मौसम सर्दी

स स सर्दी है...

सर्द मौसम का अपना ही मजा है, लेकिन लापरवाही कर दें तो सजा भी है। कभी जोड़ों में दर्द होने लगता है तो कभी सर्दी-जुकाम और लूज मोशन से हम परेशान होते रहते हैं। बीपी, शुगर और दिल के मरीजों के लिए भी यह समय कुछ भारी-सा महसूस होता है। कैसे बिना परेशानियों के तेज सर्दी का लुत्फ उठा सकते हैं, इसी बारे में विशेषज्ञों से बात करके जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

8 सबसे जरूरी बातें

1. सर्दियों में दर्द बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है ठंडी हवाओं के संपर्क में आना। इसलिए जरूरी है कि पूरे शरीर को ढककर रखें। खासकर, कान, सिर और पैर जरूर ढकें।

2. कोशिश करें कि सुबह टहलने न जाएं। जब धूप निकल जाए, तभी टहलें। टहलते समय मास्क लगाकर जरूर रखें। इससे कोरोना के साथ कुछ हद तक ठंडी हवा भी शरीर के अंदर कम जाएगी।

3. अगर सर्दियों में लूज मोशंस की परेशानी हो जाए तो शरीर में पानी की कमी न होने दें। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि यूरिन कितना और किस तरह का आ रहा है। अगर यूरिन की मात्रा कम हो गई हो या यूरिन ज्यादा गाढ़ा और पीला हो गया हो तो डॉक्टर से मिलना जरूरी हो जाता है।

4. इस मौसम में शरीर का हाजमा कम हो जाता है। इसलिए ज्यादा तेल-मसाले वाली चीजें न खाएं। शादी या पार्टियों में जाने पर सलाद न खाएं क्योंकि बाकी चीजें आग पर पकी होती हैं और गर्म होती हैं। सलाद हम सीधे खा लेते हैं। अमूमन सलाद की साफ-सफाई का ध्यान भी कम रखा जाता है। वहीं पीने का पानी बोतलबंद हो तो बेहतर है। पानी और सलाद से ही सबसे ज्यादा बैक्टीरिया या वायरल इंफेक्शन का खतरा होता है।

5. हार्ट, बीपी और शुगर के मरीजों की ज्यादा परेशानी तब बढ़ जाती है जब फिजिक ऐक्टिविटी कम करते हैं, दवा सही मात्रा में नहीं खाते और सर्दी से बचाव का इंतजाम नहीं करते। इससे एंजाइना के लक्षण आ सकते हैं। इसलिए ऐसे लोगों के लिए अपना रुटीन सही रखना जरूरी है।

6. एक्सरसाइज करने का यह मतलब नहीं कि शरीर के साथ जबर्दस्ती करें। जितना हो सके, उतना ही करें। सर्दियों में आसन और कपालभाति जैसे प्राणायाम घर पर ही करना बेहतर है।

7. तापमान का ज्यादा फर्क न हो इसका भी ध्यान रखें। घर में भी अगर कंबल में हों या हीटर के पास हों तो बाथरूम या खुले हॉल में जाने से पहले 2 से 4 मिनट शरीर को बाहर रखें। इसी तरह अगर हीटर चलाकर गाड़ी चला रहे हैं तो भी गाड़ी से निकलने से 5 से 10 मिनट पहले हीटर बंद करके सामान्य तापमान होने का इंतजार करें। कई लोगों के घर में गैस गीजर का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग नहाने से पहले गीज को सही तरीके से चेक कर लें।

8. सर्दियों की यह बड़ी समस्या होती है कि प्यास कम लगती है। कई लोग बार-बार यूरिन जाने की परेशानी से बचने के लिए भी पानी कम पीते हैं कि कौन इस सर्दी में रजाई से बार-बार बाहर निकलेगा। लेकिन दिनभर में 2 लीटर या 8 गिलास पानी जरूर पिएं। अगर पानी गुनगुना हो तो बेहतर है।

जब बढ़े कड़ाके की ठंड, सेहत का रखें ऐसे ध्यान

दर्द से मिल जाएगी राहत

शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द होने का मतलब है कि वहां कुछ गलत हुआ है। चाहे चोट लगी हो या कोई ऐसा बेकार चीज जमा हो गई है जिसने शरीर को परेशानी में डाल दिया है। जहां तक सर्दियों में दर्द की बात है तो यह कभी भी अपने आप नहीं होता। इसके पीछे हमारी कोई न कोई लापरवाही जरूर होती है। हम ठंडी हवा को शरीर से संपर्क में आने से नहीं रोक पाते।

इसलिए होता है दर्द
सॉफ्ट टिशू में सख्ती आना: सर्दियों में तापमान कम होने और हवा का दबाव कम होने का असर सीधा हमारे शरीर पर पड़ता है। शरीर में मौजूद कई तरह सॉफ्ट टिशू (लिगामेंट और टंडन जो क्रमश: हड्डियों को हड्डियों से और हड्डियों को मांसपेशियों से जोड़ता है) थोड़े सख्त हो जाते हैं। वहीं जोड़ों में मौजूद फ्लूड जो मूवमेंट के लिए उत्तरदायी है, वह भी कुछ गाढ़ा हो जाता है।
ब्लड सर्कुलेशन में थोड़ी कमी: सर्दियों में दिल और दिमाग का तापमान सही रहे, इसके लिए इन दोनों जगहों पर ज्यादा खून की जरूरत होती है। ऐसा न होने और इन अंगों का तापमान गिरने से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए शरीर ने एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है कि सर्दियों में शरीर के बाकी अंगों की तुलना में इन दोनों अंगों को ज्यादा से ज्यादा खून मिले। इससे जॉइंट और मांसपेशियों में कुछ मात्रा में खून की कमी हो जाती है। नतीजा हो सकता है दर्द और सूजन।
दौड़-भाग कम करते हैं हम: यह सच है कि दूसरे मौसमों की तुलना में सर्दियों में फिजिकल ऐक्टिविटी कम हो जाती है। जो लोग गर्मियों में खूब एक्सरसाइज और योग करते हैं, वे भी सर्दियों में कई बार इसे टाल देते हैं या फिर काफी कम कर देते हैं।
ये हैं उपाय
वैसे तो पूरे शरीर का ध्यान रखना जरूरी है, लेकिन जिन लोगों को जॉइंट पेन की परेशानी है। वे

इस तरह ध्यान रखें...
- जिस अंग में दर्द हो, उसे ज्यादा ढक कर रखें: मान लें कि किसी को घुटने में परेशानी है तो वह घुटने को सही तरीके से ढक कर रखे। इसके लिए नी-कैप लगा सकते हैं। नी-कैप को सोते समय उतार सकते हैं। वहीं अगर पैरों में भी इनर पहना हुआ है तो नी कैप को छोड़ सकते हैं। इसी तरह अगर किसी को कुहनी में दर्द रहता है तो वह पूरी बाजू वाले इनर और स्वेटर पहनकर रखें ताकि बाजू कम से कम ठंडी हवा तापमान के संपर्क में आए। इसी तरह अगर किसी को एड़ी में दर्द रहता है तो उसे घर में भी पूरी सर्दियों में ऊनी जुराबें पहनकर रखनी चाहिए।
- सर्दियों के मौसम में शरीर के जॉइंट में मौजूद फ्लूड जो जॉइंट को मुलायम और रगड़न से बचाए रखता है, वह गाढ़ा हो जाता है। इससे हड्डियों में अकड़न बढ़ जाती है। इसके लिए जरूरी है कि हम वॉक करें। अगर बाहर निकलकर वॉक नहीं कर सकते तो घर में ही वॉक करें या फिर बैठे-बैठे स्ट्रेच करें।
- अगर खड़े होकर एक्सरसाइज नहीं कर सकते तो कुर्सी पर बैठकर करें। इसके लिए कुर्सी पर सीधे होकर बैठ जाएं यानी स्पाइनल कॉर्ड सीधी हो। इसी स्थिति में आपके दोनों पैर सीधे जमीन पर हों। फिर बारी-बारी से दोनों पैरों को 90 डिग्री यानी ऊपर की तरह उठाएं। इसे 10 बार दोहराएं। यह ध्यान रहे कि दोनों पैरों को एक साथ नहीं उठाना है। दोनों पैरों को एक साथ उठाने पर कूल्हे की एक्सरसाइज होती है और उसी पर दबाव पड़ता है।
- शरीर में दर्द बढ़ाने में हमारी डाइट का भी योगदान है। दरअसल, किसी खास अंग में यूरिक एसिड के ज्यादा बनने से भी दर्द होने लगता है। हमें ऐसी चीजें कम खानी चाहिए जिनसे ज्यादा यूरिक एसिड बनता है। जैसे: साग, फूलगोभी और पत्तेदार सब्जियां। ये चीजें खासकर किडनी मरीजों को कम खानी चाहिए। इनकी जगह घीया आदि खाएं। इसलिए किडनी मरीजों को हर 2 या 3 महीने पर KFT टेस्ट कराना चाहिए।

तेल मालिश कितनी फायदेमंद
- मालिश के लिए तिल का तेल सबसे अच्छा है। अगर वह न हो तो सरसों के तेल से मालिश करें।
- सर्दियों में खून का बहाव ठीक रहे, इसके लिए तेल मालिश करना या करवाना चाहते हैं तो पंजों की ओर से मालिश शुरू करें और ऊपर की ओर बढ़ते हुए यानी घुटनों तक पहुंचते हुए दबाव कम करते जाएं। फिर जांघों पर बहुत हल्की मालिश। इसी तरह पीठ में भी जब दर्द न हो तो मालिश कर सकते हैं।
- चूंकि सर्दियों में स्किन और दूसरे अंगों तक खून का बहाव दिमाग और दिल की तुलना में कुछ कम होता है, इसलिए मालिश फायदेमंद हो सकती है।
-जब जोड़ों की मालिश करें तो दबाव न डालें बल्कि वहां हल्के हाथों से तेल लगाकर गोल-गोल घुमाएं।

सर्दी-जुकाम छू-मंतर

जब सर्द हवा शरीर के भीतर जाती है तो नतीजा सर्दी-जुकाम के रूप में बाहर आता है। नाक से पानी आना, बार-बार छींकें आना। कभी-कभी शरीर भी हल्का गर्म हो जाता है। इससे बचने का तरीका है कि किसी भी तरह से हवा शरीर के भीतर न घुस पाए। सुबह टहलने से बचें। धूप निकलने पर ही टहलें।  दरअसल, सुबह-सुबह बाहर का तापमान भी दिन की अपेक्षा बहुत कम होता है और पलूशन का स्तर भी बहुत बढ़ा होता है। बुजुर्ग सुबह-सुबह नहाने से बचें, चाहे वे गर्म पानी से ही क्यों न नहाते हों। अगर किसी दिन धूप न निकले तो उस दिन न नहाएं। सर्दी लगने से एक तरफ जहां सर्दी-जुकाम का खतरा भी बना रहता है, वहीं तापमान के ज्यादा कम होने से एंजाइना या हार्ट अटैक का खतरा भी रहता है। जब भी नहाएं, कपड़े उतारकर सीधे शरीर पर पानी न डालें। कपड़े उतारने और पानी डालने के बीच में कम से कम 2 से 3 मिनट का फासला जरूर रखें।
ये हैं उपाय
- पूरा शरीर ढककर रखें। कान, नाक, पैर सभी अंग। इसके लिए मफलर रखें। मंकी कैप से कान और सिर ढके रहते हैं। वहीं मास्क से कोरोना और ठंडी हवा से भी सुरक्षा मिल जाएगी।
-कोशिश करें कि ठंडी हवा में न जाएं। अगर जाना भी पड़े तो ठंडी हवा शरीर के भीतर न पहुंचे, ऐसा इंतजाम रखें। जहां तक मुमकिन हो गुनगुना पानी पिएं।
-अगर खांसने पर बलगम भी आए तो दिन में तीन बार 5 से 7 मिनट के लिए स्टीम जरूर लें।
-कई बार सर्दी-जुकाम की वजह से सिर दर्द भी रहता है। इसके लिए कई लोग पेनकिलर ले लेते हैं। यह सही नहीं है। इससे किडनी पर बुरा असर पड़ता है। अगर दर्द बर्दाश्त से बाहर हो तो ही पेनकिलर लें, वह भी डॉक्टर से पूछ कर।
-अगर ठंड लग जाए और गले में खराश हो तो दिन में 2 बार गर्म सूप या गर्म काढ़ा पी सकते हैं। इससे फौरी रहत मिल जाती है।
सोते समय भी न लगे ठंड...
-मंकी कैप एक बेहतरीन विकल्प है। इसे पहनने पर सिर ढका रहता है, मुंह और नाक खुले रहते हैं। कड़ाके की सर्दी में मंकी कैप पहनने से बच्चों और बुजुर्गों का ठंड से बचाव होता है।
-जुराब पहनकर सोने की वजह से कंबल या रजाई हटने पर भी पैरों से ठंड नहीं लगती। हालांकि कई लोगों को जुराबें पहनकर सोने की आदत नहीं होती। सच तो यह है किसी को जुराबें पहनकर नींद आती है और किसी को पहनने के बाद नींद नहीं आती। हां, इतना जरूर ध्यान रख सकते हैं कि जुराबें ढीली हों। अगर पुरानी ढीली जुराबें हैं तो अच्छा है। इससे वे इस्तेमाल भी हो जाएंगी और पैरों के निचले हिस्से पर दबाव भी नहीं पड़ेगा। साथ ही पैरों में खून का दौरा भी बरकरार रहेगा। कुछ जुराबों का इलास्टिक टाइट रहता है, ऐसी जुराबें पहनने से बचें।

बीपी और हार्ट को रखें दुरुस्त
ठंड के मौसम में अमूमन पूरी दुनिया में हार्ट अटैक, स्ट्रोक आदि की परेशानी सबसे ज्यादा होती है। इसका मतलब यह नहीं कि जो भी दिल के मरीज हैं या जिन्हें बीपी की परेशानी है, उन सभी को डरने की जरूरत है। असल में जो लोग चीजों को गंभीरता से लेते हैं, वे अपना बचाव करके रखते हैं। सर्दियों में खून थोड़ा गाढ़ा हो जाता है। इससे शरीर के हर अंग तक खून पहुंचाने और उसे वापस लाने में हार्ट को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। साथ ही नसों के सिकुड़ने से स्थिति ज्यादा गंभीर हो जाती है। इसकी वजह है फिजिकल ऐक्टिविटी कम करना या सही समय और तरीके से नहीं करना, ठंड से बचाव कम करना और जब दवाओं को बदलने की जरूरत होती है तो उन्हें न बदलना।

ये हैं उपाय
- ठंड ज्यादा हो तो घर के अंदर ही टहलें। टहलना बंद न करें। एक्सरसाइज जरूर करें, लेकिन शरीर के साथ जबर्दस्ती नहीं।
-शरीर को गर्म रखें।
-अगर 20 कदम टहलने पर या बैठने पर छाती में भारीपन हो या सांस फूलने लगे या पसीना आए तो यह एंजाइना का लक्षण है। ऐसे में इसे नजरअंदाज न करें। फौरन ही दिल के डॉक्टर (बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड नहीं     ) से मिलें।
- समय पर सचेत हो गए तो हार्ट अटैक को आने से पहले रोका जा सकता है।
-अमूमन हार्ट अटैक की परेशानी एंजाइना को नजरअंदाज करने से ही होती है।
-जहां तक बीपी की बात है तो यह सभी बीमारियों की जननी है। इसे काबू में रखना बहुत जरूरी है। अगर दवा ले रहे हैं तो इसे न खुद बदलें और न बंद करें।
-कोशिश यह हो कि सर्दियों के आने से पहले या शुरू होने के बाद भी डॉक्टर से मिलें। कई बार सर्दियों में डॉक्टर दवा बदल देते हैं या पावर बढ़ा देते हैं ताकि बीपी के बढ़ने से ज्यादा दिक्कत न हो।
-नमक कम खाएं। ऊपर से तो बिलकुल न लें। चटनी, अचार, नमकीन, चिप्स आदि में ज्यादा नमक होता है। अगर बीपी है तो इन्हें बहुत कम कर दें या न लें।
-सिगरेट और अल्कोहल का सेवन न करें। इससे बीपी की परेशानी बढ़ जाती है। वहीं हार्ट की समस्या में भी यह खतरनाक है।

...तो बार-बार यूरिन नहीं
सर्दियों में बार-बार यूरिन आने की परेशानी कई लोगों को होती है। कई लोग तो पानी पीना ही कम कर देते हैं।
ये हैं उपाय
-अगर किसी को बार-बार यूरिन की परेशानी आ रही है तो इसकी कई वजहें हो सकती हैं।
- गलत तरीके से और गलत मात्रा में पानी पीना। गलत समय पर पानी पीना।
-बार-बार यूरिन आने का मतलब है दिनभर में 5-7 बार से ज्यादा बार यूरिन आना और रात में सोने के बाद 1 बार से ज्यादा यूरिन आना।
-पूरे दिन में एक से डेढ़ लीटर तक यूरिन आना सामान्य है।
- इसके लिए एक बार में आधा गिलास पानी पीना चाहिए, वह भी हर 1 घंटे पर यानी नियमित अंतराल पर पानी पीना।
- शाम को पानी लेना कम कर दें। सोने के पहले तक 1 से 2 गिलास पानी काफी है।
- नमक की मात्रा जरूर कम करें। दिनभर में 1 चम्मच यानी 5 ग्राम से भी कम नमक लें। नमक ज्यादा लेने से शरीर पानी को ज्यादा समय तक रोककर रखता है।
- अगर इन उपायों से भी परेशानी कम नहीं हो रही है तो इसका मतलब है कि कोई दूसरी परेशानी हो सकती है।
-किडनी, शुगर, प्रोस्टेट की परेशानी, किसी बीमारी की वजह से यूरिनरी ब्लैडर छोटा हो गया हो या फिर न्यूरॉलजी की समस्या हो सकती है। ऐसे में पहले जनरल फिजिशन दिखाना चाहिए। इसके बाद उनके सुझाव पर विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

चोट और गठिया में फायदा

आर्थराइटिस वालों को सलाह
यह कई तरह का होता है, सबसे आम है ऑस्टियो-आर्थराइटिस और रूमैटॉयड आर्थराइटिस जिसे गठिया कहते हैं।
-लगातार बैठे रहने का काम है तो आधा घंटे के गैप पर 5 मिनट का ब्रेक लें, स्ट्रेचिंग करें।
- हर दिन सुबह में 11 से 2 बजे के बीच 35 मिनट धूप में बैठें। डॉक्टर की सलाह से विटामिन-डी और कैल्शियम सप्लिमेंट्स जरूर लें।
-जॉइंट्स पर ज्यादा दबाव न डालें, जैसे कि भारी सामान उठाना, पोछा लगाते समय भारी बाल्टी उठाना आदि।
-टॉयलेट में भी वेस्टर्न टॉयलेट का चुनाव करें। इंडियन बनावट वाले से बचें क्योंकि इससे घुटनों पर दबाव ज्यादा पड़ता है।
-जब भी नहाएं, गुनगुने पानी से ही नहाएं। अगर बहुत ज्यादा ठंड हो तो नहाने को टाल भी सकते हैं।

अगर चोट लग जाए
चोट लगने का कोई मौसम नहीं होता, यह कभी भी लग सकती है। लेकिन इसके दर्द को कम करने का तरीका है। इसे हम घर पर भी चोट लगने के फौरन बाद अपना सकते हैं:
-चोट लगने से दर्द हो, सूजन हो और खून न निकल रहा हो तो ठंडे पैक या आइस से सिकाई करें।
-अमूमन सूजन 24 से 48 घंटे में चली जाती है यानी जब तक सूजन हो ठंडी सिकाई करें। फिर हॉट पैक से सिकाई करें।

- यहां ध्यान है कि घाव खुला न हो यानी खून न निकल रहा हो।
सीढ़ी या ऊंचाई चढ़ने पर बढ़ जाए दर्द
अगर पैरों या जोड़ों में दर्द पहले से हो और सीढ़ी पर बिना आदत के चढ़ जाएं तो अक्सर हमारी मांसपेशियों या हड्डियों में दर्द होने लगता है। ऐसे में भी हमें पहले दो दिनों तक ठंडी सिकाई करनी चाहिए। इसके बाद भी ठीक न हो तो गर्म सिकाई करें।

महिलाएं ऐसे करें कमर दर्द पर काबू
- कमर को ठंड के संपर्क में आने ही न दें। कमर के इर्द-गिर्द कोई गर्म कपड़ा लपेट कर रखें। हॉट वॉटर पैक से दिन में 2 से 3 बार 10 मिनट के लिए सिकाई करें। विटामिन-डी सप्लिमेंट्स लें।

बदहजमी का हल
जब शरीर की क्षमता कम होने लगती है तो पचाने की शक्ति भी घट जाती है। सर्दियों में भी ऐसा ही होता है। वहीं जब शरीर के किसी भाग में ठंड लगती है तो वहां दर्द होने लगता है। इससे पेट के पाचक रसों की कार्यक्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है। इसके अलावा कई बार रोटा वायरस के इंफेक्शन से भी पाचन की परेशानी हो सकती है। इसे आंतों का जुकाम भी कह सकते हैं। बच्चों के लिए तो रोटा वायरस के इंजेक्शन भी आए हुए हैं। उन्हें लगवा सकते हैं।
 
ये हैं उपाय
ठंड की वजह से जब शरीर की पाचन क्षमता कम हो गई हो और हम पार्टियों में जाकर या घर में हेवी डाइट लेते हैं तो इस तरह की परेशानी हो जाती है। ऐसे में ज्यादा हेवी डाइट न लें।
-जितना खाते हैं, उसका एक चौथाई कम कर दें। खासकर रात का खाना तो जरूर कम करें। इससे वजन भी काबू में रहता है।
-आसानी से पचने वाला खाना खाएं।
-लूज मोशंस हो जाए तो पानी की कमी न हो।
-हर 2 घंटे पर एक गिलास ओआरएस का घोल या नमक, चीनी और पानी का घोल पिएं।
क्या खाएं
- हर दिन 1 या 2 संतरे
- हर दिन तुलसी पत्ता, लौंग, दालचीनी, अदरक को मिलाकर काढ़ा बनाएं और आधा कप पिएं।
- मिले-जुले अनाज (दाल, मक्का, गेहूं, चावल, बाजरा आदि को बराबर भाग में मिलाकर) आटे से रोटी बनाकर खाएं।
नोट: किस मौसम में कौन-सा आटा खाना बेहतर है, विस्तार से पढ़ने के लिए हमारे फेसबुक पेज SundayNbt पर जाएं और #Aaata सर्च करें।

इन्हें ज्यादा न खाएं
गुड़: दिनभर में 2 से 3 चम्मच यानी 10 से 15 ग्राम। अगर गुड़ से बनी चीजें खाना पसंद करते हैं तो चाय में, मिठाई में, हलवा आदि में डालकर खा सकते हैं। अगर डायबीटीज नहीं है तो यह मात्रा 50 से 100 ग्राम तक कर सकते हैं।
ड्राइ फ्रुट्स: हर दिन 1 अखरोट, 3 बादाम, 2 पिस्ता और एक मुट्ठी मूंगफली खा सकते हैं।
प्याज और लहसुन: सब्जियों में एक प्याज और लहसुन की 4 से 5 कली ठीक है, लेकिन जब कच्चा खाने की बात आती है तो एक टुकड़ा प्याज और 1 से 2 लहसुन की कली काफी है।

कब जाएं डॉक्टर के पास
- यूरिन का रंग गाढ़ा हो जाए और मात्रा आधी या उससे भी कम हो जाए। कई बार ज्यादा गंभीर होने पर यूरिन बंद भी हो सकता है। बहुत ज्यादा कमजोरी लगने लगे।

हीटर और ब्लोअर के इस्तेमाल का सही तरीका
-ऐसे लोग जिन्हें सर्दियों में दर्द की शिकायत रहती है उन्हें ड्राइ हीट से बचना चाहिए। हम ड्राई हीट देकर त्वचा और मांसपेशियों को ज्यादा ड्राइ बना देते हैं।
-अगर हीटर के सामने बैठना मजबूरी हो तो उस अंग में तेल (तिल या सरसों का तेल) जरूर लगा लें जिसे हीटर से सेक रहे हों। साथ ही उसे ढककर भी रखें।

आपके काम का हीटर
सामान्य हीटर और ब्लोअर
-सामान्य हीटर या ब्लोअर दोनों ही हवा में मौजूद ऑक्सीजन और नमी की मात्रा को कम करते हैं।
-कीमत: 500 रुपये से शुरू                                              
-कंपनियां: Orpat, Usha, Lifelong आदि।

हैलोजन हीटर    
- इस हीटर के इस्तेमाल में हवा में मौजूद ऑक्सीजन और नमी लगभग बने रहते हैं।
-कीमत: 900 रुपये से शुरू
-कंपनियां: Bajaj, Cruiser, Maharaja आदि।

इंफ्रारेड हीटर  
-यह हीटर भी हवा में मौजूद ऑक्सीजन और नमी की मात्रा को प्रभावित नहीं करता।
- कीमत: 800 से शुरू
-कंपनियां: Sunflame, Usha आदि।

ऑयल फिल्ड रेडिएटर हीटर
तेल की मौजूदगी की वजह से कमरे की नमी और ऑक्सीजन को कम नहीं करती। n आग की गुंजाइश न के बराबर है।
-कीमत: 8000 से शुरू
-कंपनियां: Usha, Bajaj, Havells आदि।
 नोट: ऊपर बताई गई कंपनियों के अलावा भी दूसरी कई कंपनियों के अच्छे हीटर बाजार में मौजूद हैं।

सावधान
1. सर्दी से बचने के लिए कुछ लोग बंद कमरे में अंगीठी या कोयले जलाकर सो जाते हैं। यह खतरनाक है। इससे कमरे में ऑक्सीजन की कमी से दम घुट सकता है।
2. बाजार में मिलने वाले आम हीटर बंद कमरे में नमी सोख लेते हें। इससे तरह-तरह की परेशानियां हो सकती हैं। ऐसे में कमरे में एक बड़े बर्तन में पानी भरकर रखें।





सवाल सांस का

सर्दी की दस्तक के साथ ही पलूशन की आहट भी सुनाई पड़ने लगी है। वैसे तो पलूशन इस मौसम में हर साल बढ़ जाता है, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर के बाद उन लोगों को ज्यादा सचेत होने की जरूरत है जिन्हें ऑक्सिजन की कमी की वजह से अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था और उन्हें भी जिनके फेफड़े कुछ कमजोर हैं। उन लोगों को भी कुछ ख्याल रखना चाहिए जो अपनी सांसों में दम भरना चाहते हैं। सवाल है कि कैसे? एक्सपर्ट्स से बात करके उपाय बता रहे हैं लोकेश के. भारती

तकनीकी शब्द और उनका मतलब

1. पीएम 2.5 (PM: पार्टिकुलेट मैटर) : जब हवा में 2.5 माइक्रो मीटर तक के पार्टिकल मौजूद हों तो सेहत को काफी हानि पहुंचाते हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि सांसों के द्वारा ये सीधे फेफड़े, लिवर और किडनी तक पहुंचकर उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। एक आदमी का एक बाल 100 माइक्रोमीटर मोटा होता है। इसमें पीएम 2.5 के लगभग 40 कण रखे जा सकते हैं। ये कण डीजल आदि गाड़ियों के धुएं से निकलते हैं। WHO की नई गाइडलाइंस के अनुसार PM 2.5 को 10 माइक्रोग्राम्स प्रति क्यूबिक मीटर से घटाकर 5 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पर लाना होगा।
2. पीएम 10 : 10 माइक्रोमीटर वाले ऐसे कण जिनमें धूल होती है, धुआं भी और थोड़ी-सी नमी भी, लेकिन ये हमें ज्यादा परेशान नहीं करते।
3. AQI: हवा की क्वॉलिटी कैसी है, उसमें धूल-धुआं कितना है। यह एक्यूआई से ही पता चलता है।  
4. कार्बन मोनो ऑक्साइड: अमूमन पॉलिथीन, टायर आदि को जलाने और ईंधन के जलने से पैदा होती है। अगर वातावरण में कार्बन मोनोऑक्साइड मौजूद है तो यह सांस के जरिए से ऑक्सिजन से पहले शरीर में पहुंचकर जहरीला कार्बाक्सिहिमोग्लोबिन बना लेती है। कहा जाता है कि बंद कमरे में कभी भी दीया, कैंडल या लैंप आदि जलाकर नहीं सोना चाहिए। 
5.  नाइट्रोजन ऑक्साइड: यह गैस ज्यादातर डीजल और पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियों से निकले धुएं में मिलती है।   
6. सल्फर डाइऑक्साइड: यह फैक्ट्रियों और गाड़ियों से निकलती है। इसके बढ़ने से भी सांस लेने में काफी परेशानी होती है।

AQI से समझें हवा की हैसियत
एयर क्वॉलिटी इंडेक्स (AQI) के जरिए आप अपने आसपास की एयर क्वॉलिटी को परख सकते हैं।
रेंज         लेवल          रेटिंग            सेहत से जुड़ी समस्याएं                                                                क्या करें            
0–50,   लेवल 1       शानदार             कोई परेशानी नहीं                                            हर कोई आराम से सांस ले सकता है। लोग बाहर भी घूमने या दौड़ने के लिए जा सकते हैं।
51–100, लेवल 2     अच्छा             ज्यादातर लोगों को परेशानी नहीं, कुछ ज्यादा सेंसिटिव लोगों को थोड़ी परेशानी मुमकिन      ऐसे कुछ लोग जिन्हें परेशानी हों, वे बाहर कम निकलें।
101–150, लेवल 3    हल्का प्रदूषण       सेहतमंद इंसानों को थोड़ी परेशानी हो सकती है, लेकिन सेंसिटिव लोगों को ज्यादा।         बच्चे, बुजुर्ग और ऐसे लोग जिन्हें सांस की समस्या है, उन्हें बाहर निकलने से बचना चाहिए।
151–200, लेवल 4  सामान्य प्रदूषण     सेंसिटिव लोगों को ज्यादा परेशानी होगी, सेहतमंद लोगों को हार्ट और सांस से जुड़ी तकलीफें हो सकती हैं।  बच्चे, बुजुर्ग और ऐसे लोग जिन्हें सांस की समस्या है, वे बाहर न निकलें।
201–300, लेवल 5   भारी प्रदूषण     हेल्दी लोगों को भी सांस आदि से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। जिन्हें सांस और हार्ट से जुड़ी समस्याएं हैं, उन्हें बाहर की हवा में सांस लेने में परेशानी हो सकती है।   301-350 से ज्यादा: खतरनाक प्रदूषण     सेहतमंद लोगों को भी दिक्कत होती है। सिरदर्द, उलटी और सांस लेने में परेशानी हो सकती है। 
                                                                                                                                 सभी लोगों के लिए बाहर निकलना खतरनाक। बच्चे, बुजुर्ग और ऐसे लोग जिन्हें सांस की समस्या है, वे शारीरिक कामकाज बिल्कुल न करें। 
351 से ज्यादा: इमरजेंसी जैसे हालात।    बाहर निकलना खतरनाक। घर में भी खिड़की आदि बंद रखें।

इन मोबाइल ऐप्स से जान सकते हैं हवा की क्वॉलिटी
SAFAR-Air
Platform: एंड्रॉयड, iOS 

The Weather Channel
Platform: एंड्रॉयड, iOS
IQAir AirVisual
Platform: एंड्रॉयड, iOS

Air Matters 
Platform: एंड्रॉयड, iOS

यहां है पलूशन का कारगर सलूशन
घर में लगाएं इन पौधों को
1. पीस लिली: यह हानिकारक कणों को दूर भगाता है। 
कीमत: 150-200 रुपये
2. रबड़ प्लांट: फर्नीचर से निकलने वाले हानिकारक ऑर्गेनिक कंपाउंड से वातावरण को मुक्त करने की क्षमता है। कीमत: 150-200 रुपये
3. मनी प्लांट: यह हवा को शुद्ध करने में काफी मदद करता है। कीमत: 100 से 300 रुपये
4. स्पाइडर: यह कॉर्बन मोनोऑक्साइड और कॉर्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने में सहायक है। 
कीमत: 150 से 200 रुपये
नोट: पौधों की कीमतों में फर्क मुमकिन है। 
जब प्रदूषण हो जाए ज्यादा 
- कमरे की खिड़कियां बंद रखें। घर के अंदर कोई भी चीज जलाने से बचें, मसलन मोमबत्ती या धूप-अगरबत्ती। समय-समय पर गीला पोछा लगाते रहें। प्रदूषण ज्यादा होने पर दिन में 3 से 4 बार गीला पोछा जरूर लगाएं। 
-अगर सुबह-शाम घर के अंदर दरवाजे के पास 2 लीटर पानी खुले में उबाला जाए तो धूल व प्रदूषण के ज्यादातर कण वाष्प के साथ नीचे बैठ जाएंगे। 

एयर प्यूरिफायर की बात
- सांस संबंधी समस्याओं से निजात दिलाने के लिए जरूरी है कि प्यूरिफायर पीएम 2.5 पार्टिकल को फिल्टर करे।
- अगर एयर प्यूरिफायर खरीदना पड़े तो ऊंचे HEPA मतलब ज्यादा-से-ज्यादा महीन कणों को रोकने लायक फिल्टर और हाई क्लीन एयर डिलिवरी रेट हो।
-इसे इस्तेमाल करनेवालों का कहना है कि इससे हालात बदतर होने से तो बच जाते हैं, लेकिन प्रदूषण के घातक हालात में यह कारगर नहीं रहता।

इनहेलर को न भूलें
सांस से जुड़ी बीमारी होने के कारण अस्थमा के मरीजों को साफ हवा की दरकार ज्यादा होती है। इसलिए यह जरूरी है कि वे इनहेलर हमेशा अपने साथ रखें। यहां तक कि परेशानी ज्यादा हो तो बाथरूम में भी इसे ले जाना न भूलें।

मास्क से बचाव
जब घर से बाहर जा रहे हैं तो मास्क जरूर लगाएं। अगर घर में भी बार-बार छींक, खांसी हो रही है तो मास्क लगाकर रखें।  
1. नीला सर्जिकल मास्क: इसे हर दिन बदलना पड़ता है। हेवी पलूशन में कारगर नहीं है। कीमत: 10 से 20 रुपये
2. सूती कपड़े का मास्क: धूल से बच सकते हैं, लेकिन स्मॉग के कणों से बचना मुश्किल। कीमत: 10 से 20 रुपये
3. N95 मास्क: ये ऊपर के दोनों मास्क से बेहतर है। 2 से 3 दिन ही कारगर, जिन्हें सांस की समस्या है उनके लिए मुफीद नहीं। कीमत: 70 से 80 रुपये
4. टोटोबोबो (Totobobo): अच्छा है। पलूशन और उसके बुरे असर से बचाता है। कीमत: 2000 से 2500 रुपये।

हर दिन शरीर को डिटॉक्सिफाई करना बहुत जरूरी

नीचे बताए हुए सभी विकल्प शरीर में फ्री-रेडिकल्स को कम करते हैं और एंटिऑक्सिडेंट को बढ़ाते हैं। इस प्रक्रिया को डिटॉक्सिफिशन कहते हैं। इससे शरीर में बेकार और हानिकारक पदार्थों की मात्रा कम होती है। साथ ही बीमारियों से लड़ने की ताकत या इम्यूनिटी बढ़ती है।

क्या हैं फ्री-रेडिकल्स और एंटिऑक्सिडेंट
फ्री-रेडिकल्स ऐसे ऑक्सिजन युक्त मोलिक्यूल्स होते हैं जो स्वतंत्र रहते हैं। ये भोजन के पाचन के दौरान गैरजरूरी चीजों के रूप में पैदा हो जाते हैं। फ्री-रेडिकल्स पर शरीर का काबू नहीं होता। इनमें फ्री-इलेक्ट्रॉन होते हैं। फ्री-इलेक्ट्रॉन की वजह से ये शरीर में मौजूद किसी भी जरूरी और उपयोगी पदार्थ को भी केमिकल रिऐक्शन से हानिकारक पदार्थ में बदलने की क्षमता रखते हैं। शरीर में एक स्तर तक फ्री-रेडिकल्स होने से कोई खास परेशानी नहीं होती क्योंकि शरीर में पहले से मौजूद एंटिऑक्सिडेंट्स इससे निपट लेते हैं, लेकिन पलूशन आदि की वजह से फ्री-रेडिकल्स बढ़ जाते हैं। ज्यादा फ्री-रेडिकल्स होने से ही खांसी, जुकाम जैसी गड़बड़ियां सामने आती हैं। शरीर के भीतर सूजन बढ़ने लगती है। सीधे कहें तो शरीर में केमिकल लोचे का असल कारण फ्री-रेडिकल्स ही है। ऐसे में हम खानपान न बदलें तो फ्री-रेडिकल्स से एंटिऑक्सिडेंट हारने लगते हैं और शरीर बीमार हो जाता है। 

दिन से रात तक करें डिटॉक्सिफाई
सुबह-सुबह
- 1 कप ग्रीन टी लें। फिर तुलसी के 4 पत्तियों का सेवन करें। 
- हल्दी, गुड़, काली मिर्च और देसी घी की चटनी बनाकर सात दिनों के लिए रख लें। इसके लिए 3 चम्मच हल्दी लें, 30 ग्राम गुड़, एक बड़ा चम्मच देसी घी और चौथाई चम्मच काली मिर्च पाउडर लेकर मिला लें। इसका आधा चम्मच सुबह-शाम गरम पानी के साथ लें। इससे अस्थमा, जुकाम, खांसी, खराश सभी दिक्कतें काबू में रहेंगी। 
- रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच च्यवनप्राश लें। अगर डायबिटीज है तो शुगर-फ्री च्यवनप्राश लें।
- 1 गिलास गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद और दालचीनी का पाउडर (एक चुटकी) आधे नीबू के रस के साथ लें। 
- एक कप ताजे आंवले का जूस, साथ ही, एक कप गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर लेना चाहिए।
 काढ़ा बना लें। सुबह से शाम तक थोड़ीी मात्रा में सेवन करें।
- नीम की पत्तियों से बीमारियों से लड़ने की क्षमता मिलती है। ऐसे में इन दिनों में रोजाना सुबह के समय 4-5 नीम की पत्ती चबाकर खा सकते हैं। इसके अलावा लहसुन की एक कली रोज सुबह खाली पेट पानी के साथ निगल लें।

दोपहर
- सूखे अदरक का एक टुकड़ा गुड़ की दोगुनी मात्रा के साथ चबाएं। इसे दोपहर में भोजन से पहले या बाद में लें। गुड़ खाने से पलूशन का असर कुछ कम जरूर होता है और फेफड़ों को फायदा पहुंचता है। यही कारण है कि कॉटन इंडस्ट्री में हर एंप्लायी को कैंटीन में गुड़ खाने के लिए दिया जाता है।
- सौंठ तीन चुटकी, तीन तुलसी पत्ते, तीन काली मिर्च, दालचीनी का पाउडर दो चुटकी लें और इन सभी को मिलाकर काढ़ा या चाय के रूप में दोपहर बाद एक बार एक कप जरूर पिएं। 
- 2 चम्मच एलोवेरा जूस को 2 चम्मच गर्म पानी के साथ लें।  आंवले का दो चम्मच रस, एक चौथाई चम्मच शहद और चौथाई चम्मच हल्दी पाउडर मिलाकर पिएं तो फायदा होगा। 
- 1 गिलास गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद और दालचीनी का पाउडर (एक चुटकी) आधे नीबू के रस के साथ लें। 

रात 
एक कप गर्म पानी के साथ हरितकी (हरड़) का चूर्ण 45 दिनों के लिए लें। इसका सेवन शरीर को प्रदूषण से लड़ने के काबिल बनाएगा और फेफड़े मजबूत होंंगे। खाने के आधे घंटे बाद लें।

इन उपायों को अपनाने से भी पलूशन से लड़ने में बहुत फायदा
-सुबह उठने के बाद एक गिलास गुनगुने पानी से गरारे करें। 
-गरारे करने के बाद मुंह में सरसों का तेल भर लें। इसे पीना नहीं है। 3 से 4 मिनट तक सरसों के तेल को मुंह में चलाएं। इसके बाद फेंक दें। इससे दांतों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। विंड पाइप यानी सांस की नली लचीली होती है। यह तेल कुछ हद तक बाहर से आने वाले इन्फेक्शन को रोकने में भी कारगर है।
- बाहर निकलते समय नाक के दोनों छिद्रों में सरसों या तिल का तेल लगा लें। इसे अपनी तर्जनी उंगली की मदद से लगा सकते हैं। इन दिनों चाहें तो अपने नाक के बाल न काटें। इससे हवा में मौजूद कई डस्ट पार्टिकल सांस की नली और फेफड़ों तक नहीं पहुंच सकेंगे। 
- खाना जब भी हो, गर्मागर्म खाएं। एक दिन पहले वाला न खाएं।
- तिल  के तेल से मसाज और गुनगुने पानी से स्नान करें। 
-अगर सीने में कफ जमा हो तो 1 गिलास दूध में 5 से 7 किशमिश, 2 से 3 खजूर डालकर 10 मिनट उबाल लेना है। फिर जिनकी उम्र 5 साल से ज्यादा है वे बिना छाने ही इन्हें पी लें और किशमिश आदि को खा लें। 
-कई लोग सोते समय खिड़की खोल देते हैं। इससे बाहर की ठंडी हवा अंदर आ जाती है और खराश पैदा कर देती है।

जलनेति से भी फायदा
सुबह खाली पेट आधा लीटर पानी उबालकर ठंडा कर लें। जब पानी गुनगुना रह जाए तब आधा चम्मच सफेद या सेंधा नमक मिला लें। अब टोंटीदार लोटा लेकर पानी को लोटे में भर लें और कागासन में बैठ जाएं। जो नासिका चल रही हो, उसी हथेली पर लोटा रख लें और टोंटी को चलती नासिका पर लगाएं और गर्दन को दूसरी तरफ झुका लें। मुंह खोलकर मुंह से सांस लेते रहें। लोटे को थोड़ा ऊपर उठाते ही दूसरी नाक से पानी आना शुरू हो जाएगा। इसी तरह दूसरी नासिका से भी कर लें। हाथों को कमर के पीछे बांधकर खड़े हो जाएं और थोड़ा आगे झुककर कपालभाति क्रिया गर्दन को सामने, नीचे, दाएं व बाएं घुमाकर बार-बार कर लें। हर दिन खाली पेट 5 मिनट तक कर सकते हैं। सावधानी: अभ्यास योग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही करें।   

स्नेहन और स्वेदन
स्नेहन: स्नेह का मतलब शरीर को चिकना करने से है। इसे शरीर पर तेल आदि स्निग्ध पदार्थों की मालिश करके किया जाता है। 
स्वेदन: वाष्प स्वेदन में स्टीम बॉक्स में मरीज को लिटाकर या बिठाकर स्वेदन किया जाता है। स्वेदन को घर में खुद भी कर सकते हैं। गर्म चाय या गर्म पानी पीने के बाद मोटा कंबल ओढ़ लेते हैं।

नेचरोपैथी
- सुबह योगासन और प्राणायाम के बाद सूर्य स्नान करें। इसके लिए कपड़े उतने ही पहनें जितना ठंड से बचाव के लिए जरूरी हों। 30 से 45 मिनट काफी हैं।
- फिर 8 बजे से पहले 250 एमएल सफेद पेठे का जूस लें।
- फिर 10 बजे से पहले कोई एक प्लेट मौसमी फल (सेब, संतरा, पपीता, मौसमी, शरीफा) लगभग 500 ग्राम खा लें।
- दोपहर 12 बजे 400 से 500 ग्राम मौसमी सलाद (मूली, गाजर, खीरा आदि) खाएं। इसके बाद अपना सामान्य खाना खा सकते हैं। इसमें रोटी और मौसमी सब्जी लें। 
- शाम में 250 एमएल बथुआ और टमाटर जूस लें। 
नोट: किसी भी जूस में नमक या नीबू, कुछ भी न मिलाएं। 

होम्योपैथी
होम्योपैथिक दवाएं: Arsenic, Blatta, Ipecac, Lycopodium, Sulphur & Thuja 
बच्चों में फेफड़ों का इन्फेक्शन: आजकल ऐसी परेशानी बच्चों में काफी होती है। बच्चों के लिए होम्योपैथी दवाइयां: Antim Tart, Kali Sulph, Pulsatilla, Bacillinum आदि। 
कितनी मात्रा में: 30 potency में 4 गोली लें, 6 महीने तक।

ऐसे रहेंगे आपके फेफड़े मजबूत
जब फेफड़े मजबूत होंगे तो शरीर के बाकी अंग भी मजबूत होंगे। दरअसल, शरीर के सभी अंगों में ऑक्सिजन जिसे प्राण वायु कहते हैं, पहुंचाने की जिम्मेदारी शरीर में मौजूद दो फेफड़ों की ही होती है। इसलिए फेफड़ों को मजबूत करना बहुत जरूरी है।

4 बातें जिनसे फेफड़े होंगे दमदार...
1. नींद पूरी और खानपान सही हो
हर शख्स के लिए हर दिन 7 से 8 घंटे की नींद लेना जरूरी है। इससे शरीर के सभी अंग सही तरीके से काम करते हैं। जहां तक डाइट की बात है तो कार्बोहाइड्रेट- चावल या रोटी, प्रोटीन- दाल, फैट्स- सरसों का तेल या देसी घी, मिनरल और विटामिन- हरी सब्जियां, फल सभी शामिल हों। हमारी हर डाइट में प्रोटीन जरूर शामिल होना चाहिए। 
मौसमी फल, सब्जियां: इन्हें खाने में जरूर शामिल करें। कम से कम हर दिन 1 से 2 कटोरी हरी सब्जियां, जैसे- पालक, सरसों का साग, फूल गोभी आदि और हर दिन 1 से 2 फल जैसे- सेब, संतरा, अनन्नास आदि सुबह नाश्ते के बाद लें। 

2. योग और एक्सरसाइज
-हर दिन सुबह के वक्त 20 से 25 मिनट तक योग और एक्सरसाइज करें या फिर दोनों करें।
-योगासन और प्राणायाम से पहले सूक्ष्म क्रिया जरूर करें। जैसे शरीर के जोड़ों: कलाई, उंगलियों, गर्दन आदि को 5 बार घड़ी की सुई की दिशा में और 5 बार इसके विपरीत घुमाएं। ऐसा 5-5 बार करें।
-शुरुआत कपालभाति से करें। फिर नीचे बताए हुए योगासन और प्राणायाम को क्रमानुसार 15 से 20 मिनट तक करें। हर एक आसन 2 से 3 बार करें।
-सही तरीके से सांस लें। जब भी सांस अंदर खींचे पेट बाहर की ओर निकले और जब छोड़ें तो पेट अंदर जाए।
-1. ताड़ासन, 2. कटिचक्रासन, 3. उत्तानपादासन, 4. सेतुबंध आसन, 5. भुजंगासन, 6. उष्ट्रासन, 7. अनुलोम-विलोम, 8. उज्जायी प्राणायाम, 9. भस्त्रिका प्राणायाम।
-एक बात का ध्यान रखें कि कोई भी योगासन या प्राणायाम जबर्दस्ती न करें। आराम से करें। 

3. धूप जरूर लें
शरीर में इसकी कमी बिलकुल भी न हो। शरीर में जहां भी कोई परेशानी देखी जाती है, उसके पीछे एक वजह विटामिन-डी की कमी होती है। इसलिए जरूरी है कि जाड़ों में हम हर दिन सुबह 9 से 12 बजे तक 35 से 40 मिनट के लिए और गर्मियों में सुबह 8 से 11 बजे के बीच 30 से 35 मिनट के लिए धूप में जरूर बैठें। 

4. सिगरेट बिलकुल नहीं
बाहर का खाना, पैक्ड फूड बिलकुल बंद कर दें। रिफाइंड ऑयल और मैदे से बनी चीजें न खाएं। सिगरेट और नशे से दूर रहें। पैसिव स्मोकिंग से भी बचें।

जांचें दम और करें एक्सरसाइज
1. Balloon
गुब्बारे को अपने मुंह से हवा भरकर फुलाएं। पहले ज्यादा से ज्यादा हवा अपने फेफड़ों में भरें। इसके बाद उसे बलून के अंदर डालें। अगर फूले हुए बलून हों तो उनसे हवा निकालकर उन्हें दोबारा फुला सकते हैं। इस बात का भी ध्यान रखें कि बलून को फुलाना तब बंद कर दें जब मुंह या जबड़े में दर्द होने लगे। ऐसा देखा जाता है कि अगर पहले दिन किसी ने एक बलून फुलाया और वह दूसरे दिन 2 फुला लेता है तो यह फेफड़ों की बढ़ती क्षमता को ही बताता है। कोरोना से उबरे हुए 3 से 4 महीने हो गए हैं तो 3 से 4 बलून फुला सकते हैं। 
कीमत: 20 से 50 रुपये, (10 से 20 गुब्बारों का पैकिट)

2. Three Balls Spirometer
सांस की क्षमता को जांचने और बढ़ाने में 'थ्री बॉल्स स्पाइरोमीटर' का इस्तेमाल भी कारगर है। इसमें एक पाइप होता है और 3 प्लास्टिक की हल्के बॉल। पाइप में फूंक मारनी होती है। अगर किसी के फूंकने से तीनों बॉल ऊपर उठ जाती हैं तो समझें उनके फेफड़ों की क्षमता अच्छी है। अगर 2 बॉल उठ रही हैं तो क्षमता कुछ कम है। अगर 1 ही उठ रही है तो उन्हें अपनी क्षमता को बढ़ाने की जरूरत है। इस मशीन का इस्तेमाल दिन में 2 से 3 बार कर सकते हैं जब तक क्षमता सही न हो जाए। 
कीमत: 250 से 400 रुपये

3. Peak Expiratory Flow Meter
फेफड़ों की क्षमता को मापने के लिए पीईएफआर टेस्ट भी एक अच्छा तरीका है। इसमें भी फूंक मारनी होती है। फूंक मारने के बाद अगर संकेत हरे रंग तक पहुंचता है तो फेफड़ों की स्थिति अच्छी है। अगर पीले रंग तक पहुंचता है तो सुधार की जरूरत है और लाल रंग पर मामला अटकता है तो डॉक्टर से सलाह ले सकते हैं या फिर धीरे-धीरे यहां बताए हुए तरीकों से फेफड़ों की क्षमता बढ़ा सकते हैं।
कीमत: करीब 800 रुपये
 
4. सांस रोकना
इनके अलावा सांस रोकने की क्षमता से भी पता चलता है कि फेफड़े कैसा काम कर रहे हैं। अगर कोई शख्स लंबी सांस खींचकर 1 से डेढ़ मिनट तक सांस रोककर रख ले तो यह मान लिया जाता है कि उसके फेफड़ों की क्षमता अच्छी है क्योंकि उसके फेफड़ों ने काफी अच्छी मात्रा में बाहर की हवा को शरीर के भीतर पहुंचाया। यहां इस बात का ध्यान रखें कि अगर कोई 30 सेकंड तक ही अपनी सांस रोक पाता है तो धीरे-धीरे कोशिशों से उसकी क्षमता भी बढ़ जाती है।
ध्यान दें: ऊपर बताए हुए सभी तरीकों को 7 साल से बड़ा बच्चा भी कर सकता है, खासकर बलून वाला।


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