आटा
चक्की पीसिंग एंड पीसींग आटा
हम सबकी किचन में आटे के नाम पर गेहूं छाया हुआ है। इसके बाद ही किसी दूसरी चीज के आटे का नंबर आता है। पिछले कुछ बरसों में किचन में फिर से तरह-तरह के आटे की एंट्री हुई है। लेकिन शायद ही हमने कभी गौर किया होगा कि जो आटा हम खा रहे हैं, क्या वह हमारे लिए मौसम के हिसाब से भी सही है? आटे में क्या-क्या मिलवाकर पिसवाएं तो ज्यादा पौष्टिक होगा? या फिर बाजार से आटे का पैकेट लेना ही सही है? नवरात्र में कौन-सा आटा ज्यादा अच्छा रहेगा? एक्सपर्ट्स से बात करके ऐसे ही सवालों के जवाब और जानकारी दे रही हैं रजनी शर्मा
सुबह गेहूं या मैदा की ब्रेड, दोपहर को गेहूं की रोटी, फिर शाम को गेहूं की रोटी व थोड़े चावल। बहुत-से भारतीय घरों में दशकों से खानपान का यही रुटीन चलता आ रहा है। हालांकि पहले ऐसा नहीं था। उत्तर भारत का पारंपरिक खाना कई तरह के अनाज से भरपूर था। लेकिन 60 के दशक के बाद आई हरित क्रांति ने दुनिया में हलचल मचा दी। उस दौर में गेहूं की नई किस्में आईं और इसका असर हमारी थाली पर भी पड़ा। धीरे-धीरे हमारे पारंपरिक अनाज हमारी किचन से बाहर होते चले गए।
आटा वही, जो रीजन (इलाके) और सीजन (मौसम) के मुताबिक हो
हमें शरीर और मन को तृप्त करनेवाला भोजन करना चाहिए, न कि सिर्फ जीभ को खुश करनेवाला। पहले हमें मौसमी फल और सब्जियां पूरे साल नहीं मिलती थीं लेकिन अब मिलती हैं तो महंगी होने पर भी हम उन्हें खरीद लेते हैं। यह सोचे बिना कि उनमें पौष्टिकता भी कम होगी। उन चीजों को कोल्ड स्टोरेज से निकालकर बेचा जा रहा होगा। इसी तरह अनाज की जो किस्में जिस इलाके में उगती हैं, वहीं सस्ती भी मिलती हैं और लोगों को सेहतमंद भी रखती हैं। दरअसल हमारे वातावरण और जगह का असर हमारे खानपान पर पड़ता है। अगर गेहूं को देखें तो पहले यह उत्तर भारत का प्रमुख अनाज नहीं था। चावल के साथ-साथ, बाजरा, मक्का, ज्वार, जौ जैसे पारंपरिक अनाज की अहमियत भी खूब थी। सिर्फ गेहूं लंबे समय तक खाने की वजह से ग्लूटन एलर्जी जैसी समस्या पैदा होने लगी क्योंकि ये गेहूं की नईं फसलें संशोधित की गई थीं। इनकी गुणवत्ता सुधारने और ज्यादा उपज के लिए इनको ऐसे बदला गया कि इन्हें खाने से कुछ लोगों के शरीर में परेशानी पैदा होने लगी। फिलहाल देश में 1 से 2 फीसदी लोगों को ग्लूटन एलर्जी है। इन लोगों के अलावा बाकि सबको तुरंत गेहूं को अपनी ज़िंदगी से बाहर करने की जरूरत नहीं। लेकिन हमें गेहूं के साथ ही दूसरे अनाजों को भी शामिल करना होगा। इससे नुकसान कम होगा और फायदे बढ़ जाएगा। आयुर्वेद में बताया गया है कि गेहूं, चावल और चने आदि को जिस मौसम में उनकी फसल काटी गई है, उससे अगले मौसम में खाना चाहिए। इसीलिए पुराना चावल और पुराना गेहूं अच्छा माना जाता है। गेहूं के नए दानों की गर्मी सालभर पूरा होते-होते कम होने लगती है। इसलिए ऐसा आटा हजम करने में आसानी होती है। गेहूं को धोकर सुखाने से भी गेहूं की गर्मी कम हो जाती है।
ऐसा गेहूं चुनें
साल 1965 के बाद से हमारे देश में ही गेहूं की करीब 450 किस्में तैयार हो चुकी हैं। इनमें से सबसे बढ़िया किस्म की पहचान करना आसान नहीं। फिर भी बाजार में गेहूं खरीदने जाएं तो ध्यान रखें:
- सिर्फ यही न देखें कि गेहूं बहुत महंगा है। मंहगा बेहतर होगा, जरूरी नहीं।
- आमतौर पर हमारे आसपास की दुकान में 3 से 4 तरह के गेहूं की किस्में मिल सकती हैं। उनमें से ऐसा गेहूं लें जो साफ-सुथरा हो, उसके दाने पिचके हुए न हों।
-गेहूं की बाहरी परत में चमक हो और धूप में देखने पर गेहूं की सुनहरी परत दमक उठे।
- वैसे तो गेहूं कई प्रदेशों में उगता है पर मध्य प्रदेश में उगने वाला शरबती गेहूं अच्छा माना जाता है।
गेहूं का आटा ऐसा हो
- आटा बिलकुल मैदे की तरह सफेद न दिखता हो।
- आटे में चोकर भरपूर होना चाहिए यानी उसमें गेहूं की सुनहरी परत हो।
- आटा गूंथने के बाद रबड़ की तरह न खिंचे।
- आटे की रोटी बहुत ज्यादा चिकनी यानी बेहद मुलायम न बने।
- अगर शरबती गेहूं का आटा होगा तो गूंथने में पानी ज्यादा लगेगा। रोटी में हल्की मिठास आती है।
चोकर भी जरूरी
गेहूं में स्टार्च और फाइबर दोनों लगभग बराबर मात्रा में होते हैं लेकिन आमतौर पर पैकेटवाले आटे में गेहूं का स्टार्च ही मिलता है। इसलिए ऐसा आटा लें जिसमें चोकर भी हो। आटा छानने की छलनी से अगर इस आटे को छानें तो कुछ चोकर निकलना चाहिए। अगर छलनी में कुछ नहीं बचता और सारा आटा छनकर नीचे बर्तन में जमा हो जाता है तो ऐसे आटे का इस्तेमाल करना बंद कर दें। बाजार में सामान्य से थोड़े बड़े छेद वाली आटा छलनी भी आती है, सामान्य छलनी की जगह उसका भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे ज्यादा चोकर आटे में मिल जाएगा और आटे में कोई कीड़ा आदि हुआ तो वह भी छानते वक्त दिख जाएगा। आटे की सबसे रिफाइन किस्म होती है मैदा। जैसे गन्न से चीनी बनती है। मैदा रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट है। उसमें कोई फाइबर यानी चोकर नहीं है। अब हमें फाइबर के महत्व पता चल चुका है। फाइबर की वजह से शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है, शरीर का इम्यून सिस्टम और मेटाबॉलिजम ठीक होता है जबकि मैदा लेने से परेशानी होती है क्योंकि कोलेस्ट्रोल बढ़ जाता है।
आटा दुकान से पिसवाएं या घर पर पीस लें?
धीमे-धीमे हल्की आंच पर खाना पकाने और धीरे-धीरे ही आटा पिसवाने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि दुकान में चक्की तेजी से चलती है तो ताजा पिसा हुआ आटा गर्म हो जाता है। इससे आटे की पौष्टिकता घट जाती है। पहले लोग घर में पत्थर की चक्की से आटा पीसते थे तो धीरे-धीरे पिसता था और पौष्टिक गुण बरकरार रहते थे। कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि यह बात सही है। वहीं, कुछ यह तर्क देते हैं कि जब रोटी बनती है तो तेज आंच पर पकती है, ऐसे में आटे के गर्म होने से पौष्टिकता घटने की बात पूरी तरह सही कैसे हो सकती है। अगर ऐसा है तो इसका असर मामूली होगा। हम कच्चा अनाज नहीं खा सकते और पकाने के बाद ही अनाज हमारे खाने योग्य होता है। हां, कोई चाहे तो घर में छोटी चक्की रख सकता है। गेहूं या अनाज को धोकर-सुखाकर इसमें पीस सकते हैं। हर बार ताजा आटा खाने को मिल सकता है। यह साफ-सफाई के हिसाब से बाजार में पिसवाए आटे से बेहतर होगा। जैसे सिल-बट्टे की जगह मिक्सी ने ले ली है, उसी तरह पत्थर की गोल चक्की की जगह अब आटा पीसने की मशीनें मिल जाती हैं। इलेक्ट्रिक आटा चक्की करीब 8 हजार रुपये से शुरू होकर 21 हजार रुपये तक की कीमत में ऑनलाइन मौजूद हैं। कुछ यहां देख सकते हैं:
- Natraj Viva ऑटोमेटिक आटा चक्की - कीमत 16,999 रुपये
- Milcent Flour Mill - कीमत 17,999
- MICROACTIVE ऑटोमेटिक आटा चक्की - कीमत 14,999
(कीमतों में बदलाव हो सकता है। दूसरी कंपनियां भी हैं।
पैकेट का आटा जल्दी खराब नहीं होता तो चक्की का क्यों?
आमतौर पर आटा नमी के संपर्क में आते ही खराब होता है। बारिश के मौसम में उसमें 15 दिन रखते ही कीड़े पड़ सकते हैं। फैक्ट्री से पैक होकर आनेवाले आटे के पैकेट से हवा निकाल दी जाती है तो नमी की गुंजाइश कम होती है। इसके अलावा गेहूं में नमी होगी तो भी आटे में नमी पहुंच सकती है। यह मुमकिन है कि कुछ कंपनियां उसमें प्रिजर्वेटिव मिलाती हों। जो सेहत के लिए हानिकारक हो। वैसे आटे के पैकेट पर लिखा होता है कि उसे ठंडी और सूखी जगह पर ही रखें। अगर खुद आटा पिसवाएं तो पूरे महीने का एकसाथ लेने की जगह सिर्फ 15 दिन के लिए आटा लें। इससे ताजा आटा इस्तेमाल कर सकेंगे और खराब होने की आशंका भी नहीं रहेगी।
खुद मल्टिग्रेन आटा कैसे तैयार करें?
मिलेट्स यानी मोटा अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी (मडुआ), जौ, कोदों आदि) पहले खूब खाया जाता था। हम ज्यादा पौष्टिक आटा चाहते हैं तो मिलेट्स और गेहूं का आटा मिलाकर खा सकते हैं। अगर हम गेहूं के साथ कई तरह के अनाज या चने आदि को पिसवा लें तो मल्टिग्रेन आटा बन जाता है। जैसे गेहूं में प्रोटीन कम होता है लेकिन चने और सोयाबीन में ज्यादा। मिस्सी रोटी भी ऐसे ही तैयार होती है। पारंपरिक तौर पर दाल-चावल, दाल-रोटी की जोड़ी भी ऐसी है जिसमें अलग-अलग तरह के एमिनोएसिड होते हैं जो एक-दूसरे की कमी दूर करते हैं। गेहूं की एलर्जी से बचने के लिए अनाज को बदल-बदलकर खाना चाहिए।
मल्टिग्रेन आटा तैयार करने का पहला तरीका
उदाहरण के लिए पहले महीने 10 किलो गेहूं के आटे में दूसरे अनाज 10 फीसदी ही मिलवाएं। तीन महीने बाद 25 फीसदी मिला लें। फिर आधा गेहूं और आधा दूसरा आटा कर दें। वैसे बाजार में मिलनेवाले पैकेट के आटे में सिर्फ 10 फीसदी ही मल्टिग्रेन होता है।
दूसरे तरीके से बढ़ सकता है आटे का स्वाद
आधा-आधा किलो जौ, सोयाबीन, ज्वार, बाजरा और चना (चना दाल कैटिगरी का है लेकिन प्रोटीन का अच्छा स्रोत है, इसे भी गेहूं में मिलवाया जाता है।) लेकर अलग से पिसवा लें। 4 लोगों की रोटी के लिए जितना गेहूं का आटा लेते थे, उसका सिर्फ एक चौथाई हिस्सा गेहूं का आटा मिलाएं और बाकी दूसरे आटे से लें। जिस अनाज का स्वाद ज्यादा लेना है उसे 2 मुट्ठी भी मिला सकते हैं। वैसे आयुर्वेद कहता है कि सभी अनाज एक साथ पहले से मिलाकर न रखें। खासकर चने को उबालकर मैश करके आटा गूंथते समय मिलाएं तो आसानी से पचने लायक हो जाता है। ग्लूटन से परेशानी हो तो गेहूं छोड़ देना चाहिए। विकल्प में ब्राउन राइस, किनोवा के बीज, ज्वार, बाजरा आदि ले सकते हैं।
कौन न खाए मोटे अनाज का आटा
किसी भी नए अनाज को 15 दिन तक इस्तेमाल करके देखें। शरीर पर उसका असर पता चल जाता है। दरअसल कुछ लोगों का पेट अचानक ज्यादा फाइबर झेल नहीं पाता। अगर डायरिया हो, गैस ज्यादा बनती हो, डकार ज्यादा आती हों, गैस ज्यादा निकलती हो यानी शरीर में ब्लोटिंग होती हो, पेट फूलने लगता तो मोटे अनाज के साथ थोड़ा गेहूं का आटा मिलाएं। धीरे-धीरे आदत पड़ जाएगी। बचपन से फाइबर वाला आटा खाएं तो दिक्कत नहीं होती।
कैसे बने मोटे अनाज की नर्म रोटी?
मोटे अनाज के आटे से बनी रोटी सिर्फ गेहूं के आटे से बनी रोटी के मुकाबले जल्दी सूखने लगती है। इसके लिए जब सुबह आटा गूंथें तो उसमें रात की बची दाल या सब्जी मिला सकते हैं। चाहें तो आटे को दूध या दही से भी गूंथ सकते हैं। इससे रोटी नर्म रहती है। मोटे अनाज की रोटी पर अच्छी तरह देसी घी लगाना चाहिए। यह आटा गूंथते हुए थोड़ा-सा गेहूं का आटा तो मिला ही सकते हैं। गेहूं में ग्लूटन होता है इसलिए रोटी ज्यादा नर्म और फ्लेक्सिबल होती है। वैसे सच यह है कि ग्लूटन की हमारे शरीर को कोई जरूरत नहीं होती।
किस मौसम में कौन-सा आटा मिलाकर खाएं?
मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का, जौ आदि में भी प्रोटीन तो गेहूं जैसा ही होता है लेकिन ये फाइबर, विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होते हैं। इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी कम होता है यानी ये शरीर में धीरे-धीरे ग्लूकोज जारी करते हैं। इसीलिए डायबीटिज जैसी लाइफस्टाइल की बीमारी या थायरॉइड के मामलों में भी फायदा पहुंचता है। ये धीरे-धीरे हजम होते हैं तो शरीर इनकी पौष्टिकता को सोख सकता है। जिन्हें कब्ज रहती है और हार्ट की बीमारी है उनके लिए भी ये अच्छे हैं।
-जौ हमारा पारंपरिक खाना है। यह शरीर की सफाई करता है यानी इसमें ऐंटी-ऑक्सिडेंट्स होते हैं। यह हाजमे के लिए अच्छा है। इसके आटे को भूनकर सत्तू के तौर पर भी ले सकते हैं। जौ को गर्मी के मौसम में आटे में मिलाएं।
- मक्का मौसमी अनाज है। इसे सर्दियों में ही खाना चाहिए। इसमें विटामिन-ए और आयरन होता है।
-सोयाबीन अच्छे प्रोटीन का स्रोत है। लेकिन गर्मी के मौसम में गेहूं में ज्यादा मात्रा में न मिलाएं। चना और सोयाबीन एक साथ न लेकर बारी-बारी से गेहूं में मिलाएं।
-चने में भी प्रोटीन अच्छी मात्रा में होता है। इसे किसी भी मौसम में गेहूं के साथ ले सकते हैं। सर्दियों में इसका सत्तू भी ले सकते हैं। यह आयरन से भी भरपूर होता है।
- बाजरा, रागी, ज्वार सभी गर्म तासीर के हैं इसलिए सर्दियों में गेहूं के साथ आटे में मिलाएं। इनसे प्यास बहुत लगती है। ऐसे में पानी खूब पीते हैं तो सर्दियों में होने वाली कब्ज दूर हो जाती है। बाजरा बिलकुल ग्लूटन फ्री है और इसमें अच्छा फाइबर होता है। रागी में कैल्शियम, विटामिन और फाइबर है तो ज्वार में मैग्नीशियम, फाइबर और प्रोटीन होता है। ये आटे बरसात के मौसम में नहीं खाने चाहिए।
इनके अलावा आजकल मेथी के दाने और अजवायन भी आटे में पिसवाने का ट्रेंड है। लेकिन पिसने से पूरा न्यूट्रिशन नहीं मिल पाएगा। अजवायन की खुशबू और तेल उड़ जाएगा। इसलिए जब आटा गूंथ रहे हों तब एक छोटी चम्मच अजवायन मिला सकते हैं। अगर कोई डायबीटीज के लिए मेथी खाना चाहता है तो आटे में मिलाने के बजाय मेथी दाने को भिगोकर खाने से फायदा ज्यादा होता है।
नवरात्र व्रत में कैसा आटा खाना चाहिए?
नवरात्र का संबंध हमारे शरीर की शुद्धि से है। 9 दिन के भीतर ही मन की शुद्धि, तन की शुद्धि और आध्यात्मिक स्तर पर शुद्धि की कोशिश होनी चाहिए। नवरात्र इस बात का संकेत होते हैं कि अब मौसम में भारी बदलाव आने वाला है। गर्मी से पहले चैत्र नवरात्र और सर्दी से पहले शारदीय नवरात्र आते हैं। मौसम बदलते वक्त हमारे शरीर की इम्यूनिटी कम हो जाती है। इस दौरान वात और पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है। इसीलिए इन दिनों में लोग जल्दी बीमार होते हैं। कुदरत के इस बदलाव के मुताबिक अपने शरीर को ढालने के लिए हम अपने सामान्य खानपान को कुछ वक्त के लिए ब्रेक देते हैं। अपना सामान्य खाना न खाकर हल्का-फुल्का खाते हैं। उपवास में इसीलिए फलाहार पर जोर दिया जाता है। इस दौरान खूब पानी पीना चाहिए और मौसमी फल जरूर लेने चाहिए। जब 9 दिन बीत जाएं तो मन और तन से हल्का महसूस करना चाहिए। अगर ज्यादा तला हुआ भोजन हर दिन लेंगे तो 10वें दिन तक वजन बढ़ जाएगा और हाजमा खराब हो चुका होगा। आमतौर पर लोग यहीं गलती कर देते हैं। वे फास्टिंग की जगह फीस्टिंग कर लेते हैं। इसीलिए व्रत में खाए जानेवाले आटे से जो कुछ भी बनाएं, वह सादा होना चाहिए। कम चिकनाई और मिर्च-मसाले में बना। लेकिन घी, तेल का इस्तेमाल कम करना है, बंद नहीं करना। इन दिनों जो आटा खाया जाता है वह रूखी प्रकृति का होता है। आमतौर पर नवरात्र के व्रत में 3 तरह का आटा खाया जाता है। कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, समा या सामक के चावल या उसका आटा:
कुट्टू का आटा
यह एक जंगली बीज है जो प्रोटीन और फाइबर से भरपूर है। यह हल्का है। जल्दी हजम हो जाता है लेकिन इससे बना खाना खाकर पेट लंबे वक्त तक भरा हुआ महसूस होता है। पहले यह सीमित वक्त के लिए ही मिलता था लेकिन अब इसकी डिमांड और सप्लाई दोनों बढ़े हैं। पर इसका इस्तेमाल सिर्फ नवरात्र में होता है। इसलिए फूड पॉयजनिंग के कुछ केस आ जाते हैं। यह गर्म तासीर का होता है। इसलिए ओवरईटिंग होने पर दस्त भी लग सकते हैं।
इन बातों का ध्यान रखें
कुट्टू का आटा खाकर फूड पॉयजनिंग के मामले कई तरह के होते हैं। जो लोग कभी-कभी यह आटा खाते हैं, वे लगातार कई दिन तक इसे खाकर हजम नहीं कर पाते क्योंकि फाइबर बहुत है। दूसरे कूट्टू के स्टोरेज के वक्त फंगस लग सकता है जो पकाने के बाद भी खत्म नहीं होता। आटे में किसी दूसरे जंगली बीज की मिलावट हो, आटा एक्सपायरी डेट के बाद का हो तो भी खाने के बाद उल्टी-दस्त हो सकते हैं। जिन्होंने किसी एक ही दुकान से आटा लिया हो, उन सभी लोगों में एक जैसे लक्षण दिख जाते हैं। कुट्टू का बीज तिकोने आकार का और थोड़ा चमकदार दिखता है। इसमें बारिश के दिनों में दीवार पर लगनेवाली फंफूद जैसी ही फफूंद लग सकती है। आमतौर पर अच्छी दुकानों में स्टोरेज सही होती है तो ऐसी आशंका नहीं रहती।
-अगर कुट्टू के बीजों को अपने सामने चक्की पर पिसवा रहे हैं तो देख लें कि बीज पर किसी तरह का फंगस न हो। यह फंगस कालापन लिए हुए होती है।
- छूने पर भी बीज में किसी तरह की नमी महसूस न हो।
- अगर पहले से पिसा हुआ आटा ले रहे हैं तो पैकेट की एक्सपाइरी डेट जरूर देख लें। खुला आटा साफ-सुथरे तरीके से न रखा गया हो, वहां से तो बिलकुल न लें।
समा या सामक के चावल का आटा
यह भी अनाज नहीं, एक तरह का बीज है। इसमें स्टार्च कम होता है, फाइबर ज्यादा होता है। इसलिए यह चावल मोटापे को काबू कर सकता है। डायबीटिज मरीज भी इसका इस्तेमाल करते हैं। इसे खाने से शरीर की सफाई भी होती है। इस चावल की ऊपरी परत में ऐंटी-ऑक्सिडेंट्स होते हैं। यह ऐंटी-एजिंग और ऐंटी-कैंसर होता है।
सिंघाड़े का आटा
यह तालाब में पैदा होने वाला फल है। इसके भीतर की गिरी को सुखा लिया जाता है। इसमें पोटैशियम, स्टार्च और मिनरल्स खूब होते हैं। लेकिन लंबे समय तक कुट्टू या सिंघाड़े का आटा खाना भी पेट के लिए ठीक नहीं। इसका मतलब है कि इन्हें कुछ दिन ही खाना ठीक है, महीनेभर तक या उससे ज्यादा न लें क्योंकि इनमें कैलरी भी ज्यादा होती है।
घी-तेल जरूरी, पर इतना न हो...
व्रत के दौरान कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से पूड़ी और पकौड़ी बनाने की जगह रोटी व पराठें बना सकते हैं। समा के चावल का आटा लिया है तो भी इसमें थोड़ा-सा आलू मैश कर लें। इस तरह कम घी लगाकर खाना, डीप फ्राइ खाने से कहीं बेहतर होगा। तीनों वक्त एक जैसा खाना न खाकर फलाहार पर ज्यादा फोकस करें। अगर आटे से कोई चीज बनाकर खानी है तो बदल-बदलकर लें यानी सुबह समा के चावल तो शाम को कुट्टू। अगले दिन सिंघाड़े का आटा ले सकते हैं। पूरे 9 दिन के व्रत में भी ऐसा ही कर सकते हैं। चाहें तो एक दिन कुट्टू, दूसरे दिन सिंघाड़े का आटा और तीसरे दिन समा के चावल ले सकते हैं। जब आटा बदल-बदल कर खाएंगे तो शरीर ज्यादा सेहतमंद रहेगा।
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