रानी सती मंदिर

रानी सती मंदिर
राजस्थान के झुनझुनू शहर के बीचोबीच स्थित रानी सती मंदिर देश के प्रमुख दर्शनीय स्थलों के अलावा भारत के सबसे अमीर मंदिरों में स्थान रखता है। मंदिर के कई भागों को कांच के द्वारा सजाया गया है वो आज भी देखा जा सकता है। भारत के राजस्थान 13 वीं और 17 वीं शताब्दी के बीच और राजस्थानी महिला रानी सती को समर्पित है। रानी सती को नारायणी देवी भी कहा जाता है । आज इन्हें दादीजी (दादी सती) कहा जाता है। यह मंदिर झुंझुनू की पहाड़ियों पर स्थित है जो पूरे शहर का मनोरम दृश्य भी प्रस्तुत करता है जो मंदिर के आकर्षण में चार चाँद लगाने का कार्य करते है।
बाहर से देखने पर यह मंदिर किसी राजमहल जैसा दिखाई देता है। पूरा मंदिर संगमरमर से बना है। इसकी बाहरी दीवारों पर शानदार रंगीन चित्रकारी की गई है। मंदिर में शनिवार और रविवार पर खासतौर पर श्रद्धांलुओं की भीड़ उमड़ती है।

रानी सती को समर्पित यह मंदिर 400 साल पुराना है। रानी सती का यह मंदिर सम्मान और शक्ति का प्रतीक है। देश भर से भक्त रानी सती मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। यहां विशेष प्रार्थना करने के साथ ही भाद्रपद माह की अमावस्या पर आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में भी हिस्सा लेते हैं ?



कहानी

रानी सती दादी मां की कहानी महाभारत के समय से शुरू होती है जो अभिमन्यु और उनकी पत्नी उत्तरा से जुड़ी हुई है। महाभारत के भीषण युद्ध में कोरवो द्वारा रचित चक्रव्यूह को तोड़ते हुए जब अभिमन्यु की मृत्यु हुई, तो उत्तरा कौरवों द्वारा विश्वासघात में अभिमन्यु को अपनी जान गंवाते देख उत्तरा शोक में डूब गई और अभिमन्यु के सतह सती होने का निर्णय ले लिया। लेकिन उत्तरा गर्भ से थी और एक बच्चो को जन्म देने वाली थी। यह देखकर श्री कृष्ण ने उत्तरा से कहा कि वह अपना जीवन समाप्त करने के विचार को भूल जाए, क्योंकि यह उस महिला के धर्म के खिलाफ है जो अभी एक बच्चे को जन्म देने वाली है। श्री कृष्ण की यह बात सुनकर उत्तरा बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने सती होने के अपने निर्णय को बदल लिया लेकिन उसके बदले उन्होंने ने एक इच्छा जाहिर जिसके अनुसार वह अगले जन्म में अभिमन्यु की पत्नी बनकर सती होना चाहती थी।

जैसा कि भगवान कृष्ण ने दिया था, अपने अगले जन्म में वह राजस्थान के डोकवा गांव में गुरसमल बिरमेवाल की बेटी के रूप में पैदा हुई थी और उसका नाम नारायणी रखा गया था। अभिमन्यु का जन्म हिसार में जलीराम जालान के पुत्र के रूप में हुआ था और उसका नाम तंदन जालान रखा गया था। तंदन और नारायणी ने शादी कर ली और शांतिपूर्ण जीवन जी रहे थे। उसके पास एक सुंदर घोड़ा था जिस पर हिसार के राजा का पुत्र काफी समय से देख रहा था। तंदन ने अपना कीमती घोड़ा राजा के बेटे को सौंपने से इनकार कर दिया।

राजा का बेटा तब घोड़े को जबरदस्ती हासिल करने का फैसला करता है और इस तरह तंदन को द्वंद्वयुद्ध के लिए चुनौती देता है। तंदन बहादुरी से लड़ाई लड़ता है और राजा के बेटे को मार डालता है। क्रोधित राजा इस प्रकार युद्ध में नारायणी के सामने तंदन को मार देता है। नारी वीरता और शक्ति की प्रतीक नारायणी, राजा से लड़ती है और उसे मार देती है। फिर उसने राणाजी (घोड़े की देखभाल करने वाले) को आदेश दिया कि वह अपने पति के दाह संस्कार के साथ-साथ उसे आग लगाने की तत्काल व्यवस्था करे।

राणाजी, अपने पति के साथ सती होने की इच्छा को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए, नारायणी द्वारा आशीर्वाद दिया जाता है कि उनका नाम लिया जाएगा और उनके नाम के साथ पूजा की जाएगी और तब से उन्हें रानी सती के नाम से जाना जाता है।


इतिहास
रानी सती मंदिर का इतिहास बेहद ही दिलचस्प है। जब इसके इतिहास पर नज़र डालते हैं यह मंदिर लगभग 400 वर्ष पीछे लेकर जाता है। मंदिर में मिले प्रमाणों और कई कहानियों के अनुसार इस मंदिर की देवता रानी सती है, जो एक राजस्थानी महिला रानी थी। रानी सती का वास्तविक नाम नारायणी बताया जाता है। कहानियों के अनुसार एक युद्ध के दौरान नारायणी देवी/रानी सती के पति की मौत हो जाती है जिसके बाद वो भी सती हो जाती है। धीरे-धीरे लोग इन्हें आदि शक्ति का रूप मनाने लगे और रानी सती के रूप में पूजा जाने लगा। इस मंदिर को कई लोग रानी सती दादी के नाम से भी जानते हैं।

गर्भ गृह 
मंदिर किसी भी महिला या पुरुष देवताओं की कोई पेंटिंग या मूर्ति नहीं रखने के लिए उल्लेखनीय है। इसके बजाय अनुयायियों द्वारा शक्ति और बल का चित्रण करने वाले त्रिशूल की धार्मिक रूप से पूजा की जाती है। प्रधान मंड में रानी सती दादी जी का चित्र है। मंदिर का निर्माण सफेद संगमरमर से किया गया है और इसमें रंगीन दीवार पेंटिंग हैं।

षोडश मात्रकाओ अर्थात 16 देवियों की मूर्तियां

रानी सती मंदिर के परिसर में कई और मंदिर है जो शिव जी गणेश जी, माता सीता और राम जी के परमभक्त हनुमान जी को समर्पित है। मंदिर परिसर में षोडश मां का सुंदर मंदिर है, जिसमें षोडश अर्थात 16 देवियों की मूर्तियां स्थापित है। परिसर में नयनाभिराम लक्ष्मी नारायण का मंदिर भी बना हुआ है।
मारवाड़ी लोगों का दृढ़ विश्वास है कि रानी सती जी, स्त्री शक्ति की प्रतीक और मां दुर्गा का अवतार थीं। उन्होंने अपने पति के हत्यारे को मारकर बदला लिया और फिर अपने सती होने की इच्छा पूरी की। वैसे अब मंदिर का प्रबंधन सती प्रथा का पूर्णतः विरोध करता है। मंदिर के गर्भ गृह के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा है 'हम सती प्रथा का विरोध करते हैं।'

मंदिर खुलने का समय
मंदिर सुबह 5 बजे से दोपहर एक बजे तक और शाम 3 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर के गर्भ गृह में निक्कर और बरमूडा पहने लोगों का प्रवेश वर्जित है। मंदिर का दफ्तर सुबह 9 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है।

मंदिर का स्वागत कक्ष
अगर एक दिन रुकना है तो रानी सती मंदिर के स्वागत कक्ष पर आवास के लिए भी आग्रह कर सकते हैं। मंदिर का दफ्तर सुबह 9 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए विशाल आवास बना है, जहां 100 रुपये से लेकर 700 रुपये तक के कमरे उपलब्ध हैं। 

भोजनालय
मंदिर में एक कैंटीन और एक भोजनालय भी है। कैंटीन में दक्षिण भारतीय भोजन भी उपलब्ध है। भोजन दिन में 11 बजे से 1 बजे तक और शाम को 8 बजे से 10 बजे तक उपलब्ध रहता है।

आरती पूजा 
मंदिर में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु आते हैं। मंदिर में दिन में दो बार एक विस्तृत आरती की जाती है। य़े हैं:

मंगला आरती: 
सुबह-सुबह मंदिर खुलने पर की जाती है।
संध्या आरती: 
शाम को सूर्यास्त के समय की जाती है।

भाद्र अमावस्या के अवसर पर एक विशेष पूजन उत्सव आयोजित किया जाता है: हिंदू कैलेंडर में भाद्र महीने के अंधेरे आधे के 15 वें दिन मंदिर के लिए विशेष महत्व रखता है।

प्रत्येक 'आरती' के बाद एक नियमित 'प्रसाद' वितरण होता है। साथ ही मुख्य मंदिर में बारह छोटे सती मंदिर हैं। भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा परिसर के केंद्र में स्थित है और हरे-भरे बगीचों से घिरी हुई है।

प्रवेश शुल्क
जो भी पर्यटक रानी सती मंदिर झुंझुनू घूमने जाने वाले हैं हम उन्हें बता दे रानी सती मंदिर में प्रवेश और दर्शन के लिए कोई भी शुल्क नही है। यहाँ श्रद्धालु बिना किसी शुल्क के घूम सकते है और झुंझुनू वाली रानी सती के दर्शन के लाभ उठा सकते है।

समय 
रानी सती मंदिर झुंझुनू घूमने जाने के लिए सबसे अच्छे समय की बात करें तो वह बारिश के बाद सर्दियों के समय माना जाता है। इस दौरान झुंझुनू का मौसम काफी सुखद और यात्रा के अनुकूल होता है।

‌थकैसे पहुंचें ?

रानी सती मंदिर के लिए आटोरिक्शा मिलता है। ऑटो रिक्शा वाले 10 रुपये किराया लेते हैं। झुंझुनूं बस स्टैंड से मंदिर की दूरी 3 किलोमीटर तथा रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 2 किलोमीटर है, वहीं शहर के प्रसिद्ध गांधी चौक से मंदिर की दूरी महज एक किलोमीटर है। आप ऑटो रिजर्व करके भी मंदिर जा सकते हैं।
यदि आप फ्लाइट से ट्रेवल करके झुंझुनू घूमने जाने कि सोच रहें हैं तो हम आपको बता दे झुंझुनू के लिए कोई सीधी फ्लाइट कनेक्टविटी नही है। इसके लिए आपको जयपुर हवाई अड्डे के लिए फ्लाइट लेनी होगी। जयपुर एयरपोर्ट झुंझुनू का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है जो झुंझुनू से लगभग 185 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

ट्रेन से ट्रेवल करके रानी सती मंदिर घूमने जाना पर्यटकों द्वारा सबसे अधिक पसंद किये जाने वाले ऑप्शन हैं क्योंकि झुंझुनू का अपना रेलवे जंक्शन है जो रानी सती मंदिर से महज 6.00 किलोमीटर कि दूरी पर स्थित है। आप जब भी ट्रेन से यात्रा करके झुंझुनू रेलवे स्टेशन पहुचेगें तो रेलवे स्टेशन के बाहर से ऑटो, टेक्सी या अन्य स्थानीय परिवहन से आसानी से लगभग 20 मिनिट में रानी सती मंदिर जा सकते है।

सड़क मार्ग से भी रानी सती मंदिर झुंझुनू की यात्रा करना काफी आसान और सुविधाजनक हैं क्योंकि झुंझुनू रोड नेटवर्क द्वारा राजस्थान के सभी शहरों से जुड़ा है साथ ही झुंझुनू के लिए आसपास के सबसे प्रमुख शहरों से बसें से भी चलती है जिनसे पर्यटक आसानी से झुंझुनू आ सकते है। इनके अलावा आप अपनी पर्सनल कार या एक टेक्सी बुक करके भी यहाँ घूमने आ सकते है।

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