पण्डितराज जगन्नाथ शास्त्री का कुछ मर्दन

पण्डितराज जगन्नाथ
जन्मजगन्नाथ
1590
भारत
मृत्यु1641
वाराणसी
व्यवसायकवि, संस्कृत समालोचक, काव्यशास्त्री
जीवनसाथीलवंगी
बच्चेनिस्संतान
माता-पिताविष्णुअय्या (पिता) लक्ष्मी (माता)

जीवनीसंपादित करें

पंडितराज जगन्नाथ वेल्लनाटीय कुलोद्भव कश्यप गोत्रीय रेही (पातालभेदी अवटंक के) तैलंग ब्राह्मण, गोदावरी जिलांतर्गत मुंगुडु ग्राम के निवासी थे। उनके उनके पिता का नाम "पेरुभट्ट" (पेरभट्ट) और माता का नाम लक्ष्मी था। नारायण अय्या इनके वंश के मूलपुरुष इनके पितामह थे ! पिता पेरुभट्ट जिनका एक नाम विष्णुअय्या भी लिखा मिलता है [2] परम विद्वान् थे। उन्होंने ज्ञानेंद्र भिक्षु से "ब्रह्मविद्या", महेंद्र से न्याय और वैशेषिक, खंडदेव से "पूर्वमीमांसा" और शेषवीरेश्वर से महाभाष्य का अध्ययन किया था। वे अनेक विषयों के प्रौढ़ विद्वान् थे। पंडितराज ने अपने पिता से ही अधिकांश शास्त्रों का अध्ययन किया था। शेषवीरेश्वर जगन्नाथ के भी गुरु थे।मशहूर काव्यशास्त्री और कवि पंडितराज जगन्नाथ औरंज़ेब के दरबारी थे और उन्हीं के संरक्षण और हौसलाआफजाई में पंडितराज ने ‘पीयूषलहरी’, ‘गंगालहरी’, ‘अमृत लहरी’, ‘लक्ष्मी लहरी’ और काव्यशास्त्र मीमांसा ग्रंथ ‘रसगंगाधर’ लिखा था। औरंज़ेब ने ना तो पंडितराज जगन्नाथ को जलवाया और न उनके लिखे इन ग्रंथों को। ये ग्रंथ अभी भी उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं कुछ विद्वान मानते हैं- पंडितराज ने औरंज़ेब के राज्याश्रय में रहते हुए बादशाह की बहन से शादी की और उसका नया नाम 'तन्वंगी' रखा और उस पर संस्कृत में कविता भी लिखी।

किम्वदंतियांसंपादित करें

प्रसिद्धि के अनुसार जगन्नाथ, पहले जयपुर में एक विद्यालय के संस्थापक और अध्यापक थे। एक काजी को वाद-विवाद में परास्त करने के कीर्तिश्रवण से प्रभावित दिल्ली सम्राट् ने उन्हें बुलाकर अपना राजपंडित बनाया। "रसगंगाधर" के एक श्लोक में "नूरदीन" के उल्लेख से समझा जाता है नूरुद्दीन मुहम्मद "जहाँगीर" के शासन के अंतिम वर्षों में (17वीं शती के द्वितीय दशक में) वे दिल्ली आए और शाहजहाँ के राज्यकाल तथा दाराशिकोह के वध तक (1659 ई.) वे दिल्लीवल्लभों के पाणिपल्लव की छाया में रहे। मुगल विद्वान युवराज दाराशिकोह के साथ उनकी मैत्री घनिष्ठ थी पर उसकी हत्या के पश्चात् उनका उत्तर-जीवन मथुरा और काशी में में ईश्वरोपासना में बीता। उनके ग्रंथों में न मिलने पर भी उनके नाम से मिलने वाले पद्यों और किंवदंतियों के अनुसार पंडितराज का "लवंगी" नामक कोमलांगी, यवनसुंदरी के साथ प्रेम और शरीर-संबंध हो गया था जो एक मुग़ल दरबारी गायिका/ नर्तकी थी। उससे उनका विधिपूर्वक विवाह हुआ या नहीं, कब और कहाँ उसकी मृत्यु हुई - इस विषय में बहुत सी दंतकथाएँ प्रचलित हैं। इसके अतिरिक्त पंडितराज के संबंध में भी अनेक जनश्रुतियाँ पंडितों में प्रचलित हैं। कहा जाता है कि 'यवन संसर्गदोष' के कारण काशी के पंडितों, विशेषत: उन्हीं के सजातीय अप्पय दीक्षित द्वारा बहिष्कृत और तिरस्कृत होकर उन्होंने ' गंगालहरी' के श्लोकों का उच्चार करते हुए इच्छापूर्वक प्राणत्याग किया। कहीं-कहीं यह भी सुना जाता है कि यवनी लवंगी और पंडितराज - दोनों ने ही गंगा में डूब कर प्राण दे दिए थे। इस प्रकार की लोकप्रचलित दंतकथाओं का कोई ऐतिहासिक-प्रमाण उपलब्ध नहीं है। किसी मुसलमान रमणी से उनका प्रणय-संबंध रहा हो - यह संभव जान पड़ता है। 16वीं शती ई. के अंतिम चरण में संभवत: उनका जन्म हुआ था और 17वीं शती के तृतीय चरण में कदाचित् उनकी मृत्यु हुई। सार्वभौमश्री शाहजहाँ के प्रसाद से उनको "पंडितराज" की उपाधि (सार्वभौम श्री शाहजहाँ प्रसादाधिगतपंडितराज पदवीविराजितेन) अधिगत हुई थी। कश्मीर के रायमुकुंद ने उन्हें "आसफविलास" लिखने का आदेश दिया था। नवाब आसफ खाँ के (जो "नूरजहाँ" के भाई और शाहजहाँ के मंत्री थे) नाम पर उन्होंने उसका निर्माण किया। इससे जान पड़ता है कि शाहजहाँ और आसफ खाँ के साथ वे कश्मीर भी गए थे।

साहित्यिक अवदानसंपादित करें

पंडितराज जगन्नाथ उच्च कोटि के कवि, समालोचक तथा शास्त्रकार थे। कवि के रूप में उनका स्थान उच्च काटि के उत्कृष्ट कवियों में कालिदास के अनंतर- कुछ विद्वान् रखते हैं। उन्होंने यद्यपि महाकाव्य की रचना नहीं की है, तथापि उनकी मुक्तक-कविताओं और स्तोत्रकाव्यों में उत्कर्षमय और उदात्त काव्यशैली का स्वरूप दिखाई देता है। उनकी कविता में प्रसादगुण के साथ-साथ आजप्रधान, समासबहुला रीति भी दिखाई देती है। भावनाओं का ललितगुंफन, भावचित्रों का मुग्धकारी अंकन, शब्दमाधुर्य की झंकार, अलंकारों का प्रसंगसहायक और सौंदर्यबोधक विनियोग, अर्थ में भाव-प्रवणता और बोध-गरिमा तथा पदों के संग्रथन में लालित्य की सर्जना - उनके काव्य में प्रसंगानुसार प्राय: सर्वत्र मिलती है। रीतिकालीन अलंकरणप्रियता और ऊहात्मक कल्पना की उड़ान का भी उनपर प्रभाव था। गद्य और पद्य - दोनों की रचना में उनकी अन्योक्तियों में उत्कृष्ट अलंकरणशैली का प्रयोग मिलता है। कल्पनारंजित होने पर भी उनमें तथ्यमूलक मर्मस्पर्शिता है। उनकी सूक्तियों में जीवन के अनुभव की प्रतिध्वनि है। उनके स्तोत्रों में भक्तिभाव और श्रद्धा की दृढ़ आस्था से उत्पन्न भावगुरुता और तन्मयता मुखरित है। उनके शास्त्रीय विवेचन में शास्त्र के गांभीर्य और नूतन प्रतिभा की दृष्टि दिखाई पड़ती है। सूक्ष्म विश्लेषण, गंभीर मनन-चिंतन और प्रौढ़ पांडित्य, के कारण उनका "रसगंगाधर" अपूर्ण रहने पर भी साहित्यशास्त्र के उत्कृष्टतम ग्रंथों में एक कहा जाता है। वे एक साथ कवि, साहित्यशास्त्रकार और वैयाकरण थे। पर "रसगंगाधर" कार के रूप में उनके साहित्यशास्त्रीय पांडित्य और उक्त ग्रंथ का पंडितमंडली में बड़ा आदर है।

प्रमुख रचनाएँसंपादित करें

ग्रंथ की प्रौढ़ता से आकृष्ट हो कर साहित्यशास्त्रज्ञ नागेश भट्ट ने "रसगंगाधर" की टीका लिखी थी।


स्तोत्र
  • (क) अमृतलहरी (यमुनास्तोत्र),
  • (ख) गंगालहरी (पीयूषलहरी - गंगतामृतलहरी),
  • (ग) करुणालहरी (विष्णुलहरी),
  • (घ) लक्ष्मीलहरी और
  • (ङ) सुधालहरी।
प्रशस्तिकाव्य
  • (क) आसफविलास,
  • (ख) प्राणाभरण, और
  • (ग) जगदाभरण।
शास्त्रीय रचनाएँ -
  • (क) रसगंगाधर (अपूर्ण सहित्यशास्त्रीय ग्रंथ),
  • (ख) चित्रमीमांसाखंडन (अप्पय दीक्षित की "चित्रमीमांसा" नामक अलंकारग्रंथ की खंडनात्मक आलोचना) (अपूर्ण),
  • (ग) काव्यप्रकाशटीका (मम्मट के "काव्यप्रकाश" की टीका) और
  • (घ) प्रौढ़मनोरमाकुचमर्दन (भट्टोजि दीक्षित के "प्रौढ़मनोरमा" नामक व्याकरण के टीकाग्रंथ का खंडन)।

इनके अतिरिक्त उनके गद्य ग्रंथ "यमुनावर्णन" का भी "रसगंगाधर" से संकेत मिलता है। "रसगंगाधर" नाम से सूचित होता है कि इस ग्रंथ में पाँच "आननों" (अध्यायों) की योजना रही होगी। परतु दो हो "आनन" मिलते हैं। "चित्रमीमांसाखंडन" भी अपूर्ण् है। "काव्यप्रकाशटीका" भी प्रकाशित होकर अब तक सामने नहीं आई।

सुभाषित -

भामिनीविलास (पंडितराज शतक) उनका परम प्रसिद्ध मुक्तक कविताओं का संकलन ग्रंथ है। "नागेश भट्ट" के अनुसार "रसंगगाधर" के लक्षणों का उदाहरण देने के लिए पहले से ही इसकी रचना हुई थी। इसमें चार विलास हैं, प्रथम "प्रस्तावित विलास" में अत्यन्त सुन्दर और ललित अन्योक्तियाँ हैं जिनमें जीवन के अनुभव और ज्ञान का सरस एवं भावमय प्रकाशन है। अन्य "विलास" हैं - शृंगारविलास, करुणविलास और शांतिविलास। सायास अलंकरणशैली का प्रभाव तथा चमत्कारसर्जना की प्रवृत्ति में अभिरुचि रखते हुए भी जगन्नाथ की उक्तियों में रस और भाव की मधुर योजना का समन्वय और संतुलन बराबर वर्तमान है। उनके मत से वाङ्मय में साहित्य, सहित्य में ध्वनि, ध्वनि में रस और रसो में शृंगार का स्थान क्रमश: उच्चतर हैं। पंडितराज न अपने पांडित्य और कवित्व के विषय में जो गर्वोक्तियाँ की हैं वे साधार हैं। ये सचमुच श्रेष्ठ कवि भी है और पंडितराज भी।

सन्दर्भसंपादित करें

  1.  "Weaponising faith: The Gyanvapi Mosque-Kashi Vishwanath dispute".
  2.  'उत्तर भारतीय आन्ध्र-तैलंग-भट्ट-वंशवृक्ष' (भाग-२) संपादक स्व. पोतकूर्ची कंठमणि शास्त्री और करंजी गोकुलानंद तैलंग द्वारा 'शुद्धाद्वैत वैष्णव वेल्लनाटीय युवक-मंडल', नाथद्वारा से वि. सं. २००७ में प्रकाशित

जगन्नाथ पंडितराज के सन्दर्भ : पठनीय आलेख

1.[1]

2.[2]

3.भट्टोजि दीक्षित पर [3]

4. ‘समुद्र संगम’ मुगल राजकुमार दाराशुकोह के गुरू प्रसिद्ध कवि पण्डितराज जगन्नाथ की आत्मकथा की शैली में भोलाशंकर व्यास का उपन्यास : भारतीय ज्ञानपीठ: [ISBN 8126310847]

5. पण्डितराज जगन्नाथ ग्रन्थावली - प्रथम भाग विमर्शमयी 'बालक्रीडा' हिन्दी व्याख्या सहित : आचार्य मधुसूदन शास्त्री -चौखम्भा संस्कृत सीरीज :

6. पण्डितराज जगन्नाथ शैमुषी समुन्मीलन : मनुलता शर्मा - सम्पूर्णानन्द संस्कृत वि.वि. प्रकाशन

7. गंगालहरी : अंश: [4]

8. आधुनिक संस्कृत काव्यशास्त्र डॉ॰ आनंद कुमार श्रीवास्तव [ISBN 978-81-7854-232-4]

9. अमृतलहरी - जगन्नाथ पण्डितराज[https://web.archive.org/web/20151130163013/http://docs.google.com/viewer? url=http%3A%2F%2Fwww.sanskritworld.in%2Fpublic%2Fassets%2Fbook%2Fbook_523731cca9ddf.txt]

10. प्राणाभरणम्‌ - जगन्नाथ पण्डितराज[5]

11. Paṇḍitarāja Jagannātha mahākaviḥ :Khaṇḍavilli Sūryanārāyaṇaśāstrī Bharateeya Vidya Niketan, 1983

12. भामिनीविलास : जगन्नाथ पण्डितराज : महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा हिंदी भाषानुवाद  : खेमराज श्रीकृष्ण दास द्वारा बम्बई से संवत् 1950 में वेंकटेश्वर प्रेस से प्रकाशित

13. 'दाराशुकोह' : मेवाराम का भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित वृहद् उपन्यास

14. 



लवंगी-जगन्नाथ

कहानी   By  फ़ेमिनाOctober 20, 2017, 8:48 PM IST

लेखक: डॉ निखिलेश शास्त्री 

(इतिहास के पन्नों पर दर्ज एक मुग़लकालीन प्रेम-कथा)

मुग़ल बादशाह शाहजहां ने जब यह देख लिया कि उसका बड़ा बेटा शहज़ादा दाराशिकोह अब सयाना हो गया है और उसमें हर वह ख़ासियत है कि वही मुग़ल सल्तनत का अगला बादशाह होगा. तब उन्हें लगा कि दारा हिन्दुस्तानियों पर सहूलियत से हुकूमत कर सके इसके लिए उसे हिन्दुस्तान की बोली-भाषा, यहां के धर्म, रीति-रिवाज़ों की अच्छी जानकारी होनी चाहिए. इस लिहाज़ से बादशाह ने दक्षिण के एक तेलंग ब्राह्मण युवा जगन्नाथ को नियुक्त किया और उनके रहने, खाने का इंतज़ाम भी लाल क़िले में ही कर दिया.

हरम से कुछ दूर हटकर एक सजे हुए कमरे, जिसे अध्ययन कक्ष कहते थे, में पण्डित जगन्नाथ दाराशिकोह को पढ़ाने लगे. इसी समय कई बार शहज़ादे के साथ एक लगभग 18 वर्षीया सुंदरी भी पढ़ने बैठ जाया करती थी. युवा जगन्नाथ उस गौरवर्णा को बार-बार दाराशिकोह से नज़र बचाते हुए निहार लेते थे. धीरे-धीरे जगन्नाथ उस के अप्रतिम सौन्दर्य से आकर्षित होने लगे.

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इधर कंधों तक फैले हुए चमकीले बालोंवाले, हर रोज़ की कसरत से कसे हुए 25 वर्षीय युवा जगन्नाथ को देखकर उस हसीना के मन में भी कुछ हलचल शुरू होने लगी. दोनों के मन श्रृंगार में पगने लगे. अब तो वे दोनों यही चाहने लगे कि कोई ऐसा एकान्त में मौक़ा मिले, जहां एक दूसरे को अपलक निहारते हुए अपना प्यार पनपने दें.

एक दिन जगन्नाथ ने हिम्मत करके शहज़ादे से पूछ ही लिया,‘‘इस कन्या से आपका क्या रिश्ता है?’’
शहज़ादे ने खुलासा किया,‘‘आचार्य प्रवर ! इस यवन कन्या का नाम लवंगी है और बचपन में इसके माता-पिता एक हादसे में मारे गए. तभी से इसकी परवरिश हमारी अम्मी जान मुमताज़ महल ने की है और हमारे साथ रहते हुए यह लवंगी भी संस्कृत भाषा और व्याकरण में निपुण हो रही है.’’

ऐसे पढ़ते-पढ़ाते दिन गुज़रते रहे और इन दोनों युवा प्रेमियों का प्यार धीरे-धीरे और गहराता गया. एक दिन दाराशिकोह को दौरे पर आगरा जाना पड़ा. पंडित जगन्नाथ को इसकी ख़बर नहीं थी. वे रोज़ की तरह अध्ययन कक्ष की तरफ़ बढ़ने लगे. वहां पास के लगे कमरे में उन्होंने देखा कि लवंगी दर्पण में देखते हुए अपने घुंघराले बालों को सुलझा रही थी. उसके सौंदर्य को देखकर जगन्नाथ के पैर वहीं ठिठक गए और दरवाज़े पर खड़े वे एकटक उसके सौन्दर्य को नख से शिख तक निहारने लगे. दरवाज़े पर कुछ आहट सुनकर लवंगी ने मुड़कर देखा कि वही हृष्ट-पुष्ट तेजस्वी युवा उसे सतत निहार रहा है. दोनों के मन में प्रेम का ज्वार उमड़ता तो था, पर इस एकांत ने दोनों को इसके इज़हार का मौक़ा दे दिया. उस प्यार में कुछ ऐसा नशा था कि लवंगी खड़े होकर अपना आंचल संभालती, उसके पहले ही जगन्नाथ ने बिना किसी संकोच के उसकी नज़ाकत को सशक्त बाहुपाश में बांध लिया. वह कमसिन लड़की भी अपनी ज़िंदगी के पहले प्रेम के आगोश में समा रही थी. लवंगी निःसंकोच जगन्नाथ के आलिंगन में बंधी उनके सानिध्य का आनंद लेती रही.

लवंगी की नशीली आंखों में आंखें डालकर जगन्नाथ ने अपनी भावना को शब्द दिए,‘‘लवंगी, यह हमारा क्षणिक शारीरिक मिलन नहीं है, यह तो पूरी ज़िंदगी साथ रहने का वादा है.’’

‘‘आचार्य प्रवर! इस नाचीज़ यवन कन्या पर ऐसा प्यार! इतना प्यार? यह मुमक़िन नहीं होगा,’’ लवंगी का निराशाभरा स्वर आया.
‘‘प्रिये! यह आत्मा का बंधन है. यह उम्र, जाति और मज़हब से कहीं अधिक ऊंचा है,’’ जगन्नाथ ने विश्वासभरे शब्दों से लवंगी की निराशा को दूर किया.

लवंगी के भीतर प्यार का भरोसा जगाकर जगन्नाथ अपने आश्रयस्थल की ओर लौट रहे थे तभी बादशाह के हरकारे ने उन्हें बादशाह का पैग़ाम सुनाया-आज शाम दीवान-ए-आम में कई मुल्क़ों के जानकारों की किसी मुद्दे पर बहस होगी और बादशाह सलामत चाहते हैं कि आप भी इस बहस में शामिल होकर अपना इल्म नुमाया करें.

जगन्नाथ के लिए यह हर्ष का विषय था. उस शाम हुए पण्डितों के शास्त्रार्थ में विद्वानों ने कई तर्क-वितर्क दिए और आख़िर में पंडित जगन्नाथ को बोलने का मौक़ा दिया गया. जगन्नाथ ने वेद-पुराण और कुरान शरीफ़ के ऐसे सशक्त उदाहरण दिए कि सभा में बैठे सारे विद्वानों ने एक स्वर से पंडित जगन्नाथ की जय-जयकार की. वे उस शाम के सर्वश्रेष्ठ वक्ता घोषित कर दिए गए. बादशाह शाहजहां ने जगन्नाथ के ऐसे प्रदर्शन से ख़ुश होकर जगन्नाथ को ‘पंडितराज’ की उपाधि से सुशोभित कर दिया.

इसती तरह दिन गुज़रते रहे. जगन्नाथ-लवंगी का प्रेम परवान चढ़ता रहा. जब कभी फ़ुर्सत में होते तो बादशाह शाहजहां पंडितराज जगन्नाथ के साथ शतरंज खेला करते थे. हर बार जगन्नाथ की ही मात होती थी. इस शह और मात के खेल में एक दिन बादशाह ने कहा,‘‘पंडितराज! जिस दिन तुम हमें शतरंज में मात दे देगो तब माबदौलत तुम्हारी हर मुराद पूरी कर देंगे.’’

कई दिनों से खेलते हुए अब जगन्नाथ को भी शतरंज में कुछ महारत हासिल हो रही थी और एक दिन जगन्नाथ ने सचमुच बादशाह को मात दे ही दी. शहंशाह ने अपना वादा दोहराते हुए कहा,‘‘पंडितराज! आज तुम मुहमांगी मुराद पाने के हक़दार हो. जो चाहो मांग लो. माबदौलत अपने वादे से नहीं मुकरेंगे.’’

‘‘जहांपनाह ! वैसे तो मेरे पास ईश्वर का और आपका दिया सब कुछ है. फिर भी ज़रूरत होने पर मैं आपसे कुछ ज़रूर मांग लूंगा,’’ जगन्नाथ ने नम्रतापूर्वक निवेदन किया.

कुछ समय बाद शहज़ादे दाराशिकोह को एक महीने के लिए हैदराबाद जाने का फ़रमान सुनाया गया. जाने से पहले वह लवंगी को हिदायत दे गया कि इस दौरान वह अध्ययन कक्ष में न जाए. शहज़ादे की इस पाबंद से दोनों युवा प्रेमी यह सोचकर मन ही मन बेचैन हो रहे कि अब वे एक-दूसरे से नहीं मिल सकेंगे. विरह की तड़प में उनके दिन कट रहे थे. वे ऐसे मौक़े की तलाश में थे कि एकांत में एक-दूसरे को निहार सकें, मन की बातें कर सकें.
उस दिन मेहमानों के ठहरने के लिए अतिथि गृह में कोई भी मेहमान नहीं था. चारों तरफ़ सन्नाटा छाया हुआ था. पंडितराज ने दूर से देखा कि लवंगी अतिथि गृह में ही जा रही थी. जगन्नाथ ने सोचा कि मिलने का इससे अच्छा मौक़ा नहीं मिलेगा. यह सोचकर वह लम्बे-लम्बे डग भरते हुए वहां जा पहुंचे.  शय्या पर अंगड़ाई लेती हुई लवंगी के चेहरे पर बिखरे बालों में से उसका गोरा मुख ऐसा दिखाई दे रहा था जैसे काले बादलों की घटा में से आधा चन्द्रमा झांक रहा हो.

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जगन्नाथ उसके समीप पहुंचे और उसे आलिंगन में ले लिया. कुछ पलों तक प्रेमी जोड़ा विरह की प्यास बुझाता रहा. लवंगी के मखमली चेहरे से बालों की लट हटाते हुए जगन्नाथ ने एक विरही स्वर में कहा,‘‘लवंगी! अब तुम्हीं मेरे जीवन का आधार हो. अब तुम्हारे बिना जिंदगी का एक पल भी एक युग जैसा लगता है.’’

जगन्नाथ की बाहों में ख़ुद को निढाल-सा छोड़ते हुए लवंगी ने अपने मन की बात कही,‘‘आचार्य, आपके बिना मेरी ज़िंदगी ऐसी होती है, जैसे कोई ज़िंदा लाश हो. हम इस तरह छुप-छुपकर मिलनेवाली ज़िंदगी कब तक जिएंगे? आचार्य, यदि ख़ुदा न ख़ास्ता शहज़ादे दाराशिकोह ने मुझे आपकी बांहों में देख लिया तो यक़ीन जानिए, वो मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

लवंगी के इस दर्द ने जगन्नाथ का मानो कलेजा ही चीरकर रख दिया, उसने लवंगी को शय्या पर बैठाया और तत्काल तेज़ी से, लगभग दौड़ते हुए शहंशाह शाहजहां के सामने जा पहुंचे. प्यार के जोश ने जगन्नाथ को ऐसी हिम्मत दी कि बिना भय, संकोच के जगन्नाथ ने बादशाह से एक ही सांस में कह डाला,‘‘जहांपनाह ! आज मैं अपनी मुराद मांगना चाहता हूं. आपने मुझे जो वचन दिया था, उसे पूरा करने का समय आ गया है, शहंशाह. आपके महल में रह रही मृगनयनी लवंगी को अपनी ‌जीवनसंगिनी बनाना
चाहता हूं.’’

अचानक आए जगन्नाथ की ऐसी ख़्वाहिश सुनकर एक बार तो बादशाह सकते में आ गए और आसपास बैठे दरबारी भी आश्चर्य से एक दूसरे का मुंह ताकने लगे.

‘‘पंडितराज! माबदौलत अपने वादे से कभी नहीं मुकरेंगे, पर हमारे ज़हन में यह ख़ौफ़ कचोट रहा कि एक कट्टर ब्राह्मण, एक मुग़लिया कनीज़ से निक़ाह करके अपने ख़ानदान में, अपनी बिरादरी में मुंह दिखाने लायक रहेगा? क्या तुम्हारे मज़हब के लोग तुम्हें चैन से रहने देंगे? और तो और क्या लवंगी भी इसके लिए रज़ामंद है?’’ बादशाह ने अपनी शंका ज़ाहिर की.

जगन्नाथ ने अति विश्वस्त होकर कहा,‘‘परवरदिगारे आलम! न मुझे समाज की परवाह है न जाति के लोगों के विरोध का डर है. और लवंगी तो मेरी जीवनसंगिनी बनने को बहुत पहले से ही अधीर हो रही है.’’

युवा जगन्नाथ के ऐसे दृढ़ संकल्प को समझते हुए बादशाह ने भरी सभा में पंडितराज और लवंगी की शादी की घोषणा कर दी.

बादशाह की स्वीकृति मिलने पर जगन्नाथ को ऐसा लगा कि मानो, उन्हें पूरी दुनिया की सल्तनत हासिल हो गई हो. प्रसन्नातिरेक में वे अतिथिगृह की ओर लौटे और लवंगी को एक ही झटके में उठाया, आलिंगनबद्ध कर उसके ख़ूबसूरत चेहरे पर चुंबनों की बौछार कर दी. जगन्नाथ के इस बेख़ौफ़ अप्रत्याशित व्यवहार और दृढ़ आलिंगन से यवन कन्या समझ गई कि यह उनके जीवनभर साथ रहने का संकेत है. वह भी लोकलाज भूलकर जगन्नाथ की बांहों में सिमटी रही. वह जान गई थी कि उनके प्यार पर बादशाह की ‌स्वीकारोक्ति की मुहर लग चुकी है.

पंडितराज जगन्नाथ और लवंगी के विवाह के लिए सारा लाल क़िला सजाया गया और शाही तौर-तरीक़े से विवाह उत्साह से सम्पन्न हुआ. हालांकि इस विवाह से मौलवी, इमाम और दरबारी नाख़ुश तो थे, किन्तु बादशाह के ख़ौफ़ से वे अंत तक शांत ही बने रहे.

लवंगी और जगन्नाथ का वैवाहिक जीवन सुख-शांति से व्यतीत हो रहा था. इसी बीच पंडितराज ने संस्कृत साहित्य के दो अनुपम ग्रन्थों की रचना की. एक षोडश श्रृंगार प्रधान ‘भामिनी विलास’ जो एक खंड काव्य है और दूसरा अलंकार शास्त्र पर आधारित ‘रस गंगाधर’. ये ऐसी पांडित्य पूर्ण रचनाएं थीं कि पंडितराज जगन्नाथ समूचे संस्कृत साहित्य में विद्वान लेखक की श्रेणी में माने गए.

लाल क़िले में बादशाह शाहजहां आनन्द से जीवन बिता रहे थे, तभी एक मध्यरात्रि में अचानक क़िले में ज़बर्दस्त कोलाहल मच गया. सैनिक हथियारों से लैस बेतहाशा इधर से उधर दौड़ रहे थे और दरबान एक मशाल लिए हुए जगन्नाथ के पास हांफता हुआ यह ख़बर देने आया कि बादशाह के तीसरे शहज़ादे औरगंजेब ने दक्षिण से आकर सारे लाल क़िले पर कब्ज़ा कर लिया है. उसने बादशाह शाहजहां को क़ैद में डाल दिया है और दाराशिकोह का भी क़त्ल कर दिया है. यह बताते हुए उसने कहा,‘‘पंडितराज, चूंकि आप भी बादशाह के चहेते हैं, औरंगजेब आपको भी ज़िंदा नहीं छोड़ेगा. सेनापति ने कहा है कि आप किले के पिछले दरवाज़े से निकलकर जमुना पर लगी नाव में बैठकर कहीं दूर निकल जाएं और अपनी जान बचाएं.’’

दोनों युवा युगल नाव में झोंके लेते हुए मथुरा पहुंच गए और वृंदावन में रहने लगे. थोड़े दिन बाद जगन्नाथ ने यह समझा कि यहां उनकी विद्वत्ता की कोई पूछ-परख नहीं है अतः काशी, जो विद्वानों का गढ़ है, वहीं उनकी रोज़ी-रोटी का इंतज़ाम हो पाएगा. यह सोचकर वह दोनों काशी नगरी पहुंच गए. वहां के कट्टर ब्राह्मणों ने जगन्नाथ का घोर विरोध किया, क्योंकि ब्राह्मण होकर भी उन्होंने एक मुग़ल कन्या से विवाह किया. वहां अधिकांश ब्राह्मणों का समवेत स्वर उठा,‘‘इस  भ्रष्ट ब्राह्मण को पवित्र काशी नगरी से निकाल बाहर करो.’’

एक किंवदंति के मुताबिक़, काशी के पंडितों के घनघोर विरोध में पंडितराज जगन्नाथ ने अपनी पवित्रता का प्रमाण देने के लिए उन पंडितों से कहा,‘‘मैं गंगाजी के घाट की 52 वीं सीढ़ी पर बैठकर गंगाजी की स्तुति करूंगा. यदि मैं पवित्र ब्राह्मण हूं तो गंगा नदी का जल मेरी एक-एक स्तुति पढ़ने पर एक सीढ़ी ऊपर चढ़ता जाएगा.’’


पंडितराज के इस चमत्कार को देखने के लिए काशी के क्या पंडित और क्या आम लोग, सभी घाट के इर्दगिर्द जमा हो गए. पंडितराज जगन्नाथ ने संस्कृत भाषा में लिखे शिखरिणी छंद में रचित ‘गंगालहरी’ का पहला श्लोक ‘समृद्धं सौभाग्यं सकल वसुधायाः किमपितन्’ सस्वर गाया तो ऐसा विलक्षण चमत्कार हुआ कि गंगाजी का जल एक सीढ़ी ऊपर चढ़ गया. इस तरह जगन्नाथ ने 52 श्लोक पढ़े और गंगाजल आख़िर में 52 वीं सीढ़ी पर बैठे जगन्नाथ और लवंगी की कमर तक चढ़ गया. लोग अचरज करते रहे, लेकिन कट्टरता को छोड़ने तैयार न हुए. यह देखकर क्षुब्ध हुए पंडितराज जगन्नाथ ने अपने पास बैठी लवंगी से कहा,‘‘प्रिये! मेरे पवित्रता का प्रमाण देने के बावजूद ये काशी के कट्टर पंडित हमें यहां सुख से जीने नहीं देंगे, इससे बेहतर होगा कि हम इस गंगा नदी के पवित्र जल में जल समाधि ले लें और अपने जीवन को सार्थक करें.’’

लवंगी ने सहमति में पलकें झपकाईं और जगन्नाथ के हाथ को कसकर पकड़ लिया. प्रेमी युगल ने आंखों ही आंखों में दृढ़ निश्चय किया और एक-दूसरे के साथ हमेशा के लिए जलमग्न हो गए.  

 



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