ऑक्सिजान है तो
ऑक्सिजान है तो जहान है
जब हवा में ऑक्सिजन है तो सिलिंडर क्यों?
इन दिनों हर तरफ कोरोना की ही बातें होती हैं। अब ऑक्सिजन सिलिंडर की भी चर्चा हो रही है। ऐसे में आपके मन में भी यह सवाल आ रहा होगा कि हम जिस हवा में सांस लेते हैं उसमें ऑक्सिजन है तो अलग से ऑक्सिजन सिलिंडर की क्या जरूरत है? यह सिलिंडर कैसा होता है और इसमें कैसी ऑक्सिजन गैस भरी जाती है, आज यही जानते हैं:
सिलिंडर में होती है 98% ऑक्सिजन
यह तो आप जानते ही होंगे कि हमारे एनवायरमेंट में 21% ऑक्सिजन, 78% नाइट्रोजन और बाकी दूसरी गैसें हैं। अगर सिलिंडर वाली ऑक्सिजन की बात की जाए तो एक मशीन से हवा में मौजूद नाइट्रोजन और दूसरी हानिकारक गैसों को अलग कर देते हैं और बहुत ज्यादा शुद्ध ऑक्सिजन को सिलिंडर में भर दिया जाता है। सिलिंडर में 98% तक ऑक्सिजन ही होती है।
सिलिंडर इसलिए जरूरी
हमें जितनी ऑक्सिजन की जरूरत है, उतनी आसपास की हवा से मिल जाती है। लेकिन जब कोई बीमार पड़ता है और उसके फेफड़े धीरे-धीरे काम करते हैं तो 21% ऑक्सिजन काम नहीं आती। ऐसे में मरीज को ज्यादा पर्सेंटेज वाली ऑक्सिजन की जरूरत होती है। इसलिए ऐसे मरीजों को ऑक्सिजन सिलिंडर की जरूरत होती है ताकि उन्हें सिलिंडर में मौजूद 98% फीसदी ऑक्सिजन दी जा सके। लेकिन इससे पहले उनका ऑक्सिजन का लेवल देखा जाता है। यह लेवल ऑक्सीमीटर से चेक कर सकते हैं।
सिलिंडर में लिक्विड फॉर्म में ऑक्सिजन
हमारे आसपास की हवा में ऑक्सिजन गैस के रूप में होती है जबकि सिलिंडर में लिक्विड फाॅर्म में। इसे -185 डिग्री सेल्सियस टेंपरेचर पर गैस से लिक्विड में बदला जाता है। सिलिंडर से बाहर निकलने पर यह वापस गैस में बदल जाती है और इससे सांस ले सकते हैं। देश में ऑक्सिजन बनाने वाले काफी प्लांट हैं। इस ऑक्सिजन का इस्तेमाल अस्पतालों के साथ इंडस्ट्री में भी होता है। हमारे देश में जितनी ऑक्सिजन बनाई जाती है, उसका 15% अस्पतालों में और बाकी 85% इंडस्ट्री में होता है। अब अचानक बहुत सारे लोगों को ऑक्सिजन सिलिंडर चाहिए तो अस्पतालों में ऑक्सिजन की कमी दिखने लगी। लेकिन अच्छी खबर यह है कि अब बहुत सारे टैंकर ऑक्सिजन प्लांट से गैस सिलिंडर लेकर देश के कोने-कोने में जा रहे हैं इससे जल्दी ही यह कमी दूर जाएगी।
जब धरती बनी थी तो ऑक्सिजन गैस नहीं थी। बाद में ऑक्सिजन गैस बननी शुरू हुई, समझिए तभी सेे धरती पर जीव पैदा होने शुरू हुए। फिर पेड़-पौधों, शैवालों (एल्गी) ने इसे स्थिर करने में अहम भूमिका निभाई। सीधे कहें तो धरती पर हमारी मौजूदगी की सबसे अहम वजह ऑक्सिजन यानी प्राणवायु है। आज धरती पर ऑक्सिजन की मात्रा लगभग 21 फीसदी है। कोरोना ने इस ऑक्सिजन की मौजूदगी को भी कम साबित कर दिया है। लोग ऑक्सिजन के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। हां, अगर इस धरती पर ऑक्सिजन की मात्रा 95 फीसदी से ज्यादा हो जाए तो किसी की जान ऑक्सिजन की कमी की वजह से नहीं जाएगी, लेकिन यह मुमकिन नहीं है। अब कोरोना को देखते हुए किसी शख्स के ऑक्सिजन सेचुरेशन में अगर सामान्य यानी 94 से 3 से 4 पॉइंट की कमी आ जाए तो उसे घर ही दूर किया जा सकता है। एक्सपर्ट्स से बात करके इन्हीं उपायों को बता रहे हैं लोकेश के. भारती
सबसे जरूरी बातें...1. कुछ लोगों में हैपी हाइपोक्सिया के मामले बनते हैं। ये मामले ज्यादातर 30 साल से ज्यादा उम्र के युवाओं में ज्यादा देखे गए हैं। इसमें मरीज का ऑक्सिजन स्तर 70 फीसदी से नीचे जाने पर भी मरीज की सांस नहीं फूलती। ऐसे में यह खतरनाक हो जाता है। इसलिए जो भी कोरोना के मरीज हैं, सभी को 3 से 4 बार ऑक्सिमीटर में ऑक्सिजन का स्तर जरूर देखना चाहिए।
2. जिनमें लक्षण नहीं हैं या कम हैं, वे दिन में 3 से 4 बार ऑक्सिजन का स्तर देखें। वहीं जिन्हें लक्षण हैं, वे हर 2 घंटे पर और
अगर बीच में सांस फूले तो उस समय भी जरूर देखें।
3. ऑक्सिजन का स्तर 90 या इससे नीचे होने पर ऑक्सिजन की व्यवस्था होनी चाहिए। यह व्यवस्था पहले तो अस्पताल में बेड के लिए करनी चाहिए। अगर बेड नहीं मिल पा रहा हैै तो घर पर ऑक्सिजन कंसंट्रेटर या सिलिंडर की व्यवस्था करनी चाहिए। फौरी राहत के लिए डीप ब्रीदिंग और प्रोनिंग पोजिशन में लेटना फायदेमंद हो सकता है।
4. प्रोनिंग पोजिशन में लेटने पर ऑक्सिमीटर लगा लें। इससे यह पता चलेगा कि किस पोजिशन में ऑक्सिजन का स्तर ज्यादा बढ़ रहा है। जिस पोजिशन में ज्यादा बढ़े, उसमें ज्यादा देर तक लेटना चाहिए।
कोरोना से संक्रमित करीब 90 फीसदी लोग होम आइसोलेशन में रह कर इलाज करा रहे हैं। इनमें से ऐसे लगभग 10 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनका ऑक्सिजन सेचुरेशन कुछ हद तक गड़बड़ हो रहा है। ऑक्सिमीटर में इनकी सामान्य ऑक्सिजन रीडिंग 94 से कम होकर 90-92 तक पहुंच रही है। ऐसे लोग घर पर कुछ एक्सरसाइज और ऑक्सिजन बढ़ाने के तरीकों की मदद से यह स्तर बढ़ाकर 94 से 96 या इससे ऊपर भी ले जा सकते हैं।
घर पर ऑक्सिजन का स्तर बढ़ाने की कोशिश...
-सामान्य ढंग से बैठे या लेटे हुए ऑक्सिजन का सेचुरेशन 90 से ऊपर हो, पर 94 से नीचे।
-सांस न फूल रही हो।
-6 मिनट वॉक टेस्ट करें, अगर ऑक्सिजन का स्तर फिर भी 90 से कम नहीं हो रहा हो। अगर यह नीचे जाता है तो मुमकिन है कि इंफेक्शन ने फेफड़ों को परेशान करना शुरू कर दिया है। ऐसे में अस्पताल में बेड के लिए कोशिश करनी चाहिए।
-वॉक टेस्ट के लिए मरीज को सामान्य चाल से चलते हुए 6 मिनट तक लगातार वॉक करना है। अस्थमा के मरीजों के लिए ही पहले इस टेस्ट को कराया जाता था, लेकिन अब इसे कोरोना के लिए भी कराया जाता है।
-इस टेस्ट के बाद अगर ऑक्सिजन का स्तर कम हो जाता है तो यह मुमकिन है आइसोलेशन के दौरान जब शरीर कमजोर होता है तो बाथरूम आदि जाने पर भी ऑक्सिजन का स्तर गिर सकता है। तब कोई खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है।
-मरीज डीप ब्रीदिंग करने में सक्षम हो।
-कोई और दूसरे गंभीर लक्षण जैसे डायरिया या दस्त की परेशानी न हो।
ऑक्सिजन बढ़ाने के लिए ये तरीके हैं कारगर
प्रोनिंग पोजिशन
यह पोजिशन सभी के लिए फायदेमंद है। जिन्हें कोरोना नहीं हुआ है और उन्हें फेफड़ों से जुड़ी कोई परेशानी नहीं है, तो उनके लिए इसे करना उनकी मर्जी पर है। इसके अलावा वे लोग जिन्हें कोरोना हुआ है और उनका ऑक्सिजन का स्तर 6 मिनट वॉक के बाद 94 से नीचे जा रहा हो तो उन्हें प्रोनिंग पोजिशन में जरूर लेटना चाहिए। अगर ऑक्सिजन सेचुरेशन 90 से नीचे चला गया है तो जब तक ऑक्सिजन की व्यवस्था न हो जाए, प्रोनिंग पोजिशन में लेटना फायदेमंद रहेगा। इससे फेफड़ों के निचले हिस्से में भी ऑक्सिजन की मात्रा ज्यादा पहुंचने लगती है जहां कोरोना ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। इससे फेफड़ों के टिशू ठीक होने लगते हैं।
वैसे तो प्रोनिंग पोजिशन से आजकल लोग परिचित हो चुके हैं, लेकिन इसे गलत तरीके से कर रहे हैं। आइए जानते हैं इसका सही तरीका क्या है और इसके लिए क्या सामान चाहिए?
-एक समतल बेड, 3 से 4 तकिये
-इस बात का भी ध्यान रखना है कि अगर वजन ज्यादा है तो संभव है कि थोड़ा पेट भी बढ़ा हुआ हो। ऐसे में ज्यादा तकियों की जरूरत पड़ेगी।
ऐसे करें प्रोनिंग
पहले पेट के बल लेटकर इसे फर्श पर भी कर सकते हैं और पलंग पर भी।तकियों की पोजिशन
पहला: 1 तकिया गर्दन और छाती के ऊपरी हिस्से पर हो।
दूसरा: पेट के नीचे और जाघों से ऊपर यानी पेट दबने वाली स्थिति में हरगिज न हों, वहां पर तकिया रखें। अगर वजन ज्यादा है और पेट बाहर की ओर है तो 2 या 3 तकियों की जरूरत पड़ सकती है वरना 1 से भी काम चल सकता है।
तीसरा: एक तकिया घुटनों से नीचे और पंजों से ऊपर वाली पोजिशन में रखा हो।
-सबसे खास बात यह कि जब इस पोजिशन में लेट जाएं तो एक हाथ पेट के नीचे रखकर देख लें कि वह दब तो नहीं रहा। अगर पेट दब रहा होगा तो प्रोनिंग का फायदा कम होगा क्योंकि फेफड़ों में ज्यादा हवा पहुंचाने के लिए पेट नहीं दबना चाहिए। फेफड़ों के संचालन में डायफ्राम एक अहम अंग होता है जो पेट के ऊपरी हिस्से में मौजूद रहता है। सांस के साथ हमारे पेट का ऊपर नीचे होना, डायफ्राम की मदद से ही होता है। साथ ही हाथों को सुविधानुसार रखना है। हाथ छाती या पेट के नीचे न रखें।
-इसे करते समय ऑक्सिमीटर लगा लें ताकि यह पता चले कि ऑक्सिजन का स्तर नीचे नहीं जा रहा है। अगर नीचे जाने लगे तो इसे न करें। इसका मतलब है यह पोजिशन सही नहीं है। कितनी देर करें: 30 मिनट से 45 मिनट
राइट और लेफ्ट साइट करवट लेकर लेटना
-इस पोजिशन में सिर्फ एक तकिया सिर के नीचे रखें और बाकी तकियों को हटा दें।
कितनी देर लेटें: 30 मिनट से 45 मिनट
पीठ के बल लेटना
-इसमें भी सिर के नीचे एक पतला तकिया रखें। इसे सामान्य तरीके से लेटना कह सकते हैं। शरीर इस अवस्था में सबसे ज्यादा आराम महसूस करता है। चारों पोजिशन में इसे सबसे आखिर में करें। कितनी देर लेटें: 30 मिनट से 45 मिनट
नोट: ऊपर बताए हुए प्रोनिंग के पोजिशन सबसे खास हैं। प्रोनिंग की हर पोजिशन में ऑक्सिमीटर लगाकर रखें। इससे यह पता चलेगा कि किस पोजिशन में ऑक्सिजन स्तर ज्यादा बढ़ रहा है। अगर किसी खास पोजिशन में ऑक्सिजन लेवल ज्यादा बढ़ रहा है तो उसे ज्यादा देर करें। अगर किसी पोजिशन में ऑक्सिजन नीचे जा रहा है तो उस पोजिशन को कम या न करें। पूरी प्रोनिंग प्रक्रिया को दिन में 3 से 4 बार कर सकते हैं।
योग
डीप ब्रीदिंग
हमारे देश में फेफड़ों को मजबूत करने के लिए यह उपाय सदियों से चला आ रहा है। डीप ब्रीदिंग करने का सही तरीका क्या है?
-अगर ऑक्सिजन का स्तर 90 से ऊपर है और सांस न फूल रही हो तो इसे कर सकते हैं। इसके लिए आराम से बैठ जाएं। अपनी छाती को आराम की स्थिति में रखें। इसके बाद नाक या मुंह से सांस अंदर खींचे और उसे रोककर रखें। अगर पहली बार में 10 सेकंड के लिए भी रोक कर रखा है तो अगली बार इसे 12 सेकंड तक के लिए करें। अगर खांसी होने लगे तो होल्ड करने की प्रक्रिया को छोड़ सकते हैं। सिर्फ गहरी सांस लें। फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ें।
कितनी बार करना है: इसे हर शिफ्ट में 10 बार करें। दिन में कम से कम से कम 10 बार करें।
-सुबह-शाम 10-10 मिनट अनुलोम-विलोम भी करें।
हास्य योग
अगर ऑक्सिजन का स्तर 90 से ऊपर है तो ऑक्सिजन की मात्रा बढ़ाने के लिए कुछ हास्य क्रियाएं भी फायदेमंद हो सकती हैं:
1. नाक से सांस लेना और मुंह से छोड़ना: आराम से बैठ जाएं। अपने दोनों हाथों को ऊपर की तरफ उठाएं। फिर नाक से गहरी सांस लें और हंस दें। इससे अपने आप ही हवा मुंह से बाहर निकल जाएगी।
2. बिना गुब्बारे के मुंह से गुब्बारा फुलाएं: जिस तरह गुब्बारे में हवा भरने के लिए हवा को नाक से अंदर खींचकर मुंह में लाते हैं और फिर गुब्बारे में डालते हैं। उसी तरीके से यह सोचना है कि हवा गुब्बारे में भरना है। पहले हवा को बाहर से अंदर खींचना है और फिर बाहर छोड़ना है। हवा छोड़ते समय हंस सकते हैं।
पैनिक न करना
जो शख्स परेशानी में भी धैर्य रखता है, घबराता नहीं, आधी जंग तो वह ऐसे ही जीत लेता है। कोरोना के मामले में भी ऐसा ही है। कोरोना से खौफ का आलम यह है कि जिन्हें कोरोना हो गया हो उनकी बात छोड़िए, जिन्हें नहीं हुआ है वे भी डरकर अपना ऑक्सिजन लेवल नीचे पहुंचा देते हैं। उनका बीपी बढ़ रहा है, हार्ट रेट को बढ़ा रहे हैं। अपनी तबियत खराब कर रहे हैं। ऐसे में जिन्हें कोरोना नहीं है और जो कोरोना के कारण आइसोलेशन में हैं या फिर जो आइसोलेशन से निकल चुके हैं, सभी को कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है:
-कोरोना की खबरों को देखकर या सोशल मीडिया पर चलने वाली खबरों को देखकर विचलित होते हैं। पैनिक हो रहा है तो ऐसी खबरों से दूरी बना लें।
-अगर कोई जानने वाला ऐसी खबरें बार-बार भेज रहा हो या किसी ग्रुप में ऐसी खबरें शेयर की जाती हों तो पहले ऐसा करने से मना कर दें। फिर भी न मानें तो ऐसे ग्रुप या शख्स से अलग हो जाएं। वॉट्सऐप कुछ दिनों के लिए बंद भी कर सकते हैं।
-ऐसे लोगों से बातें करें जो मजाकिया हों और हमेशा ही पॉजिटिव बातें करते हों।
-इनडोर गेम्स के लिए समय जरूर निकालें। इसे अपने पार्टनर, पैरंट्स या बच्चों के साथ खेल सकते हैं। जैसे- लूडो, चेस, प्लेइंग कार्ड्स, कैरम बोर्ड, तंबोला आदि। खेलते समय बिलकुल बच्चे बन जाएं और जीत का जश्न मनाएं। अगर बीमार हैं और कमजोरी नहीं आई है तो जीत का जश्न मनाते हुए थोड़ा चिल्ला भी सकते हैं। इससे निगेटिव एनर्जी बाहर निकलेगी।
-टीवी या मोबाइल पर कॉमेडी शो देखें। अगर पहले देख चुके हैं तो रिपीट देखें। साथ ही अपने पसंदीदा गाने सुनें। अगर भक्ति गीत सुनने में मजा आता है तो उसे भी जरूर सुनें।
-यह यकीन करें कि हर वक्त गुजरता है। यह बुरा वक्त भी जरूर गुजरेगा। दरअसल, किसी शख्स को यह पता हो कि यह दुख कुछ दिनों में खत्म हो जाएगा तो वक्त काटना आसान हो जाता है।
-डीप ब्रीदिंग, अनुलोम-विलोम और मेडिटेशन करें। ये मन में पॉजिटिव एनर्जी बढ़ाते हैं।
ऑक्सिजन कंसंट्रेटर: घर पर 24 घंटे ऑक्सिजन के लिए यह है विकल्प
होम आइसोलेशन में जब ऑक्सिजन का स्तर 94 से कम होने लगे तो मरीज को अमूमन ऑक्सिजन की जरूरत होती है। ऐसे में ऑक्सिजन सप्लाई के 2 अहम उपाय बनते हैं। पहला यह कि ऑक्सिजन सिलिंडर की व्यवस्था की जाए और दूसरा ऑक्सिजन कंसंट्रेटर की।
किसे और कब जरूरत होती है ऑक्सिजन कंसंट्रेटर की...
-मरीज की सांस फूल रही हो। उससे नीचे जा रहा हो और यह स्तर किसी भी सूरत में -85 से कम न हों।
-मरीज की सांस फूल रही हो।
-ऑक्सिजन सिलिंडर की व्यवस्था लगातार नहीं हो पा रही हो जबकि मरीज को 24 घंटे ऑक्सिजन की जरूरत हो।
-मरीज को कोई दूसरी गंभीर परेशानी न हो यानी मरीज को आईसीयू में भर्ती होने की जरूरत न हो। अगर मामला गंभीर है तो अस्पताल ही बेहतर विकल्प होगा।
बिजली जरूरी है...
मरीज का ऑक्सिजन का स्तर 85 तक पहुंचा हो तो उसका काम 5 लीटर वाले कंसंट्रेटर से चल जाएगा। इससे नीचे जाने पर 7 या 10 लीटर वाले ऑक्सिजन कंसंट्रेटर की जरूरत होगी, लेकिन इसके लिए कोशिश तब करनी चाहिए जब अस्पताल में बेड की व्यवस्था न हो। मशीन सही तरीके से चले इसके लिए लगातार बिजली की सप्लाई होनी चाहिए। कम पावर की मशीन को इनर्वटर से चला सकते हैं।
कंसंट्रेटर में ऑक्सिजन का बनना
हवाओं में मौजूद गैसों के मिश्रण से ऑक्सिजन को अलग किया जाता है। इसमें पानी की जरूरत होती है। इसकी मदद से यह नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड आदि गैसों को अलग कर ऑक्सिजन को मशीन में मौजूद 1 या 2 सिलिंडरों में भरता है और फिर ऑक्सिजन की सप्लाई मरीज को हो जाती है। बाकी गैसों को फिर से हवा में छोड़ देता है।
चलाते समय क्या ध्यान रखें
-बिजली की सप्लाई हमेशा होनी चाहिए।
-कमरे की खिड़कियां जरूर खुली होनी चाहिए। इससे ताजा हवा कमरे में आती रहेगी और कमरे में मशीन से निकलने वाली नाइट्रोजन समेत दूसरी गैसों का घनत्व नहीं बढ़ेगा।
-जब ऑक्सिजन कंसंट्रेटर चल रहा हो तो एसी न चलाएं। एसी चलाते समय कमरे की खिड़कियां और दरवाजों को बंद कर दिया जाता है।
-मास्क सैनिटाइज करके ही इस्तेमाल करें।
क्या है इसकी खासियत
-इसमें कई कैटिगरी होती हैं।
-कुछ मशीनों में नेबुलाइजर की सुविधा भी होती है।
-यह अमूमन 5 लीटर, 7 लीटर और 10 लीटर की क्षमताओं में आता है।
-7 लीटर प्रति मिनट और 10 लीटर प्रति मिनट ऑक्सिजन की उत्पादन क्षमता से है।
-10 लीटर प्रति मिनट ऑक्सिजन की सप्लाई अगर हो तो 84 ऑक्सिजन स्तर वाले का भी काम चल सकता है, लेकिन यहां इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि मरीज की स्थिति गंभीर न हो। वह आईसीयू मरीज की स्थिति में न पहुंचा हो। जब तक बेड न मिले तब तक इससे मरीज को ऑक्सिजन की सप्लाई की जा सकती है।
इसे खरीदते समय क्या रखें ध्यान...
-चूंकि अभी इस मशीन की मांग बहुत ज्यादा है इसलिए इसकी कीमत बढ़ गई है।
-अगर मुमकिन हो तो ज्यादा लीटर यानी 7 या 10 लीटर वाली मशीन ही खरीदें, इससे मरीज में ऑक्सिजन का स्तर 84 या 85 तक पहुंचने पर भी अस्पताल में एडमिट होने के लिए समय मिल जाता है।
-मशीन के साथ में मास्क और पाइप भी लगा हुआ ही आता है। इसे भी चेक कर लें।
-अगर ऑफलाइन यानी सीधे दुकान से खरीद रहे हैं तो मशीन को चलवाकर जरूर चेक कर लें। उसके सभी फंक्शन को अच्छी तरह समझ लें। चाहें तो इसके लिए इसके फंक्शन को पेपर पर नोट कर लें या विडियो बना लें।
-अगर ऑनलाइन खरीद रहे हैं तो जिस कंपनी का खरीद रहें हैं उसके कॉल सेंटर या सर्विस सेंटर पर फोन करके पूरा फंक्शन समझ लें और उसे रिकॉर्ड कर लें ताकि आगे भी परेशानी न हो। वैसे मशीन के साथ ब्रॉशर मिलता है, जिसे पढ़कर भी समझा जा सकता है, लेकिन ज्यादा बेहतर समझने के लिए ऊपर बताए हुए उपाय भी कर सकते हैं।
-वारंटी कार्ड जरूर लें।
कंपनियां: कई कंपनियां जैसे फिलिप्स, इवॉक्स, वेलकॉन आदि बनाती हैं।
कीमत: 35 हजार से शुरू होकर 2 लाख तक जा सकती हैं। ज्यादा लीटर वाले की कीमत ज्यादा होती है। कई जगह ये मशीनें रेंट पर भी मिल जाती हैं। 5000 से 7000 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से चार्ज किया जाता है।
नोट: इनके अलावा भी कई अच्छी कंपनियां मार्केट में हैं। कीमतें कम या ज्यादा हो सकती हैं।
ऑक्सिजन सिलिंडर से फौरी राहत
चूंकि ऑक्सिजन कंसंट्रेटर की कीमत ज्यादा है। ऐसे में सभी के लिए इसे खरीदना या इसका इंतजाम करना मुश्किल है। ऐसे लोग ऑक्सिजन सिलिंडर से भी काम चला सकते हैं। अगर किसी शख्स का ऑक्सिजन स्तर 90 या इससे ऊपर है तो ऑक्सिजन सिलिंडर मंगवा सकते हैं। अगर ऑक्सिजन सप्लाई के बाद यह 94 या 95 से ऊपर नहीं जा रहा है तो इसका मतलब यह हो सकता है कि फेफड़ों में हल्का इंफेक्शन है। चूंकि आजकल 80 फीसदी से ज्यादा लोग होम आइसोलेशन में हैं। इनमें लगभग 15 फीसदी ऐसे लोग हैं जिन्हें ऑक्सिजन की जरूरत पड़ जाती है। इसलिए लोग घर पर ही ऑक्सिजन सिलिंडर की व्यवस्था कर रहे हैं। घर पर ऑक्सिजन सिलिंडर उपयोग करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है...
-अगर ऑक्सिजन 90 या 90 से नीचे है और प्रोनिंग पोजिशन आदि के बाद यह स्तर 94 से 95 तक पहुंच रहा हो तो मरीज को थोड़ी-थोड़ी देर (5 से 10 मिनट) के लिए ऑक्सिजन सप्लाई कर सकते हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि ऑक्सिजन का स्तर इससे नीचे नहीं जाए। अगर सामान्य अवस्था में ऑक्सिजन का स्तर 90 से नीचे चला गया हो तो ऑक्सिजन की सप्लाई लगातार देनी चाहिए ताकि ऑक्सिजन का स्तर 94 से ज्यादा बना रहे।
-अगर मरीज की सांस ऑक्सिजन लेवल 92 पर भी फूलने लगे तो ऑक्सिजन की सप्लाई कर दें।
-ऑक्सिजन की मात्रा कितनी होनी चाहिए यह डॉक्टर से पूछकर ही तय करें।
-बिना डॉक्टर से पूछे ऐसा न करें।
-ऑक्सिजन सिलिंडर के पास कभी भी आग को न ले जाएं।
-लीक करने वाले सिलिंडर का उपयोग न करें।
-अगर घर में एक से ज्यादा मरीज हैं तो सभी के लिए अलग ऑक्सिजन मास्क और पाइप रखें। एक ही मास्क और पाइप का इस्तेमाल सभी लोग न करें। इससे इंफेक्शन बढ़ने का खतरा हो सकता है।
-नोट: इस बात का जरूर ध्यान रखें कि जब तक ऑक्सिजन का स्तर 94 या इससे ऊपर नहीं होगा, फेफड़ों को पूरी ऑक्सिजन नहीं मिलेगी। इससे कम होने का मतलब है कि हम कहीं न कहीं फेफड़ों की डिमांड पूरी नहीं कर रहे हैं।
ऑक्सिमीटर करता है अलर्ट
होम आइसोलेशन में रहने वाले कोरोना मरीज हों या फिर किसी अस्पताल में इलाज करा रहे मरीज। इस छोटी-सी मशीन की जरूरत हर जगह है। खासकर जो मरीज घर पर रहकर इलाज करा रहे हैं, उनके पास कम मेडिकल फैसिलिटी होती है। ऐसे में ऑक्सिमीटर बहुत ही काम की चीज हो जाती है। मरीज में ऑक्सिजन का स्तर नीचे जा रहा है, यह पता करने के लिए इस मशीन की जरूरत होती है। यह मीटर बता देता है कि किस मरीज को अस्पताल में भर्ती होना चाहिए।
अगर मरीज का ऑक्सिजन सेचुरेशन ऐसा हो....
94 से ऊपर: सामान्य, साथ में प्राणायाम, डीप ब्रीदिंग एक्सरसाइज दिन में 5 से 7 बार करें।
92 से ऊपर: मरीज पर नजर रखने की जरूरत, साथ ही दिन भर में 30 मिनट प्रोनिंग पोजिशन में 7 से 10 बार लेटना। सुबह-शाम 10 मिनट प्राणायाम करना। दिनभर में 5 बार ब्रीदिंग एक्सरसाइज करना।
90 से ऊपर: अगर मरीज की सांस फूल रही हो तो ऑक्सिजन की व्यवस्था करें। मरीज पर ज्यादा नजर रखने की जरूरत। दिन में 30 मिनट प्रोनिंग पोजिशन में 10 बार लेटना। सुबह-शाम 10 मिनट प्राणायाम करना। दिनभर में 10 बार ब्रीदिंग एक्सरसाइज करना। अगर इन उपायों से ऑक्सिजन का स्तर फिर नॉर्मल हो जाए तो 6 मिनट का वॉक टेस्ट भी कर सकते हैं। वॉक टेस्ट के बाद यह जरूर देखें कि ऑक्सिजन का स्तर कितना पहुंच रहा है। अगर यह 90 से कम हो रहा है तो ऑक्सिजन या फिर अस्पताल में बेड की व्यवस्था जरूर करें।
85 से ऊपर: इसे बड़े खतरे की घंटी मान लें। यहां पर सिर्फ 1 या 2 सिलिंडर से काम नहीं चलेगा। इस स्तर पर 24 घंटे ऑक्सिजन की जरूरत होने लगती है। इसलिए जब तक अस्पताल में बेड की व्यवस्था न हो, ऑक्सिजन कंसंट्रेटर की व्यवस्था जरूर करें। इस समय तक मरीज की सांस अमूमन फूलने लगती है।
80 या इससे नीचे: फौरन ही अस्पताल में जाना होगा। अस्पताल ले जाते समय भी ऑक्सिजन की सप्लाई मरीज को होती रहे। एक से ज्यादा मरीज हैं तो 2 ऑक्सिमीटर रख सकते हैं।
नोट: यहां दी गई जानकारी के आधार पर बीमारी या टेस्ट कराने के बारे में कोई फैसला न करें। डॉक्टर से सलाह जरूर करें।
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