बद्रीनाथ या बद्रीनारायण मंदिर
बद्रीनाथ या बद्रीनारायण मंदिर एक हिन्दू मंदिर है | ( बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और मान्यताये ! )
यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है , ये मंदिर भारत में उत्तराखंड में बद्रीनाथ शहर में स्थित है |
बद्रीनाथ मंदिर , चारधाम और छोटा चारधाम तीर्थ स्थलों में से एक है
यह अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है । ये पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं | यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है | ऋषिकेश से यह 214 किलोमीटर की दुरी पर उत्तर दिशा में स्थित है | बद्रीनाथ मंदिर शहर में मुख्य आकर्षण है | प्राचीन शैली में बना भगवान विष्णु का यह मंदिर बेहद विशाल है | इसकी ऊँचाई करीब 15 मीटर है | पौराणिक कथा के अनुसार , भगवान शंकर ने बद्रीनारायण की छवि एक काले पत्थर पर शालिग्राम के पत्थर के ऊपर अलकनंदा नदी में खोजी थी | वह मूल रूप से तप्त कुंड हॉट स्प्रिंग्स के पास एक गुफा में बना हुआ था |
बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण (Establishment of Badrinath temple)
सोलहवीं सदी में गढ़वाल के राजा ने मूर्ति को उठवाकर वर्तमान बद्रीनाथ मंदिर में ले जाकर उसकी स्थापना करवा दी |
और यह भी माना जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने 8 वी सदी में मंदिर का निर्माण करवाया था |
शंकराचार्य की व्यवस्था के अनुसार मंदिर का पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से होता है |
यहाँ भगवान विष्णु का विशाल मंदिर है और पूरा मंदिर प्रकर्ति की गोद में स्थित है |
यह मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप ।बद्रीनाथ जी के मंदिर के अन्दर 15 मुर्तिया स्थापित है | साथ ही साथ मंदिर के अन्दर भगवान विष्णु की एक मीटर ऊँची काले पत्थर की प्रतिमा है | इस मंदिर को “धरती का वैकुण्ठ” भी कहा जाता है | बद्रीनाथ मंदिर में वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है |
लोककथा के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना :-
पौराणिक कथा के अनुसार यह स्थान भगवान शिव भूमि( केदार भूमि ) के रूप में व्यवस्थित था | भगवान विष्णु अपने ध्यानयोग के लिए एक स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा के पास शिवभूमि का स्थान बहुत भा गया | उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के पास) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के पास बालक रूप धारण किया और रोने लगे |
उनके रोने की आवाज़ सुनकर माता पार्वती और शिवजी उस बालक के पास आये |और उस बालक से पूछा कि तुम्हे क्या चाहिए | तो बालक ने ध्यानयोग करने के लिए शिवभूमि (केदार भूमि) का स्थान मांग लिया | इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव पार्वती से शिवभूमि (केदार भूमि) को अपने ध्यानयोग करने हेतु प्राप्त कर लिया |यही पवित्र स्थान आज बद्रीविशाल के नाम से भी जाना जाता है | ( बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और मान्यताये ! )
1. अलकनंदा के तट पर स्थित अद्भुत गर्म झरना जिसे ‘तप्त कुंड’ कहा जाता है।
2. एक समतल चबूतरा जिसे ‘ब्रह्म कपाल’ कहा जाता है।
3. पौराणिक कथाओं में उल्लेखित एक ‘सांप’ शिला है |
4. शेषनाग की कथित छाप वाला एक शिलाखंड ‘शेषनेत्र’ है।
5. भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं- ‘चरणपादुका’ |
6. बद्रीनाथ से नजर आने वाला बर्फ़ से ढका ऊंचा शिखर नीलकंठ, जो ‘गढ़वाल क्वीन’ के नाम से जाना जाता है |
( बद्रीनाथ मंदिर का नाम बद्रीनाथ कैसे पडा )
इसके पीछे एक रोचक कथा है , यह कहते है कि एक बार देवी लक्ष्मी , भगवान विष्णु से रूठकर मायके चले गयी | तब भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए तपस्या करने लगे | जब देवी लक्ष्मी की नाराजगी दूर हुई | तो देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु को ढूंढते हुए उस जगह पहुँच गई , जहाँ भगवान विष्णु तपस्या कर रहे थे | उस समय उस स्थान पर बदरी (बेड) का वन था | बेड के पेड़ में बैठकर भगवान विष्णु ने तपस्या की थी इसलिए लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को “बद्रीनाथ” नाम दिया |
बद्रीनाथ मंदिर की मान्यताये (Beliefs of Badrinath Temple)
1. बद्रीनाथ मंदिर की पौराणिक मान्यताओ के अनुसार , जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हो रही थी , तो गंगा नदी 12 धाराओ में बट गयी |
इस लिए इस जगह पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से प्रसिद्ध हुई |
और इस जगह को भगवान विष्णु ने अपना निवास स्थान बनाया और यह स्थान बाद में “बद्रीनाथ” कहलाया |
2. बद्रीनाथ मंदिर की मान्यता यह भी है कि प्राचीन काल मे यह स्थान बेरो के पेड़ो से भरा हुआ करता था | इसलिए इस जगह का नाम बद्री वन पड़ गया |
और यह भी कहा जाता है की इसी गुफा में ” वेदव्यास “ ने महाभारत लिखी थी और पांडवो के स्वर्ग जाने से पहले यह जगह उनका अंतिम पड़ाव था | जहाँ वे रुके थे |
3. बद्रीनाथ मंदिर के बारे में एक मुख्य कहावत है | ( बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और मान्यताये ! )
” जो जाऐ बद्री , वो ना आये ओदरी “
अर्थात जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है |
उसे माता के गर्भ में नहीं आना पड़ता है | मतलब दर्शन करने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है |
बद्रीनाथ मंदिर की मान्यता यह है कि भगवान बद्रीनाथ के दर पर सभी श्रद्धालु की मनचाही इच्छा पूरी होती है |
4. बद्रीनाथ धाम की मान्यता यह है कि बद्रीनाथ में भगवान शिव जी को ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली थी |
इस घटना की याद “ब्रह्मकपाल” नाम से जाना जाता है | ब्रह्मकपाल एक ऊँची शिला है | जहाँ पितरो का तर्पण,श्राद्ध किया जाता है | माना जाता है कि यहाँ श्राद्ध करने से पितरो को मुक्ति मिल जाती है |
5. इस जगह के बारे में यह भी कहते है कि इस जगह पर भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने तपस्या की थी | नर अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्री कृष्ण के रूप में जन्मे थे |
उम्मीद करते है कि “बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास और मान्यताये ” जानकार आपको आनंद आया होगा |
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