सत्संग की महिमा

🚩🚩।।जय श्री हरि विष्णु।।🚩🚩
एक व्यक्ति भोर में उठा, चारो ओर अंधेरा था। उसने साफ कपड़े पहने और सत्संग स्थल की ओर चल दिया ताकि सत्संग का आनंद प्राप्त कर सके। चलते-चलते रास्ते में वह व्यक्ति एक स्थान पर ठोकर खाकर गिर पड़ा, कपड़े कीचड़ से सन गए और पुनः वापस घर आ गया।

कपड़े बदलकर पुनः वापस सत्संग स्थल की ओर रवाना हुआ, कि ठीक उसी स्थान पर ठोकर खा कर पुनः गिर पड़ा। एक बार पुनः वापस घर आकर कपड़े बदले, और फिर से सत्संग स्थल की ओर रवाना हुआ।

जब तीसरी बार उस जगह पर पहुंचा, तो क्या देखता है की एक व्यक्ति दीपक हाथ में लिए खड़ा है, और उसे अपने पीछे पीछे चलने को कह रहा है।

इस प्रकार वह व्यक्ति उसे सत्संग स्थल तक ले आया। 

पहले वाले व्यक्ति ने उससे कहा आप भी अंदर चलकर सतसंग सुन लें।

लेकिन वह व्यक्ति हाथ में दीपक थामे खड़ा रहा और सत्संग स्थल में प्रवेश नही किया।

दो तीन बार इनकार करने पर उसने पूछा आप अंदर क्यों नही आ रहे हैं...?

दूसरे वाले व्यक्ति ने उत्तर दिया
"क्योंकि.....

मैं काल हूँ,

ये सुनकर पहले वाले व्यक्ति के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

काल ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, मैं ही था जिसने आपको धरती पर गिराया था।

जब आपने वापस घर जाकर कपड़े बदले और दुबारा सत्संग स्थल की ओर रवाना हुए तो भगवान ने आपके सारे अपराध क्षमा कर दिए।

जब मैंने आपको दूसरी बार गिराया और आपने घर जाकर पुनः कपड़े बदले और सत्संग हेतु जाने लगे तो भगवान ने आपके पूरे परिवार के अपराध भी क्षमा कर दिए।

मैं तो डर ही गया कि यदि कहीं मैने आपको पुनः गिराया और आप फिर कपड़े बदलकर चले गए तो कहीं ऐसा न हो कि परमात्मा आपके गांव के सभी लोगों के ही अपराध क्षमा कर दे, इसीलिए यहाँ तक मै स्वयं ही आपको पहुंचाने आया हूँ।

अब हम देखें और विचार करें कि उस व्यक्ति ने दो बार गिरने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और तीसरी बार पुनः सत्संग हेतु पहुँच गया। एक हम हैं कि यदि हमारे घर पर कोई मेहमान भी आ जाए या हमें कोई भी काम आ जाए तो उसके लिए हम सत्संग की कौन कहे घर पर रहकर भजन और जाप तक भी छोड़ देते हैं। 

क्यों....?

क्योंकि जीव भगवान से अधिक दुनिया की चीजों और सम्बन्धियों को अधिक प्यार करता है।

उन्हें सत्संग की अपेक्षा इन सांसारिक वस्तुओं का कहीं अधिक मोह है। इसके विपरीत वह व्यक्ति दो बार कीचड़ में गिरकर भी तीसरी बार पुनः घर जाकर कपड़े बदलता है और सत्संग स्थल तक चला जाता है।

क्यों...?

क्योंकि उसके हृदय में भगवान के लिए कहींं अधिक ही प्रेम एवं श्रद्धाभाव था। वह किसी भी मूल्य पर अपना नियम नहीं टूटने देना चाहता था।

इसीलिए काल ने स्वयं उस व्यक्ति को सत्संग स्थल तक पहुँचाया, जिसने कि उसे दो बार कीचड़ में गिराया भी था।

इसी प्रकार सभी जीवात्माओं को एकाग्रचित होकर  भजन-सुमिरन में बैठें, प्रभु के बारे में ज्ञान का चिंतन मनन करना चाहिए तब हमारा मन चाहे कितना भी भटके उसे ब्रह्म पर केंद्रित करे, मन चाहे कितनी ही चालाकी करे या कितना ही बाधित हो , हमें हार नहीं माननी चाहिए और डट कर सभी कुविचारो का मुकाबला करना चाहिए।
 
बस हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, और न ही किसी काम के लिए भजन सुमिरन में ढील देनी चाहिए। वह प्रभु आप ही हमारे काम सिद्ध कर ही देगा। हमें मन से कभी हार नहीं माननी चाहिए और निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिए।
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जय श्री राधे राधे जय श्री राधे श्याम जय श्री राधे कृष्णा
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।        
                 🙏🌹श्री कृष्ण:शरणम् मम 🌹

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