चौसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर
गौरी शंकर मंदिर चौसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर
चौसठ योगिनी मंदिर
माँ नर्मदा की गोद में बसे मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में कई ऐसे मंदिर हैं जिनके इतिहास की गणना करना बहुत कठिन है। इनमें से कई मंदिर दूर-दराज के इलाकों में स्थित हैं। ऐसा ही एक मंदिर नर्मदा से थोड़ी दूर पर लगभग 70 फुट ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। विश्व प्रसिद्ध भेड़ाघाट के नजदीक स्थित चौसठ योगिनी मंदिर सभवतः भारत का इकलौता मंदिर है, जहाँ भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की प्रतिमा स्थापित है। कहा जाता है कि इस मंदिर के लिए नर्मदा ने भी अपनी दिशा बदल दी थी। हालाँकि देश के कई अन्य मंदिरों की तरह यह भी औरंगजेब के इस्लामिक कट्टरपंथ की भेंट चढ़ा, लेकिन वह मंदिर के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा का कोई नुकसान नहीं कर पाया।
इतिहास
कई मान्यताओं के अनुसार जब एक बार भगवान शिव और माता पार्वती भ्रमण के लिए निकले तो उन्होंने भेड़ाघाट के निकट एक ऊँची पहाड़ी पर विश्राम करने का निर्णय किया। इस स्थान पर सुवर्ण नाम के ऋषि तपस्या कर रहे थे जो भगवान शिव को देखकर प्रसन्न हो गए और उनसे प्रार्थना की कि जब तक वो नर्मदा पूजन कर वापस न लौटें तब तक भगवान शिव उसी पहाड़ी पर विराजमान रहें। नर्मदा पूजन करते समय ऋषि सुवर्ण ने विचार किया कि यदि भगवान हमेशा के लिए यहाँ विराजमान हो जाएँ तो इस स्थान का कल्याण हो और इसी के चलते ऋषि सुवर्ण ने नर्मदा में समाधि ले ली।
इसके बाद से कहा जाता है कि आज भी उस पहाड़ी पर भगवान शिव की कृपा भक्तों को प्राप्त होती है। माना जाता है कि नर्मदा को भगवान शिव ने अपना मार्ग बदलने का आदेश दिया था ताकि मंदिर पहुँचने के लिए भक्तों को कठिनाई का सामना न करना पड़े। इसके बाद संगमरमर की कठोरतम चट्टानें मक्खन की तरह मुलायम हो गई थीं जिससे नर्मदा को अपना मार्ग बदलने में किसी भी तरह की कठिनाई नहीं हुई।
चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी के दौरान कल्चुरी शासक युवराजदेव प्रथम के द्वारा कराया गया। उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती समेत योगिनियों का आशीर्वाद लेने के उद्देश्य से इस मंदिर का निर्माण कराया था। युवराजदेव के बाद 12वीं शताब्दी के दौरान शैव परंपरा में पारंगत गुजरात की रानी गोसलदेवी ने चौसठ योगिनी मंदिर में गौरी-शंकर मंदिर का निर्माण कराया।
मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित चौसठ योगिनी मंदिर की तरह यह मंदिर भी तंत्र साधना का एक महान स्थान हुआ करता था। यह मंदिर काल गणना और पंचांग निर्माण का सर्वश्रेष्ठ स्थान माना जाता था जहाँ ज्योतिष, गणित, संस्कृत साहित्य और तंत्र विज्ञान का अध्ययन करने के लिए देश और विदेश से छात्र आया करते थे। 10वीं शताब्दी का यह मंदिर उस समय का आयुर्वेद कॉलेज हुआ करता था। खुले आसमान के नीचे ग्रह और नक्षत्रों की गणना के साथ आयुर्वेद की शिक्षा भी दी जाती थी।
संरचना और इस्लामिक आक्रमण
पत्थरों से निर्मित चबूतरे पर इस मंदिर का निर्माण किया गया है। त्रिभुजाकार कोणों पर योगिनियों की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। मंदिर परिसर की गोलाकार संरचना के केंद्र में गर्भगृह में गौरीशंकर की प्रतिमा स्थापित है। नंदी पर विराजमान भगवान शिव और माता पार्वती की विवाह प्रतिमा संभवतः पूरे भारत में कहीं नहीं है। मुख्य मंदिर के सामने नंदी प्रतिमा है और एक छोटे चबूतरे पर शिवलिंग स्थापित है, जहाँ श्रद्धालुओं द्वारा विभिन्न तरह के अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।
हालाँकि मंदिर में योगिनियों की प्रतिमाओं को खंडित कर दिया गया है और यह कार्य किसी और ने नहीं बल्कि इस्लामी आक्रांता औरंगजेब ने किया, जिसने अपने शासनकाल में हजारों हिन्दू मंदिरों को अपना निशाना बनाया। कहा जाता है कि औरंगजेब ने अपनी तलवार से एक-एक योगिनी की प्रतिमा को खंडित किया, लेकिन जब वह गर्भगृह में स्थापित गौरीशंकर की प्रतिमा को खंडित करने गया तो दैवीय चमत्कार के कारण उसे भयभीत होकर वहाँ से भागना पड़ा था।
कैसे पहुँचे?
जबलपुर, मध्य प्रदेश के चार प्रमुख नगरों में से एक है ऐसे में यहाँ पहुँचने के लिए यातायात के साधन और शहर के अंदर परिवहन व्यवस्था दोनों ही बेहतर है। मंदिर का नजदीकी हवाई अड्डा जबलपुर डुमना एयरपोर्ट ही है जो मंदिर से लगभग 34 किमी दूर है। इसके अलावा इंदौर का देवी अहिल्याबाई एयरपोर्ट, जबलपुर लगभग 534 किमी की दूरी पर है। जबलपुर मध्य भारत का एक प्रमुख रेलवे जंक्शन है। जंक्शन से चौसठ योगिनी मंदिर की दूरी 22 किमी है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों समेत देश के प्रमुख नगरों से सड़क मार्ग के जरिए जबलपुर पहुँचना काफी आसान है।
चौंसठ योगिनी मंदिर जबलपुर की ऐतिहासिक संपन्नता में एक और अध्याय जोड़ता है। प्रसिद्ध संगमरमर चट्टान के पास स्थित इस मंदिर में देवी दुर्गा की 64 अनुशंगिकों की प्रतिमा है। इस मंदिर की विषेशता इसके बीच में स्थापित भागवान शिव की प्रतिमा है, जो कि देवियों की प्रतिमा से घिरा हुआ है। इस मंदिर का निर्माण सन् 1000 के आसपास कलीचुरी वंश ने करवाया था। मंदिर के सैनटोरियम में रानी दुर्गावती की मंदिर की यात्रा से संबंधित एक शिलालेख भी देखा जा सकता है। यहां एक सुरंग भी है जो चौंसठ योगिनी मंदिर को गोंड रानी दुर्गावती के महल से जोड़ती है। यह मंदिर एक विशाल परिसर में फैला हुआ है और इसके हर एक कोने से भव्यता झलकती है। बेशक, अगर आप जबलपुर जा रहे हैं तो यह मंदिर जरूर जाएं।
भारत में कई स्थान विविधताओं और रहस्यों को समेटे हुए हैं। इनमें कई चीजें ऐसी भी हैं, जो लोगों का आश्चर्य चकित कर देती हैं। इन्हीं में शुमार है जबलपुर का भेड़ाघाट स्थित 64 योगिनी मंदिर...। इस मंदिर में आज भी चौसठ योगिनियां (प्रतिमाएं) पहरा देती नजर आती हैं। कभी तंत्र साधना के लिए पूरे विश्व में विख्यात रहा यह मंदिर काल गणना का भी केन्द्र रहा। इसे गोलकी मठ के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर के मध्य में शिव-पार्वती के वृषभ (बैल) पर सवार आलौकिक प्रतिमा है, जिसके दर्शन के लिए नवरात्रि में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है।
दसवीं सदी की मूर्तियां
चौसठ योगिनी मंदिर वृत्ताकार यानी गोल आकार का है। बीच में एक अद्भुत नक्कासीदार मंदिर है। इस मंदिर के गर्भगृह में शिव-पार्वती प्रतिमा है। इतिहासविद् बताते हैं यह प्रतिमा दुर्लभ है। वृषभ यानी नंदी पर सवार श्रंगारयुक्त ऐसी प्रतिमा देश और किसी जगह पर नहीं है। इतिहासकार डॉ. आरके शर्मा के अनुसार यह मंदिर दसवीं शताब्दि का है। मंदिर त्रिभुजाकार 81 कोणों पर आधारित है, जिसके प्रत्येक कोण पर योगिनी की स्थापना की गई थी. इसी स्थान पर गुप्त काल में सप्त या अष्ट मातृकाएं स्थापित थीं। 12 वीं शताब्दी में गुजरात की रानी गोसलदेवी ने यहां गौरीशंकर मंदिर का निर्माण कराया था।
कैसे हुआ होगा निर्माण
करीब ढाई सौ मीटर की ऊचाई पर बने चौसठ योगिनी मंदिर में पूरा ढांचा भारी भरकम व वजनदार पत्थरों का बना है। तीन दशक पहले ही यहां पक्की सीढिय़ां बनाई गई हैं। लोग यह देखकर हैरान रह जाते हैं कि इतनी ऊंची पहाड़ी पर वजनदार को कैसे चढ़ाया और तराशा गया होगा। हर मूर्ति की अपनी अलग आभा और खासियत है। हालांकि मुगलकाल में अधिकांश मूर्तियों को खंडित कर दिया गया है, लेकिन इन खंडित मूर्तियों में सदियों पुराना शिल्प अपना लोहा मनवाता नजर आता है।
देवाधिदेव का पहरा
महादेव को नाट्य विधा में पारंगत माना जाता है, वहां मां गौरी लाश्य नृत्य की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। चौसठ योगिनियां भी नृत्य विधा के साथ मारण, मोहन, सम्मोहन, उच्चाटन और वशीकरण जैसी विधाओं में दक्ष थीं। इनकी उत्पत्ति महिषासुर मर्दिनी मां दुर्गा से ही मानी जाती है, तो मां शक्ति की इच्छा के अनुरुप सृष्टि के संचालन में अपनी भूमिका निभाती हैं। ङ्क्षकवंदंति है कि चौसठ योगिनी मंदिर में आज भी ऐसा प्रतीत होता है कि योगनियां अब भी शिव-पार्वती को पहरा देते हुए नृत्य करती हैं।
गोलकीमठ नाम से प्रसिद्धि
इतिहासकारों के अनुसार भेड़ाघाट की संगमरमरी वादियों के समीप बना चौसठ योगिनी मंदिर एक जमाने में गोलकी मठ के नाम से भी प्रसिद्ध रहा। इतिहासकार राजकुमार गुप्ता के अनुसार गोलकीमठ को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त था और यह काल गणना का बड़ा केंद्र हुआ करता था। यहां देश ही नहीं विदेशों से विद्यार्थी विद्याअध्ययन के लिए आते थे। गोलकीमठ विश्वविद्यालय में गणित, ज्योतिष गणित, संस्कृत साहित्य, तंत्र विज्ञान की शाखाएं थीं। इनमें से कल्चुरी काल में निर्मित तंत्र साधना केन्द्र चौसठ योगिनी मंदिर अब भी मौजूद है। बाकी शाखाओं को संचालित करने वाले भवन अस्तित्व में नहीं हैं।



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