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ग्वारीघाट, जबलपुर मध्य प्रदेश।

ग्वारीघाट, जबलपुर मध्य प्रदेश।
ग्वारीघाट का इतिहास, महत्व एवं कहानी | GWARIGHAT HISTORY AND STORY

ग्वारीघाट (Gwarighat) एक ऐसी खूबसूरत जगह है जहां पर आपको नर्मदा नदी के अनेक  घाट एवं भाक्तिमय वातवरण देखने मिल जाएगा। ग्वारीघाट (Gwarighat) एक बहुत अच्छी जगह है गौरी घाट में घाटों की एक श्रंखला है। ग्वारीघाट (Gwarighat) में आके आपको बहुत शांती एवं सुकून मिलता है। आप यहां पर नर्मदा मैया के दर्शन कर सकते है, उन्हें प्रसाद चढा सकते है। ग्वारीघाट (Gwarighat) में सूर्यास्त का नजारा भी बहुत मस्त होता है। 


ग्वारीघाट (Gwarighat) कैसे पहुंचे

ग्वारीघाट (Gwarighat) जबलपुर जिले में स्थित है। जबलपुर जिला मध्य प्रदेश में स्थित है जबलपुर जिले को संस्कारधानी के नाम से भी जाना जाता है। जबलपुर से नर्मदा नदी बहती है। ग्वारीघाट (Gwarighat) नर्मदा नदी पर स्थित है। ग्वारीघाट एक अद्भुत जगह है, जिसके दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। ग्वारीघाट (Gwarighat) पहुंचने के लिए आप मेट्रो बस और ऑटो का प्रयोग कर सकते हैं। आपको ग्वारीघाट (Gwarighat) पहुंचने के लिए जबलपुर जिले के किसी भी हिस्से से बस या ऑटो की सर्विस मिल जाती है। ग्वारीघाट (Gwarighat) पर आप अपने वाहन से भी आ सकते हैं। 

आपको मेट्रो बस या आटो से आते है, तो आटो वाला आपको ग्वारीघाट (Gwarighat)  के चैक पर छोड सकता है जहां से आपको पैदल आना पड सकता है। यह पैदल रास्ता भी बहुत अच्छा रहता है आपको यहां पर बहुत सारी दुकानें मिल जाएगी जहां से आप शॉपिंग कर सकते हैं। अगर आपको मेट्रो बस वाला या ऑटो वाला ग्वारीघाट (Gwarighat) के घाट के पास उतारता है तो आप प्रसाद ले सकते हैं, सिंदूर वगैरह खरीद सकते हैं। आपको घाट के पास ही में बहुत सारी दुकान मिल जाती है। 

ग्वारीघाट के फैमस घाट (Gwarighat ke Ghats)

ग्वारीघाट (Gwarighat) में बहुत सारे घाट हैं। हर घाटों के अलग-अलग नाम है और अलग अलग पहचान है। ग्वारीघाट (Gwarighat) के सारे घाट अच्छी तरह से बने हुए है। ग्वारीघाट के सारे घाट में आपके बैठने की उत्तम व्यवस्था है। ग्वारीघाट (Gwarighat) के सभी घाटों में अब साफ सफाई का बहुत ज्यादा ध्यान दिया दिया जाता है, मगर लोग यहां पर फिर भी गंदगी करते हैं। यहां पर कूड़ेदान की भी व्यवस्था है और घाटों पर  साफ सफाई करने वाले लोग लगे रहते हैं। 

सिद्ध घाट 

ग्वारीघाट (Gwarighat) में सबसे पहला घाट सिद्ध घाट है। आपको सिद्ध घाट पर शंकर जी का मंदिर देखने मिलेगा और वहां पर गोमुख देखने मिलेगा। इस गोमुख से लगातार साल के 12 महीने और 24 घंटे पानी बहता रहता है। यह घाट बहुत खूबसूरत है और बहुत अच्छे से बना हुआ है।  यहां पर गोमुख के पास शंकर जी का मंदिर भी है, जिसमें शंकर जी का शिवलिंग विराजमान है। गोमुख के पास ही शंकर जी की मूर्ति भी विराजमान है जो बहुत खूबसूरत है गोमुख के पास ही अन्य मूर्तियां विराजमान है जैसे काली जी की दुर्गा जी की गणेश जी की और भी मूर्तियां विराजमान है।

उमा घाट

ग्वारीघाट (Gwarighat) पर दूसरा घाट है उमा घाट, आप सिध्द घाट से आगे आते है तो आपको यह घाट देखने मिलेगा। उमा घाट बहुत अच्छा घाट है। उमा घाट में माता नर्मदा जी की आरती शाम को 7 बजे की जाती है। इस घाट में शिव भगवान के 12 ज्योतिर्लिंगों के प्रतिरूप भी स्थापित है, जिनके दर्शन आप कर सकते हैं। उमा घाट पर गार्डन बना हुआ है, जहां पर आप बैठ सकते हैं। गर्मी के टाइम यहां पर बहुत अच्छा लगता है और बहुत शांति मिलती है। 

उमाघाट आप आगे बढ़ेंगे तो आपको यहां पर नर्मदा जी का मंदिर देखने मिल जाएगा । इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि मंदिर में तैर कर नहीं जाया जा सकता है क्योंकि उससे कुछ ना कुछ अशुभ घटना हो सकती है। नर्मदा मंदिर पर आप नाव से जा सकते हैं और माता नर्मदा जी के दर्शन कर सकते हैं। नर्मदा मंदिर के सामने आपको बहुत सारे पंडित जी देखने मिल जाएंगे जो पूजा कराते हैं, यहां पर पंडित जी एक पलंग के उपर बैठ रहते है। सभी पंडितों की अलग अलग पलंग होता है। ये पंडित जी आपकी पूजा और कथा करा देते है। आपका यहां पर मुंडन भी हो जाता है, यहां पर बहुत सी दुकानें है मुंडन की। 

दरोगा घाट

आप उमा घाट से आगे बढते है तो आपको दरोगा घाट देखने मिलता है, दरोगा घाट के बारे में कहा जाता है कि दरोगा घाट में आप समान एक घाट से दूसरे घाट नाव के द्वारा ले जाया जाता था। जिसका किराया यहां पर वसूला जाता था। इस कारण इस घाट को दरोगा घाट कहते है। इस घाट से गाड़ियों को भी नावों के द्वारा एक घाट से दूसरे घाट तक ले जाया जाता है। 

खारी घाट 

ग्वारीघाट (Gwarighat) में खारी घाट भी है यह भी बहुत खूबसूरत और शांत घाट है इस  घाट की विशेषता यह है कि इस घाट में घारी का विसर्जन किया जाता है। यहां पर ज्यादा भीड़ नहीं रहती है। यहां पर भी अच्छा वातावरण रहता है यहां पर भी आप नहा सकते हैं यहां चेंज करने के लिए भी यहां पर आपको चेंजिंग रूम मिल जाता है। इस घाट पर आप दरोगा घाट से पैदल आ सकते हैं, यह घाट दरोगा घाट के पास ही में है।

जलहरी घाट

जलहरी घाट भी ग्वारीघाट (Gwarighat) का एक घाट है। यह घाट ग्वारीघाट (Gwarighat) के मुख्य घाटों से थोड़ी दूरी पर है आप यहां पर पैदल जा सकते हैं। यह घाट ग्वारीघाट (Gwarighat) के अन्य घाटों से करीब 1 किमी या आधा किलोमीटर की दूरी पर होगा । इस   घाट पर आपकी गाड़ी के पार्किंग का किराया लगता है। यह घाट भी काफी अच्छा है यहां पर बहुत सारे मंदिर है जिनके आप दर्शन कर सकते हैं यहां पर कांच का एक प्रसिद्ध मंदिर है जिनके आप दर्शन कर सकते हैं।

ग्वारीघाट (Gwarighat) के हर घाट में नहाने की व्यवस्था है और हर घाट में आपको कपड़े बदलने के लिए चेंजिंग रूम मिल जाता है, तो आप नहाकर कपड़े बदल सकते हैं।

ग्वारीघाट (Gwarighat) में आपको बहुत सारी दुकानें मिल जाएंगी । जहां पर आप खाना खा सकते हैं और चाय नाश्ता कर सकते हैं। ग्वारीघाट (Gwarighat) पर कक्कड़ भर्ता बहुत फेमस होता है तो आप यहां पर कक्कड़ बनाकर भी खा सकते हैं या फिर होटल से खरीद कर खा भी सकते हैं।

ग्वारीघाट (Gwarighat) के सामने आपको गुरुद्वारा देखने मिलेगा जहां पर आप नाव से जा सकते है। यहां पर जाने का नाव से बहुत सस्ता किराया लगता है। गुरुद्वारा बहुत खूबसूरत लगता है। यहां सफेद कलर की बिल्डिग है। आप अगर रविवार को जाते है तो आप यहां लंगर खा सकते है। 

ग्वारीघाट (Gwarighat) में आपको बहुत सारे घाट और मंदिर देखने मिल जाएंगे। ग्वारीघाट (Gwarighat) के घाटों पर आप स्नान भी कर सकते हैं। घाटों पर साबुन और शैम्पू लगाने के लिए मनाही है, यह बहुत अच्छी बात है कि लोगों में जागरूकता फैल रही है कि वह साबुन का यूज ना करें और अपनी नर्मदा नदी को साफ रखने में महत्वपूर्ण योगदान दें। नर्मदा नदी में लोग अपने घरों के भागवन के पोस्टर और भगवान की पुरानी एवं खण्डित मूर्तियां भी छोड़ देते हैं। हम लोगों को इन वस्तुओं को भी नर्मदा नदी में नही डालना चहिए। जिससे नर्मदा नदी साफ रहे।

ग्वारीघाट (Gwarighat) बहुत अच्छी जगह है और हमें इसके सभी घाट को साफ सुथरा रखना चाहिए। हमारी नदियों को साफ सुथरा रखना चाहिए इसके आजू-बाजू हमें गंदगी नहीं करनी चाहिए। हमें कचरा यहां पर नहीं डालना चाहिए क्योंकि  नदिया ही हमारे पीने के पानी का मुख्य स्त्रोत है और हमें नदियों से ही पीने के पानी मिलता है। 

ग्वारीघाट (Gwarighat) में आपको नाव की सवारी करने मिल जाती है। यहां पर बहुत कम रेट पर आप नाव की सवारी कर सकते हैं, मगर नाव की सवारी के लिए आप बरेगन जरूर करें। 

ग्वारीघाट (Gwarighat) में ठंड के मौसम में विदेशी पक्षी आते हैं। इन विदेशी पक्षियों को दाना डालने पर यह आपके पास आ जाते हैं । इनको डालने वाला दाना आपको ग्वारीघाट (Gwarighat) में ही मिल जाता है, यह विदेशी पक्षी बहुत खूबसूरत लगते हैं और दाना डालने पर और आवाज लगाने पर यह एकदम से आपके पास आ जाते हैं जो बहुत ही मनोरम लगता है और इन पक्षियों की आवाज बहुत ही खूबसूरत लगती है। फरवरी के महीने में भी आपको यह विदेशी पक्षी देखने मिल जाते हैं।

ग्वारीघाट (Gwarighat) में बहुत सारे आश्रम है जो बहुत से फेमस संतों के है। ये आश्रम ग्वारीघाट (Gwarighat) के आस पास में स्थित है। यहां पर लोग आकर रहते हैं जिनके कोई नहीं रहता है और अपनी सेवा आश्रम को देते है। इसके अलावा  ग्वारीघाट (Gwarighat) में बहुत सारे भंडारे होते रहते हैं तो आप यहां से प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं।

ग्वारीघाट (Gwarighat) एक बहुत अच्छी जगह है। यहां पर आप अपनी फैमिली और फ्रेंड्स के साथ आ सकते हैं और बहुत अच्छा टाइम बिता सकते हैं।

हिंदू धर्म में न सिर्फ देवी-देवताओं की भक्ति भाव से पूजा-उपासना करने की परंपरा है, बल्कि पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और नदियों की भी पूजा होती है। हिंदू धर्म में नदियों को बहुत ही पूज्यनीय माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष माघ शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को नर्मदा जयंती मनाई जाती है। इस बार नर्मदा जयंती 07 फरवरी को है। ऐसी मान्यता है कि आज के ही दिन धरती पर मां नर्मदा का अवतरण हुआ था। नर्मदा नदी को रेवा नदी के नाम से भी जाना जाता है। नर्मदा नदी मध्य प्रदेश में बहती है और अमरकंटक इन नदी का उद्गम स्थल है। 

आठ फरवरी को मां नर्मदा का प्राकट्योत्‍सव है। ग्वारीघाट में ही नर्मदा प्राकट्योत्‍सव पर सुबह से रात तक हजारों की संख्या में लोग नर्मदा का पूजन व दर्शन करने पहुंचते हैं। इस मां नर्मदा विशेष पूजन किया जाता है। धूमधाम के साथ मां नर्मदा को चुनरी चढ़ाई जाती है। 
इसके अलावा तिलवाराघाट, लम्हेटाघाट में श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

हिन्दू संस्कृति में नदियों को बहुत ही अधिक महत्व दिया गया है। उन्हें मां का दर्जा दिया गया है। मान्यता के अनुसार जितना पुण्य पूर्णिमा तिथि को गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान से प्राप्त होता है। उसी के समान पुण्य नर्मदा जयंती पर नर्मदा नदी में स्नान करने पर मिलता है। मां गंगा की तरह ही मां नर्मदा भी मोक्षदायिनी हैं। 

इस तरह मनाई जाती है नर्मदा जयंती 
नर्मदा जयंती पर नर्मदा नदी के सभी तटों को सजाया जाता है। नदी के तटों पर हवन किया जाता हैं। इस दिन मां नर्मदा के पूजन के बाद भंडारा का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही सुबह से शाम तक नदी के किनारे कई सारे धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। संध्या में मां नर्मदा की महाआरती की जाती है। माना जाता है जो भक्त इस दिन मां नर्मदा का पूजन करते हैं उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और रोगों से मुक्ति मिलती है।

नर्मदा जयंती पूजन विधि
हिंदू धर्म में नदियों में स्नान करना बहुत ही पुण्य का काम माना जाता है। नर्मदा जयंती पर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के मध्य नर्मदा किसी भी समय स्नान किया जा सकता है। इस पावन अवसर पर प्रातः जल्दी उठकर नर्मदा में स्नान करने के बाद सुबह फूल, धूप, अक्षत, कुमकुम, आदि से नर्मदा मां के तट पर पूजन करना चाहिए। इसके साथ ही इस पावन पर्व पर नर्मदा नदी पर दीप जलाकर दीपदान करना शुभ रहता है। 

नर्मदा नदी का महत्व
धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव के द्वारा मां नर्मदा का अवतरण हुआ था। नर्मदा नदी की महिमा का चारो वेदों में वर्णन है। इसके अलावा रामायण और महाभारत में भी इस नदी उल्लेख है। इसी दिव्य नदी के नर्मदेश्वर शिवलिंग विराजमान हैं, जो हिन्दू आस्था का बड़ा केन्द्र माना जाता है। मान्यता है कि इसी नदी के तट पर साधना करते हुए देवताओं और ऋषि-मुनियों ने सिद्धियां प्राप्त की थी।  

नर्मदा जयंती (narmda jayanti 2022) माघ माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है। नर्मदा भारत की प्रमुख नदियों में से एक है। इसका वर्णन रामायण, महाभारत आदि अनेक धर्म ग्रंथों में भी मिलता है। धार्मिक ग्रंथों में यह तिथि को नर्मदा जयंती के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। नर्मदा जीवनदायिनी मां है। यह पूरी दुनिया की अकेली रहस्यमयी नदी है। चारों वेद इसकी महिमा का गान करते हैं। इस बार मां नर्मदा की जयंती 7 फरवरी 2022, सोमवार (7 February 2022) को मनाई जा रही है। कैलेंडर के मत-मतांतर से नर्मदा जयंती कई स्थानों पर 8 फरवरी को भी मनाई जाएगी। कहते हैं कि कृपा सागर भगवान शंकर द्वारा अमरकंटक के पर्वत पर 12 वर्ष की कन्या के रूप में नर्मदा को उत्पन्न किया गया। 

नर्मदा ने भगवान शिव से वरदान प्राप्त किया था कि 'प्रलय में भी उसका नाश न हो। उसका हर पाषाण शिवलिंग के रूप में बिना प्राण-प्रतिष्ठा के पूजित हो।' 12 ज्योर्तिर्लिंगों में से एक प्रसिद्ध ज्योर्तिर्लिंग ओंकारेश्वर नर्मदा नदी के तट पर ही स्थित है। इसके अलावा भृगुक्षेत्र, शंखोद्वार, धूतताप, कोटीश्वर, ब्रह्मतीर्थ, भास्करतीर्थ, गौतमेश्वर। चंद्र द्वारा तपस्या करने के कारण सोमेश्वर तीर्थ आदि 55 तीर्थ भी नर्मदा के विभिन्न घाटों पर स्थित हैं। वर्तमान समय में तो कई तीर्थ गुप्त रूप में स्थित हैं।

 
Purano me Narmada पुराणों में नर्मदा- स्कंद पुराण के अनुसार, नर्मदा प्रलय काल में भी स्थायी रहती है एवं मत्स्य पुराण के अनुसार नर्मदा के दर्शन मात्र से पवित्रता आती है। इसकी गणना देश की पांच बड़ी एवं सात पवित्र नदियों में होती है। गंगा, यमुना, सरस्वती एवं नर्मदा को ऋग्वेद, सामवेद, यर्जुवेद एवं अथर्ववेद के सदृश्य समझा जाता है। महर्षि मार्कण्डेय के अनुसार इसके दोनों तटों पर 60 लाख, 60 हजार तीर्थ हैं एवं इसका हर कण भगवान शंकर का रूप है। इसमें स्नान, आचमन करने से पुण्य तो मिलता ही है केवल इसके दर्शन से भी पुण्य लाभ होता है।
 
 
नर्मदा अनादिकाल से ही सच्चिदानंदमयी, आनंदमयी और कल्याणमयी नदी रही है। हमारे कई प्राचीन ग्रंथों में नर्मदा के महत्व का वर्णन मिलता है। नर्मदा शब्द ही मंत्र है। नर्मदा कलियुग में अमृत धारा है। नर्मदा के किनारे तपस्वियों की साधना स्थली भी हैं और इसी कारण इसे तपोमयी भी कहा गया है। विष्णु पुराण में वर्णन आता है कि नाग राजाओं ने मिलकर नर्मदा को वरदान दिया है कि जो व्यक्ति तेरे जल का स्मरण करेगा उसे कभी सर्प विष नहीं फैलेगा।
 
नर्मदा के सभी स्थलों को श्राद्ध के लिए उपयुक्त बतलाया गया है। वायु पुराण में उसे पितरों की पुत्री बताया गया है और इसके तट पर किए गए श्राद्ध का फल अक्षय बताया गया है। नर्मदा पत्थर को भी देवत्व प्रदान करती है और पत्थर के भीतर आत्मा प्रतिष्ठित करती है।
birth story of Maa narmada नर्मदा अवतरण की कथा- एक बार भगवान शिव लोक कल्याण के लिए तपस्या करने मैखल पर्वत पहुंचे। उनके पसीने की बूंदों से इस पर्वत पर एक कुंड का निर्माण हुआ। इसी कुंड में एक बालिका उत्पन्न हुई। जो शांकरी व नर्मदा कहलाई। शिव के आदेशानुसार वह एक नदी के रूप में देश के एक बड़े भू-भाग में रव (आवाज) करती हुई प्रवाहित होने लगी। रव करने के कारण इसका एक नाम रेवा भी प्रसिद्ध हुआ। मैखल पर्वत पर उत्पन्न होने के कारण वह मैखल-सुता भी कहलाई।
 
 
एक दूसरी कथा के अनुसार चंद्रवंश के राजा हिरण्यतेजा को पितरों को तर्पण करते हुए यह अहसास हुआ कि उनके पितृ अतृप्त हैं। उन्होंने भगवान शिव की तपस्या की तथा उनसे वरदान स्वरूप नर्मदा को पृथ्वी पर अवतरित करवाया। भगवान शिव ने माघ शुक्ल सप्तमी पर नर्मदा को लोक कल्याणार्थ पृथ्वी पर जल स्वरूप होकर प्रवाहित रहने का आदेश दिया। नर्मदा द्वारा वर मांगने पर भगवान शिव ने नर्मदा के हर पत्थर को शिवलिंग सदृश्य पूजने का आशीर्वाद दिया तथा यह वर भी दिया कि तुम्हारे दर्शन से ही मनुष्य पुण्य को प्राप्त करेगा। इसी दिन को हम नर्मदा जयंती के रूप में मनाते हैं।

 
अगस्त्य, भृगु, अत्री, भारद्वाज, कौशिक, मार्कण्डेय, शांडिल्य, कपिल आदि ऋषियों ने नर्मदा तट पर तपस्या की है। ओंकारेश्वर में नर्मदा के तट पर ही आदि शंकराचार्य ने शिक्षा पाई और नर्मदाष्टक की रचना की। भगवान शंकर ने स्वयं नर्मदा को दक्षिण की गंगा होने का वरदान दिया था। पुराणों के अनुसार नर्मदा का उद्भव भगवान शंकर से हुआ। तांडव करते हुए शिव के शरीर से पसीना बह निकला। उससे एक बालिका का जन्म हुआ जो नर्मदा कहलाई। शिव ने उसे लोककल्याण के लिए बहते रहने को कहा। कहते हैं कि वैशाख शुक्ल सप्तमी पर नर्मदा में गंगा का वास रहता है।

 
Narmada ka Safar नर्मदा का सफर- अमरकंटक से प्रकट होकर लगभग 1200 किलोमीटर का सफर तय कर नर्मदा गुजरात के खंभात में अरब सागर में मिलती है। विध्यांचल पर्वत श्रेणी से प्रकट होकर देश के ह्रदय क्षेत्र मध्यप्रदेश में यह प्रवाहित होती है। नर्मदा के जल से मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा लाभान्वित है। यह पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है तथा डेल्टा का निर्माण नहीं करती। इसकी कई सहायक नदियां भी हैं।

नर्मदा परिक्रमा का महत्व Narmada Parikarma- नर्मदा ही विश्व की एक मात्र ऐसी नदी है, जिसकी परिक्रमा की जाती है क्योंकि इसके हर घाट पर पवित्रता का वास है तथा इसके घाटों पर महर्षि मार्कण्डेय, अगस्त्य, महर्षि कपिल एवं कई ऋषि-मुनियों ने तपस्या की है। शंकराचार्यों ने भी इसकी महिमा का गुणगान किया है। मान्यता के अनुसार इसके घाट पर ही आदि गुरु शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित किया था।

 
हमारे पुराणों में वर्णन है कि संसार में नर्मदा ही एकमात्र नदी है जिसकी परिक्रमा सिद्ध, नाग, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, मावन आदि करते हैं। माघ शुक्ल सप्तमी पर अमरकंटक से लेकर खंभात की खाड़ी तक नर्मदा के किनारे पड़ने वाले ग्रामों और नगरों में उत्सव रहता है क्योंकि इस दिन नर्मदा जयंती मनाई जाती है। 
 
मंत्र-Narmada Mantra
 
- नम: पुण्यजलेआद्येनम: सागरगामिनि।
नमोऽस्तुतेऋषिगणै:शंकरदेहनि:सृते।
नमोऽस्तुतेधर्मभृतेवराननेनमोऽस्तुतेदेवगणैकवन्दिते।
नमोऽस्तुतेसर्वपवित्रपावनेनमोऽस्तुतेसर्वजगत्सुपूजिते। 
 
- पुण्या कनखले गंगा कुरुक्षेत्रे सरस्वती।
ग्रामेवा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा।
त्रिभि:सारस्वतं पुण्यं सप्ताहेनतुयामुनम्।
सद्य:पुनातिगाङ्गेयंदर्शनादेवनर्मदाम्।
 
- कनकाभांकच्छपस्थांत्रिनेत्रांबहुभूषणां।
पद्माभय:सुधाकुम्भ:वराद्यान्विभ्रतींकरै:।
 
- ऐं श्रींमेकल-कन्यायैसोमोद्भवायैदेवापगायैनम:।





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