103. विक्रम बैताल || कहानी 03 || यह रिश्ता मंजूर नहीं ||
* यह रिश्ता मंजूर नहीं। *
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एक अध्यापक ने अपने बेटे का रिश्ता तय किया। लेकिन बुजुर्गों के कहे अनुसार तथा अपने अनुभव के आधार पर रिश्ते को उन्होंने कुछ समय के लिए रोक देना ही उचित समझा। वास्तव में इससे दोनों परिवारों को एक दूसरे को जानने का मौका मिलता है। माता-पिता और बिचौलिए के अनुसार लड़की देखने में सुंदर, सुशील और पढ़ी लिखी थी। उसी प्रकार उसका नाम भी था सलोनी।
कुछ दिनों बाद मास्टर साहब को अपने होने वाले समधी के घर जाने का मौका मिला। तो देखा कि होने वाली समधन खाना बना रही थीं।
सभी बच्चे और होने वाली बहू (सलोनी) टी वी देख रही थी। उन्होंने मास्टर जी को देखा और फॉर्मेलिटी पूरी करके पुनः टीवी देखने में लग गई। मास्टर साहब ने चाय पी कुशल क्षेम जाना और वापस लौटने ही वाले थे कि समधी जी आ गए और उन्होंने खाना खाए बिना लौटना नहीं दिया। सलोनी के माता-पिता बहुत ही मिलनसार बहुत ही अच्छे और परोपकारी व्यक्ति थे।
एक माह बाद मास्टर साहब फिर से समधी जी के घर फिर गए। देखा कि भावी समधन जी झाड़ू लगा रहीं थी। बच्चे पढ़ रहे थे और होने वाली बहू सो रही थी। उन्होंने समधी सहब से पूछा
सलोनी कहां है, तो उन्होंने सलोनी को आवाज लगाई तो वह सोते हुए सीधे उठ कर चली आई।
वह अपने होने वाले ससुर को सामने देखकर जी झिझक गई। समधी जी ने उनकी अच्छे से आओ भगत की और चले गये।
कुछ दिन बाद मास्टर साहब को किसी काम से फिर होने वाले समधी जी के घर जाने का मौका मिल गया। दोपहर के 11:00 बजे थे। घर में पहुंच कर देखा कि होने वाली समधन बर्तन साफ़ कर रही थी। बच्चे टीवी देख रहे थे और होने वाली बहू खुद के हाथों में नेलपेंट लगा रही थी।
मास्टर साहब कि फिर से खातिरदारी हुई और उन्हें फिर से खाना खिलाया गया। साहब ने घर आकर गहन सोच-विचार कर लड़की वालों के यहाँ खबर पहुचाई कि हमें ये रिश्ता मंजूर नहीं है। बेताल आश्चर्य से राजा के मुख को देखता है।
और कहानी बीच में ही रोक दी और विक्रमादित्य से हर बार की तरह सवाल पूछ बैठा कि, “बताओ विक्रमादित्य, जब लड़की के माता-पिता बहुत अच्छे और खातिर करने वाले और लड़की भी बिचोलिए के अनुसार सलोनी, सुशील, सुंदर और सभ्य थी, फिर मास्टर साहब ने रिश्ता नामंजूर क्यों कर दिया?
सवाल सुनने के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने कोई जवाब नहीं दिया। इस पर गुस्से में बेताल ने कहा, “राजन जवाब पता होने पर भी आप उत्तर नहीं देंगे, तो मैं अपने तेज से तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा और मुक्त हो जाऊंगा।"
तब राजा ने जवाब देते हुए कहा कि बेताल ! मास्टर साहब अपने होने वाले समधी के घर तीन बार गए। तीनों बार सिर्फ समधन जी ही घर के काम काज में व्यस्त दिखीं। उन्होंने एक भी बार भी अपनी होने वाली बहू को घर का काम काज करते हुए नहीं देखा।
समधी जी, जो बेटी अपनी सगी माँ को हर समय काम में व्यस्त पा कर भी उन की मदद करने का न सोचे। अपनी उम्र दराज माँ से जवान हो कर भी स्वयं की माँ के कामों में हाथ बटाने का जज्बा न रखे। वो किसी और की माँ और किसी अपरिचित परिवार के बारे में क्या सोचेगी?
मास्टर साहब अभी बच्ची है जब सात फेरों में बनेगी तो सारे काम सीख जाएगी।
मुझे अपने बेटे के लिए एक अपरेंटिस या नव-सीखिए की नहीं एक बहू की आवश्यकता है। श्रयक
किसी गुलदस्ते की नहीं!जो किसी फ्लावर पाटॅ में सजाया
जाये!
इसलिये सभी माता-पिता को चाहिये!कि वे इन छोटी
छोटी बातों पर अवश्य ध्यान दें!
बेटी कितनी भी प्यारी क्यों न हो
उससे घर का काम काज अवश्य कराना चाहिए!
समय-समय पर डांटना भी चाहिए!
जिससे ससुराल में!
ज्यादा काम पड़ने या डांट पड़ने पर उसके द्वारा गलत करने!
की कोशिश ना की जाये!हमारे घर बेटी पैदा होती है!
हमारी जिम्मेदारी बेटी से
बहू बनाने की है!
अगर हमने अपनी जिम्मेदारी ठीक तरह से नहीं निभाई!
बेटी में बहू के संस्कार नहीं डाले तो इसकी सज़ा बेटी को तो मिलती है!
और माँ बाप को मिलती हैं!जिन्दगी भर
गालियाँ!
हर किसी को सुन्दर सुशील बहू चाहिए!
लेकिन भाइयो!
जब हम अपनी बेटियों में एक अच्छी बहु के संस्कार डालेंगे!
तभी तो हमें संस्कारित बहू मिलेगी!
ये कड़वा सच शायद कुछ लोग न बर्दाश्त कर पाएं!
----- लेकिन पढ़ें और समझें बस इतनी इलतिजा!
वृद्धाआश्रम में माँ बाप को देखकर सब लोग बेटो को ही
कोसते हैं!
लेकिन ये कैसे भूल जाते हैं!कि उन्हें वहां भेजने में
किसी की बेटी का भी अहम रोल होता है!
वरना बेटे अपने माँ बाप को शादी के पहले वृद्धाश्रम क्यों नही भेजते-------!🙏🏻🙏🏻
इतने में ही बेताल ने कहानी बीच में ही रोक दी और विक्रमादित्य से हर बार की तरह सवाल पूछ बैठा कि, “बताओ विक्रमादित्य, ललित ठहाके मारकर क्यों हंसा? उसने विद्या को कटु दृष्टि से क्यों देखा ? अच्छा, तो विद्या का दोष ढूंढ रहे हो। " ऐसा प्रश्न क्यों किया?
सवाल सुनने के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने कोई जवाब नहीं दिया। गुस्से में बेताल ने कहा, “राजन जवाब पता होने पर भी आप उत्तर नहीं देंगे, तो मैं अपने तेज से तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा और मुक्त हो जाऊंगा।"
तब राजा ने जवाब देते हुए कहा, “ बेताल! यह कहानी अधूरी है। आगे की कहानी इस प्रकार है। इस कहानी से तुम्हें तुम्हारे प्रश्नों के जवाब मिल जाएंगे" कहते हुए विक्रम ने कहानी शुरू कर दी।
उस समय सतीप्रथा का प्रचलन था। जिसमे पति के मरने के बाद पत्नी को पति की चिता के साथ जला दिया जाता था।
इसी बात से चिंतित होकर चतुर बोला, "हां, वह बेचारी तो निर्दोष है और तेरे मरने के बाद बेचारी बहू को भी तेरे साथ ही जिन्दा जला कर सती कर दिया जाएगा। "
तब ललित ने अपने भाई से पूछा, "जानते हो भाई साहब, वह वैद्य कहाँ है। जिसने मुझे जहर खिलाया था।"
तब ललित ने उसे बताया, "भाई ! तुम्हारी मृत्यु के तीन साल बाद वो मर गया था। तुम्हारे जाने के बाद उसने मुझसे बहुत पैसा ऐंठा था।"
तब ललित ने पूछा, "भाई जानते हो कि यह विद्या कौन है?"
ललित ने न में गर्दन हिलाई।
"भगवान ने देखो दोनों नाम मिलते-जुलते दिए हैं। लल्ला और ललित तथा विद्या और वैद्य।" ललित बोला।
"तो क्या?"
"आप सही समझे, भाई साहब, यह वही दुष्ट वैद्य आज मेरी पत्नी के रुप में है। अब इसे भी अपनी करनी का दंड मिलने जा रहा है। मेरे मरने पर इसे मेरे साथ ही जिन्दा जला दिया जाऐगा। और हां आप दोनों ध्यान रखिएगा कि आपको भी आपके कर्मों के फल भुगतने ही होंगे। अभी आपको उनसे मुक्ति नहीं मिली है।"
बेताल ! ईश्वर कहता है कि कर्मों का लेखा यहीं भुगत के जाना होता है। इस लिए कोई भी बुरा काम करो तो उसके फल के बारे में एक बार सोच विचार अवश्य कर लिया करो।
राजा का जवाब सुनकर बेताल बेहद खुश हुआ और बोला, “राजन ! तुम बहुत बड़े ज्ञानी हो। बिल्कुल सही। तुमने एक एक बात को अच्छे से समझा दिया। तुम्हें आगे की कहानी भी पता लग गई । तुम बहुत समझदार हो। परंतु, राजन ! शर्त के मुताबिक आपको चुप रहना था। अपने मुंह खोल दिया, अब मैं चला।”
इतना कहकर बेताल एक बार फिर से उड़ जाता है। इतना कहकर बेताल तुरंत ही हर बार की तरह उड़कर पेड़ पर जाकर उल्टा लटक गया। और विक्रम उसे उतारने के लिए पुनः चल दिया।
कहानी से सीख :
कर्म फल भुगतना ही पड़ता है । इसी जन्म में या फिर अगले जन्म में। इसलिए कर्म करने से पहले एक बार उसके अच्छे और बुरे फल के बारे में अवश्य सोच लेना चाहिए।
जिन बेटियों से घर का काम नही होता ! उनको कहीं पर भी जीवन में उचित सम्मान ओर उचित स्थान नही मिलता-------!! ==================================

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