माँ गढ़कालिका
माँ गढ़कालिका
12 शिवा स्वरूपों में एक माँ गढ़कालिका
कांचीपुरे तू कामाक्षी, मलये भ्रामरी तथा केरले तु कुमारी सा, अम्बा नर्तेषु संस्थीता, करवीरे महालक्ष्मी कालिका मालवेषुसा, प्रयागे ललितादेवी, विन्ध्ये विन्ध्य निवासिनी, वाराणस्यां विशालाक्षी, गया यां मंगलावती, बंगेषु सुन्दरी देवी, नेपाले गुह्यकेश्वरी, इति द्वादश रुपेण, संस्थीता, भारते शिवा। एतासां दर्शना देव, सर्व पापः प्रमुच्यते ।। अशक्तो दर्शने नित्यं स्मरेत प्रातः समाहितः । तथाप्युपासकः सर्वेरपराधेर्वि मुच्यते ।।
वात्सल्यमयी जगत् जननी भगवती महीशक्ति कांचीपुरं अर्थात शिवकांची में श्री कामाक्षी रुप में, मलय प्रदेश में भ्रामरी रूपमे केरल में श्री कुमारी अर्थात कन्याकुमारी, आनर्त अर्थात गुजरात में श्री अम्बाजी गिरनार पर्वत पर रुप में प्रतिष्ठित है । करवीर अर्थात कोल्हापुर में श्री महालक्ष्मी रुप में, मालवा अर्थात उज्जैन में श्री गढ़कालिका शक्तिपीठ रुप में, प्रयाग में श्री ललितादेवी, विन्ध्यगिरि में विंध्यवासिनी, वाराणसी में श्री विशालाक्षी, गया में मंगलागौरी, बंगाल में श्री सुन्दरीदेवी रुप में, नेपाल में श्री बागमती नदी के तट पर गुह्येश्वरी के रुप में, मंगलमयी पराम्बा श्री पार्वतीजी इन बारह स्वरुपों में पूण्य भूमि भारत वर्ष में विध्यमान है।
भक्तों द्वारा सदा सेव्य है, इन श्री के दर्शन मात्र से ही मनुष्य सभी प्रायों से मुक्त हो जाता है। दर्शन करने में असमर्थ प्राणी चित्त से प्रतिदिन प्रातः काल में स्मरण करने वाला उपासक भी सभी पापों से मुक्त होकर श्री जगदम्बा की कृपा प्राप्त करता है।
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे, सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी, नारायणी नमोस्तुते ।।
महाकवि कालिदास की ईष्ट देवी
श्री गढ़कालिका लोक परंपरा के अनुसार महाकवि कालिदास् की ईष्ट देवी मानी जाती है, कालीदास अभिज्ञान शकुंतलम् व मेघदूत के रचियता एवं विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक प्रमुख रत्न है।
इस मंदिर के शुंगकाल ईसापूर्व प्रथम शताब्दी, गुप्तकाल चौथी शताब्दी तथा परमार काल दसवीं से बारहवीं शताब्दी की प्रतिमाएँ एवं नींव प्राप्ति हुई है। सम्राट हर्षवर्धन ने सातवीं शताब्दी में इस मंदिर का जिर्णोद्धर करवाया था । परमार राज्यकाल दसवीं शताब्दी में करवाए गए जिर्णोद्धार के अवशेष भी मिले है। बीसवीं शताब्दी में परम्परागत् पुजारी श्री सिध्दनाथ जी महाराज ने विक्रम संवत् 2001 (1944) में इस मंदिर का पुनः जिर्णोद्धार करवाया था।
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