जबलपुर का चौसठ जोगनी मंदिर और गौरी शंकर मंदिर
गौरी शंकर मंदिर चौसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर
चौसठ योगिनी मंदिर लगभग 12 सौ वर्ष पुराना है। ऐसा वर्णन यहां पर मिलता है और यह गौरी शंकर मंदिर जो 64 योगिनी मंदिर प्रांगण के बीचो-बीच स्थापित है। आज हम इसी मंदिर का वर्णन आपसे करने जा रहे हैं। आप जब भी गौरी शंकर मंदिर को देखने आएंगे तो आपको चौसठ योगिनी मंदिर मुफ्त में देखने को मिलेगा। क्यों अब आप समझ ही गए होंगे क्योंकि वह चौसठ योगिनी मंदिर प्रांगण के बिल्कुल बीचो-बीच खड़ा है।
तो चलिए आज हम चलते हैं। गौरी शंकर मंदिर अर्थात 64 योगिनी मंदिर देखने के लिए। जबलपुर का नाम जहां जबाली ऋषि के नाम पर पड़ा है। वहीं भेड़ाघाट का नाम महर्षि भृगु के नाम पर पड़ा है अर्थात यह तपोभूमि महर्षि भृगु की तपोभूमि है। ऐसा कहा जाता है कि पहले भेड़ाघाट को भृगु घाट कहा जाता था। जो बिगड़ते बिगड़ते आज भेड़ाघाट हो गया। यदि हम भेड़ाघाट का नाम भृगु घाट ले तो ज्यादा बेहतर रहेगा।
मार्कंडेय पुराण में भी मां नर्मदा के तट पर गौरी शंकर मंदिर की स्थापना का वर्णन मिलता है। साथ ही ऐसा माना जाता है कि सातवाहन शासकों ने भी इस मंदिर के निर्माण में सहयोग किया था। जिनके काल को हम कुषाण काल के नाम से भी जानते हैं। अतः कुषाण काल में भी इस मंदिर का निर्माण का साक्ष्य भी देखने को मिलता है क्योंकि यहां पर कुषाण काल की एक मूर्ति भी स्थापित है।
गौरी शंकर मंदिर विश्व का एकमात्र मात्र ऐसा मंदिर बताया जाता है जिसमें भगवान भोलेनाथ व माता पार्वती की एक साथ नंदी पर बैठे हुए की प्रतिमा स्थापित है। यह उनके विवाह की प्रतिमा है। जिसे भी मां गौरा को अपने साथ लेकर जा रहे हैं।
आपको इस प्रकार की प्रतिमा कहीं भी देखने के लिए नहीं मिलेगी। यह भगवान शिव की एक दुर्लभ मूर्ति है। जहां भगवान शिव शिवलिंग रूप में या मूर्ति रूप में देखने के लिए मिलते हैं। वही यहां पर भगवान शिव माता गौरी के साथ नंदी पर विराजमान हैं।
ऐसा वर्णन मिलता है कि सन 1185 से लेकर 1195 के बीच महाराज विजय सिंह की माता कौशल देवी यहां आकर नित्य पूजा किया करती थीं। इस मंदिर के अंदर भगवान शिव, पार्वती ही नहीं और भी देवी देवता स्थापित हैं। जो अद्भुत नक्काशी के नमूने है, एनके बाएं हाथ पर या आगे की ओर अष्टभुज गणेश, लक्ष्मी नारायण, वामन देव, नाग देवता व नाग माता दूसरी तरफ दाएं हाथ पर या पीछे की ओर सूर्य भगवान, तारा देवी, दत्तात्रेय देव और चतुर्भुज गणेश जी विराजमान है।
शिव मंदिर के सामने बिल्कुल बाहर खुले आकाश के नीचे दो शिवलिंग रखे हुए देखे जा सकते हैं। यही पर एक 4 मुखी शिवलिंग भी है जिसे चुंबकीय शिवलिंग के नाम से जाना जाता है। उन्हीं के साथ 2 घंटे भी आप देख सकते हैं। इनमें से एक घंटा सैकड़ों साल से पुराना व 150 किलो वजनी है। घंटा जो नंदी के ऊपर देख सकते हैं और कहते हैं कि जब इसे बजाया जाता था तो इसकी गूंज लगभग 5 से 10 किलोमीटर के बीच सुनी जा सकती थी।
यहां की मूर्तियों के खंडित होने की स्थिति को देखते हुए हमें लगता है कि जैसे दुर्दांत आक्रमणकारियों ने इसे तोड़ा है। यह दुर्दांत आक्रमणकारी कोई और नहीं औरंगजेब था। कहते हैं कि वह हर मूर्ति को तोड़ने से पहले वह कहता कि यदि शक्ती है तो परिचय दो। ऐसा कहकर वह मूर्तियों को तुड़वाता चला गया।
जहां इस मंदिर में विराजमान सभी मूर्तियों को वीभत्स रूप से खंडित किया गया है लेकिन मंदिर के अंदर की सभी मूर्तियां सुरक्षित कैसे रह गईं।
मंदिर से मिली जानकारी के अनुसार जब औरंगजेब की सेना ने गौरी शंकर मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास किया तो भगवान शिव के साथ निवास करने वाले बहुत सारे कीड़े मकोड़े जैसे बिच्छू, सांप और मधुमक्खियां आदियों ने उसकी सैना पर आक्रमण कर दिया और उन्हें इस मंदिर को छोड़कर भागना पड़ा।
गौरी शंकर मंदिर के बाहर एक शिलालेख लगा है जो ब्राह्मी लिपि में है और उस पर 11वीं शताब्दी का उल्लेख है। कलचुरी वंश के राजा नरसिंह देव के शासनकाल में 1155 में इसका निर्माण कराया गया था। इसमें कुषाण काल दूसरी ईस्वी की एक प्रतिमा भी इसमें देखने के लिए मिलते हैं।
मंदिर परिसर में चौसठ योगिनियां 64 कक्षों में विराजमान है और कुल मिलाकर यहां 85 मूर्तियां हैं। इस मंदिर के अंदर की मूर्ति को मिलाकर के 95 मूर्तियां हो जाती हैं।
कहा जाता है कि यहां स्थित सभी मूर्तियां जाग्रत हैं और भगवान भोलेनाथ के इस मंदिर की रक्षा करते हैं। इसी कारण इस मंदिर में रात में ठहरने के लिए मनाही है। इसी कारण रात में यहां कोई नहीं रहता है।
रात में यहां जाने पर पाबंदी और जैसे ही चौसठ योगिनी का नाम आता है तो तंत्र मंत्र और तांत्रिक क्रियाओं जैसे क्रियाकलाप दिमाग में घूमने लगते हैं। तो क्या जबलपुर के चौसठ योगिनी मंदिर में अभी भी तांत्रिक क्रियाकलाप अभी भी जारी है।
कभी यह स्थान तांत्रिक क्रियाओं का गढ़ रहा है लेकिन मंदिर के पुजारियों ने बताया कि भेड़ाघाट के इस मंदिर में अब तांत्रिक क्रियाएं बंद हो चुकी हैं अर्थात अब यहां तांत्रिक क्रियाएं नहीं होती। केवल नवरात्रि में अब भी यहां पर तंत्र से संबंधित विशेष पूजा होती हैं।
पहले यह मंदिर गोलकीए मठ के नाम से प्रसिद्ध था और इसमें तंत्र विद्या या तांत्रिक क्रियाएं की जाती थी । कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान ने भी यहीं से शिक्षा ग्रहण की थी।
आखिर यह चौसठ योगिनी है क्या? चौसठ योगिनी साधना में देवी काली के 64 रूपों की आराधना की जाती है? इनको आदिशक्ति मां काली का अवतार माना गया है, कहा जाता है कि इनकी साधना सफल हो जाने से जीवन में सुख सुविधाओं का कोई अभाव नहीं रहता।
योगिनी कहते हैं योगाभ्यास करने वाली स्त्री को दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि योगी स्त्री का पर्याय ही योगिनी है।
इनकी संख्या 64 होने के पीछे कई जानकारियां दी जाती है। इनमें से एक है कि स्त्री के बिना पुरुष अधूरा और पुरुष के बिना स्त्री अधूरी मानी जाती है। पुरुष और स्त्री दोनों बत्तीस और बत्तीस कलाओं से मिलकर बनी हुई है। इस प्रकार दोनों में बत्तीस और बत्तीस मिलकर 64 कलाएं हो जाती हैं। तो यह माना जा सकता है कि जो संपूर्ण कलाओं से युक्त भगवान शंकरजी के अर्धनारीश्वर के मिलन से प्रकट हुई है। अर्थात ये 64 योग ने भगवान शंकर और माता काली के मिलन स्वरूप ही उत्पन्न हुई हैं।
मंदिर परिसर में उसके द्वार पर एक सुरंग से भी है जो रानी दुर्गावती के महल को इस मंदिर से जोड़ती है। इस मंदिर के चारों तरफ घने जंगल है। इसकी इसके चारों ओर की जंगल में इमली बेलपत्र नेम आदि के वृक्ष देखे जा सकते हैं। यहां से संपूर्ण भैराघाट आसानी से दिखाई दे जाता है।
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