महाभारत _ग्रँथ_में_भीष्म_जी_के_अनुसार_धर्म_क्या_है
महाभारत _ग्रँथ_में_भीष्म_जी_के_अनुसार_धर्म_क्या_है
वेदव्यास जी की महाभारत से ही जानें ( संस्कृत हिंदी दोनो )आप संस्कृत भाषा भी पढ़ें । इससे आपने कुंडली के दोष स्वतः ही समाप्त होंगे ।।।
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"श्री गणेशाय नमः"
भीष्म उवाच
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अत्र धर्मानुवचनं कीर्तयन्ति पुराविदः ।
प्रत्यक्षावेव धर्मार्थों क्षत्रियस्य विजानतः ॥ १ ॥
तत्र न व्यवधातव्यं परोक्षा धर्मयापना ।
अधर्मो धर्म इत्येतद् यथा वृकपदं तथा ॥२॥
धर्माधर्मफले जातु ददशेह न कश्चन ।
बुभूषेद् बलमेवैतत् सर्व बलवतो वशे ॥३॥
धियो बलममात्यांश्च बलवानिह विन्दति ।
यो ह्यनाढ्यः स पतितस्तदुच्छिष्टुं यदल्पकम् ॥ ४ ॥
बह्वपथ्यं बलवति न किंचित् क्रियते भयात् ।
उभौ सत्याधिकारस्थी त्रायते महतो भयात् ॥ ५ ॥
अतिधर्माद् बलं मन्ये बलाद् धर्मः प्रवर्तते ।
बले प्रतिष्ठितो धर्मो धरण्यामिव जङ्गमम् ॥६॥
धूमो वायोरिव वशे वलं धर्मोऽनुवर्तते ।
अनीश्वरो बले धर्मो द्रुमे वल्लीव संश्रिता ॥ ७ ॥
वशे बलवतां धर्मः सुखं भोगवतामिव ।
नास्त्यसाध्यं बलवतां सर्व बलवतां शुचि ॥८॥
दुराचारः क्षीणबलः परित्राणं न गच्छति ।
अथ तस्मादुद्विजते सर्वो लोको वृकादिव ॥ ९ ॥
अपभ्वस्तो ह्ययमतो दुःखं जीवति जीवितम् ।
जीवितं यदपक्रुष्टं यथैव मरणं तथा ॥१०॥
यदेवमाहुः पापेन चारित्रेण विवर्जितः ।
सुभृशं तप्यते तेन वाक्शल्येन परिक्षतः॥११॥
अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य परिमोक्षणे ।
प्रयीं विद्यामवेक्षेत तथोपासीत वै द्विजान् ॥१२॥ प्रसादयेन्मधुरया वाचा चाप्यथ कर्मणा ।
महामनाश्चापि भवेद् विवहेश्च महाकुले ॥ १३ ॥ इत्यस्मीति वदेदेवं परेषां कीर्तयेद् गुणान् ।
जपेदुदकशीलः स्यात् पेशलो नातिजल्पकः॥१५॥ ब्रह्मक्षत्रं सम्प्रविशेद् बहु कृत्वा सुदुष्करम् ।
उच्यमानो हि लोकेन बहुकृत् तदचिन्तयन् ॥१५॥
अपापो ह्येवमाचारः क्षिप्रं बहुमतो भवेत् ।
सुखं च चित्रं भुजीत कृतेनैकेन गोपयेत् ॥१६ ॥
लोके च लभते पूजां परत्रेह महत् फलम् ॥ १७ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन् (युधिष्ठिर) ! प्राचीनकाल की बातों को जानने वाले विद्वान् इस विषय में जो धर्म का प्रवचन करते हैं , वह इस प्रकार है - विज्ञ क्षत्रिय के लिये धर्म और अर्थ ये दो ही प्रत्यक्ष हैं॥१॥
( स्पष्टिकरण - संसार चलाना, एवं धन कमाना, यही दो धर्म है )
धर्म और अधर्म की समस्या रखकर किसीके कर्तव्य में व्यवधान नहीं डालना चाहिये , क्योंकि धर्म का फल प्रत्यक्ष नहीं है । जैसे भेड़िये का पदचिह्न देखकर किसीको यह निश्चय नहीं होता कि यह व्याघ्रका पदचिह्न है या कुत्तेका ? उसी प्रकार धर्म और अधर्मके विषयमें निर्णय करना कठिन है ।।२।।
(कौन सनातन धर्मी है, कौन नही है ;- इसका निर्णय ईश्वर करता है, मनुष्य नही , ईश्वर मनुष्य के द्वारा लिए गए तत्काल निर्णयों के आधार पर उसके धर्म/अधर्म का कर्मफल देता है ।)
धर्म और अधर्म का फल किसी ने कभी यहाँ प्रत्यक्ष नहीं देखा है । अतः राजा बल प्राप्ति के लिये प्रयत्न करे , क्योंकि यह सब जगत् बलवान के वशमें होता है ।।३॥
( अन्य सभी बातों की परवाह छोड़ केवल बल अर्जित करें, वही धर्म है )
बलवान् पुरुष इस जगत में सम्पत्ति , सेना और मन्त्री सब कुछ पा लेता है । जो दरिद्र है । वह पतित समझा जाता है और किसीके पास जो बहुत थोड़ा धन है , वह उच्छिष्ट या जूठन समझा जाता है ॥४ ॥
बलवान् पुरुष में बहुत - सी बुराई होती है तो भी भय के मारे उसके विषय में कोई मुँह से कुछ बात नहीं निकालता है । यदि बल और धर्म दोनों सत्यके ऊपर प्रतिष्ठित हो तो वे मनुष्यकी महान् भयसे रक्षा करते हैं ।। ५ ॥
मैं अधिक धर्म से भी बल को ही श्रेष्ठ मानता हूँ ; क्योंकि बलसे धर्म की प्रवृत्ति होती है । जैसे चलने - फिरनेवाले सभी प्राणी पृथ्वीपर ही स्थित हैं , उसी प्रकार धर्म बल पर ही प्रतिष्ठित है ।।
जैसे धूआँ वायु के अधीन होकर चलता है , उसी प्रकार धर्म भी बल का अनुसरण करता है । अतः जैसे लता किसी वृक्ष के सहारे फैलती है , उसी प्रकार निर्बल धर्म बल के ही आधार पर सदा स्थिर रहता है ॥ ७ ॥
जैसे भोग - सामग्रीसे सम्पन्न पुरुषोके अधीन सुख - भोग होता है , उसी प्रकार धर्म बलवानों के वशमें रहता है । बलवानों के लिये कुछ भी असाध्य नहीं है । बलवानों की सारी वस्तु ही शुद्ध एवं निर्दोष होती है ॥ ८ ॥
जिसका बल नष्ट हो गया है , जो दुराचारी है,उसको भय उपस्थित होनेपर कोई रक्षक नहीं मिलता है । दुर्बलसे सब लोग उसी प्रकार उद्विग्न हो उठते हैं , जैसे भेड़ियेसे ॥९॥
दुर्बल अपनी सम्पत्ति से वञ्चित हो जाता है , सबके अपमान और उपेक्षा का पात्र बनता है तथा दुःखमय जीवन व्यतीत करता है । जो जीवन निन्दित हो जाता , वह मृत्युके ही तुल्य है ॥ १० ॥
दुर्बल मनुष्य के विषय में लोग इस प्रकार कहने लगते -'अरे ! यह तो अपने पापाचारके कारण बन्धु -बान्धवों द्वारा त्याग दिया गया है । उनके उस वाग्बाणसे घायल होकर वह अत्यन्त संतप्त हो उठता है ॥ ११ ॥
उससे छूटने के लिये आचार्योंने यह उपाय बताया है उक्त पापसे लिप्त हुआ राजा तीनों वेदोंका स्वाध्याय करे , ब्राह्मणोंकी सेवामें उपस्थित रहे , मधुर वाणी तथा सत्कर्मोद्वारा उन्हें प्रसन्न करे , अपने मनको उदार बनावे और उच्चकुलमें विवाह करे । मैं अमुक नामवाला आपका सेवक हूँ , इस प्रकार अपना परिचय दे , दूसरोंके गुणोंका बखान करे , प्रतिदिन स्नान करके इष्ट - मन्त्रका जप करे , अच्छे स्वभावका बने , अधिक न बोले , लोग उसे बहुत पापाचारी बताकर उसकी निन्दा करें तो भी उसकी परवा न करे और अत्यन्त दुष्कर तथा बहुत - से पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के समाजमें प्रवेश करे ॥ १२-१५ ॥
ऐसे आचरणवाला पुरुष पापहीन हो शीघ्र ही बहुसंख्यक मनुष्योंके आदरका पात्र हो जाता है , नाना प्रकारके सुखोंका उपभोग करता है और अपने किये हुए एक सत्कर्म के प्रभावसे अपनी रक्षा कर लेता है । लोकमें सर्वत्र उसका आदर होने लगता है तथा वह इहलोक और परलोकमें भी महान् फलका भागी होता है॥१६-१७ ॥
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