25. किसान काल की कुछ यादें

25. किसान काल की कुछ यादें
कुछ दिन पूर्व गाजीपुर के किसान आंदोलन में शामिल होने का मौका मिला, तभी मुझे अपने किसान काल की कुछ बातें याद है। वे मैं आपके साथ शेयर कर रहा हूं कि वास्तव में किसान क्या होता है। 

हमनें (ईश्वर वैदिक) यह सारी बातें बचपन में स्वयं अपनी आंखों से देखी हैं कि जीवों के प्रति गहरी संवेदना हमारे महान पुरखों में जन्मजात होती थी। जिन्हें आजकल हम अशिक्षित कहते हैं। 

किसान एक वह व्यक्ति है जो आज भी सड़कों के किनारे बिना किसी लालच के वृक्ष लगाता है और कुछ समय बाद उन वृक्षों के दरख़्त होते ही वे सरकारी वृक्ष हो जाते हैं और इन्हीं वृक्षों की छांव में पथिक विश्राम करते हैं।

जीवो के प्रति गहरी संवेदना के कुछ उदाहरण है जो मुझे अचानक से ज्यादा है और उन्हें में आपके सामने रखने का प्रयास कर रहा हूं। यह सब अभी 30-40 वर्ष पूर्व तक होता रहा। मेरे हम उम्र यदि गांव में रहे हैं तो उन्हें यह बातें अवश्य याद आ जाएंगीं।

मुझे याद है कि हम छोटे होते थे तो हम गायों के पैरों के बीच चले जाते थे और वह हमें कुछ भी नहीं कहती थी जबकि हमारे घर के लोग डर जाया करते थे।

मुझे याद है कि एक बार कुछ लोग नदी में नहा रहे थे। अचानक से उनमें से एक का पैर फिसला और वह गहरे पानी में चला गया और डूबने लगा। किनारे पर बंधे हुए उसके बैल ने उसे देखा और पूरा जोर लगा कर अपने खूंटे को अखाड़ा नदी में कूद गया और अपने मालिक को बचाकर बाहर ले आया।

हल खींचते समय यदि कोई बैल गोबर या मूत्र त्यागने की स्थिति में होता था, तो किसान कुछ देर के लिए हल चलाना बन्द करके बैल के मल-मूत्र त्यागने तक खड़ा रहता था ताकि बैल आराम से यह नित्यकर्म कर सके, यह एक आम चलन था।

उस जमाने का देसी घी यदि आजकल के हिसाब से मूल्य लगाएं तो इतना शुद्ध होता था कि वर्तमान में उसकी कीमत दो हजार रुपये किलो तक हो सकती है। उस देसी घी को किसान विशेष कार्य के दिनों में हर दो दिन बाद आधा-आधा किलो घी अपने बैलों को पिला पिला दिया करता था।

टटीरी नामक पक्षी अपने अंडे खुले खेत में देती है और उनको सेती है। हल चलाते समय किसान को यदि सामने कहीं कोई टटीरी चिल्लाती मिलती थी तो किसान उसका इशारा समझ जाता था और उस अंडे वाली जगह को बिना हल जोते खाली छोड़ देता था।

उस जमाने में आधुनिक शिक्षा नहीं थी । पर सब आस्तिक थे । दोपहर को जब किसान के आराम करने का समय होता तो सबसे पहले बैलों को पानी पिलाकर चारा डालता और फिर खुद भोजन करता था। उसके लिए यह एक सामान्य नियम था ।

बैल जब बूढ़ा हो जाता था तो उसे कसाइयों को बेचना शर्म से भरा हुआ व सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता था । बूढा बैल, कई सालों तक खाली बैठा चारा खाता रहता था, मरने तक उसकी सेवा होती थी । 

उस जमाने के तथाकथित अशिक्षित किसान का मानवीय तर्क था कि इतने सालों तक इसकी माँ का दूध पिया और इसकी कमाई खाई है, अब बुढापे में इसे कैसे छोड़ दें, कैसे कसाइयों को दे दें काट खाने के लिए ? 

जब बैल मर जाता तो किसान फफक-फफक कर रोता था और उन भरी दुपहरियों को याद करता था । जब उसका यह वफादार मित्र हर कष्ट में उसके साथ होता था। 

माता-पिता को रोता देख किसान के बच्चे भी अपने बुड्ढे बैल की मौत पर रोने लगते थे। पूरा जीवन काल तक बैल अपने स्वामी किसान की मूक भाषा को समझता था कि वह क्या कहना चाह रहा है ।

वह पुराना भारत इतना शिक्षित और धनाढ्य था कि अपने जीवन व्यवहार में ही जीवन रस खोज लेता था । वह करोड़ों वर्ष पुरानी संस्कृति वाला वैभवशाली भारत था I

यदि यह सब आज भी महसूस करना चाहते हैं तो दो दराज के ग्रामों में रहने वाले किसानों से मिलिए आप आंखों देखा सब कुछ समझ जाएंगे।

वह अतुल्य भारत था I

आजकल हर इंसान अपने कर्मों/लक्षणों से दुःखी और तनाव ग्रस्त है।
🙏

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