किस-किस राज्य में इमाम को सैलरी और कौन देता है?

किस-किस राज्य में इमाम को सैलरी

दिल्ल ही नहीं बल्कि देश के कई राज्यों में वक्फ बोर्ड अपनी मस्जिदों के इमामों को सैलरी देता है. तेलंगाना में जुलाई 2022 से इमामों और मुअज्जिनों को हर महीने 5,000 रुपये मानदेय दिया जा रहा है. पश्चिम बंगाल की सरकार ने साल 2012 से ही इमामों को हर महीने 2,500 रुपये देने का ऐलान किया था और तब से यह सिलसिला जारी है. मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड इमाम को 5000 रुपये महीना और मुअज्जिनों को 4500 रुपये महीना देता है. हरियाणा में वक्फ बोर्ड अपनी मस्जिदों के 423 इमामों को प्रतिमाह 15000 रूपए का वेतन देता है. 

बिहार में साल 2021 से सुन्नी वक्फ बोर्ड अपनी मस्जिदों के इमाम को 15 हजार और मोअज्जिनों को 10 हजार रुपये मानदेय दे रहा है. हालांकि, बिहार स्टेट शिया वक्फ बोर्ड 105 मस्जिदों के इमाम को 4000 और मोअज्जिनों को 3000 रुपये मानदेय दे रहा है. बिहार सरकार सालाना 100 करोड़ रुपये का फंड वक्फ बोर्ड को अनुदान के तौर पर देती है. 

कर्नाटक वक्फ बोर्ड ने पंजीकृत मस्जिदों के इमाम को सैलरी देने का स्लैब बना रखा है, जिसमें बड़े शहरों में इमाम को 20 हजार, नायब इमाम को 14000, मोअज्जिन को 14000, खादिम को 12000 और मुल्लिम को 8 हजार रुपये देने का प्रावधान है. ऐसे ही शहर की मस्जिद के इमाम को 16000, कस्बे या नगर की मस्जिद के इमाम को 15000 और ग्रामीण में इमाम को 12000 रुपये दिए जाते हैं. इसी तरह पंजाब में भी वक्फ बोर्ड की मस्जिदों के इमाम को सैलरी दी जाती है.

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड वक्फ बोर्ड अपनी मस्जिदों के इमाम और मुअज्जिन को सैलरी नहीं देते. उत्तर प्रदेश में कुछ चुनिंदा मस्जिदों के इमाम को सैलरी दी जाती है, जो खासकर पुरातत्व विभाग के अधीन हैं. इनमें ताजमहल मस्जिद, लखनऊ में राजभवन की मस्जिद, फतेहपुर सीकरी जैसी मस्जिद के इमाम को सैलरी यूपी वक्फ बोर्ड देता है. वहीं, बाकी मस्जिद को इमाम को स्थानीय मस्जिद कमेटी के द्वारा सैलरी दी जाती है. 

मंदिर के पुजारी को क्यों नहीं सैलरी

वरिष्ठ पत्रकार जैद फारूकी कहते हैं कि वक्फ संपत्तियों की देखरेख वक्फ बोर्ड करता है, जो स्वायत्त संस्था है. स्टेट सरकार के अधीन आती है. वक्फ संपत्तियों से होना वाली आय वक्फ बोर्ड को जाती है, जिसके जरिए वक्फ अपनी मस्जिदों के इमाम को सैलरी देता है. वहीं, मंदिर के पुजारियों को सैलरी इसलिए सरकार के द्वारा नहीं दी जाती, क्योंकि मंदिर और आश्रम का संचालन निजी ट्रस्ट के द्वारा किया जाता है. मंदिरों से होने वाली आय को ट्रस्ट अपने पास रखता है और उससे अपनी मंदिरों के पुजारी को सैलरी देता है. इतना ही नहीं कई जगह पर धर्मार्थ विभाग हैं, जो मंदिरों के लिए ही पैसा खर्च करते हैं. उत्तराखंड में मंदिरों को सरकार ने अपने अधीन लेना चाहा तो पुजारियों ने विरोध कर दिया था. 

केंद्रीय सूचना आयुक्त ने खड़े किए सवाल

दिल्ली वक्फ बोर्ड के द्वारा मस्जिदों के इमाम और मुअज्जिनों के दी जाने वाली सैलरी को लेकर केंद्रीय सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर भी सवाल खड़े किए हैं, जिसमें 1993 में मस्जिदों में इमामों और मुअज्जिनों को सैलरी देने का निर्णय दिया था. उदय माहुरकर ने कहा कि देश की शीर्ष अदालत ने अपने आदेश को पारित करके संविधान के प्रावधानों, खासकर अनुच्छेद 27 का उल्लंघन किया, जिसमें कहा गया है कि करदाताओं का धन किसी एक विशेष धर्म के पक्ष में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. 

अनुच्छेद 27 का उल्लंघन नहीं

वहीं, वक्फ वेल्फेयर फोरम के चेयरमैन जावेद अहमद कहते हैं कि वक्फ बोर्ड के द्वारा अपनी मस्जिदों के इमाम को सैलरी देना अनुच्छेद 27 का कहीं से भी उल्लंघन नहीं है, क्योंकि वक्फ बोर्ड अपनी आय से मस्जिद के इमाम और मुअज्जिनों को सैलरी देता है. राज्य सरकारें जो अनुदान देती हैं, वो वक्फ संपत्ति को संरक्षण के लिए है. ऐसे में मंदिर के पुजारियों को जहां तक देने की बात है, तो बंगाल में ममता सरकार देती है, जो कि जनता के टैक्स से दिया जाता है. इसलिए मस्जिद के इमाम और पुजारियों को मिलने वाली सैलरी की तुलना नहीं की जा सकती है.


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