इन्सान कभी मौसम नही होता, फिर भी, मैरे यार उसे बदलते देखा है!

इन्सान कभी मौसम नही होता, 
फिर भी, मैरे यार उसे बदलते देखा है!

कभी-कभी ऐसा क्या हो जाता है?
हम चाहते कुछ और 
और हो कुछ और ही जाता है

हम जानते हैं कि
आँखे तालाब नहीं होती, 
फिर भी, मैरे यार इन्हें भरते देखा है!
किस्मत दोस्त नहीं होती, 
फिर भी, मैरे यार इसे भी रुठते देखा है!

हम जानते हैं कि
आत्मसम्मान शरीर का अंग नहीं है, 
फिर भी, मैरे यार इसे घायल होते देखा है!
होठ कोई कपड़ा नही होते, 
फिर भी, मैरे यार इन्हें भी सिलते देखा है!

हम जानते हैं कि
दुश्मनी बीज नही होती, 
फिर भी, मैरे यार इसे भी बोते देखा है!
 और
इन्सान कभी मौसम नही होता, 
फिर भी, मैरे यार उसे बदलते देखा है!

लेखक
ॐ जितेन्द्र सिंह तोमर 

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