अतः इसका भी कसौटी पर परीक्षण अत्यन्त आवश्यक है। नैतिक नियमों और धर्म सम्मत आचार-विचार का तत्कालीन समाजिक व्यवस्था में विशेष महत्व था। दैनिक जीवन में मानव व्यवहार की सरलता, मधुरता और विनम्रता पर विशेष बल दिया जाता था । श्रेष्ठता, मधुरता, उच्च शिष्टाचार, मधुर व्यवहार ये सुसंस्कृत व्यक्ति के मानदण्ड थे। सामाजिक शिष्टाचार में अतिथि सत्कार महत्त्वपूर्ण स्थान रखता था - " अतिथिः किल पूजा है प्राकृताऽपि विज्ञानता (वा. रा. 5/1/112 )

वनवासी मुनिगण अपने वानप्रस्थ धर्म के अनुसार आतिथ्य करते थे। राम-लक्ष्मण सीता के आगमन पर दण्डकारण्य के तपस्वियों ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया तथा बड़ी प्रसन्नता के साथ मंगलसूचक आशीर्वाद देते हुए जल, कन्दमूल, फूल-फल अर्पित करके पर्णशाला में उन्हें ठहराया। उपर्युक्त वर्णन से हम जान सकते हैं कि रामायणकालीन संस्कृति में आचार व्यवहार सुसंस्कृत समाज का परिचायक रहा । तत्कालीन समाज में भाषा, रहन-सहन, परस्पर संवाद इत्यादि से मनुष्य के आचार-व्यवहार का बोध होता है जो कि अत्यन्त उत्कृष्ट था ।

रामायणकालीन संस्कृति में शिक्षा

रामायणकालीन संस्कृति में न्याय तथा शासन की सुचारू व्यवस्था के कारण शैक्षणिक एवं बौद्धिक क्रिया का धर्मोत्कर्ष देखने को मिलता है। विद्याध्ययन पर केवल ब्राह्मणों का ही एकाधिकार नहीं था । अपितु समस्त द्विज इसके अधिकारी थे। महर्षि वाल्मीकि का यह कथन अत्यन्त सार्थक मालूम होता है कि महाराज दशरथ के राज्य में ऐसा हो नहीं सकता जो नास्तिक, असत्यभाषी तथा शास्त्रों से अनभिज्ञ अथवा विमुख हो -
नास्तिको नानृति वापि न कश्चित अबहुश्रुतः। 
( वा.रा. 1/6/14)

राम शिक्षा और विद्यालयों के महान् पोषक थे। सैकड़ों छात्र और विद्वद्जन उनके राज्य में निवास करते थे और शास्त्रों का अध्ययन करते थे। रामायणकालीन शिक्षा का एक प्रमुख सिद्धान्त यह था कि वास्तविक रूप में किसी व्यक्ति का सभ्य सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत होना उसके शिक्षा-दीक्षा पर इतना निर्भर नहीं करता था जितना कि उसके जन्मगत संस्कारों और स्वभावों पर महर्षि वाल्मीकि का चिन्तन था कि गर्भाधान अगर उचित काल में न किया जाए अथवा गर्भाधान काल में दम्पत्ति दूषित विचारों से युक्त हो तो सन्तान पर कुसंस्कारों का प्रभाव निश्चित रूप से होता है। 

यज्ञ-यागादि धार्मिक कृत्य तथा वैदिक शिक्षा का सांस्कृतिक प्रभाव तभी होता है जब यदि व्यक्ति को परम्परा या जन्म से तामसी एवं संकुचित संस्कार प्राप्त न हुए हों गुणयुक्त भरत की माता तथा दशरथ की पत्नी होने पर भी कैकेयी को स्वार्थ लिप्सा उत्तराधिकर स्वरूप मिली थी। गुरु ऐसे ही शिष्यों को चुना करते थे जो उसे सदाचारी, सुयोग्य, उत्साही मालूम पड़े। विश्वामित्र ने राम की अपने साथ ले जाने का आग्रह इसीलिए किया था कि दोनों उन्हें एक आदर्श प्रतीत हुए थे।

रामायणकालीन शिक्षा में एक विशेष तारतम्य था। छात्र के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना, जीवन मूल्यों की उच्चता बनाए रखना तत्कालीन संस्कृति का मूलभूत आदर्श था। उस कालखण्ड के आदर्श शासक सुसंस्कृत प्रजा, कर्त्तव्यपरायण अधिकारीगण और संघर्षरहित समाज इसी सांस्कृतिक शिक्षा की देन थे।

रामायणकालीन संस्कृति में विज्ञान

विज्ञान का भी रामायणकलीन बौद्धिक प्रवृत्तियों में महत्त्वपूर्ण स्थान था खगोलशास्त्र का पर्याप्त अनुशीलन प्राप्त होता है। दिन-मास और वर्ष के चक्र की लोगों को वैज्ञानिक जानकारी हो चुकी थी जैसे राम का राज्याभिषेक गुरुवार के दिन प्रस्तावित हुआ था, जब पुष्यनक्षत्र से युक्त चन्द्रमा के अधिपति गुरु थे। लंका से अयोध्या लौटते हुए राम ने पंचमी तिथि को महर्षि भरद्वाज के दर्शन किये थे।

रामयणकालीन चिकित्सा विज्ञान भी अत्यन्त समुन्नत था। रामायण में आयुर्वेद आयुर्वेद के जनक धनवन्तरि तथा त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) का उल्लेख मिलता है। ( वा. रा.1 /45 / 31 ) । अयोध्या नगरी वैद्यों से परिपूर्ण थी। राजा लोग वैद्यों के प्रति अत्यन्त सम्मानपूर्ण व्यवहार करते थे।

उस समय की चिकित्सा प्रणाली में मुख्य रूप से औषधियों का प्रयोग होता था । वनों और पर्वतों पर इनकी खोज की जाती थी ये औषधियाँ अपनी प्रभा से आसपास के प्रदेश को आलोकित करती रहती थीं। महेन्द्र पर्वत पर सर्पविष प्रतिरोधक औषधियाँ पाई जाती थीं। ( वा. रा. 5 / 1 / 21 ) । उस समय रेखागणित के प्रचलन का भी प्रमाण प्राप्त होता है। सावधानी से मापी गई यज्ञ भूमि पर वेदि की प्रतिष्ठा यज्ञ समारोह का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग था। यज्ञ के अधिष्ठाता देवता के अनुकूल उसका सूक्ष्म नियोजन एवं संस्थापन किया जाता था ।

इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन से प्रामाणित होता है कि चिकित्सा विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, पशु विज्ञान, कृषि विज्ञान अत्यन्त उच्चकोटि का था ।

रामायणकालीन संस्कृति में वर्ण व्यवस्था

भारतीय संस्कृति में गुण क्रमानुसार मनुष्यों को चार वर्षों में विभाजित किया है। गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि "चातुर्वण्ये मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः " इस प्रकार चार वर्ण रामायणकालीन संस्कृति में भी दृष्टिगोचर होते हैं महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में चारों वर्णों का उल्लेख किया है।

राजा दशरथो नाम द्युतिमान् धर्मवत्सलः । 
चातुर्वर्ण्य स्वधर्मेण नित्यमेवाभिपालयून् ।।

महाराज दशरथ ने अपने अभिलषित प्राप्ति हेतु अनुष्ठीयमान अवश्वमेघ यज्ञ में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र इन चारों वर्णों के लोगों को आमन्त्रित किया था ।

" निमन्त्रयस्व नृपतीन् पृथिव्यां मे च धार्मिकाः। 
ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वेश्यां शूदांश्चैव सहस्त्रशः ।। "

ब्राह्मण वर्ण के विषय में रामायण में महर्षि वाल्मीकि कहते है कि 
वर्णेष्वग्रे चतुर्थेषु देवतातिथिपूजकाः ।
कृतज्ञाच्च वदान्याश्च शुरा विक्रमसंयुताः ।। 
क्षत्रियों का विशेष रूप से समाज और देश की रक्षा का दायित्व था । शरणागत को आश्रय देना उनका परम धर्म रहा। महर्षि वाल्मीकि ने कहा है कि जिस प्रकार माता अपने गर्भ की रक्षा करती है उसी प्रकार राजा को तपस्वियों की रक्षा करनी चाहिए।
"रक्षणीया रुत्वया शश्वद् गर्भभूतास्तपोधनाः ।। " ( वा. रा. कि. 1 /21) अयोध्या तथा अन्य नगरों में व्यापारियों के सुव्यवस्थित विक्रयकेन्द्र अर्थात् दुकानें बनी हुई थीं। भगवान् राम के हृदय में चारों वर्णों के प्रति दया भाव स्फुरित था। इसीलिए सभी मनुष्य उनके अधीनस्थ होते हुए उनका सम्मान करते थे ।

सारांश

रामायण आदिकाव्य है और महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं। महर्षि वाल्मीकि ने अपने इस काव्य में रामायणकालीन समाज के सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक आदि विषयों का विशद विवेचन किया है। इस इकाई में आपने रामायणकालीन सभ्यता और संस्कृति के विषय में जाना। आपने रामायणकालीन आर्य एवं अनार्य सभ्यता राक्षसी सभ्यता, वानरी सभ्यता आदि का अध्ययन किया। रामायण के अध्ययन के पश्चात् हमें तत्कालीन समाज की वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार, नारी दशा आदि के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलती है। उस समय स्त्रियाँ विद्याध्ययन करती थीं, सैन्य शिक्षा प्राप्त करती थीं और धार्मिक कार्यों में भाग लेती थीं। 

कन्या का जन्म होने पर माता-पिता हर्ष का अनुभव करते थे। पुत्रवधू के रूप में भी स्त्रियों को पर्याप्त सम्मान मिलता था। इस प्रकार रामायण काल में स्त्रियों की दशा अच्छी थी। उस समय नैतिक नियमों और धर्म सम्मत आचरण का पालन किया जाता था । मानव व्यवहार की सरलता, मधुरता और विनम्रता पर विशेष बल दिया जाता था। इसके अतिरिक्त इस इकाई में आपने रामायणकालीन संस्कृति में शिक्षा, विज्ञान एवं वर्ण व्यवस्था के विषय में भी अध्ययन किया।

रामायण कालीन समाज की संरचना

रामायण में प्रमुख रूप से तीन प्रकार की जातियों का उल्लेख है - नर, वानर तथा राक्षस । इन तीनों जातियों के विषय में दो दृष्टिकोण है। प्रथम दृष्टिकोण अध्यात्मिक है, जिसमें रामचन्द्र जी सच्चिदान्द परब्रह्म है, राक्षस षडविकार है और वानर जाति चंचल मनोवृति है ।

दूसरा दृष्टिकोण अधिभौतिक है इसके अनुसार नर सामान्य रूप से मनुष्य ही माने गए हैं। राक्षस कराल दाँत वाले भयंकर आकृतिवाले तथा वानरों को सामान्य पपु लंबी पूछवाला बन्दर कहा गया।

वस्तुतः नर, वानर और राक्षसों के विषय में रामायण में वर्णित है कि ये सभी मनुष्य ही थे । मनुष्यों की भाँति उनके संस्कार होते थे, वे वेदों के ज्ञाता होते थे, उनका राज्याभिषेक यज्ञों के सम्पादन से ही होता था। वे सन्ध्योपासना करते थे। उनकी राज्य व्यवस्था थी वे संस्कृत भाषा के ज्ञाता थे, संस्कृत में वार्तालाप करते थे। वस्त्राभूषण से अलंकृत रहते थे। नर वानर और राक्षस के अतिरिक्त रामायण कालीन समाज के अन्य घटक सुर, असुर, किन्नर, गन्धर्व विद्याधर, ऋक्ष रोहित, आमीर पल्लव, मलेच्छ, शक भवन किरात आदि भी थे। 

रामायण कालीन समाज गुणानुसार एवं कर्मानुसार विभक्त उपर्युक्त विभिन्न प्रकार की जातियों से युक्त मनुष्यों का ही समाज था। मनुष्य ही अपने आचरणों एवं प्रवृतियों के कारण वानर राक्षस आदि कहलाए। रामायणकालीन समाज में वर्ण व्यवस्था भी जो चार वर्णों में ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैष्य एवं शुद्र में विभाजित था। समाज में वर्ण व्यवस्था के साथ -साथ आश्रम व्यवस्था भी थीं।

आश्रम व्यवस्था चार प्रकारों में विभाजित थी। ब्रह्मचर्य गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। जिसमें प्रत्येक आश्रम व्यवस्था के लिए समय निर्धारित था तदनुसार कर्तव्य करना पड़ता था। इन सभी में गृहस्थाश्रम को श्रेष्ठ कहा गया है। रामायण कालीन समाज में सभ्यता एवं संस्कृति विकसित और उन्नत थी। नैतिक नियमों एवं आदर्षो से युक्त भौतिक आदर्ष भी पूर्णतः उच्च थे। नगरीय योजना उच्च कोटी की थी। महिलाओं को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था।

राजा प्रजा के हितों का ध्यान रखता था। न्यायप्रियता का उत्कृष्ट उदाहरण रामायण में देखने की मिलता है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि समाज, सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से समुन्नत थी।

रामायण का साहित्यिक महत्त्व

रामायण संस्कृत साहित्य में आदिकाव्य के रूप में विख्यात है क्योंकि परवर्ती साहित्य को इसके द्वारा भाव, भाषा और शैली का निर्देश मिला है। माधुर्यमयी उक्तियों का आरम्भ रामायण से ही संस्कृत साहित्य में हुआ है। रामायण की भाषा सुन्दर, ललित, प्राञ्जल, प्रवाहपूर्ण तथा परिष्कारयुक्त है। भाव के अनुरूप भाषा आरोह-अवरोह का विन्यास वाल्मीकि ने ही आरम्भ किया है। जहाँ किसी घटना का विवरण देना होता है, वहाँ वाल्मीकि पौराणिक सरलता दिखाते हैं। जैसे-
यामेव रात्रिं ते दूताः प्रविशन्ति स्म तां पुरीम् । 
भरतेनापि तां रात्रिं स्वप्नो दृष्टोऽयमप्रियः ॥ १

उपदेश आदि देने में भी ऐसी ही सरल भाषा का प्रयोग किया गया है। जैसे-
मरणान्तानि वैराणि निर्वृतं नः प्रयोजनम्। 
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥

लम्बे वर्णनों में वाल्मीकि अपनी भाषा को ईषत् अलङ्कृत करके शैली-सौन्दर्य के प्रति जागरूक हो जाते हैं। सामान्य रूप से प्रयुक्त अनुष्टुप् छन्द भी त्याग दिया जाता है तथा अन्य छन्दों का साहित्यिक मूल्य मानकर उनका प्रयोग आरम्भ हो जाता है।
उदाहरणार्थ सुन्दरकाण्ड में हनुमान् लङ्का में जब चन्द्रोदय का अवलोकन करते हैं तब कवि का प्रकृति-प्रेम अलङ्कारों के आकर्षण में पड़कर प्रवाहित हो उठता है-

हंसो यथा राजत-पञ्जरस्थः सिंहो यथा मन्दर-कन्दरस्थः । वीरो यथा गर्वितकुञ्जरस्थश्चन्द्रोऽपि बभ्राज तथाम्बरस्थः॥ 
स्थितः ककुद्मानिव तीक्ष्णशृङ्गो विभाति चन्द्रः परिपूर्णशृङ्गः। 
हस्तीव जाम्बूनदबद्धशृङ्गो विभाति चन्द्रः परिपूर्णशृङ्गः ॥ विनष्ट-शीताम्बु-तुषारपङ्को महाग्रह - ग्राह-विनष्ट- पङ्कः। 
प्रकाशलक्ष्म्याश्रय-निर्मलाङ्को रराज चन्द्रो भगवाञ्शशाङ्कः॥ 
शिलातलं प्राप्य यथा मृगेन्द्रो महारणं प्राप्य यथा गजेन्द्रः। राज्यं समासाद्य यथा नरेन्द्रस्तथा प्रकाशो विरराज चन्द्रः ॥

यहाँ वाल्मीकि ने उपमा के साथ अन्त्यानुप्रास का सुन्दर समन्वय किया है। एक ही उपमेय चन्द्र को उपमानों की माला पहना दी गयी है जिससे 'मालोपमा' अलङ्कार की हृदयावर्जक छटा छा गयी है।

वाल्मीकि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास आदि प्रमुख अलङ्कारों का तो प्रयोग किया ही है, यथासंख्य-जैसे अल्प- प्रचलित अलङ्कार का भी सुन्दर निवेश किया है। किष्किन्धाकाण्ड में वर्षावर्णन के प्रसङ्ग में कहा गया है

वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति । 
नथो घना मत्तगजा वनान्ताः प्रियाविहीनाः शिखिनः प्लवङ्गाः ॥

के वर्णनों में प्रकृति का विशुद्ध (अलङ्कार-रहित) चित्रण भी रमणीय है जिसमें पदशय्या तथा लालित्य-निवेश का सौन्दर्य काव्य की नई ऊँचाइयों का स्पर्श करता है। वर्षा वर्णन का ही यह प्रसङ्ग लें जो दक्षिण भारतीय नदियों के ताम्रवर्ण जल का दृश्य प्रस्तुत करता है-

व्यामिश्रितं सर्जकदम्बपुष्पैर्नवं जलं पर्वतधातुताम्रम् । मयूरकेकाभिरनुप्रयातं शैलापगाः शीघ्रतरं वहन्ति ॥

आदिकवि ने नगर, ग्राम, आश्रम, उपवन, पर्वत, नदी, पम्पा सरोवर, सेना, युद्ध, ऋतु, चन्द्रोदय आदि के अत्यधिक सरस, रोचक और सजीव वर्णन किये हैं जो परवर्ती महाकाव्यों के लिए दिशा-निर्देशक बने। उनके पात्रों के लम्बे संवाद भी रोचक हैं। पात्रों के चिन्तन तथा विषय विवेचन रामायण के विराट् परिदृश्य के अनुकूल हैं। हनुमान् का सुन्दरकाण्ड के आरम्भ में, सीता के अन्वेषण के क्रम में लङ्का के वैभव और विलास को देखना तथा नारी-दर्शन से उत्पन्न चिन्तन अपने आप में महाकाव्य हैं। वस्तुतः वर्णनों की विपुलता, चिन्तनों की उदात्तता, पात्रों की विशिष्टता और विषय-वस्तु की रमणीयता से रामायण के अन्तर्गत कई महाकाव्य सज्जित हैं। यह महाकाव्यों का विपुल कोश है।

वाल्मीकि ने विपुल परिमाण में यद्यपि अनुष्टप् छन्द (८ x ४ = ३२ अक्षर) का प्रयोग किया है किन्तु कहीं-कहीं सर्गों में उपजाति, वंशस्थ जैसे ललित और गेयात्मक छन्दों का भी व्यापक निवेश किया है। पाश्चात्त्य विद्वानों की धारणा है कि मूल रूप से रामायण में अनुष्टुप् छन्द ही था जिसे श्लोक' कहते थे। किन्तु यह भ्रान्त धारणा है। संस्कृत में लक्षणा से सभी पद्यबद्ध रचना को श्लोक कहा जाता रहा है।

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