सभी पशु हैं, और भगवान शिव पशुपति हैं।
*आप सभी पशु हैं, और भगवान शिव पशुपति हैं।*
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*कूर्मपुराण के उपरिभाग के 7 वें अध्याय के 18 वें श्लोक में भगवान शिव ने ऋषियों को पशुपति शब्द का अर्थ बताते हुए कहा कि -*
*आत्मान:पशव:प्रोक्ता:सर्वे संसारवर्तिन:।*
*तेषां पतिरहं देव:स्मृत:पशुपतिर्बुधै:।18।।*
भगवान शिव जी ने ऋषियों को पशुपति शब्द का अर्थ बताते हुए कहा कि हे ऋषियो! चार चरणवाले, शाकाहारी मांसाहारी जीवों को ही पशु नहीं कहते हैं, अपितु देव ,गन्धर्व, मनुष्य आदि जो भी जीव, इस शारीरिक माया में फंसे हुए हैं,वे सभी लोकों के सभी जीव पशु हैं। माया मोह में फंसे हुए इन पशुओं का मैं पति अर्थात स्वामी हूं, इसलिए ज्ञानीजन मुझे पशुपति कहते हैं।
*अविशेषरूपेण सर्वान् पश्यति इति पशु:।*
पाणिनव्याकरण के उणादिप्रकरण के प्रथमपाद के 27 वें सूत्र,
*अर्जिदृशिकम्यमिपशिबाधामृजिपशितुग्धुग्दीर्घहकारश्च* *इस सूत्र से बन्धनार्थक, पश धातु से उ प्रत्यय होकर पशु शब्द बनता है।*
अर्थात पशु उसे कहते हैं,जो सबको समान रूप से देखता है। जैसे किसी कुत्ते,बिल्ली,बकरा आदि पशुओं को जो भी रोटी,भोजन,पानी देते हैं,वे उसी से प्रेम करने लगते हैं। उसी के पीछे पीछे चलने लगते हैं। भोजन पानी देनेवाले के गुणों दुर्गुणों को नहीं जानते हैं और न ही समझते हैं,उसी को पशु कहते हैं। *अर्थात विवेकहीन को पशु कहते हैं।*
*पशु, अपने स्वामी के द्वारा किए गए अत्याचारों को सहन करते रहते हैं। वे रूखा सूखा भोजन देकर,बड़ी निर्ममता से मारते हैं।*
कितने तो ऐसे मनुष्य हैं कि वे बकरा,मछली,मुर्गा आदि का पालन करके उनको ही काटकर खा जाते हैं। किन्तु ये पशु पक्षी जानते ही नहीं हैं कि ये दुष्ट प्रवृत्ति का मनुष्य मुझे खाने के लिए पाल रहा है। इसीलिए इनको पशु कहते हैं।
भगवान शिव कहते हैं कि
*आत्मान :पशव सर्वे संसारवर्तिन:*
*संसार में जितने भी जीव हैं,वे सभी पशु के समान ही अविवेकी हैं।*
पशुओं को पालने वाले स्त्री पुरुष,उन पशुओं को समय पर न तो जल देते हैं और न ही भोजन देते हैं,समय समय पर मारते भी हैं, फिर भी वे पशु उस स्थान को छोड़कर कहीं नहीं जाते हैं। एक ही स्थान में बांधकर रखते हैं। धूप,वर्षात,ठंडी आदि सहन करते रहते हैं। यदि कोई उनको छोड़ भी देते हैं, तो भी घूम-फिर कर वहीं आ जाते हैं।
*आप पशुओं की स्थिति देख लीजिए, और फिर अपनी स्थिति देख लीजिए।*
एक पुरुष को परिवार के माता पिता, भाई, बहिन चाचा, भतीजा, आदि सम्बन्धी अपने सम्बन्ध बन्धन में ऐसा जकड़कर रखते हैं कि कोई कितना भी अपमान करता है, तो भी आप सहते रहते हैं। जब चाहे, जहां चाहे, अपमान करने से नहीं चूकते हैं, फिर भी आप घूम घूम कर वहीं जाते हैं, जहां से दुख मिलता है। यही तो मनुष्य की पशुता है। सम्बन्ध बन्धन में बांधकर सभी स्त्री पुरुष एक पुरुष को दुख ही दुख देते हैं।काम भी करवाते हैं, और अच्छे से अच्छा भोजन नहीं देते हैं,ऊपर से लड़ जाते हैं। पत्नी, पुत्र, पुत्री पौत्र पौत्री आदि से किसी भी पुरुष को किसी भी प्रकार का कभी भी सुख नहीं मिलता है, किन्तु उन्हीं दुख देनेवालों के पीछे पीछे ही घूमता फिरता है।
पशुओं जैसी ही स्थिति स्त्री पुरुषों की हो रही है, इसीलिए भगवान शिव ,इन सभी जीवों को पशु कहते हैं।
*यही स्थिति तो एक स्त्री की है। भाई, बहिन, माता पिता, के बंधन से छूटकर एक पति के बंधन में बंध जाती है।* पति के सहित, परिवार के नंद,सास,ससुर,देवर तथा पति के सम्बन्धी सभी स्त्री पुरुष,एक स्त्री का कभी न कभी अपमान करते रहते हैं। जीवनभर करते रहते हैं।
यहां इस संसार में सभी स्त्री पुरुष एक दूसरे को दुख ही देते हैं, फिर भी इन दुख देनेवालों के आगे पीछे घूमते रहते हैं। इसीलिए सभी जीवों को पशु ही कहा जाता है।
अब भगवान शिव जी ने कहा कि -
*तेषां पतिरहं देव:स्मृत: पशुपतिर्बुधै:।।*
संसार में आसक्त सभी मनुष्य,देव, दैत्य,गन्धर्व आदि पशु जैसे ही सम्बन्ध बन्धन में बंधे हुए विविध प्रकार के दुखों को भोगते हैं, फिर भी दुख देनेवालों को त्याग नहीं पाते हैं,यही तो पशुता है।
इसीलिए सभी जीवों को पशु कहते हैं और मैं इन सभी *पशुओं का पति अर्थात रक्षक* हूं। इसलिए मुझे सभी ज्ञानीजन पशुपति कहते हैं।
*पशुओं की रक्षा करनेवाला कोई पति अर्थात स्वामी नहीं होता है तो कोई भी पशु व्यवस्थित नहीं चलता है।*
*यदि इस संसार के रक्षक भगवान न हों तो सारा संसार पशुओं के समान ही रहता,खाता पीता और सोता, इससे अधिक कुछ भी नहीं करता होता।*
*धर्म और सत्कर्म कर्तव्य आदि का ज्ञान तो भगवान ही प्रदान करते हैं। भगवान ही हमारे रक्षक हैं और वे ही ज्ञान प्रदाता हैं।*
*आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम*
*26 -5- 2022*
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*🚩🔱श्री नटराज मंदिर चिदंबरम*
*🔱🕉️जहाँ ओम रूप में विराजते हैं शिव*
*🌻के. अय्यानाथन🌻*
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*🔱🕉️देवाधिदेव भगवान शिव को सर्वोच्च देवता के रूप में पूजने वाले उपासकों के लिए तमिलनाडु में चिदंबरम का नटराज मंदिर आस्था के प्रमुख केंद्रों में से एक है। मान्यता है कि कैलाशपति ने इस पवित्र स्थान को अपनी सभी शक्तियों से उपकृत किया है, जिनका सृजन भी उन्होंने यहीं किया।*
*🔱🕉️पुराणों के मुताबिक भगवान यहाँ प्रणव मंत्र 'ॐ' के आकार में विराजमान हैं। यही वजह है कि आराधक इसे सबसे अहम मानते हैं। चिदंबरम भगवान शिव के पाँच क्षेत्रों में से एक है। इसे शिव का आकाश क्षेत्र कहा जाता है।*
*🔱🕉️अन्य चार क्षेत्रों में कालाहस्ती (आंध्रप्रदेश) अर्थात वायु, कांचीपुरम यानी पृथ्वी, तिरुवनिका- जल और अरुणाचलेश्वर (तिरुवनामलाई) अर्थात अग्नि शामिल हैं। हिन्दू मान्यता के अनुसार इन्हीं पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) से मानव शरीर का निर्माण हुआ है। नटराज मंदिर को अग्नि मूल के नाम से भी जाना जाता है। कई उपासक मानते हैं कि भोलेनाथ यहाँ ज्योति रूप में प्रकट हुए थे।*
*🔱🕉️मंदिर के केंद्र और अम्बलम के सामने भगवान शिवकाम सुंदरी (पार्वती) के साथ स्थापित हैं। चिदंबरम रहस्य मंदिर की अन्य खासियतों में शुमार है। इसे जानने के लिए आपको एक तय राशि यहाँ देनी पड़ती है।*
*🔱🕉️मंदिर की संरचना अपने आप में आकर्षक और विशिष्ट है। चार सुंदर और विशाल गुंबदों ने संपूर्ण मंदिर को भव्य स्वरूप प्रदान किया है। मंदिर की आंतरिक साज-सज्जा, शिल्पकारी और इसका व्यापक क्षेत्रफल इसे अनन्य रूप देते हैं।*
*🕉️🔱शिव के नटराज स्वरूप के नृत्य का स्वामी होने के कारण भरतनाट्यम के कलाकारों में भी इस जगह का खास स्थान है। मंदिर की बनावट इस तरह है कि इसके हर पत्थर और खंभे पर भरतनाट्यम नृत्य की मुद्राएँ अंकित हैं।*
*🔱🕉️मंदिर के केंद्र और अम्बलम के सामने भगवान शिवकाम सुंदरी (पार्वती) के साथ स्थापित हैं। चिदंबरम रहस्य मंदिर की अन्य खासियतों में शुमार है। इसे जानने के लिए आपको एक तय राशि यहाँ देनी पड़ती है। मंदिर की देखरेख और पूजा-पाठ पारंपरिक पुजारी करते हैं। हालाँकि सारा प्रबंधन श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ावे और दान के रूप में दिए गए धन से होता है।*
*🕉️🔱मंदिर शिव क्षेत्रम के रूप में भी प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान गोविंदाराज की प्रतिमा भी है, जो शिव के बिलकुल निकट स्थापित हैं। मंदिर में एक बहुत ही खूबसूरत तालाब और नृत्य परिसर भी है। यहाँ हर साल नृत्य महोत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें देशभर से कलाकार हिस्सा लेते हैं।*
*🚩🕉️कैसे पहुँचे-*
*🚩🔱रेल मार्ग : चिदंबरम*
*🚩🔱चेन्नई-तंजावुर मार्ग पर चेन्नई से 245 किमी दूर है। रेलवे स्टेशन भी चिदंबरम नाम से ही है।*
*🚩🔱सड़क : किसी भी वाहन से चेन्नई से 4 से 5 घंटे में चिदंबरम पहुँचा जा सकता है।*
*🚩🔱हवाई सेवा : चिदंबरम जाने के लिए चेन्नई नजदीकी एयरपोर्ट है। यहाँ से बस या ट्रेन के जरिए चिदंबरम पहुँचा जा सकता है।*
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*शिवलिंग को विवेकानंद ने क्या कहा ?*
-हिंदू धर्म का मजाक बनाने के लिए कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी, जिहादी और हिंदू द्रोही शिवलिंग की तुलना नर शिश्न से कर रहे हैं । कई लोगों पर एफआईआर हो रही है वो जेल भेजे जा रहे हैं । लेकिन कुछ हिंदू विद्वान भी इस संबंध में नाना प्रकार की भ्रामक बातें फैला रहे हैं जो ठीक नहीं है ।
-स्वामी विवेकानंद पर लिखी भगवान सिंह राणा की किताब "भारत के अमर मनीषी स्वामी विवेकानंद" में शिवलिंग पर विवेकानंद की जो टिप्पणी अंकित है उस को हू ब हू लिख रहा हूं.... बाद में शिवलिंग का असल सत्य भी जरूर बताऊंगा
"सभा में एक जर्मन विद्वान ओपर्ट ने अपना एक निबंध पढ़ा जिसमें उन्होंने ये सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि भारत में शिवलिंग की पूजा क्रमश: योनि और लिंग की पूजा है । इस मत का खंडन करते हुए स्वामी विवेकानंद जी ने कहा -
शिवलिंग को मनुष्य के लिंग से जोड़ने के विषय में कुछ विचारहीन मत प्रचलित हैं । शिवलिंग पूजा की उत्पत्ति का मूल अथर्ववेद का यूपस्तम्भ स्रोत है इस स्रोत में अनादि अनंत स्तंभ का वर्णन है और यह स्तम्भ ही ब्रह्म है।"
-शिवलिंग के संदर्भ में मेरा शोध ये है कि इसकी तुलना नर शिश्न से इसलिए नहीं की जा सकती है क्योंकि अगर आप किसी शिवालय को देखें तो उसमें तीन चीजें होती हैं... पहली शिवलिंग दूसरी शिवलिंग पर लिपटा हुआ सर्प और तीसरा शिवलिंग के ऊपर रखा घड़ा जिससे लगातार अभिषेक होता रहता है ।
जबकि नर शिश्न पर कोई सर्प नहीं होता है और ना ही नर शिश्न के ऊपर कोई घड़ा होता है !
-दरअसल असल बात ये है कि शिवालय और शिवलिंग किसी भी मनुष्य की कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है । मुझे स्वयं योग का अनुभव है और यही अनुभव सैकड़ों योगियों का रहा है । दरअसल कुंडलिनी शक्ति मूलाधार चक्र में स्थित एक ज्योतिर्मयी प्रकाशवान शिवलिंग के ऊपर लिपटा हुआ सर्प है । ये कुंडलिनी सामान्य मनुष्यों में सोती रहती है लेकिन योगी पुरुषों में ये कुंडलिनी ऊपर चढ़ती है यानी कुंडलिनी पर मौजूद सर्प ऊपर चढ़कर मेरूदंड के भी ऊपर सिर पर मौजूद सहस्रार चक्र को स्पर्श करता है उसके स्पर्श से सहस्रार चक्र जागृत हो जाता है और तब उस सहस्रार चक्र से अमृत की बूंदें गिरती हैं । सहस्रार चक्र एक्टिव होते ही पूरा शिवालय शरीर के अंदर ही संपूर्ण हो जाता है । दरअसल हमारे शरीर में सबसे ऊपर सिर पर मौजूद सहस्रार चक्र ही शिवालय में घड़े के रूप में दिखाया जाता है जो शिवालय में शिवलिंग के ऊपर नजर आता है । और जिस तरह योगी के शरीर में सहस्रार से अमृत बूंदें गिरती रहती हैं ठीक वैसे ही शिवालय में घड़े से जल या दूध की बूंदें गिराई जाती हैं । और देवालय में शिवलिंग पर जो सर्प लिपटा रहता है वो मूलाधार में मौजूद कुंडलिनी शक्ति यानी ज्योतिर्मय शिवलिंग पर लिपटे हुए सर्प का ही प्रतीक है !
-कहने का मतलब साफ है जिसने भी शिवालय की रचना की होगी वो अवश्य ही कोई महायोगी रहा होगा और निसंदेह वो भगवान शंकर ही रहे होंगे ।
-अपनी बात को साबित करने के लिए मैं दो किताबों का विवरण प्रस्तुत कर रहा हूं जो योग आचार्य के अनुभव पर लिखी गई हैं... .
- अपनी किताब तत्व ज्ञान में योगी आनंद जी लिखते हैं...
"मूलाधार चक्र में स्थित शिवलिंग में साढ़े तीन चक्कर लिपटे हुए दिखाई देते हैं"
- अपनी एक और किताब त्राटक में योगी आनंद जी लिखते हैं...
"चित्रों और मूर्तियों में कुंडलिनी को एक शिवलिंग के चारों ओर तीन पूर्ण और एक अपूर्ण कुंडली बनाते हुए दर्शाया जाता है । मूलाधार चक्र में त्रिकोण के मध्य में शिवलिंग पर लिपटी हुई साढे तीन चक्कर लपेटकर सोती है"
-दरअसल शिवालयों की रचना की ही इसीलिए गई थी कि लोग शिवालय को देखकर अपनी कुंडलिनी शक्ति को समझें और योगी के समान आध्यात्मिक अनुभव हासिल करें लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि हम हिंदू लोग स्वयं ही दिग्भ्रमित हो गए और अपनी बात कभी ठीक से नहीं समझा सके । आपसे उम्मीद है इस लेख को खूब शेयर करें ताकी सबको असली बात पता चले ।
Break
*नोट- कई मित्रों ने 9990521782 मोबाइल नंबर दिलीप नाम से सेव किया है लेकिन मिस्ड कॉल नहीं की , लेख के लिए मिस्ड कॉल और नंबर सेव, दोनों काम करने होंगे क्योंकि मैं ब्रॉडकास्ट लिस्ट से मैसेज भेजता हूं जिन्होंने नंबर सेव नहीं किया होगा उनको लेख नहीं मिलते होंगे.. जिनको लेख मिलते हैं वो मिस्डकॉल ना करें प्रार्थना*
* ज्ञानवापी में मिल गया शिवलिंग से भी बड़ा सबूत*
*https://youtu.be/QIF_DO36J7E*
*ये मेरा यूट्यूब चैनल है इसको जरूर सब्सक्राइब करें और बेल आइकन दबाएंआप यूट्यूब पर सर्च कीजिए लिखिए... Dileep Pandey तो आपको सबसे पहले मेरा चैनल मिल जाएगा ! उसी चैनल पर आपको कई ज्ञानवर्धक वीडियो मिलेंगे*
Continue
-मेरा निजी तौर पर ये मानना है कि जो लोग भी शिवलिंग पर अपमानित करने वाली टिप्पणियां कर रहे हैं उनका अंत बहुत बुरा होगा और उनको प्रकृति ही दंड देगी क्योंकि वो अपने ही आत्मा और परमेश्वर का अपमान कर रहे हैं ।
-मुस्लिमों को भी शिवलिंग पर टिप्पणी करने से पहले मक्का में काबा के बाहर ईशान कोण पर मौजूद उस काले पत्थर को जरूर याद करना चाहिए जिसका बोसा (चुंबन) हजयात्री अवश्य लेते हैं ।
धन्यवाद
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