29. तब कहानी कुछ और ही हो
29. तब कहानी कुछ और ही होती।
(एक संत के विचार)
पिछले कुछ दिनों से मौत मोहल्ले में ही घूम रही है। पिछले सोमवार पिछली गली से चढ़ेतीलाल जी मौत के हत्थे चढ़ गए, तो मंगलवार को तीन मकान आगे वाले उत्तरदेव जी जीवन की पटरी से उतर गए।
बुधवार को दो, वीरवार को एक, शुक्रवार को फिर एक। शनिवार कुछ थक गई होगी शायद, पर रविवार को वह फिर एक को ले गई।
वैसे भी उसे रविवार से क्या लेना? मौत के दफ्तर में कभी छुट्टी तो होती नहीं। वह तो सदा खुला ही रहता है। निष्ठुर ऐसी है कि उम्र का भी लिहाज नहीं करती। आगे पीछे नहीं देखती। मोहलत नहीं देती, ईमानदार इतनी कि रिश्वत भी नहीं लेती। वह तो अपने मालिक का ही हुक्म बजाती है।
यूं देखूं तो जो पीछे रह गए, उन्हें दुखानुभूति तो है, इस पर किसे संदेह है? पर आखिर जिंदगी तो नहीं रुकती, आगे ही बढ़ती है। वे फिर खड़े होंगे, बचा हुआ संसार संभालेंगे, नया रास्ता बनाएँगे, नए सपने देखेंगे, और कहीं एक गहरी टीस लिए, फिर मुस्कुराएँगे, और जो चला गया वह भी सब कुछ भुला कर, नया शरीर पहन कर, नई गोद में खेलेगा।
पर उस जाने वाले के लिए एक बात है। उसका एक शरीर ही नहीं गया, एक मौका खो गया, एक सुनहरा अवसर हाथ से छूट गया। यदि वह चाहता, प्रयास करता, संत सेवा करता, साधन मार्ग पर चलता, मनका मनका घिस डालता, तो मौत उसे क्या मारती? वह ही मौत को मार सकता था। पर उसके लिए अब क्या किया जा सकता है? जो चला गया वह तो चला ही गया।
हाँ! जो अभी गया नहीं, जो अभी यहीं है, जो अभी बचा है, उसके लिए अनन्त संभावना अब भी बनी हुई है। वह चाहे तो उसके लिए बहुत कुछ किया जा सकता है।
बाहर एक पेड़ बढ़ रहा है, जिसकी लकड़ी से अपनी चिता सजाई जाएगी। बस कब वह कटेगा? कब उसकी लकड़ी आरे पर ले जाई जाएगी? कब वह चिरेगी? कब वह सूखेगी? कब श्मशान पहुँचेगी? यह वह भी नहीं जानता और मैं भी।
पर शायद अभी ऐसा हुआ न हो। वह पेड़ अभी बढ़ ही रहा हो। अभी वह कटा न हो। अभी समय हो। अभी भी मौका हो। अभी भी होश में आने का संयोग बन जाए तो कहानी कुछ और ही हो जाए।
एक संत के विचार

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