संदीपनी आश्रम 

सांदीपनि आश्रम

प्राचीन उज्जैन अपने धार्मिक और राजनैतिक वैभव के साथ ही पौराणिक मतानुसार महाभारत काल से ही शिक्षा का केंद्र भी रही है। यहाँ सांदीपनि ऋषि का आश्रम था जहाँ देश देशान्तर से आकर विद्यार्थी विद्योपार्जन किया करते थे। यहीं पर कृष्ण, बलराम और सुदामा ने गुरू सांदीपनि के सानिध्य में विद्यार्जन किया था। 
यह आश्रम अंकपात क्षेत्र में विद्यमान है। यहाँ भगवान श्री कृष्ण लिखने की पटिट्याँ घो कर अंक मिटाते थ। अतः इस स्थान का नाम अंकपात पड़ा, महाभारत, श्रीमद भागवत, ब्रम्ह पुराण, अग्नि पुराण, तथा ब्रम्ह वैवर्त पुराण में सांदीपनि आश्रम का उल्लेख मिलता है। पुरातात्विक प्रमाण के रूप में चित्रित धूसर पात्र मिले हैं। जिनका संबंध महाभारत काल से माना जाता है।

सान्दीपनि आश्रम

पौराणिक परम्परा के अनुसार कुलगुरू संदीपनि के आश्रम में कृष्ण एवं उनके मित्र सुदामा ने विद्यार्जन किया था। महाभारत, श्रीग‌द्भागवत, बह्मपुराण, अग्निपुराण तथा बह्मवैवर्तपुराण में सान्दीपनि आश्रम का उल्लेख मिलता है। इस क्षेत्र में पुरातात्विक प्रमाण के रूप में तीन हजार वर्ष पुराने चित्रित धूसर पात्र मिले है, जिनका सम्बंध महाभारत काल से माना जा सकता है। ये पात्र हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ, मथुरा, अहिच्छत्रा और कौशाम्बी से प्राप्त अवशेषों से साम्य रखते हैं। इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि नगर का यह क्षेत्र सर्वाधिक प्राचीन है। 

आश्रम का प्राचीन जलस्त्रोत गोमती कुण्ड है, जिसका पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। कुण्ड के पास खड़े नन्दी की प्रतिमा दर्शनीय है जो शुंगकालीन है। निकट का क्षेत्र अंकपात कहलाता है। जनश्रुति के आधार पर कृष्ण अपने अंक लेखन की पट्टिका यहाँ साफ करते थे। सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में इस आश्रम के पास वैष्णव संप्रदाय के महान आचार्य श्री वल्लभाचार्य ने धार्मिक प्रवचन किया था। वल्लभ संप्रदाय के अनुयायी श्री वत्लभाचार्य की चौरासी बैठकों में से इस स्थान को महाप्रभुजी की तिहत्तरवीं बैठक मानते हैं।

संचालक पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय मध्यप्रदेश, भोपाल


श्री कुण्डेश्वर महादेव 

चत्वारिंशत्तमं विद्धि कुण्डेश्वरमतः शृणु।
यस्व दर्शनमात्रेण लभ्यते सद्गतिः परा।।

स्कन्द पुराण के अनुसार - एक बार देवी पार्वती को अपने योगबल से उत्पन्न पुत्र वीरक को देखने की इच्छा हुई। वे शिवजी के साथ नन्दीगन पर बैठकर महाकाल वन स्थित उस स्थान पर जाने लगे, जहाँ वीरक साधनारत था। तभी नन्दी के तेज चलने और पार्वतीजी के भयभीत होने के कारण शिव और पार्वती पैदल ही महाकाल वन की ओर चलने लगे। रास्ते में मार्ग भटकने के कारण शिवजी ने पार्वतीजी को एक स्थान पर प्रतीक्षा करने को कहा। शिवजी ने पार्वती जी सेवा-सुरक्षा हेतु अपने एक गण, जिसका नाम कुण्ड था, को नियुक्त किया। जब शिवजी दस वर्षों तक नहीं लौटे, तब पार्वती ने उस कुण्ड नामक गण को शिवजी को ढूँढ़कर लाने को कहा। कुण्ड द्वारा असफल रहने पर पार्वतीजी ने उसे शाप देते हुए कहा कि- मृत्युलोक में तुम्हारा पतन हो जाये। तभी सदाशिव वहाँ आ गये। 
वस्तुस्थिति जानकर उन्होंने कुण्ड को कहा कि तुम महाकाल वन स्थित गोमती कुण्ड के निकट इस दिव्य लिंग की उपासना करो। कुण्ड ने शिवजी की आज्ञा को शिरोधार्य कर यहाँ गाढभक्ति के साथ प्रार्थना की, जिसके प्रभाव से वह शापमुक्त हो गया और सभी सुखों का भोग करने लगा। शिव के गण कुण्ड द्वारा पूजे जाने के कारण ये महादेव श्री कुण्डेश्वर के नाम से विख्यात हुए।

संदर्भ - स्कन्द पुराण, अवन्ती खण्ड चतुरशीति सिंङ्गमाहात्म्य अध्याय 40 (श्लोक : 1 से 42)



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