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मांसाहार सभ्य मनुष्यों का भोजन नहीं।

मांसाहार सभ्य मनुष्यों का भोजन नहीं।  मासांहारी खाना खाने वाले मनुष्य कहलाने के लायक ही नहीँ है।  पहली बात तो यह है कि हर पशु-पक्षी में आत्मा का वास होता है। ईश्वर यह कदापि आज्ञा नहीं देता कि हम उसकी बनाई सृष्टि को नष्ट करें। हमारे बच्चों को काँटा भी चुभता है तो हम परेशान हो जाते हैं परन्तु उस परमपिता की जिन्दा संतानों को हम मारकर खा जाते हैं। एक मनुष्य यानि जीव को मारने पर आजीवन कारावास की सजा मिलती है तो उन निरीह मूक जीवों को मारने की सजा का क्या प्रावधान है? शायद उनका न्याय उस बड़ी अदालत में होता है। जो व्यक्ति मांसाहार का सेवन करता हैँ, वो तामसी अपवित्र और पापी व्यक्ति अधोगती अर्थात नरक को प्राप्त होता है।  भोजन के दो प्रकार  हैँ, शाकाहार और मांसाहार, शाकाहार मनुष्यो का आहार हैँ और मांसाहार राक्षस, पशु, हिंसक जानवर का आहार हैँ।  मनुष्य अगर मांसाहार का सेवन करेगा तो उसे भी राक्षस, कुत्ता ,कव्वा, गिधड़, सिंह, बाघ, लोमडी, सियार, बिल्ली भी कहना पडे़गा क्योंकी, मांसाहार उनका ही तो आहार हैँ मांसाहार मनुष्य का भोजन नही है क्योंकि माँसाहारी जीवों और मनुषय के शरीर की ...

गुड खाने के क्या फायदे

*गुड खाने के क्या फायदे होते हैं?*  गुड़ का आयुर्वेद में काफी महत्व बताया गया है।  गुड़ केवल एक खाद्य पदार्थ या चीनी का विकल्प भर ही नहीं है बल्कि इसमें सेहत का खजाना छिपा है।  यह एंटी टॉक्सिन का भी काम करता है। रात में गुड़ का सेवन करने से शरीर में मौजूद हानिकारक टॉक्सिन बाहर निकल जाता है।  यानि यह खून को साफ करने का काम भी करता है।  वैसे तो गुड़ के सेवन के कई फायदे हैं लेकिन हम आपको यहां 7 चुनिंदा फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं। 1. सूक्रोज़ (sucrose) का सबसे अच्छा संग्राहक गुड़ होता है।  भारतीय संस्कृति में भोजन करने के बाद मीठा खाने का प्रचलन सदियों पुराना है।  इस गतिविधि को आगे बढ़ाने के लिए गुड़ सबसे अच्छा माध्यम होता है।  गुड़ में बहुत ही पोष्टिक तत्व होते है।  इसमें फाइबर (Fiber) बिल्कुल भी नहीं होता।  यह पाचन प्रक्रिया को मजबूत करने में मदद करता है साथ ही यह कब्ज को रोकने में असरदार होता है। 2.  इसमें उपस्थित पोषक तत्वोंे में लौह तत्व  और फोलेट अच्छी  मात्रा में होते है, ये तत्वक शरीर में लाल रक्तह कोशिकाओं की स...

गंगा जल

*गंगा जल* अमेरिका में एक लीटर गंगाजल 250 डालर में क्यों मिलता है ? सर्दी के मौसम में कई बार खांसी हो जाती है। जब डॉक्टर से खांसी ठीक नही हुई तो किसी ने बताया कि डाक्टर से खांसी ठीक नहीं होती तब गंगाजल पिलाना चाहिए। गंगाजल तो मरते हुए व्यक्ति के मुंह में डाला जाता है, हमने तो ऐसा सुना है ; तो डॉक्टर साहिब बोले- नहीं ! कई रोगों का इलाज भी है। दिन में तीन बार दो-दो चम्मच गंगाजल पिया और तीन दिन में खांसी ठीक हो गई। यह अनुभव है, हम इसे गंगाजल का चमत्कार नहीं मानते, उसके औषधीय गुणों का प्रमाण मानते हैं। कई इतिहासकार बताते हैं कि सम्राट अकबर स्वयं तो गंगा जल का सेवन करता ही था, मेहमानों को भी गंगा जल पिलाता था। इतिहासकार लिखते हैं कि अंग्रेज जब कलकत्ता से वापस इंग्लैंड जाते थे, तो पीने के लिए जहाज में गंगा का पानी ले जाते थे, क्योंकि वह सड़ता नहीं था। इसके विपरीत अंग्रेज जो पानी अपने देश से लाते थे वह रास्ते में ही सड़ जाता था। करीब सवा सौ साल पहले आगरा में तैनात ब्रिटिश डाक्टर एमई हॉकिन ने वैज्ञानिक परीक्षण से सिद्ध किया था कि हैजे का बैक्टीरिया गंगा के पानी में डालने पर कुछ ही देर में मर गया।...

द्रौपदी

*द्रौपदी के ऐसे कौनसे राज हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं?* कितना अविश्वसनीय लगता है सीता,द्रौपदी,मकरध्वज आदि लोगों के जन्म की प्रक्रिया प्राकृतिक न होकर क्रमशः धरती,अग्नि और मछली के माध्यम से हुई थी,जो बिल्कुल भी वैज्ञानिक और वास्तविक नहीं प्रतीत होता। द्रौपदी तो एक युवा कन्या के रूप में आग्निवेदी से प्रकट हुई थी,जो अति विचित्र जान पड़ता है। कहा जाता है कि द्रुपद ने द्रौपदी को कुरु वंश के नाश के लिए उत्पन्न करवाया था।राजा द्रुपद द्रोणाचार्य को आश्रय देने वाले कुरु वंश से बदला लेना चाहते थे। जब पांडव और कौरवों ने अपनी शिक्षा पूरी की थी तो द्रोणाचार्य ने उनसे एक गुरुदक्षिणा मांगी।द्रोणाचार्य ने वर्षो पूर्व द्रुपद से हुए अपने अपमान का बदला लेने के लिए पांडवो और कौरवों से कहा कि पांचाल नरेश द्रुपद को बंदी बनाकर मेरे समक्ष लाओ।[1] पहले कौरवों ने आक्रमण किया परन्तु वो हारने लगे।यह देख पांडवो ने आक्रमण किया और द्रुपद को बंदी बना लिया।द्रोणाचार्य ने द्रुपद का आधा राज्य ले लिया और आधा उन्हें वापस करके छोड़ दिया।द्रुपद ने इस अपमान और राज्य के विभाजन का बदला लेने के लिए ही वह अद्भुत यज्ञ करवाया,जिससे...

दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?

A beautiful Hindi poem - *December Aur January Ka Rishta.* Very meaningful.” कितना अजीब है ना,  *दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?* जैसे पुरानी यादों और नए वादों का किस्सा... दोनों काफ़ी नाज़ुक हैं दोनो में गहराई है, दोनों वक़्त के राही हैं,  दोनों ने ठोकर खायी है... यूँ तो दोनों का है वही चेहरा-वही रंग, उतनी ही तारीखें और  उतनी ही ठंड... पर पहचान अलग है दोनों की अलग है अंदाज़ और  अलग हैं ढंग...   एक अन्त है,  एक शुरुआत जैसे रात से सुबह, और सुबह से रात... एक में याद है दूसरे में आस, एक को है तजुर्बा,  दूसरे को विश्वास... दोनों जुड़े हुए हैं ऐसे धागे के दो छोर के जैसे, पर देखो दूर रहकर भी  साथ निभाते हैं कैसे... जो दिसंबर छोड़ के जाता है उसे जनवरी अपनाता है, और जो जनवरी के वादे हैं उन्हें दिसम्बर निभाता है... कैसे जनवरी से  दिसम्बर के सफर में ११ महीने लग जाते हैं... लेकिन दिसम्बर से जनवरी बस १ पल में पहुंच जाते हैं!! जब ये दूर जाते हैं  तो हाल बदल देते हैं, और जब पास आते हैं  तो साल बदल देते हैं... देखने में ये साल के महज़  दो महीने ही तो लगत...

कॉपी का भार

मैं वकील कैसे बना❓ 9वीं कक्षा में मैंने विज्ञान की कॉपी नहीं बनाई थी और कॉपी चेक कराने का भयंकर दबाव था...🤔 मैडम भी बड़ी सख्त थीं...😎अगर उनको पता चलता तो उल्टा ही टांग देतीं... पूरे 9 अध्याय हो चुके थे।दूसरे लड़के 40-40 पेज रजिस्टर के भर चुके थे और मेरे पास जो भी था,एक रफ़ कॉपी में ही था... दो रातें तो एक मिनट नींद नहीं आई और ऊपर से पिता श्री को पता चलने का डर...🤔 चेकिंग का दिन आया🤔 मैडम ने चेकिंग शुरू की...21 रोल नंबर वालों तक की कॉपी चेक हुई और एक घंटा लग गया....🤔 मैंने राहत की सांस ली...😀तभी मैडम ने जल्दी जल्दी में कहा कि सभी बच्चे कॉपी जमा कर दो। मैं चेक करके भिजवा दूंगी... तभी मेरा शातिर दिमाग घूमा...🤔 मैं भीड़ में कॉपियों तक गया और जैसे बीजगणित में मान लेते हैं ना,ठीक वैसे ही मैंने मान लिया कि मैंने कॉपी जमा कर दी...😂 अब कॉपी का टेंशन मैडम का...😂 दो दिन बाद सबकी कापियाँ आई, पर मेरी नहीं आई...और आती भी कैसे...❓😀 अब मैं मैडम के पास गया और बोला:- मैडम कॉपी नहीं आई❓🤔, वो बोलीं कि मैं चेक कर लूंगी स्टाफ रूम में होगी... अगले दिन मैं फिर पहुँच गया और बोला कि मैडम मेरी कॉपी...❓😀 ...

मैंने_दहेज़_नहीं_माँगा

“मैंने_दहेज़_नहीं_माँगा” साहब मैं थाने नहीं आउंगा, अपने इस घर से कहीं नहीं जाउंगा, माना पत्नी से थोड़ा मन-मुटाव था, सोच में अन्तर और विचारों में खिंचाव था, पर यकीन मानिए साहब, “मैंने दहेज़ नहीं माँगा” . मानता हूँ कानून आज पत्नी के पास है, महिलाओं का समाज में हो रहा विकास है। चाहत मेरी भी बस ये थी कि माँ बाप का सम्मान हो, उन्हें भी समझे माता पिता, न कभी उनका अपमान हो । पर अब क्या फायदा, जब टूट ही गया हर रिश्ते का धागा, यकीन मानिए साहब, “मैंने दहेज़ नहीं माँगा” . परिवार के साथ रहना इसे पसंद नहीं है, कहती यहाँ कोई रस, कोई आनन्द नही है, मुझे ले चलो इस घर से दूर, किसी किराए के आशियाने में, कुछ नहीं रखा माँ बाप पर प्यार बरसाने में, हाँ छोड़ दो, छोड़ दो इस माँ बाप के प्यार को, नहीं माने तो याद रखोगे मेरी मार को, . फिर शुरू हुआ वाद विवाद माँ बाप से अलग होने का, शायद समय आ गया था, चैन और सुकून खोने का, एक दिन साफ़ मैंने पत्नी को मना कर दिया, न रहूँगा माँ बाप के बिना ये उसके दिमाग में भर दिया। बस मुझसे लड़कर मोहतरमा मायके जा पहुंची, . 2 दिन बाद ही पत्नी के घर से मुझे धमकी आ पहुंची, माँ बाप से हो...