पुत्रों के प्रकार

महाराजा चित्रकेतु पुत्रहीन थे। महर्षि अंगिरा का उनके यहां आना-जाना होता था। जब भी आते राजा उनसे निवेदन करते, ‘‘महर्षि मैं पुत्रहीन हूं, इतना बड़ा राज्य कौन संभालेगा? कृपा करो एक पुत्र मिल जाए, एक पुत्र हो जाए।’’

ऋषि बहुत देर तक टालते रहे। कहते ‘‘राजन, पुत्र वाले भी उतने ही दुखी हैं जितने पुत्रहीन।’’

किन्तु पुत्र मोह बहुत प्रबल है। बहुत आग्रह किया, कहा, ‘‘ठीक है परमेश्वर कृपा करेंगे तेरे ऊपर, पुत्र पैदा होगा।’’

कुछ समय के बाद एक पुत्र पैदा हुआ। थोड़ा ही बड़ा हुआ होगा कि राजा की दूसरी रानी ने उसे जहर देकर मरवा दिया। राजा चित्रकेतु शोक में डूबे हुए हैं। बाहर नहीं निकल रहे, महर्षि को याद कर रहे हैं। महर्षि बहुत देर तक इसी होनी को टालते रहे लेकिन होनी भी उतनी प्रबल। संत महात्मा भी होनी को कब तक टालते। आखिर जो भाग्य में होना है, वह होकर रहता है। संत ही है जो टाल सकता है कि आज का दिन इसको न देखना पड़े, तो टालता रहा। आज पुन: आए हैं लेकिन देवर्षि नारद को साथ लेकर आए हैं। राजा बहुत परेशान है।

देवर्षि राजा को समझाते हैं कि तेरा पुत्र जहां चला गया है, वहां से लौट कर नहीं आ सकता। शोक रहित हो जा। तेरे शोक करने से तेरी सुनवाई नहीं होने वाली। बहुत समझा रहे हैं राजा को लेकिन राजा फूट-फूट कर रो रहा था।

ऐसे समय में एक ही शिकायत होती है कि यदि लेना ही था तो दिया ही क्यों? यह तो आदमी भूल जाता है कि किस प्रकार से आदमी मांग कर लेता है, मन्नतें मांग कर इधर-उधर जाकर लिया है पुत्र हो, लेकिन आज उन्हें भी उलाहना दे रहा है। 

देवर्षि नारद राजा को समझाते हैं कि ‘‘पुत्र चार प्रकार के होते हैं। पिछले जन्म का बैरी, अपना बैर चुकाने के लिए पैदा होता है। उसे शत्रु पुत्र कहा जाता है। पिछले जन्म का ऋणदाता अपना ऋण वसूल करने आता है। हिसाब-किताब पूरा होता है जीवन भर का दुख देकर चला जाता है। तीसरी तरह के पुत्र उदासीन पुत्र विवाह से पहले मां-बाप के, विवाह होते ही मां-बाप से अलग हो जाते हैं कि अब मेरी और आपकी निभ नहीं सकती। चौथे प्रकार के पुत्र सेवक पुत्र होते हैं। माता-पिता में परमात्मा को देखने वाले सेवक पुत्र, सेवा करने वाले उनके माता-पिता की सेवा परमात्मा की सेवा, माता-पिता की सेवा हर किसी की किस्मत में नहीं है। कोई-कोई भाग्यवान है जिसको यह सेवा मिलती है उसकी साधना की यात्रा बहुत तेज गति से आगे चलती है। घर बैठे भगवान की उपासना करता है।’’

‘‘राजन, तेरा पुत्र शत्रु पुत्र था। शत्रुता निभाने आया था चला गया। यह महर्षि अंगिरा इसी को टाल रहे थे, पर तू न माना।’’ 

समझाने के बावजूद भी राजा रोए जा रहा है। मानो शोक से बाहर नहीं निकल पा रहा है। देवर्षि नारद कहते हैं,‘‘राजन! मैं तुझे तेरे पुत्र के दर्शन करवाता हूं।’’

सारे विधि-विधान तोड़ कर तो देवर्षि उसके मरे हुए पुत्र को लेकर आए हैं। शुभ्रत श्वेत कपड़ों में लिपटा हुआ है। राजा के सामने आकर खड़ा हो गया। देवर्षि कहते हैं,‘‘क्या देख रहे हो? तुम्हारे पिता हैं प्रणाम करो।’’ 

पुत्र आत्मा पहचानने से इंकार रही है। कौन पिता? किसका पिता? देवर्षि क्या कह रहे हो आप? न जाने मेरे कितने जन्म हो चुके हैं। कितने पिता! मैं नहीं जानता यह कौन है, किस-किस को पहचानूं? मेरे आज तक कितने मां-बाप हो चुके हैं किसको किसकी पहचान रहती है? मैं इस समय विशुद्ध आत्मा हूं। मेरा मां-बाप कोई नहीं। मेरा मां-बाप परमात्मा है तो शरीर के संबंध टूट गए, जितनी लाख योनियां आदमी भोग चुका है उतने ही मां-बाप। कभी चिडिय़ा में मां-बाप, कभी कौआ में मां-बाप, कभी हिरण में, कभी पेड़-पौधे इत्यादि-इत्यादि।

सुन लिया राजन! यह अपने आप बोल रहा है।

जिसके लिए मैं बिलख रहा हूं वह मुझे पहचानने से इंकार कर रहा है। समझाया पुत्र मोह केवल मन का भ्रम है। सत्य सनातन तो केवल परमात्मा हैं।

संत-महात्मा कहते हैं जो माता-पिता अपने पुत्र को, अपनी पुत्री को इस जन्म में सुसंस्कारी नहीं बनाते, उन्हें मानव धर्म का महत्व नहीं समझाते उनको संसारी बनाकर उनके शत्रु समान व्यवहार करते हैं तो अगले जन्म में उनके बच्चे शत्रु और बैरी पुत्र उनके घर पैदा होते हैं। अत: संतान का सुख भी अपने ही कर्मों के अनुसार मिलता है। जबरदस्ती, मन्नत इत्यादि से नहीं और मिल भी जाए कब तक रहे, इसका कोई भरोसा नहीं।


वेदों के अनुसार पुत्र कितने प्रकार के होते हैं । हिन्दू परिवार में विवाहिता स्त्री से उत्पन्न नर सन्तान को पुत्र कहा जाता है। पुत्र को बेटा, लड़का, बालक आदि नामों से भी सम्बोधित किया जाता है। पुत्र का प्रारम्भिक अर्थ लघु अथवा कनिष्ठ होता। 'पुत्रक' रूप का व्यवहार प्यार भरे सम्बोधन में अपने से छोटे लोगों के लिए होता था। आगे चलकर इस शब्द की धार्मिक व्युत्पत्ति की जाने लगी- "पुत=नरक से, त्र= बचाने वाला।" पुत्रों द्वारा प्रदत्त पिण्ड और श्राद्ध से पिता तथा अन्य पितरों का उद्धार होता है, इसलिए वे पितरों को नरक से त्राण देने वाले माने जाते हैं। धर्मशास्त्र में बारह प्रकार के पुत्रों का उल्लेख पाया जाता है। मनुस्मृति के अनुसार इनका क्रम इस प्रकार है:- औरस पुत्र क्षेत्रज पुत्र दत्तक पुत्र कृत्रिम पुत्र गूढज पुत्र अपविद्ध पुत्र कानीन पुत्र सहोढ़ पुत्र क्रीतक पुत्र पौनर्भव पुत्र स्वयंदत्त पुत्र शौद्र पुत्र अन्य वेदों ने भी पुत्र को इन 12 श्रेणियों में रखा है इनमें से भी औरस क्षेत्रज दत्त कृत्रिम गूढोत्पन्न और अपविद्ध - ये छ : पुत्रों से ऋण , पिण्ड , धन की क्रिया , गोत्र साम्य कुल वृति और प्रतिष्ठा रहती है । इनके अतिरिक्त- कानीन सगोढ़ क्रीत पौनर्भव स्वयं दत्त और पार्शव इनके द्वारा ऋण एवं पिंड आदि का कार्य नहीं होता - ये केवल नामधारी होते हैं व गोत्र एवं कुल से सम्मत नहीं होते। औरस अपने द्वारा उत्पन्न किया गया पुत्र। प्रकृत पुत्र को ही औरस पुत्र कहा जाता है। हिंदू धर्मानुसार अपने अंश से धर्मपत्नी के द्वारा उत्पन्न पुत्र को औरस पुत्र कहा जाता है। क्षेत्रज पति के नपुंसक , पागल - उन्मत्त या व्यसनी होने पर उसकी आज्ञा से काम वासना रहित पत्नी द्वारा उत्पन्न पुत्र। दत्तक गोद लिया हुआ , माता - पिता द्वारा दूसरे को दिया गया - इसके एवज में कोई धन - अनुग्रह - प्रत कार नहीं प्राप्त किया गया हो। कृत्रिमः श्रेष्ठजन , मित्र के पुत्र और मित्र द्वारा दिए गया पुत्र। गूढ वह पुत्र जिसके विषय में यह ज्ञान न हो कि वह गृह में किसके द्वारा लाया गया। अपविद्ध बाहर से स्वयं लाया गया पुत्र। कानीन कुँवारी कन्या से उत्पन्न पुत्र। सगोढ़ गर्भिणी कन्या से विवाह के बाद उत्पन्न पुत्र। क्रीत मूल्य देकर ख़रीदा गया पुत्र। पुनर्भव यह दो प्रकार का होता है - एक कन्या को एक पति के हाथ में देकर , पुन : उससे छीन कर दूसरे के हाथ में देने से जो पुत्र उत्पन्न होता है। स्वयंदत्त दुर्भिक्ष - व्यसन या किसी अन्य कारण से जो स्वयं को किसी अन्य के हाथ में सोंप दे। पार्शव व्याही गई या क्वाँरी अविवाहिता शूद्रा के गर्भ से ब्राह्मण का पुत्र। इसके अलावा भी शास्‍त्रों में 4 तरह के पुत्र बताए गए हैं- ऋणानुबंध पुत्र, शत्रु पुत्र, उदासीन पुत्र और सेवक पुत्र। ऋणानुबंध जिस भी व्यक्ति से आपने पूर्व जन्म में कोई ऋण लिया हैं, और चुकाया नहीं हैं। वो इस जन्म में आपका पुत्र बनकर आएगा, और तब तक आपका धन बर्बाद करेगा,जब तक कि उसका ऋण चुकता नहीं हो जाता। शत्रु पुत्र पिछले जन्म में अगर किसी को दुखी किया हैं या किसी का बुरा किया हैं तो इस जन्म में शत्रु पुत्र बनकर वो जन्म लेगा और बदला लेगा। उदासीन पुत्र ऐसा पुत्र अपने माता पिता से लगाव नहीं रखते। उनके दुख सुख से उन्हें कोई वास्ता नहीं होता। विवाह होते ही अपने माता पिता का त्याग कर देते हैं। सेवक पुत्र यह पुत्र श्रेष्ठ होता हैं। पिछले जन्म में निःस्वार्थ भाव से किसी व्यक्ति या गौ सेवा करने पर , वह व्यक्ति इस जन्म में पुत्र रूप में जन्म लेकर आपकी भी सेवा करता हैं।




यह सभी जानते हैं कि माता-पिता को अपने शरीर का पूर्ण विकास कर लेने तक, युवावस्था तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए । ग्रहस्थ जीवन में भी पूर्ण संयम का पालन करने से बलवान, निरोग, बुद्धिमान और दीर्घजीवी संतान पैदा होती है । परन्तु इस तथ्य को बहुत कम लोग जानते हैं कि माता-पिता के शुद्धाचरण का बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ता है ? बालक केवल हाड़-मांस का ही नहीं होता, उसमें अन्त: चेतना का भी प्रमुख भाग रहता है । यदि माता-पिता के मन में, मस्तिष्क में, अन्तःकरण में कुविचार, स्वार्थपरता, वासना, असंयम, अनुदारता की वृत्तियाँ भरी हुई हैं तो वह उसी रूप में या थोड़े बहुत परिवर्तित रूप में बालक में भी प्रकट होंगी । जैसे कोढ़ी या क्षयग्रस्त स्त्री-पुरुषों के रजवीर्य से दूषित रक्त वाले बालक जन्मते हैं वैसे ही बौद्धिक एवं नैतिक दृष्टि से रोगी लोगों की सन्तान भी पतित मनोभूमि की होती है ।

व्यभिचार जन्य जारज और वर्णशंकर सन्तान आमतौर से दुष्ट, दुराचारी एवं कुसंस्कारों से भरी हुई होती है क्योंकि उनके माता-पिता में पाप वृत्तियों की प्रधानता रहती है । जिन स्त्री पुरुषों में परस्पर द्वेष, घृणा एवं मनोमालिन्य रहता है, उनके बच्चे प्राय: कुरुप और बुद्धिहीन होते हैं । डाक्टर फाउलर ने इस सम्बन्ध में बहुत खोजबीन की है। उन्होंने बहुत से बालकों की विशेषताओं का कारण उनके माता- पिता की मानसिक स्थिति को पाया है, शारीरिक दृष्टि से गिरे हुए माता-पिता के द्वारा उन्होंने उत्तम स्वास्थ्य के बालकों की उत्पत्ति का कारण उन्होंने दम्पत्ति का पारस्परिक सच्चा प्रेम पाया । इसी प्रकार उन्हें इस बात के भी प्रमाण मिले कि उद्विग्न मनोदशा के दम्पत्ति शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अच्छी स्थिति के होने पर भी बीमार और बुद्धिहीन संतान के जनक बने ।

डाक्टर जान केवन ने मनोविज्ञान की दृष्टि से इस सम्बन्ध में विशेष शोध की है और वे अनेक उदाहरणों एवं प्रमाणों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यदि माता- पिता सद्गुणी, अच्छे स्वभाव के, कर्तव्यनिष्ठ, नीतिवान और धर्मात्मा हैं तो उनकी अपूर्णताओं और विकास की अन्य सुविधाओं के अभाव में भी बालक उत्तम शरीर और मन वाले उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी जो प्रतिकूल अपवाद देखे जाते हैं उनमें भी मानसिक प्रतिकूलताओं को ही उनने निमित्त कारण पाया है । धर्मात्मा लोग भी जब किसी अनीति से पीड़ित होते हैं और उनके मन में पीड़ा, उद्वेग एवं प्रतिहिंसा की अग्नि जलती है तो उनके बुरे संस्कारों से बालक की मनोभूमि भर जाती है । इसी प्रकार कभी-कभी बुरे आदमी भी परिस्थिति वश उच्च विचारधारा से भरे होते हैं, तो उसकी उत्तम छाया भी बच्चों पर आती है । पुलस्त ऋषि के घर रावण का, हिरण्यकश्यप के घर प्रहलाद का जन्म होने जैसी घटनाओं में उनने माता-पिता की मनोदशा के परिवर्तनों को ही कारण माना है ।


शास्‍त्रों में 4 तरह के पुत्र बताए गए हैं- ऋणानुबंध पुत्र, शत्रु पुत्र, उदासीन पुत्र और सेवक पुत्र। आओ जानते हैं कि उक्त 4 तरह के पुत्र कैसे होते हैं। ये 4 तरह का वर्णन पढ़कर आप भी जान सकते हैं कि आपका पुत्र कौन और कैसा है?

 नमस्कार दोस्तों आज हम एक महत्वपूर्ण विषय पर बात कर रहे है।हम सभी चाहते है,कि हमें पुत्र प्राप्त हो और उसके अन्दर सभी अच्छे व संस्कारी गुणों का विकास हो। वह माता-पिता की सेवा करे और आज्ञाकारी एवं चरित्रवान बने। तो इसके लिए हमारे शास्त्रों में चार प्रकार के पुत्र बताए गये है। four types of sons in hindi1- ऋणानुबन्ध पुत्र (Rinanubandh meaning in hindi) 2- शत्रु पुत्र (Enemy son in hindi) 3- उदासीन पुत्र (Nostalgic son in hindi) 4- सेवक पुत्र (Servant son in hindi) ए चारों पुत्र हमारे कर्म के अनुसार हमें प्राप्त होते है।आप अपने पुत्र के बारे में जान सकते हैं,कि आपका पुत्र किस प्रकार(Category)का है। वह किस राह पर जायेगा, कितना विद्वान होगा,आचरण कैसा रहेगा आदी। चलिए इन चारों पुत्रों के बारे मे विस्तृत से जानते है।

1- ऋणानुबंध पुत्र Rinanubandh Son 

ऋणानुबंध का अर्थ है कि जिससे आपका पिछले जन्म का ऋण(कर्जा) बंधा हो,या उससे आपका कुछ सम्बन्ध हो। हमारे पूर्व जन्मों का कर्ज हमें इस जनम में भुगतना पढता है। हम उस व्यक्ति का कर्जा उस जन्म में नहीं चुका पाते है,इसलिए हमें इस जन्म में उसकी सेवा करके उसका कर्जा उतारना होता है।यानी वह आपका पुत्र नहीं बल्कि आप उसके कर्जदार हो। और यह भी सत्य है कि जब तक आपने उस पुत्र या पुत्री का कर्जा न चुकाया तब तक वह आपके धन को बर्बाद करेगा या खूब धन खर्चा करायेगा चाहे माध्यम कुछ् भी हो। इसीलिए यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि आप अपने बच्चों की सेवा कर रहे हो बल्कि आप तो अपना कर्जा उतारने पर लगे हो।It should never be thought that you are serving your children, rather you are engaged in taking off your debt

2- शत्रु पुत्र Shatru Putr 

किसी व्यक्ति को शत्रु पुत्र प्राप्त हो जाता है। शत्रु पुत्र का अर्थ है - ऐसा पुत्र जिसे हमने जाने अनजाने में पूर्व जन्म में कोई दारूण दुख (असहनीय दुख) पहुँचाया हो,और वह बदला लेने के लिए पुत्र बनकर आपके जीवन में आया है। कर्मों की गती कभी नहीं थमती है।उसकी कुछ दमित इच्छा या बदला जो उस जन्म में नहीं ले पाया हो। इसीलिए वह पुत्र बनकर आया है और अपने लक्ष्य में कामयाब ही होगा,यानी वह पुत्र आपसे बदला लेकर ही रहेगा, चाहे माध्यम कोई भी हो।इसीलिए अगर आपका पुत्र आपकी बात नहीँ सुन रहा है,या आपके आचरण के विरुद्ध चल रहा है तो समझो वह आपसे बला ले रहा है।If your son is not listening to you, or is going against your conduct, then think he is cheating on you

3- उदासीन पुत्र Udaseen Putr 

उदासीन पुत्र का अर्थ है- माता-पिता के प्रति उदासीनता दिखाना,या उसका होना न होना। आप ऐसे पुत्र से कुछ आशायें नहीं पाल सकते ,आपकी सभी उम्मीदे धरी की धरी रह जाएगी। और यह आपको कोई नुकसान भी नहीं देते है।ऐसे पुत्र न सुख देते है न दुख । और ऐसे पुत्र तब तक साथ रहते है जब तक वह अपने कदमों पर खडा न हो जाए,उसके बाद वह आपको पूछता भी नहीं। इसीलिए उदासीन पुत्र का होना न होना बराबर है।The absence of an indifferent son is equal

4- सेवक पुत्र Servant Son 

सभी प्रकार के पुत्रों में यह पुत्र सबसे अच्छा माना गया है। सेवक पुत्र का अर्थ है - ऐसा पुत्र जिसकी आपने पिछले जन्म में निस्वार्थ भाव से सेवा की होऔर उसका फल आपको इस जन्म में मिल रहा है। शाब्दिक अर्थ है कि आपके पिछले अच्छे कर्मों का अच्छा फल आपको प्राप्त हो रहा है। आपने जो बोया था उसे आप इस जन्म में प्राप्त कर रहे है।और ऐसा पुत्र आपका कर्जा नहीं बल्कि वह पुत्र अपना कर्जा उताने आया है।

1. ऋणानुबंध : ऋणानुबंध का अर्थ होता है जिससे आपका ऋण बंधा या ऋण संबंध है। यदि आपने किसी से अपने पिछले जन्म में किसी भी प्रकार से कोई कर्ज या ऋण लिया है और आप उसे समय पर चुका नहीं पाए हैं, तो आपको इस जन्म में वह चुकाना होगा। जिसका आपने कर्ज नहीं चुकाया है, वह व्यक्ति आपका पुत्र बनकर आएगा और वह तब तक आपका धन बर्बाद करेगा या करेगी, जब तक कि उसका ऋण चुकता नहीं हो जाता।

 

 

2. शत्रु पुत्र : प्रचलित मान्यता के अनुसार यदि आपने पूर्व जन्म में किसी को किसी भी प्रकार का दारुण दु:ख पहुंचाया है और वह व्यक्ति आपसे किसी भी तरह से बदला लेना चाहता है लेकिन वह बदला नहीं ले पा रहा है और इसी तड़प में मर जाता है तो निश्चित ही वह व्यक्ति इस जन्म में आपका पुत्र बनकर लौटेगा और फिर वह अपना बदला पूरा करने में कामयाब होगा।

3. उदासीन पुत्र : जैसा कि शब्द से ही विदित होता है कि यह पुत्र आपके प्रति उदासीन ही रहेगा अर्थात इसका होना या न होना एक ही समान होगा और आपकी सारी की सारी अपेक्षाएं धरी की धरी ही रह जाएंगी। इस प्रकार की संतान अपने माता-पिता को न तो दु:ख देती है और न सुख। यह भी देखा गया है कि इनका विवाह हो जाने पर ये अपने माता या पिता से अलग हो जाते हैं।

4. सेवक पुत्र : यह पुत्र सबसे अच्‍छा माना जाता है। मान्यता है कि यदि आपने पिछले जन्म में बिना किसी लालच या स्वार्थ के सच्चे मन से किसी व्यक्ति आदि की सेवा की है, तो वह व्यक्ति आपके यहां जन्म लेकर आपकी भी सेवा करके अपना कर्ज उतारेगा।



हिन्दू परिवार में विवाहिता स्त्री से उत्पन्न नर सन्तान को पुत्र कहा जाता है। पुत्र को बेटा, लड़का, बालक आदि नामों से भी सम्बोधित किया जाता है।

पुत्र के पौराणिक सन्दर्भ

पुत्र का प्रारम्भिक अर्थ लघु अथवा कनिष्ठ होता। 'पुत्रक' रूप का व्यवहार प्यार भरे सम्बोधन में अपने से छोटे लोगों के लिए होता था। आगे चलकर इस शब्द की धार्मिक व्युत्पत्ति की जाने लगी- "पुत=नरक से, त्र= बचाने वाला।" पुत्रों द्वारा प्रदत्त पिण्ड और श्राद्ध से पिता तथा अन्य पितरों का उद्धार होता है, इसलिए वे पितरों को नरक से त्राण देने वाले माने जाते हैं। धर्मशास्त्र में बारह प्रकार के पुत्रों का उल्लेख पाया जाता है। मनुस्मृति[1] के अनुसार इनका क्रम इस प्रकार है:-


पुत्र संज्ञा पुं॰ [सं॰ पुत्त्र] [स्त्री॰ पुत्री]

१. लड़का । बेटा । विशेष—'पुत्र' शब्द की व्युत्पत्ति के लिये यह कल्पना की गई है कि जो पुन्नाम ['पुत्' नाम] नरक से उद्धार करे उसकी संज्ञा पुत्र है । पर यह व्यत्पत्ति कल्पित है । मनु ने बारह प्रकार के पुत्र कहै हैं—औरस, क्षेत्रज, दत्तक, कृत्रिम्, गूढ़ोत्पन्न, अपविद्ध, कानीन, सहोढ, क्रीत, पौनर्भव, स्वयंदत्त और शौद्घ । 

औरस पुत्र – विवाहिता सवर्णा स्त्री के गर्भ से जिसकी उत्पत्ति हुई हो वह 'औरस' कहलाता है । औरस ही सबसे श्रेष्ठ और मुख्य पुत्र है । 

क्षेत्रज पुत्र – मृत, नपुंसक आदि की स्त्री देवर आदि से नियोग द्वारा जो पुत्र उत्पन्न करे वह 'क्षेत्रज' है । 

दत्तक पुत्र – गोद लिया हुआ पुत्र 'दत्तक' कहलाता है । 

कृत्रिम पुत्र – किसी पुत्र गुणों से युक्त व्यक्ति को यदि कोई अपने पुत्र के स्थान पर नियत करे तो वह 'कृत्रिम' पुत्र होगा । 

गूढ़ोत्पन्न पुत्र – जिसकी स्त्री को किसी स्वजातीय या घर के पुरुष से ही पुत्र उत्पन्न हो, पर यह निश्चित न हो कि किससे, तो वह उसका 'गूढ़ोत्पन्न' पुत्र कहा जायगा । 

अपविद्ध पुत्र– जिसे माता पिता दोनों ने या एक ने त्याग दिया हो और तीसरे ने ग्रहण किया हो वह उस ग्रहण करनेवाले का 'अपविद्ध' पुत्र होगा । 

कानीन – जिस कन्या ने अपने बाप के घर कुवारी अवस्था में ही गुप्त संयोग से पुत्र उत्पन्न किया हो उस कन्या का वह पुत्र उसके विवाहिता पति का 'कानीन' पुत्र कहा जायगा । 

सहोढ़ – पहले से गर्भवती कन्या का जिस पुरुष के साथ विवाह होगा गर्भजात पुत्र उस पुरुष का 'सहोढ़' पुत्र होगा । 

क्रीत – माता पिता को मूल्य देकर जिसे मोल लें वह मोल लेनेवाले का 'क्रीत ' पुत्र कहा जायगा । 

पौनभर्व – पति द्वारा त्यागी जाकर अथवा विधवा या स्वेच्छाचारिणी होकर जो परपुरुष संयोग द्वारा पुत्र उत्पन्न करे वह पुत्र उस पुरुष का 'पौनभर्व' पुत्र होगा । 

स्वयंदत्त – मातृपितृविहीन अथवा माता पिता का त्यागा हुआ यदि किसी से आप आकर कहे कि 'मैं आपका पुत्र हुआ' तो वह 'स्वयंदत्त' पुत्र कहलाता है । 

शौद्र – विवाहिता शूद्रा और ब्राह्मण से संयोग से उत्पन्न पुत्र ब्राह्मण का 'पार्शव' या 'शौद्र' पुत्र कहलाएगा ।




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