पुत्रों के प्रकार
महाराजा चित्रकेतु पुत्रहीन थे। महर्षि अंगिरा का उनके यहां आना-जाना होता था। जब भी आते राजा उनसे निवेदन करते, ‘‘महर्षि मैं पुत्रहीन हूं, इतना बड़ा राज्य कौन संभालेगा? कृपा करो एक पुत्र मिल जाए, एक पुत्र हो जाए।’’ ऋषि बहुत देर तक टालते रहे। कहते ‘‘राजन, पुत्र वाले भी उतने ही दुखी हैं जितने पुत्रहीन।’’ किन्तु पुत्र मोह बहुत प्रबल है। बहुत आग्रह किया, कहा, ‘‘ठीक है परमेश्वर कृपा करेंगे तेरे ऊपर, पुत्र पैदा होगा।’’ कुछ समय के बाद एक पुत्र पैदा हुआ। थोड़ा ही बड़ा हुआ होगा कि राजा की दूसरी रानी ने उसे जहर देकर मरवा दिया। राजा चित्रकेतु शोक में डूबे हुए हैं। बाहर नहीं निकल रहे, महर्षि को याद कर रहे हैं। महर्षि बहुत देर तक इसी होनी को टालते रहे लेकिन होनी भी उतनी प्रबल। संत महात्मा भी होनी को कब तक टालते। आखिर जो भाग्य में होना है, वह होकर रहता है। संत ही है जो टाल सकता है कि आज का दिन इसको न देखना पड़े, तो टालता रहा। आज पुन: आए हैं लेकिन देवर्षि नारद को साथ लेकर आए हैं। राजा बहुत परेशान है। देवर्षि राजा को समझाते हैं कि तेरा पुत्र जहां चला गया है, वहां से लौट कर नहीं आ सकता। शोक रहित हो जा। ते...