24. चायवाला और कुमार साहब। (हास्य)
24. चायवाला और कुमार साहब (हास्य)
एक बार एक चाय वाला अपनी पत्नी को लेने ससुराल जा रहा था। उसी रास्ते में कुमार साहब मिल गए।
आगे क्या हुआ जानने के लिए पढ़ते हैं।
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एक बार एक चाय वाला अपनी पत्नी को लेने ससुराल जा रहा था। उसी रास्ते में कुमार साहब मिल गए।
कुमार साहब, "अरे मियां बड़े बन ठन के, कहाँ जा रहे हो ?"
चाय वाला, "अपनी पत्नी को लेने ससुराल जा रहा हूँ।"
कुमार साहब, "अब कोई फायदा नहीं हैं वहां जाने का।"
चाय वाला, "क्यों ? "
कुमार साहब, "क्योंकि, वो तो विधवा हो गई है।"
चाय वाला रास्ते से ही अपने गांव वापस आ गया।
चाय वाले की माँ, "खाली हाथ कैसे आया है...
बहु को कहाँ है, उसे कहां छोड़ कर आ गया ?
चायवाले ने कहा, "माँ ! वह तो विधवा हो गई, इसलिये लाया ही नहीं।"
चाय वाले की माँ, "कलमुहें... तेरे जिंदा रहते वो विधवा कैसे हो सकती है ?"
चाय वाला, "माँ.... मेरे जिंदा रहते, तू भी तो विधवा हो गई।"
चाय वाले की माँ , "नालायक... मैं तो विधवा इसलिए हो गई थी क्योंकि तेरा बाप मर गया था।"
चाय वाला, " ओह ! तो शायद उसका भी बाप मर गया होगा।"
चाय वाले की मां, "तुझे रास्ते में कौन मिला था?"
चाय वाला, "कुमार साहब"
चाय वाले की मां, "बेटा ! तुझे कितनी बार समझाया है...कि ...उस कुमार से मत उलझा कर"
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