भगवान गणेश-तुलसी और दूर्वा की कथा*

*🌻भगवान गणेश-तुलसी और दूर्वा की कथा*

*🕉️🚩हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार भगवान गणेश को भगवान  श्री कृष्ण का अवतार बताया गया है और भगवान श्री कृष्ण स्वयं भगवान विष्णु के अवतार है। लेकिन जो तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इतनी प्रिय की भगवान विष्णु के ही एक रूप शालिग्राम का विवाह तक तुलसी से होता है वही तुलसी भगवान गणेश को अप्रिय है, इतनी अप्रिय की भगवान गणेश के पूजन में इसका प्रयोग वर्जित है।  पर ऐसा क्यों है इसके सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा है*

*🌹🔱एक बार श्री गणेश गंगा किनारे तप कर रहे थे। इसी कालावधि में धर्मात्मज की नवयौवना कन्या तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया। देवी तुलसी सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए गंगा के तट पर पंहुची। गंगा तट पर देवी तुलसी ने युवा तरुण गणेश जी को देखा जो तपस्या में विलीन थे। शास्त्रों के अनुसार तपस्या में विलीन गणेश जी रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान थे। उनके समस्त अंगों पर चंदन लगा हुआ था। उनके गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण-मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। उनके कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था।*

*🔹🌷तुलसी श्री गणेश के रुप पर मोहित हो गई और उनके मन में गणेश से विवाह करने की इच्छा जाग्रत हुई। तुलसी ने विवाह की इच्छा से उनका ध्यान भंग किया। तब भगवान श्री गणेश ने तुलसी द्वारा तप भंग करने को अशुभ बताया और तुलसी की मंशा जानकर स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर उसके विवाह प्रस्ताव को नकार दिया।*

*⚜️🌸श्री गणेश द्वारा अपने विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने से देवी तुलसी बहुत दुखी हुई और आवेश में आकर उन्होंने श्री गणेश के दो विवाह होने का शाप दे दिया। इस पर श्री गणेश ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि तुम्हारा विवाह एक असुर से होगा। एक राक्षस की पत्नी होने का शाप सुनकर तुलसी ने श्री गणेश से माफी मांगी। तब श्री गणेश ने तुलसी से कहा कि तुम्हारा विवाह शंखचूर्ण राक्षस से होगा। किंतु फिर तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में जगत के लिए जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। पर मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा।*

*तब से ही भगवान श्री गणेश जी की पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है।*

*🌻गणेश जी और दूर्वा की कथा👇*
*🌺🍃हम सभी यह जानते हैं कि श्री गणेश को दूर्वा बहुत प्रिय है। दूर्वा को दूब भी कहा जाता है। यह एक प्रकार की घास होती है, जो सिर्फ गणेश पूजन में ही उपयोग में लाई जाती है। आखिर श्री गणेश को क्यों इतनी प्रिय है दूर्वा? इसके पीछे क्या कहानी है? क्यों इसकी 21 गांठे ही श्री गणेश को चढ़ाई जाती है? एक पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीनकाल में अनलासुर नाम का एक दैत्य था, उसके कोप से स्वर्ग और धरती पर त्राहि-त्राहि मची हुई थी। अनलासुर एक ऐसा दैत्य था, जो मुनि-ऋषियों और साधारण मनुष्यों को जिंदा निगल जाता था। इस दैत्य के अत्याचारों से त्रस्त होकर इंद्र सहित सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि भगवान महादेव से प्रार्थना करने जा पहुंचे और सभी ने महादेव से यह प्रार्थना की कि वे अनलासुर के आतंक का खात्मा करें।*
*तब महादेव ने समस्त देवी-देवताओं तथा ऋषि-मुनियों की प्रार्थना सुनकर, उनसे कहा कि दैत्य अनलासुर का नाश केवल श्री गणेश ही कर सकते हैं। फिर सबकी प्रार्थना पर श्री गणेश ने अनलासुर को निगल लिया, तब उनके पेट में बहुत जलन होने लगी। इस परेशानी से निपटने के लिए कई प्रकार के उपाय करने के बाद भी जब गणेशजी के पेट की जलन शांत नहीं हुई, तब कश्यप ऋषि ने दूर्वा की 21 गांठें बनाकर श्री गणेश को खाने को दीं। यह दूर्वा श्री गणेशजी ने ग्रहण की, तब कहीं जाकर उनके पेट की जलन शांत हुई। ऐसा माना जाता है कि श्री गणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा तभी से आरंभ हुई।*

************** *शंख और घंटा***************
                 हिन्दू पद्धति में शंखनाद एवं घंटा-ध्वनि का विशेष महत्व है. शंख-ध्वनि एवं घण्टा -ध्वनि से रोगों को उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया नष्ट होते हैं. इसीलिए आदि काल से मंदिरों एवं पूजा-पाठ इत्यादि धार्मिक उत्सवों में शंख एवं घंटा बजाया जाता है.
                सन् 1928 ईस्वी.में बर्लिन विश्वविद्यालय ने शंख-ध्वनि पर अनुसंधान करके यह सिद्ध कर दिया कि शंख-ध्वनि की शब्द-तरंगें बैक्टीरिया को  नष्ट  करने  के लिए सर्वोत्तम एवं सस्ती औषधि है.प्रति सैकेंड सत्ताईस घन  फुट  वायु-शक्ति  के  जोर  से  बजाया  हुआ  शंख 1200 फुट दूरी के बैक्टीरिया को  नष्ट  कर  डालता  है और 1200  फुट  की  दूरी  के  जीवाणु  उस  ध्वनि  से मूर्छित हो जाते हैं.
                 बैक्टीरिया   के   अलावा   इस    से   हैजा, मलेरिया, गर्दन तोड़ ज्वर के कीटाणु भी नष्ट हो जाते हैं. और साथ ही ध्वनि विस्तारक स्थान के  पास  के  स्थान निःसंदेह कीटाणु रहित हो जाते हैं.
                मिर्गी , मूर्छा , कण्ठमाला   और   कोढ़   के रोगियों के अन्दर शंख-ध्वनि की प्रतिक्रिया  रोगनाशक होती है. शिकागो के डॉ. डी. ब्राइन ने 1,300 सौ  बहरे रोगियों को शंख-ध्वनि के  माध्यम  से  अब  तक  ठीक किया है. अफ्रीका के निवासी  घण्टा  को  ही  बजाकर ज़हरीले सर्प के काटे हुए  मनुष्य  को  ठीक  करने  की प्रक्रिया को पता नहीं कब से आज तक करते चले  आ रहे हैं. ऐसा पता  चला  है  कि  मास्को  सैनेटोरियम  में घण्टा - ध्वनि से तपेदिक रोग को ठीक करने का प्रयोग सफलता पूर्वक चल रहा है.
                सन् 1,916 ई. में बर्मिंघम में एक  मुकदमा चल रहा था.तपेदिक के एक रोगी ने गिरजाघर में बजने वाले घण्टे के सम्बन्ध में  अदालत  में  यह  दावा  किया  था कि इस ध्वनि के कारण मेरा स्वास्थ्य निरन्तर गिरता जा रहा है तथा इससे मुझे बहुत शारीरिक क्षति होती है.
                इस  बात  पर  अदालत   ने   तीन   प्रमुख विज्ञानिकों को  घंटा-ध्वनि  की  जाँच  के  लिए  नियुक्त किया.यह परीक्षण लगातार सात महीनों तक चला और अन्त में वैज्ञानिकों ने यह घोषित  किया  कि  घण्टा  की ध्वनि से तपेदिक रोग ठीक होता है न कि इस  से  हानि. साथ ही तपेदिक के अलावा इससे कई  शारीरिक  कष्ट भी दूर होते हैं तथा मानसिक उत्कर्ष होता है.

      

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