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हनुमानजी की उड़ने की गति कितनी थी

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*#हनुमानजी की उड़ने की गति कितनी थी ?*🔯🕉️ #जानिए हनुमानजी की उड़ने की गति कितनी रही होगी उसका अंदाजा आप लगा सकते हैं की रात्रि को 9:00 बजे से लेकर 12:00 बजे तक #लक्ष्मण जी एवं #मेघनाद का युद्ध हुआ था। मेघनाद द्वारा चलाए गए बाण से#लक्ष्मण जी को शक्ति लगी थी लगभग रात को 12:00 बजे के करीब और वो #मूर्छित हो गए थे। #रामजी को लक्ष्मण जी मूर्छा की जानकारी मिलना फिर दुखी होने के बाद चर्चा जे उपरांत हनुमान जी & विभीषणजी के कहने से #सुषेण वैद्य को #लंका से लेकर आए होंगे 1 घंटे में अर्थात 1:00 बजे के करीबन। सुषेण वैद्य ने जांच करके बताया होगा कि #हिमालय के पास #द्रोणागिरी पर्वत🏔️🏔️ पर यह चार #औषधियां🏕️🏕️ मिलेगी जिन्हें उन्हें #सूर्योदय से पूर्व 5:00 बजे से पहले लेकर आना था ।इसके लिए #रात्रि को 1:30 बजे हनुमान जी हिमालय के लिए रवाना हुए होंगे। हनुमानजी को ढाई हजार किलोमीटर दूर हिमालय के द्रोणगिरि पर्वत से उस औषधि को लेकर आने के लिए 3:30 घंटे का समय मिला था। इसमें भी उनका आधे घंटे का समय औषधि खोजने में लगा होगा ।आधे घंटे का समय #कालनेमि नामक राक्षस ने जो उनको भ्रमित किया उसमें ...

सभी पशु हैं, और भगवान शिव पशुपति हैं।

*आप सभी पशु हैं, और भगवान शिव पशुपति हैं।*   ***********************   *कूर्मपुराण के उपरिभाग के 7 वें अध्याय के 18  वें श्लोक में भगवान शिव ने ऋषियों को पशुपति शब्द का अर्थ बताते हुए कहा कि -*   *आत्मान:पशव:प्रोक्ता:सर्वे संसारवर्तिन:।*   *तेषां पतिरहं देव:स्मृत:पशुपतिर्बुधै:।18।।*  भगवान शिव जी ने ऋषियों को पशुपति शब्द का अर्थ बताते हुए कहा कि हे ऋषियो! चार चरणवाले, शाकाहारी मांसाहारी जीवों को ही पशु नहीं कहते हैं, अपितु देव ,गन्धर्व, मनुष्य आदि जो भी जीव, इस शारीरिक माया में फंसे हुए हैं,वे सभी  लोकों के सभी जीव पशु हैं। माया मोह में फंसे हुए इन पशुओं  का मैं पति अर्थात स्वामी हूं, इसलिए ज्ञानीजन मुझे पशुपति कहते हैं।  *अविशेषरूपेण सर्वान् पश्यति इति पशु:।*  पाणिनव्याकरण के उणादिप्रकरण के प्रथमपाद के 27 वें सूत्र,   *अर्जिदृशिकम्यमिपशिबाधामृजिपशितुग्धुग्दीर्घहकारश्च* *इस सूत्र से बन्धनार्थक, पश धातु से उ प्रत्यय होकर पशु शब्द बनता है।*  अर्थात पशु उसे कहते हैं,जो सबको समान रूप से देखता है।‌ जैसे किसी...

आटा गूंथने के बाद गृहणियां उस पर उँगलियों से निशान क्यूँ बनाती हैं?

*आटा गूंथने के बाद गृहणियां उस पर उँगलियों से निशान क्यूँ बनाती हैं???* सनातन परम्परा में अगर ऐसा नहीं किया जाए तो आटे को पिंड का रूप मानते हैं जो कि हिंदू धर्म में अशुभ होता है। हिंदू धर्म में पूर्वजों एवं मृत आत्माओं को संतुष्ट करने के लिए पिंड दान की विधि बताई गई है। पिंडदान के लिए जब आटे की लोई (जिसे पिंड कहते हैं) बनाई जाती है तो वह बिल्कुल गोल होती है, इसका आशय होता है कि यह गूंथा हुआ आटा पूर्वजों के लिए है।  मान्यता है कि इस तरह का आटा देखकर पूर्वज किसी भी रूप में आते हैं और उसे ग्रहण करते हैं। यही कारण है कि जब मनुष्यों के ग्रहण करने के लिए आटा गूंथा जाता है तो उसमें उंगलियों के निशान बना दिए जाते हैं।  *ताकि वह पिंड न रहे* यह निशान इस बात का प्रतीक होते हैं कि रखा हुआ आटा या लोई पूर्वजों के लिए पिंड नहीं बल्कि परिजनो के लिए है। इस कारण से आटे पे उंगलियों से निशान बनाए जाने की प्रथा प्रचलित है। यह भारतीय *सनातन संस्कृति है* जो आदि काल से चली आ रही है। 🕉️🌞🔥🔱🐚🔔🌷

इलेक्शन सहायक जानकारी (01)

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               इलेक्शन सहायक जानकारी (01)                                    मतदाता सहायता बूथ केन्द्र से सौ मीटर दूर ही लगेंगे मतदाता सहायता बूथ * मतदाता सहायता बूथ पर मतदाता (मत दान करने वाला व्यक्ति) मतदान से संबंधित सहायता प्राप्त कर सकते हैं। * इस बूथ पर वे मतदाता अपनी पर्ची बनवा सकते हैं। जिन्हें घर पर पर्ची नहीं मिली है। * चुनाव लड़ रहे अभ्यर्थी को मतदान के दिन मतदान केन्द्र से 100 मीटर दूर मतदाता सहायता बूथ स्थापित करने की अनुमति दी जाती है।  * चुनाव लड़ रहे अभ्यर्थी द्वारा बनाए जाने वाले मतदाता सहायता बूथ पर बिना शामियाना (टेंट) के केवल एक टेबल और दो कुर्सियां रखी जा सकेंगी।  * अपनी पार्टी की पहचान के लिए अपने बूथ पर दो गुणा तीन फीट आकार का बैनर भी लगाया जा सकेगा।  * मतदाता सहायता बूथ स्थापित करने के पहले अभ्यर्थी को स्थानीय निकाय की अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य होगा और बूथ स्थापित करने की जानकारी पुलिस में भी देन...

इंदौर मे वर की मांगो से आश्चर्यचकित हुआ वधु परिवार

*इंदौर मे वर की मांगो से आश्चर्यचकित हुआ वधु परिवार* विवाह पूर्व एक लड़के की अनोखी मांगों से लड़की वाले हैरान हैं।  ☆लड़के की मांगों की चर्चा पूरे शहर में हो रही है।  ☆यह मांगें दहेज को लेकर नहीं बल्कि *विवाह संपन्न कराने के तरिके को लेकर हैं..!!* मांगें इस प्रकार से हैं:: 0१ कोई *प्री वैडिंग शूट नहीं होगा.* 02 🌹 दुल्हन शादी में फैंसी गाउन की बजाय *परंपरागत साड़ी पहनेगी/लहंगा* 03 🌹 मैरिज लॉन में ऊलजुलूल अश्लील कानफोड़ू संगीत की बजाय, हल्का इंस्ट्रूमेंटल संगीत बजेगा. 04🌹 वरमाला के समय केवल दूल्हा दुल्हन ही स्टेज पर रहेंगे. 05🌹 वरमाला के समय दूल्हे या दुल्हन को.. उठाकर उचकाने वालों को विवाह से निष्कासित कर दिया जायेगा. 06🌹 पंडितजी द्वारा विवाह प्रक्रिया शुरू कर देने के बाद कोई ,उन्हें रोके टोकेगा नहीं. 07🌹 कैमरामैन फेरों आदि के चित्र दूर से लेगा न कि बार बार पंडितजी को टोक कर..!        ये देवताओं का आह्वान करके उनके साक्ष्य में किया जा रहा विवाह समारोह है.. ना की किसी फिल्म की शूटिंग. 08🌹 दूल्हा दुल्हन द्वारा कैमरामैन के कहने पर उल्टे सीधे पोज नहीं बनाये जा...

नर्मदातट में किया गया ,वेदपाठ,दान, पुण्य अक्षय हो जाता है।

*नर्मदातट में किया गया ,वेदपाठ,दान, पुण्य अक्षय हो जाता है।*     *नारदीय पुराण के उत्तरखण्ड के 77 वें अध्याय के 29 वें श्लोक में ब्रह्मापुत्र सनक जी ने नारद जी से कहा कि -*   *स्नानं करोति शुद्धात्मा स लभेदुत्तमां गतिम्।*   *स्नानं दानं जपो होमो वेदाध्ययनमर्चनम्।*   *सर्वमक्षयतां याति नर्मदायास्तटे कृतम्।।*   ब्रह्मापुत्र सनक जी ने कहा कि हे देवर्षि नारद ! इस भारतवर्ष में सभी स्त्री पुरुष, कहीं न कहीं,कोई न कोई पुण्य करते ही रहते हैं।  पुण्य और पाप तो मन, वाणी,बुद्धि और शरीर इन  से ही होते हैं। पुण्य कर्म और पापकर्म दोनों सदा ही करनेवाले के साथ ही रहते हैं। जब भी पुण्य और पाप कर्मों के भोगने का समय आ जाता है तो वह स्त्री पुरुष, किसी भी स्थान में हो,उसको वहां ही उसी जन्म में ही,उसी काल में ही,उस पुण्य का फल और पाप का फल प्राप्त होता है,यही इस संसार के कर्ता धर्ता,विधाता का विधान है। किन्तु पुण्य क्या है, और पाप क्या है,इसका निर्णय तो शास्त्रों से ही होता है।   *शास्त्रों में कहा गया कर्मविधान ही विधाता का संविधान ...

जगन्नाथ यात्रा : 5 दीपों से करें भगवान की आरती, पीले पुष्प जरूर करें अर्पित

जगन्नाथ यात्रा : 5 दीपों से करें भगवान की आरती, पीले पुष्प जरूर करें अर्पित हर साल ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकाली जाती है। इस साल इस रथ यात्रा उत्सव की शुरुआत 1 जुलाई, शुक्रवार से होगी। इस यात्रा में शामिल होने के लिए दुनियाभर से लोग आते हैं और भगवान का रथ खींचने का सौभाग्य पाते हैं। लेकिन यदि आप भगवान जगन्नाथ की यात्रा में शामिल होने में असमर्थ हैं, तो घर पर रहकर भी इस यात्रा पूजा का फल और भगवान का आशीर्वाद पा सकते हैं। यात्रा का महत्व हिंदू धर्म में जगन्नाथ पुरी को मुक्ति का द्वार भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस रथ यात्रा में शामिल होने से व्यक्ति के समस्त कष्टों का निवारण होता है। साथ ही इस यात्रा में शामिल होने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है। पुराणों के अनुसार, आषाढ़ मास में पुरी तीर्थ में स्नान करने से सभी तीर्थों के दर्शन करने के तुल्य ही पुण्य मिलता है। भगवान जाते हैं मौसी के घर हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीय तिथि को भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर जाते हैं। इस दौरान उनके बड़े भाई बलराम और छोटी बहन सुभद्रा भी उनके साथ अलग-अलग रथों पर सवार होकर जाते हैं। गुंडीचा म...