102. विक्रम बैताल || कहानी 02 || हिसाब बराबर ||

हिसाब बराबर

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102. विक्रम बैताल || कहानी 02 || हिसाब बराबर ||

उचित समय आने पर राजा अकेला योगी के मठ पर जा पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा विक्रम ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

योगी ने कहा, “राजन्, यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर श्मशान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”

यह सुनकर राजा विक्रम अपनी वचन को पूरा करने के लिए शमशान की ओर चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन हर बाधा को दूर करते हुए निडर राजा विक्रम आगे बढ़ता गया। 

जब वह शमशान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे किर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।

उसने राजा से पूछा, “तू कौन है?” 

"विक्रम", राजा ने जवाब दिया।

राजा का इतना बोला ही था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा, तभी वह मुर्दा हवा में उड़ा और पुनः पेड़ पर जा लटका। 

राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी सिद्ध योगी की आवाज सुनाई दी, " विक्रम ! इससे बात मत करो वरना यह पुनः पेड़ पर जा लटकेगा। समय बहुत कम है जल्दी करो।"

राजा पुनः चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। मुर्दा पुनः बोला, “बता, तू कौन है?”

राजा चुप रहा। मुर्दा बार-बार बोलता रहा परंतु राजा ने जवाब नहीं दिया।

तब राजा ने उसक  दोनों हाथ पकड़े और अपनी पीठ पर लाद लिया और मुर्दे को योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है?”

राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”

बेताल बोला, “राजन ! मैं एक शर्त पर चलूँगा कि तू रास्ते में कुछ भी नहीं बोलेगा। यदि तेरे मुंह से एक शब्द भी निकला तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा। 

परंतु क्या करूं मार्ग बहुत लंबा है आसानी से कटेगा नहीं। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। चलो इसके लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”

राजा ने उसकी बात मान ली। फिर बेताल बोला, 

 
* हिसाब बराबर *


एक गाँव मे एक किसान रहता था। उसके परिवार मे उसकी पत्नी और चतुर नाम का एक लड़का था। कुछ वर्ष बाद पत्नी मृत्यु हो गई। उस समय उसके लड़के की उम्र मात्र दस साल थी।

किसान ने दूसरी शादी कर ली। उस दूसरी पत्नी से भी किसान को एक पुत्र प्राप्त हुआ। उसको वह प्यार से लल्ला कहकर संबोधित करते थे। किसान की दूसरी पत्नी भी कुछ समय बाद मृत्यु को प्राप्त हो गई।

किसान का बड़ा बेटा, चतुर, जो पहली पत्नी से प्राप्त हुआ था, जब शादी के योग्य हुआ, तो किसान ने बड़े धूमधाम से उसकी शादी कर दी। उसकी शादी के कुछ समय बाद किसान की मृत्यु हो गई।

किसान का छोटा बेटा, लल्ला, जो दुसरी पत्नी से प्राप्त हुआ था । अपने भाई चतुर और भाभी के साथ खुशी-खुशी रहने लगा।  

कुछ समय बाद लल्ला की तबयीत खराब रहने लगी। बड़े भाई चतुर ने आस पास के वैद्यों से ईलाज करवाया पर ठीक नहीं हुआ। छोटे भाई लल्ला की तबीयत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी । लल्ला के इलाज में बहुत खर्च हो रहा था।

एक दिन दोनों पति-पत्नी जब अकेले बैठे थे तो वे आपस में लल्ला के बारे में चर्चा करने लगे। चतुर ने अपनी पत्नी से सलाह की, कि क्या किया जाए चतुर की तबीयत बिगड़ती ही जा रही है। तब चतुर की पत्नी ने कहा, "यदि छोटा भाई मर जाऐ तो इसके ईलाज के पैसे बच जाएंगे। उसे भी शारीरिक परेशानी से मुक्ति मिल जाएगी। क्यो न किसी वैद्य से बात करके इसे जहर दिलवा दिया जाए।"

"नहीं, वह मेरा भाई है। मैं ऐसा नहीं कर सकता।", चतुर एकदम से खड़ा होते हुए बोला।

"कोई सगा थोड़े ही है। सौतेला है। अभी तो सारा तुम्हारी जेब में आता है। जब बड़ा होकर हिस्सा मांगेगा तो पता चलेगी।", पत्नी ने कहा।

चतुर ने डरते हुए पुनः दोहराया, "यदि किसी को पता चल गया तो?" 

"लल्ला बीमार रहता है, किसी को पता भी नहीं चलेगा। कोई रिश्तेदार भी शक नहीं करेगा। वे समझेंगे कि लल्ला बीमार था और बीमारी से उसकी मृत्यु हो गई।" 

चतुर को पत्नी की बात जम गई और चतुर ने ऐसे ही किया। उसने एक वैद्य से बात की, "मेरा छोटा भाई बीमार है। उसी बीमारी में उसे जहर देकर मारना है। आप अपने इलाज की फीस बातओ।" 

पहले तो वैद्य ने आनाकानी की फिर वैद्य ने चतुर की बात मान ली और लड़के को जहर दे दिया और लड़के की मृत्यु हो गई। 

उसके भाई भाभी ने दिखावटी मातम मनाया और अंदर ही अंदर खुशी मनाई कि रास्ते का काँटा निकल गया। अब सारी सम्पति अपनी हो गई। रिश्तेदारों के साथ मिलकर उसका अंतिम संस्कार कर दिया।

कुछ महीनो पश्चात उस किसान के बड़े लड़के चतुर की पत्नी ने एक सुंदर लड़की को जन्म दिया। उन पति पत्नी ने खुब खुशी मनाई। उन्होंने उसका नाम ललित रखा। बड़े ही लाड प्यार से ललित का लालन-पालन किया। समय के साथ ललित जवान हो गया। उन्होने अपने ललित की शादी विद्या नाम की लड़की से कर दी।

शादी के कुछ समय बाद अचानक ललित बीमार हो गया और लगातार बीमार रहने लगा। माँ बाप ने उसके ईलाज के लिऐ बहुत वैद्यों से ईलाज करवाया। जिसने जितना पैसा माँगा उनको दिया दिया कि उनका बच्चा ठीक हो जाऐ। 

चतुर ने अपने लड़के ललित के ईलाज मे अपनी आधी सम्पति तक बेच दी, पर लड़का बिमारी के कारण मरने की कागार पर आ गया। शरीर इतना ज्यादा कमजोर हो गया कि वह अस्थि पिजंर मात्र रह गया था। बच्चे डर के मारे उससे दूर भागने लगे। लोग कहते कि इसे मसान लग गया है।

एक दिन चतुर अपने लड़के को चारपाई पर लिटा कर उसके साथ बैठा था।  चतुर से अपने पुत्र की यह दयनीय हालत देखी नहीं गई।  वह दुःखी होकर उसके सिर पर हाथ फेरने लगा। यह देखकर ललित की आंखों में आंसू आ गए।

चतुर ने उसकी आंखों से आंसू पौंछे। तब ललित अपने अपने पिता से बोला, "भाई अपना अब कैसा लग रहा है।"

यह सुनकर उसके पिता ने सोचा की लड़के का बीमारी के कारण दिमाग भी काम नहीं कर रहा है।  तब चतुर बोला, "बेटा ! मै तेरा बाप हूँ, भाई नही।" 

"इस जन्म के"

ललित के मुंह से यह वाक्य सुनकर चतुर चौक गया। उसने ध्यान से ललित को देखा तो वह मुस्कुराया और बोला, " भाई साहब अगर संपत्ति ही लेनी थी तो मुझसे बोल देते मैं खुशी-खुशी दे देता।" 

चतुर के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई। वह ऐसे दूर जा गिरा जैसे उसे करंट लगा हो। "भाई साहब ! अभी हिसाब बराबर नहीं हुआ। अभी कफन और लकड़ी आदि खरीदने व क्रिया करने  जितना पैसा तो अभी आप पर बाकी बचा हुआ है।" 

"क्यों भगवान पर विश्वास है या नहीं। यदि भगवान पर विश्वास है तो पुनर्जन्म पर भी विश्वास होगा।" चतुर एक तक ललित के मुंह को देख रहा था और ललित बराबर बोले जा रहा था। 

"मैं आपका वही भाई लल्ला हूँ। जिसे आपने जहर खिलाकर मरवा दिया था। जिस सम्पति के लिऐ आप ने मुझे मरवाया, अब वो मेरे ईलाज पर आधी बिक चुकी है। अब आपके पास केवल आपकी ही सम्पति शेष है। हमारा हिसाब हो गया। परंतु अभी भी मेरे कफन और लकड़ी जितना पैसा बाकी बचा हुआ है।"

तब चतुर फूट-फूट कर रोते हुए बोला, "मेरे तो कुल का ही नाश हो गया। जो मैंने किया वह मेरे आगे आ गया। पर तेरी पत्नी का इसमें क्या दोष है ?"

यह सुनकर ललित ठहाके मारकर हंस पड़ा और विद्या की तरफ कटु दृष्टि से देखने लगा। विद्या उसकी कटु दृष्टि से डरकर सहम गई।

"अच्छा, तो विद्या का दोष ढूंढ रहे हो। " 

इतने में ही बेताल ने कहानी बीच में ही रोक दी और विक्रमादित्य से हर बार की तरह सवाल पूछ बैठा कि, “बताओ विक्रमादित्य, ललित ठहाके मारकर क्यों हंसा? उसने विद्या को कटु दृष्टि से क्यों देखा ? अच्छा, तो विद्या का दोष ढूंढ रहे हो। " ऐसा प्रश्न क्यों किया? 

सवाल सुनने के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने कोई जवाब नहीं दिया। गुस्से में बेताल ने कहा, “राजन जवाब पता होने पर भी आप उत्तर नहीं देंगे, तो मैं अपने तेज से तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा और मुक्त हो जाऊंगा।"

तब राजा ने जवाब देते हुए कहा, “ बेताल! यह कहानी अधूरी है। आगे की कहानी इस प्रकार है। इस कहानी से तुम्हें तुम्हारे प्रश्नों के जवाब मिल जाएंगे" कहते हुए विक्रम ने कहानी शुरू कर दी।

उस समय सतीप्रथा का प्रचलन था। जिसमे पति के मरने के बाद पत्नी को पति की चिता के साथ जला दिया जाता था। 

इसी बात से चिंतित होकर चतुर बोला, "हां, वह बेचारी तो निर्दोष है और तेरे मरने के बाद बेचारी बहू को भी तेरे साथ ही जिन्दा जला कर सती कर दिया जाएगा। "

तब ललित ने अपने भाई से पूछा, "जानते हो भाई साहब, वह वैद्य कहाँ है। जिसने मुझे जहर खिलाया था।" 

तब ललित ने उसे बताया, "भाई ! तुम्हारी मृत्यु के तीन साल बाद वो मर गया था। तुम्हारे जाने के बाद उसने मुझसे बहुत पैसा ऐंठा था।"

तब ललित ने पूछा, "भाई जानते हो कि यह विद्या कौन है?"

ललित ने न में गर्दन हिलाई। 

"भगवान ने देखो दोनों नाम मिलते-जुलते दिए हैं। लल्ला और ललित तथा विद्या और वैद्य।" ललित बोला।

"तो क्या?"

"आप सही समझे, भाई साहब, यह वही दुष्ट वैद्य आज मेरी पत्नी के रुप में है। अब इसे भी अपनी करनी का दंड मिलने जा रहा है। मेरे मरने पर इसे मेरे साथ ही जिन्दा जला दिया जाऐगा। और हां आप दोनों ध्यान रखिएगा कि आपको भी आपके कर्मों के फल भुगतने ही होंगे। अभी आपको उनसे मुक्ति नहीं मिली है।"

बेताल ! ईश्वर कहता है कि कर्मों का लेखा यहीं भुगत के जाना होता है। इस लिए कोई भी बुरा काम करो तो उसके फल के बारे में एक बार सोच विचार अवश्य कर लिया करो।

राजा का जवाब सुनकर बेताल बेहद खुश हुआ और बोला, “राजन ! तुम बहुत बड़े ज्ञानी हो। बिल्कुल सही। तुमने एक एक बात को अच्छे से समझा दिया। तुम्हें आगे की कहानी भी पता लग गई । तुम बहुत समझदार हो। परंतु, राजन ! शर्त के मुताबिक आपको चुप रहना था। अपने मुंह खोल दिया, अब मैं चला।” 

इतना कहकर बेताल एक बार फिर से उड़ जाता है। इतना कहकर बेताल तुरंत ही हर बार की तरह उड़कर पेड़ पर जाकर उल्टा लटक गया। और विक्रम उसे उतारने के लिए पुनः चल दिया।


कहानी से सीख :

कर्म फल भुगतना ही पड़ता है । इसी जन्म में या फिर अगले जन्म में। इसलिए कर्म करने से पहले एक बार उसके अच्छे और बुरे फल के बारे में अवश्य सोच लेना चाहिए। 

लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
17/2/29/6/2021

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