हनुमान जी और आंखों का व्रत
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रावण एक विलासी था। अनेक देश-विदेश की सुन्दरियां उसके महल में थीं । हनुमान जी अर्धरात्रि के समय माता सीता को खोजने के लिए महल के उन कमरों में घूमें जहाँ रावण की सुन्दर स्त्रियां सोई हुई थी , उन्हें देख हनुमान कहते हैं -
―कामं दृष्टा मया सर्वा विवस्त्रा रावणस्त्रियः।
न तु मे मनसा किञ्चद् वैकृत्यमुपपद्यते।।
अर्थात - मैंने रावण की प्रसुप्तावस्था में शिथिलावस्त्रा स्त्रियों को देखा है, किन्तु इससे मेरे मन में किञ्चन्मात्र भी विकार उत्पन्न नहीं हुआ ।
जब सब कमरों में घूमकर विशेष-विशेष लक्षणों से उन्होंने यह निश्चिय किया कि इनमें से सीता माता कोई नहीं हो सकती , तो मन में कुछ ग्लानि उत्पन्न हुई और कहने लगे --
―परदारावरोधस्य प्रसुप्तस्य निरीक्षम्।
इदं खलु ममातार्थं धर्मलोपं करिष्यति।।
अर्थात - 'रात्रि में सोती हुई परस्त्रियों को देखकर तूने पाप किया है । अब पहले इस पाप का प्रायश्चित करके पवित्र होकर माता सीता को खोजना।
किन्तु इसके साथ मन में दूसरा विचार भी आया कि तू रावण के महल में माता सीता को देखने गया था , अतः तेरी दृष्टि जिस पर पड़ी उसको तूने माता के रूप में देखा है। फिर इसमें पाप की कोई बात नहीं।।
आह! वाल्मीकि जी ने ''रामायण'' में श्री हनुमान जी की कितनी पवित्र मनोदशा का तथ्य हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। यही तो है आंखों का व्रत!
*बोलो सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय🚩🚩🚩
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